Monday, 10 May 2021

कोरोना ले जियादा लाकडाउन म जावत हे मनखे के जान

जबले कोरोना आए हे, तब ले मनखे के जीना हराम होगे हे. सुख चैन ह छीन गे हे. बिहिनिया अखबार ल खोलबे त कोरोना, मोबइल म कोनो ल फोन करबे त कहिथे कोरोना, टीवी ल चालू करबे त कोरोना, रेडियो ल सुनबे त कोरोना, सोसल मिडिया म कोरोना, बस कोरोना-कोरोना छाए हे. भइगे जउन मेर देखबे-सुनबे कोरोना के गोठ चलत हे. लइका से लेके सियान तक सब कोरोना के मारे परसान हे. कोरोना ले जियादा लाकडाउन ह जिवलेवा होगे हे. कोरोना के समय साल भर म तालाबंदी के चक्कर म करोड़ों मनखे के रोजगार छीन गे.

देस के ज्यादातर राज म तालाबंदी कर देहे. लॉकडाउन के दौरान लाखों मनखे ल अपन नौकरी ले हाथ धोय बर पड़ीस. ये साल अप्रैल म 70 लाख ले जियादा लोगन के नौकरी ह छूट गे. ये मै नइ काहत हंव रिसर्च फर्म सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी ह काहत हे.  एकर सेती देस म बेरोजगारी दर बढ़ के 7.97 फीसदी होगे हे. पहली मार्च म 6.5 फीसदी रहिस. अइसने पूरा कोरोना काल के बात करबे त करोड़ों मनखे के नौकरी ह छूट गे. कतको ह ये दुख ल नइ सह सकिस त आत्महत्या करके मरगे. कतको के भूख म जीव जावत हे. कतको मनखे के इलाज के अभाव म जीव छूटत हे. देस भर म हाहाकार माचे हे. 

कोरोना ले बाचे बर सरकार अस्पताल अउ स्वास्थ सुविधा ल बढ़ाय बर छोड़ के लॉकडाउन ल लगातार बढ़ावत हे. अउ काहत हे कि घर ले कोनो बहिर मत निकलव. घर म राहव स्वस्थ अउ सुरक्षित राहव. अरे भईया ये सरकार ल कोन समझाय मनखे घर म रही त खाही का ला. बिना खाय कुपोसन अउ भूख म लोगन ह मरत हे. नवा-नवा बीमारी ह मनखे ल पकड़त हे. फेर का करबे कोरोना के चक्कर म ओपीडी ल बंद कर दे हे. कोरोना के सेती दूसर बीमारी के इलाज नइ होवत हे. तालाबंदी के सेती बस अउ दूसर यातायात के साधन ल बंद कर दे हे. मनखे बीमार पड़त हे त ओकर प्राण घर म छुट जावत हे अस्पताल नइ आ पावत हे. 

सबले ज्यादा रोज के दिहाड़ी करइया गरीब मनखे ह परेसान हे. रोजी-रोटी बिना बिचारामन तरसत हे. घर म खाय बर नइ हे. अपन अउ अपन लइका के पेट ल भर नइ पावत हे. मजदूरी करइयामन रोज पूछथे कब लाकडाउन खुलही त कब काम म जातेन. रो-रो के दिन ल काटत हे. सोच-सोच के बिचारामन ल नींद नइ आवत हे. इकर कोनो देखइया नइ हे. कोनो एकर दरद ल समझइया नइ हे. केंद्र अउ राज सरकार ह लाकडाउन-लाकडाउन खेलत हे. आम जनता के जीव ह रोज जावत हे. काही बीमारी होवत हे त पहली कोरोना के जांच कराय ल काहत हे, तब तक मनखे के जीव ह छूट जावत हे. 

