Thursday, 28 August 2025

क्या मिल गई आजादी?


15 अगस्त को सभी देशवासियों में देश प्रेम जाग जाएगा। साल में ऐसा दो बार होता है। बाकी समय किसी के पास सोचने का भी समय नहीं होता। और पैसे कमाने के लिए सब देश भक्ति भूल जाते हैं।

हम कौन है और हमारी अवकात क्या है?

हम भूल जाते हैं कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं, लेकिन ये जरूर जानते हैं कि पैसा हमारे जीवन में जरूरी है। इसलिए रुपए कमाना ही मुख्य उद्देश समझते हैं। लेकिन पैसे कमाने के लिए कई लोग इतने गिर जाते हैं कि लोगों को ठगना चालू कर देते हैं, लूटना, चोरी करना, घूस लेना, घोटाले करना ऐसे बहुत से अनुचित कार्य करने लग जाते हैं, जिससे समाज और देश को आर्थिक नुकसान के साथ सामाजिक समस्या का सामना करना पड़ता है।

पूंजीवाद और मनुवाद से कब मिलेगी आजादी 

हमारा देश को अंग्रेजी सरकार से आजादी तो मिल गई, लेकिन ये मनुवादी और पूंजीवादी सरकार से कब आजादी मिलेगी? हमारा भारत महान है। आई लव माई इंडिया और छत्तीसगढि़या सबले बढि़या। ऐसे कहने बस से सब ठीक-ठाक नहीं हो जाता। क्या अच्छा है ये भी देखना पड़ता है। हवाहवाई में अच्छा है कहने से सुंदर नहीं होगा। इसके लिए अच्छा होना पड़ता है। हर एक नागरिक को बढि़या बनना पड़ेगा। अब सोचिए क्या दस प्रतिशत भी अच्छा है? 

मेरी नजर में

मेरी नजर में कोई अच्छा नहीं है। अब ये मत कहना आप निराशावादी है, नहीं दोस्तों मैं निराशावादी नहीं हूं। मैं तो आशावादी और सुधारवादी हूं। हमेशा लोगों के लिए अच्छा सोचता हूं। बेहतर समाज, अच्छा देश रहे यही चाहता हूं। इसी सुधार के कारण मैं इस लेख और बहुत से लेख को लिखता हूं। मैं आशा करता हूं कि मेरे लेख से लोग कुछ समझे और अपनी जिंदगी में सुधार लाएं। 

सभी जगह निजीकरण का बोलबाला

सरकारी संस्थान धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। सभी संस्थान पूंजीपतियों के हाथों में चले गए हैं। हर जगह निजी कंपनी खुली है, जिसमें देश हित की बात तो छोड़िए, यहां देश को कैसे लूटना है। यहां की जनता का शोषण कर किस प्रकार से पैसे कमाकर कंपनी को फायदा होगा। कंपनी के फायदे के लिए कुछ भी करने को तैयार है चाहे देश की जनता मरे इससे कोई लेना-देना नहीं है। 

सरकारी संस्थानों की जर्जर स्थिति क्यों?

हमें क्या चाहिए? रोटी, कपड़ा और मकान। फ्री में कोई नहीं देगा। इसके लिए हमें क्या चाहिए। रोजगार चाहिए और रोजगार के लिए अच्छा हेल्थ और शिक्षा होना चाहिए। तभी तो हम काम कर पाएंगे। लेकिन क्या हमें अच्छा हेल्थ, अच्छी शिक्षा और रोजगार मिल पा रहे हैं? 

शिक्षा व्यवस्था बदहाल

हजारों सरकारी स्कूल को सरकार बंद कर दिए। क्या सरकारी स्कूल से हमें आजादी चाहिए थी? कुछ बचे सरकारी स्कूलों की हालत इतना खराब कर दिया है कि वहां निम्न वर्ग के बच्चे भी नहीं पढ़ना चाहते हैं। अतिनिम्न वर्ग के ही बच्चे मजबूरी में जा रहे हैं। सरकार चाहती ही है कि सरकारी स्कूल बंद हो और निजीकरण से जितना हो सके उतना कमाया जा सके। निजी स्कूल में भी अच्छा सीखने को मिलेगा ये भी आपका भ्रम मात्र है।

