Thursday, 17 September 2026

कोलकाता से नक्सलबाड़ी



कोलकाता, पश्चिम बंगाल और नक्सलबाड़ी को करीब से जानने की जिज्ञासा लंबे समय से मन में थी। कोलकाता कभी ब्रिटिश भारत की राजधानी रहा और औपनिवेशिक दौर में व्यापार तथा प्रशासन का प्रमुख केंद्र भी। आज भी यह देश के प्रमुख महानगरों में अपनी अलग पहचान रखता है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की मिट्टी साहित्य, संस्कृति, राजनीति और आंदोलनों की लंबी परंपरा के लिए जानी जाती है। रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस और बटुकेश्वर दत्त जैसे अनेक चर्चित व्यक्तित्वों ने इस धरती की पहचान को समृद्ध किया। इसी बंगाल में 1967 में दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से एक किसान आंदोलन ने देश की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया। चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल से जुड़े इस आंदोलन ने जमीन, किसान और वर्गीय शोषण के सवालों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। आंदोलन से जुड़ा प्रसिद्ध नारा “अमार बाड़ी, तोमार बाड़ी, नक्सलबाड़ी, नक्सलबाड़ी” उस दौर में किसानों के संघर्ष और जमीन पर अधिकार की भावना का प्रतीक बन गया।

किताबों की तलाश में कॉलेज स्ट्रीट

कोलकाता घूमने की हसरत के साथ कुछ काम और प्रगतिशील हिंदी किताबों की तलाश भी थी। इसलिए हम पहुंच गए कॉलेज स्ट्रीट, जिसे किताबों की दुनिया के लिए जाना जाता है। किताबों की दुकानों के बीच घूमते हुए पश्चिम बंगाल की राजनीति पर कई लोगों से बातचीत का मौका मिला। सुबह हम नेशनल बुक एजेंसी पहुंच गए, लेकिन दुकान अभी खुली नहीं थी। पास की एक दुकान पर बैठे दुकानदार से बातचीत शुरू हुई। शुरुआत सामान्य बातचीत से हुई, लेकिन धीरे-धीरे चर्चा पश्चिम बंगाल की राजनीति तक पहुंच गई। दुकानदार ने लंबे समय तक कांग्रेस के शासन, फिर करीब 35 वर्षों तक चले वाम मोर्चे और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने की चर्चा की। उनका मानना था कि वाम मोर्चा सरकार ने गरीबों, किसानों और मजदूरों के लिए काफी काम किया, लेकिन समय के साथ वह नई पीढ़ी को पर्याप्त नेतृत्व नहीं दे सकी। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक अति-आत्मविश्वास ने वाम मोर्चे को नुकसान पहुंचाया। ममता बनर्जी के 15 सालों के शासन के दौरान लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और बदलते राजनीतिक माहौल का जिक्र करते हुए उन्होंने भाजपा के सत्ता में आने की बात कही। जब उनसे पूछा कि इन सभी सरकारों में उन्हें सबसे बेहतर कौन-सी लगी, तो उनका जवाब था—वाम मोर्चा। उनके अनुसार उस दौर में महंगाई अपेक्षाकृत कम महसूस होती थी और गरीब, किसान तथा मजदूर के मुद्दों पर सरकार का ध्यान अधिक था। भाजपा को सत्ता में आए लगभग चार महीने हुए हैं, जनता को बड़ी उम्मीद थी, लेकिन अभी तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और उनके मंत्रियों व विधायकों की तामझाम के साथ वीआईपी सुरक्षा देखने को मिल रही है। नेताओं के आने से पहले सड़कों पर चूना मारना और लोगों को खाली करने का काम किया जाता है, लेकिन वाम सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य सामान्य व्यक्ति की तरह घूमते थे। आज भी पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी नेशनल बुक एजेंसी पुस्तक खरीदने आती है बिना सुरक्षा और सामान्य कपड़ों में। लोग उन्हें जानते भी नहीं कि पूर्व सीएम की बेटी हैं।

कोलकाता की गलियों में इतिहास और वर्तमान

कोलकाता भ्रमण का पहला दिन विक्टोरिया मेमोरियल, प्रिंसेप घाट, हावड़ा ब्रिज और बड़ा बाजार घूमते हुए बीता। रास्ते में कई लोगों से बातचीत हुई। किसी से रास्ता पूछा तो उसने रुककर समझाया, किसी से किसी जगह के बारे में पूछा तो उसने सहजता से जानकारी दी। अनजान शहर में लोगों का यह व्यवहार यात्रा को और आत्मीय बना रहा था। दूसरे दिन सुबह हम रवींद्रनाथ ठाकुर के पुश्तैनी घर जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी पहुंचे। आज यह घर संग्रहालय बन गया है। इसके बाद दोपहर में साइंस सिटी पहुंचे। यहां रोपवे, टाइम मशीन, डायनासोर, 3D अंतरिक्ष, मानव के उद्भव और विकास तथा ब्रह्मांड से जुड़ी प्रदर्शित सामग्री ने विज्ञान को बेहतर और मनोरंजक तरीके से समझाया।लेकिन यात्रा अभी पूरी नहीं हुई थी। अगली सुबह मंजिल थी नक्सलबाड़ी।