देस भर म अफरा-तफरी मचे हे. मरीज बर अस्पताल नइ हे. अस्पतला हे त खटिया नइ हे. खटिया हे त डॉक्टर नइ हे. डॉक्टर हे त ऑक्सीजन नई हे. दवई अउ इंजेक्शन नइ हे. अउ कतेक ल लमाबे. मरीज के जान ह अस्पताल के अव्यवस्था के सेती जावत हे. कोरोना के आड़ म गोली-दवई के कालाबाजारी होवत हे. सासन-प्रसाशन अस्पताल के अव्यवस्था ल सुधारे बर अउ कालाबाजारी ल रोके म लाचार साबित होवत हे. ठीक से अस्पताल अउ स्वास्थ बेवस्था नइ कर पावत हे. जनता के जीव ह बदइन्तजामी म जावत हे. मनखे के लास ल जलाय बर लकड़ी नइ हे. दफनाय बर जमीन नइ हे.

चारो मुड़ा रोहा-राही मचे हे. फेर सरकार ल कोनो संसो नइ हे. इहा के नेतामन ल कइ राज के चुनाव के रैली-सभा ले फुरसत नइ मिलिस. अब चुनाव होइस त समीक्षा म जुटे हे. हारेन त काबर हारेन. फेर अपन जनता के बिलकुल ख्याल नइ हे. चुनाव ले खाली होईस त अब लाकडाउन-लाकडाउन चिल्लावत हे. ये तो अइसे होगे जइसे बिलइ ह सौ मुसवा ल खाके हज जाथे. लाखो के भीड़ म सामिल होके आज जनता ल काहत हे घर म राहव अउ सोसल डिस्टेंसिंग के पालन करव. वाह रे सरकार तोर पार ल कोई नइ पाय. बली के बकरी गरीब मनखे ह बनथे. बाकी तो नेतामन आनी-बानी के गोठियावत हे अउ बकबकावत हे.

गनपत लाल साहू, रायपुर

Sunday, 7 March 2021

तिहार के नांव म झन होय जल-जंगल के नास

होरी तिहार ल परेम, भाईचारा अउ मेलजोल के तिहार कहे जाथे। फेर का करबे अब तिहार के रंग-रूप ह बिगड़त जावत हे। मनखे ह ए तिहार ल दारू, गांजा अउ भांग के बना लेहे। त दूसर डाहर हर साल तिहार के नाम म कतको पेड़मन के बलि चड़हत जावत हे अउ पीये बर पानी नइ हे फेर रंग घोर के रिकोवत हन। एक डाहर परियावरन ल बचाय बर लकड़ी के चूल्हा नइ जलाय बर काहत हे त दूसर डाहर मनखे ह आसथा के नांव म भारी संख्या म पेड़ ल काट के जंगल के नास करत हे। एक डाहर पानी बचाय के आंदोलन चलत हे त दूसर डाहर तिहार के नांव म करोड़ो लीटर पानी ल फोकट म उलचत हे। ए ह गुने के गोठ आय। 
का कोनो माइलोगिन ल जला के जसन मनाना उचित हे। हमर देस के संसकिरिति के रग-रग म मया-दुलार समाय हे। फेर अइसन काकरो मउत म उच्छाह मनाना कतेक जायज हे। भारी संख्या म लकड़ी ल नइ जला के अपन आस-पास पड़े कचरा ल सकेल के जलाना चाही। ए दिन कसम खाना चाही कि सबो बुराई ल तियाग के भाईचारा, सदभावना अउ परेम ल अपनाबो। 
देस भर म परंपरा के नांव म परियावरन के साथ खेलवाड़ होवत हे। अपन आप ल जागरूक कहइया मनखे ह घलो ए दिन होलिका दहन बर जंगल अउ दूसर जगह ले लकड़ी सकेल के जलाथे। आज धीरे-धीरे जंगल के नास होवत हे। एकर ले कई परकार के जीव-जंतु नंदावत घलो हे। पेड़-पौधा के हरियाली के नामो-निसान मेटावत हे। फेर हमन काबर परियावरन अउ खुद के नुकसान करे म अड़े हाबन। गांव हो या सहर सबो जगह होली के दहन करके खुसी मनाथन। एकर बर कई पेड़मन के बलि देवा जथे। लकड़ी के जले ले हवा ह दूसित हो जाथे। एकर ले मनखे ल सांस ले म बड़ दिक्कत जाथे अउ फेफड़ा ले संबंधित कई बीमारी घलो हो जाथे। उहीं जले राख अउ लकड़ी ह तरिया-नदिया के पानी ल खराब कर देथे। 
एक बात अउ समझ नइ आय कि हमन 8 मार्च के बड़ जोरसोर ले महिला दिवस मनाथन अउ माइलोगिनमन के सम्मान करथन। ओकर बाद मार्च में ही एक महिला होलिका ल जला के खुसी मनाथन। ये कइसन समाज आय। ऐकर ले हमर अवइया पीढ़ी ल महिला के परति नफरत करे के सीख देवत हन। हमन ल ए जुन्ना रूढ़ी-परंपरा ल छोड़ के परियावरन अउ समाज ल बचाय के कसम खाना चाही। अब होलिका दहन बंद करके होलिका चमन के नांव ले जगह-जगह पेड़ लगावन अउ महिलामन के परति परेम के संदेस देवत हरियाली फैलावन। अइसन होतीस त कतेक सुघ्घर लागतीस। 