अस्पतालों में पंजीयन के लिए भारी जद्दोजहद

सरकारी अस्पतालों की स्थिति से तो रोना आता है। बहुत दुख होता है जब रोगी लंबी लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करता है। बिलासपुर के सिम्स हॉस्पिटल कुछ दिन पहले जाना हुआ। पर्ची के लिए लाइन लगने से पता चला ऑनलाइन आभा ऐप से पंजीयन कराना होता है। उसके बाद उस पंजीयन नंबर को लेकर लाइन में लगना होता है। ऑनलाइन पंजीयन के लिए व्यक्ति के पास स्मार्ट फोन होना चाहिए, उस फोन में डाटा रिचार्ज होना बहुत जरूरी है। इतने में भी काम नहीं बनने वाला इससे महत्त्वपूर्ण जरूरी मोबाइल में नेटवर्क होना चाहिए, जिससे नेट चल सके सभी पंजीयन होगा।

लोगों का समय हो रहा बर्बाद

ऑनलाइन पंजीयन के बाद ऑफलाइन पंजीयन के लिए लंबी लाइन में लगना होगा। पंजीयन के बाद जिस विभाग ओपीडी में जाना है, वहां भी पर्ची पर ठप्पा लगाने के लिए लंबी लाइन का सामना करना होगा। इसके बाद ओपीडी के डॉक्टर को दिखाने के लिए लाइन में लगना होगा। डॉक्टर को दिखाने के बाद मरीज को लगेगा कि अब मैं जीत हासिल कर ली। तो ये गलत है अभी तो और बचा है दोस्त। 

जनता को मिलती है ठोकर

डॉक्टर के लिखे दवाई को लेने के लिए एक टोकन लेना है महिला या पुरुष का। तब जाकर दवाई वाला काउंटर में लाइन लगाना है। (मध्यम वर्ग की समस्या यही होता है की कुछ पैसा बच जाएं, जिससे राशन-पानी की व्यवस्था हो जाए) इसी सोच को लेकर फ्री में दवाई लेने के लिए लाइन में लग जाता है। सोचता है अगर बाहर गया तो हजारों रुपए की दवाई खरीदकर खानी पड़ेगी। ये सोचते-सोचते लाइन में बारी आ जाती है। लेकिन ये क्या पर्ची पर लिखी दवाई में एक ही दवाई मिली। बाकी दवाइयां बाहर से खरीद लेने की आवाज आती है। फिर मरीज पर्ची सहेजते हुए चला जाता है।

नहीं मिल रही दवाई

वहीं उसी कैंपस में रेडक्रास मेडिकल में लंबी लाइन होती है। सोचता है यहां कुछ छूट के साथ दवाई मिल ही जाएगी, लेकिन यहां भी घाव में नमक छिड़का जाता है। लाइन में लगने के बाद भी कोई छूट नहीं मिलती है। 

रेल की स्थिति खराब

रेल लेट चल रही है। रेलवे स्टेशन में लोग रेल का इंतजार में जमीन पर लेटे पड़े हैं। कोई कुछ पूछने वाला नहीं है। रेल की जनरल डिब्बे की हालत निम्न वर्ग के लोग भली भाती जानता है।

सरकार चाहती है नीजिकरण

पोस्ट ऑफिस की लाइन इतनी लंबी रहती है कि पोस्ट ऑफिस और सड़क दोनों मिल जाते हैं। लोग कहते हैं इससे अच्छा तो कोरियर है। हां सरकार यही चाहती है। सरकारी रेल, पोस्ट, स्कूल, अस्पताल को बंद कर दे जिससे निजीकरण हो और कंपनियों को फायदा हो। क्या निजी स्कूल में अच्छी शिक्षा मिल रही? ठीक इसी प्रकार कोरियर में होगा। सरकार सरकारी संस्थानों में सुधार करने की जगह बंद कर रही है। क्या अब भी लगता है आप को पूरी आजादी मिल गई है। 

पैसे कमाने के लिए तकलीफ न दें

बेहतर समाज और देश के लिए हमें हर एक नागरिक का कर्तव्य होता है ऐसा कोई कार्य न करें जिससे समाज और देश को नुकसान हो। औरों को तकलीफ हो। पैसे कमाने के लिए किसी को तकलीफ दे बहुत ही गलत है।

टिकेश कुमार

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