नक्सलबाड़ी : एक नाम, जिसने देश की राजनीति बदल दी

दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी पहुंचते ही मन में सबसे पहले वही सवाल उठा आखिर इस छोटे से इलाके के नाम ने भारतीय राजनीति में इतनी बड़ी जगह कैसे बना ली? 1967 का नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह भारतीय वामपंथी राजनीति और किसान आंदोलनों के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। भूमि संबंधों, बटाईदार किसानों और ग्रामीण शोषण के सवालों को लेकर यहां संघर्ष तेज हुआ। आंदोलन के दौरान हिंसक टकराव भी हुए और पुलिस कार्रवाई में किसानों की मौत हुई। बाद के वर्षों में इसी घटना से जुड़ा “नक्सलवादी” शब्द देश की राजनीति में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगा। हम सुबह नक्सलबाड़ी के एक छोटे से होटल में रुके। नाश्ते में पूड़ी-सब्जी और रसगुल्ला लिया। वहां बैठे लोगों से जब नक्सलबाड़ी के बेंगई जोत क्षेत्र में किसान आंदोलन की शुरुआत के बारे में पूछा तो उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुनी बातें साझा कीं। स्थानीय लोगों की स्मृतियों में वह दौर आज भी जिंदा है। उनके अनुसार किसानों ने जमीन और शोषण के सवाल पर जमींदारों के खिलाफ संघर्ष किया था। आज भी नक्सलबाड़ी के आंदोलन और उसमें मारे गए लोगों की स्मृति स्थानीय समाज में मौजूद है। हर वर्ष 25 मई को बेंगई जोत सहित आसपास के क्षेत्रों में शहीद किसानों की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

चाय बागानों की हरियाली और छत्तीसगढ़ से जुड़ी कहानी

नक्सलबाड़ी की यात्रा केवल इतिहास तक सीमित नहीं रही। नाश्ते के बाद हम चाय बागान की ओर निकल पड़े। दूर-दूर तक फैली चाय की हरी झाड़ियां, उनके बीच काम करते श्रमिक और वातावरण में घुली हरियाली मन को बेहद आकर्षित कर रही थी। बागान में कई मोर भी चहल-पहल करते दिखाई दिए। यहीं हमारी मुलाकात छत्तीसगढ़ के जशपुर से जुड़े कुछ लोगों से हुई। कोई सुपरवाइजर के रूप में काम कर रहा था, कोई ड्राइवर था तो कोई मजदूरी कर रहा था। कई लोगों ने बताया कि उनके दादा आर्थिक तंगी के कारण वर्षों पहले यहां काम करने आए थे। रोजगार की तलाश में आई वह पीढ़ी यहीं बस गई और अब उनकी अगली पीढ़ियां भी इसी इलाके से जुड़ गई हैं। चाय बागान में यह जानने का मौका मिला कि चाय की कोमल पत्तियों को किस तरह तोड़ा जाता है और आगे प्रसंस्करण के बाद उन्हें पैकेट में पहुंचाया जाता है। हरी चाय की झाड़ियों के बीच खड़े होकर यह समझना अपने आप में एक अलग अनुभव था कि जिस चाय की चुस्की हम रोज लेते हैं, उसके पीछे कितने लोगों का श्रम जुड़ा है।

नई पीढ़ी के लिए नक्सलबाड़ी की याद

बागान में कुछ युवाओं से भी बातचीत हुई। उन्होंने बताया कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के बारे में उन्होंने अपने पिता और दादा से सुना है। उनके लिए यह उनके क्षेत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक युवा ने कहा कि उनकी समझ में यह आंदोलन मजदूर और किसान के सवालों से जुड़ा था और आज भी नक्सलबाड़ी से जुड़े नेताओं के प्रति स्थानीय लोगों में सम्मान की भावना दिखाई देती है। बेंगई जोत गांव में आज भी देश-दुनिया के कम्युनिस्ट नेता कार्ल मार्क्स, एंजेल्स, लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग, लिन बियाओ, चारु मजूमदार और सरोज दत्त की मूर्तियां लगी हुई हैं।

- गणपत लाल

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