गनपत लाल, रायपुर

Sunday, 7 February 2021

अपन हक बर लड़इया किसानमन ल जोहार

जबले केंद्र सरकार ह तीन ठोक कृषि कानून ला हे तब ले देस भर म ए कानून के खिलाफ आंदोलन चलत हे। किसान मन के आंदोलन ह अब जन आंदोलन बन गे हे। अब ए आंदोलन सिरिफ किसान के नोहे बल्कि मजदूर, नौजवान, विद्यार्थी अउ सब झन ए आंदोलन के समर्थन म बड़चड़ के हिस्सा लेवत हे। फेर ये आंदोलन ल बदनाम करे बर सरकार अउ गोदी मीडिया ह अपन पूरा ताकत ल लगा देहे। कतको बदनाम करे के उदिम करत हे, फेर सफल नइ हो पावत हे। किसानमन करिया कानून ल वापस कराय बर अउ देस भर म समर्थन मूल्य लागू करे के मांग ल लेके भारी जाड़ म दिल्ली के सीमा म डटे हाबय। आंदोलन म दू सौ ले ज्यादा किसान मन सहीद घलो होगे फेर सरकार के आंखी नइ खुलत हे। न तो सरकार ल किसान के पीरा ह समझ आवत हे। आंखी कान ल बंद करके घमंड म चूर सरकार अब ये कानून ल लागू करे म अड़े हे। भले कतको किसान मर जाए। भले देस बरबाद हो जाए। 
अब हमन बात करबो ये कानून काय आय जेकर देस भर म भारी विरोध होवत हे। पहला कानून 'कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020' आय। ए कानून म सरकार ह काहत हे कि किसान ह अपन उपज के मंडी ले बाहिर बजार म बेच सकथे। अब सवाल ये हे कि का खुला बजार म किसान मन ल ओकर उपज के सही दाम मिल पाही। अभी भी तो सरकार ह पूरा धान ल नइ खरीद सकत हे अउ किसान मन ह कोचिया के हाथ म बेचत हे। का सही दाम कोचिया ह किसान ल देवत हे। अब सरकार ह मंडी ल बंद करके दलाल मन ल छूट दे बर जावत हे। अउ ये कानून बने के बाद किसान के उपज के समर्थन मूल्य के घलो गारेंटी नइ हे। बिहार के सरकार ह 2006 म मंडी ल बंद कर दे रहिस फेर उहां के किसान ल अभी तक कोई फायदा नइ होहे। दूसरा कानून आय 'कृषि सशक्तिकरण व संरक्षण और कृषि सेवा विधेयक' ये कानून ह करार अउ ठेकेदारी खेती पद्धति ल वैधता देथे। किसान के जमीन ल बड़े बड़े कंपनीमन किराया से लिही अउ चिटफंड कंपनी असन भाग जाही अउ किसानमन ल अदालत म फरियाद करे के भी हक नइ राहय। ये किसान ल ओकरे जमीन म मजदूर बनाय के उदीम आय। एकर ले सोसन ह अउ बड़ही। तीसरा कानून 'आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक 2020' ये कानून म किसान के साथ साथ आम उपभोक्ता के जेब घलो कटही। पहली 'आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955' जमाखोरी अउ काला बाजारी ल रोके बर बनाय रहिस। पहली जमाखोरी ल अपराध कहे जाय अब ये नवा कानून के बने ले येला महापुन्य कहे जाही। जेकर ले महंगाई ह हकन के बड़ही अउ देस के जनता ल चार आंसू रोवाही। 
अतका खतरनाक कानून होय के बाद भी सरकार ह कइसनो करके किसान आंदोलन ल खतम करे के कोसिस करत हे। पहली कहिस कि ये आंदोलन पंजाब बस में होवत हे, जिहां कांग्रेस के सरकार हे। फेर हरियाणा के किसान मन घलो अपन खेत ल बचाय बर भारी संख्या में आंदोलन म सामिल होगे तब कहिस कि ये किसान नोहे खालिस्तानी आय। तेकर बाद पूरा देस भर म किसान आंदोलन ह जोर पकड़ लिस, तब कहिस कि ये विपक्ष के चाल आय। फेर कहिस कि किसानमन ल सरकार के खिलाफ भड़कावत भरमित करत। अरे कइसे गोठियाथे सत्ता ओकर अउ गोदी मीडिया ओकर तब किसान कइसे भरमित हो जाही। गोदी मीडिया तो चीख चीख के किसानमन ल आतंकवादी बतावत हे। का देस भर के किसान, मजदूर, विद्यार्थी, नौजवान अउ सबो जांगरतोड़ कमइया ह आतंकवादी, खालिस्तानी अउ देसद्रोही आय। बड़ सरम के बात आय। अइसन कहइया सरकार अउ मीडिया ल धिक्कार हे। ये तो अइसे होगे जेकरे ल खाना ओकरे संग बकबकना। अन्नदाता जउन ह सबके पेट ल भरथे आज उही ल नेतामन बदनाम करत हाबय।
कतको तोड़े के कोसिस करिस फेर सफल नइ होइस, तब 26 जनवरी के दिन दिल्ली के ट्रेक्टर रैली म दिप सिद्दू जइसे बेजेपी के चमचा ह ए आंदोलन म घूस के उपदरव करिस। ताहन ले टीवी वाला मन बिना देखे सोचे समझे कोलिहा असन नरियाय ल धर लिस। अउ किसान मन ल देस के गद्दार कहे ल लागिस। एकर बाद सरकार ल आंदोलन के जगह ल खाली करे के बहाना मिल गे। अउ जबरदस्ती किसान मन ल खदेड़े बर धर लिस। एकर ले किसान नेता राकेस टिकैत रो डारिस। ओकर आंसू ल देखके जगह जगह किसानमन के महापंचायत होय ल धर लिस अउ ये आंदोलन ह जोरदार रफ्तार पकड़ लिस। सरकार ह अब सकबका गेहे। किसान आंदोलन के दमन करे बर बिजली, पानी अउ इंटनेट ल बंद कर दे हे। सरकार ल लागथे कि जरूरत के सबो सुविधा ल बंद करे ले किसानमन अपन घर लहुट जाही। अब ये आंदोलन ह रुकने वाला नइ हे। चाहे सरकार ह सड़क ल खनवाय, कटीली तार, खीला लगवाय, आंसू गैस, पानी के बौछार, लाठी अउ गोली चलवाय कतको जुलुम करय फेर अब किसान ह अपन हक ल लेके रही अउ खाली हाथ घर नइ लहुटने वाला हे। 

गनपत लाल, रायपुर

Sunday, 29 November 2020

किताबें जोर-जोर से फड़फड़ाती हैं

बंद अलमारी से बार-बार आवाज आती हैं
किताबें जोर-जोर से फड़फड़ाती हैं
वे बहुत कुछ बताना चाहती हैं
दुनिया की तस्वीर दिखाना चाहती हैं

उन्हें इस इस बात का खेद है
वे बहुत दिनों से यहां कैद है
नहीं पढ़े किसी ने उनकी बातें
नहीं पलटे किसी ने उनके पन्नें

वे कुछ नई-पुरानी कहानी सुनाना चाहती हैं
फिर किताबें मुस्कुराना चाहती हैं
बंद अलमारी से बार-बार आवाज आती है
किताबें जोर-जोर से फड़फड़ाती हैं

- गनपत लाल

समाज में कहीं नफरत न होती

समाज में कहीं नफरत न होती 
अगर ये मंदिर न होते, मस्जिद न होती 
देश में कहीं लड़ाई न होती
अगर मूंछ न होती, दाढ़ी न होती 
न तिलक होता, न टोपी होती 
मजहब के नाम पर दुकान न होती

किसी से कोई भेदभाव न होता
अगर हिन्दू का नाम रहीम होता 
मुस्लिम का नाम राम होता 
धर्म के नाम पर दंगे न होते 
अगर लोग नैतिक रूप से नंगे न होते 
भगवान-अल्लाह के नाम पर पंगे न होते 

मोब लिंचिंग के नाम पर पिटाई न होती
किसी मासूम की जान न जाती 
किसी के लिए सुअर घृणा का प्रतीक न होता
किसी के लिए गाय माता न होती 

एक दूसरे को मारने के लिए डंडे न होते 
अगर ये मौलवी न होते, पंडे न होते 
चारों तरफ मोहब्बत की नदियां बहती 
हर जगह प्रेम की इबादत होती 

- गनपत लाल

Sunday, 4 November 2018

समाज के अंतस के अवाज लोकगीत : लक्ष्मण मस्तुरिया

जनकवि अउ गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया उमरभर छत्तीसगढ़ी साहित्य के सेवा करिन। मस्तुरिया भले ए दुनिया ल छोड़ के चल दिस फेर ओकर गीत ह सबर दिन छत्तीसगढ़ के माटी म गुंजत रही। ओकर गीत के संदेस ह मनखे ल अन्याय के खिलाफ लड़े बर तकात देवत रही। गीतकार, लेखक, कवि, गायक, शिक्षक, पत्रकार लक्ष्मण मस्तुरिया के जनम 7 जून 1949 म ग्राम मस्तूरी, जिला बिलासपुर म हाेय रहिस। वोकर लइकापन ले पढ़ई-लिखई म बड़ रूचि रहाय। स्कूल म जब पढ़त रहाय तभे कबिता लिखे के शुरू कर दे रहिस। छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक जागरन मंच ‘चंदैनी गोंदा’ के अबड़कन गीत के लिखइया अउ ‘देवार डेरा’, ‘कारी’ लोकमंच बर गीत सिरजइया। रायपुर दूरदर्शन से प्रसारित धारावाहिक लोकसुर के निर्माता लक्ष्मण मस्तुरिया के बड़ सुरता आवत हे। दू साल पहली लक्ष्मण मस्तुरिया संग लोकगीत ल लेके मोर गोठ-बात होय रहिस। ओहर मोर जम्मो सवाल के जवाब बड़ सुघ्घर ढंग ले दे रहिस।        

सवाल- लोकगीत के सुरूआत कइसे होइस होही ?    
मस्तुरिया- लोकगीत ह बहुत जुन्ना आय। जब समाज बनिस तभे लोकगीत बनिस। समाज के सुख-दुख ह लोकगीत म सुने ल मिलथे। तुलसी के दोहा ले पहली लोकगीत रिहिस हे। ओ समय तुलसी दास ह “बन निकल चले दूनो भाई” गीत ल लोकगीत कहे हे। एकर बाद अइसने-अइसने तुलसी अउ कबीर के गीत अउ पद ल मनखेमन लोकगीत माने लागिस। फेर संस्कार के गीत जइसे बिहाव, सोहर गीत ल घलो लोकगीत मानिस। 

सवाल- त लोकगीत आपमन का ल मानथंव ?
मस्तुरिया- जउन ह जनसमूह के सरल गीत हे, उही लोकगीत आय। एमा भासा अउ बियाकरन के बंधना नइ रहाय। लोकभासा ले ही लोकगीत बने हे। जउन गीत ह मनखे मन ल भा जथे अउ ओकर बीच छा जथे उही ल लोकगीत कहे जाथे। जउन समय कोनो मनोरंजन के साधन नइ रिहिस, तब समुदाय म उच्छाह अउ खुसी बर गाना गाए जाए। अइसन गीत ह गांव-गांव म चले ल धर लय। वइसे कोनो गीत ल लोकगीत बने बर अबड़ बेरा लागथे।

सवाल- आप के गीत ल गांव के मनखेमन लोकगीत मानथे अउ उच्छाह के मउका म गाथे-गुनगुनाथे। का अपन गीत ल लोकगीत मानथंव ?
मस्तुरिया- मैं अपन गीत ल कइसे लोकगीत मानहू। अउ कहूं त ए अपने गुन गवइ असन होगे। लोकगीत तो लोगन मन तय करथे। मैं ह तो बस देवार डेरा के जउन गीत रहिस ओला सुधार के सरल अउ सुघ्घर बनाय हंव। अगर लोगन मन मोर गीत ल लोकगीत मानथे त लोकगीत आय। ए तो समाज के ऊपर निरभर करथे। जब गांव-गांव म कोनो गाना ल खास मउका म गाय जाथे अउ लोगन के जुबान म रइथे उही ह लोकगीत कहलाथे।

सवाल- देवार डेरा के गाना ल सुधारे बर काबर परिस ?
मस्तुरिया- पहली देवार डेरा के गाना म भासा ल समझे बर थोकन दिक्कत होवय। जइसे ‘दौना म गोंदा केजुआ मोर बारी म आबे काल रे’ एला सुधार के ‘चौरा म गोंदा रसिया मोर बारी म’ करेंव। इही परकार के ‘चंदर छबीला रे बघली ल’ सुधार के ‘मंगनी म रे मया नइ मिलय रे मंगनी म’ करे हंव। अइसन कइ ठोक गीत ल सुधारे के जरूरत परिस। एकर ले ए गीतमन सारथक होगे।

सवाल- गीत लिखइ अउ गवइ काम म कब ले भीड़े हव ?
मस्तुरिया- वइसे तो 1960 ले गीत अउ कबिता लिखे के सुरू कर दे रहेंव। एकर बाद 1971 म इही बुता म पूरा रम गेंव। ओ समय कृष्ण रंजन, पवन दीवान अउ मैं ह शिक्षक रहेन। फेर मैं गुरुजी के नौकरी ल छोड़के ‘चंदैनी गोंदा’ मंच ले जुड़ेंव। एकर बाद मैं ह देवार डेरा के गीत ल सुधारे के काम करेंव। एकर अलावा कारी लोकनाट्य म घलो बहुत अकन गीत के सिरजन करेंव। आे समय सबझन छत्तीसगढ़ी के सेवा निसुवारथ ढंग ले करय।

सवाल- अब तक आप कतेक अकन गीत लिखे अउ गाए हव ?
मस्तुरिया- वइसे तो मैं गाना बहुत कम गाए हंव। मोर संग चलव रे, बखरी के तुमा नार, मैं छत्तीसगढ़िया अंव, चल गा किसान असाढ़ आगे, मन काबर आज तोर उदास हे अउ कुछेक गाना गाए हंव। उही लगभग 300 ले जियादा गीत के रचना करे हंव। मोर गाना ल कइ ठोक छत्तीसगढ़ी फिलिम म साामिल घलो करे हे।

सवाल- पहली अउ अब के गाना म का बदलाव देखथव ?
मस्तुरिया- बदलाव होय हे। पहली के गीत म संदेस रहाय, लेकिन आजकल के गीत म संदेस तो छोड़ कुछ समझ घलो नइ आय। आजकल धंधा जियादा होगे हे। गीत के नाम म काही ल पोरसत हे।