Sunday, 7 February 2021

अपन हक बर लड़इया किसानमन ल जोहार

जबले केंद्र सरकार ह तीन ठोक कृषि कानून ला हे तब ले देस भर म ए कानून के खिलाफ आंदोलन चलत हे। किसान मन के आंदोलन ह अब जन आंदोलन बन गे हे। अब ए आंदोलन सिरिफ किसान के नोहे बल्कि मजदूर, नौजवान, विद्यार्थी अउ सब झन ए आंदोलन के समर्थन म बड़चड़ के हिस्सा लेवत हे। फेर ये आंदोलन ल बदनाम करे बर सरकार अउ गोदी मीडिया ह अपन पूरा ताकत ल लगा देहे। कतको बदनाम करे के उदिम करत हे, फेर सफल नइ हो पावत हे। किसानमन करिया कानून ल वापस कराय बर अउ देस भर म समर्थन मूल्य लागू करे के मांग ल लेके भारी जाड़ म दिल्ली के सीमा म डटे हाबय। आंदोलन म दू सौ ले ज्यादा किसान मन सहीद घलो होगे फेर सरकार के आंखी नइ खुलत हे। न तो सरकार ल किसान के पीरा ह समझ आवत हे। आंखी कान ल बंद करके घमंड म चूर सरकार अब ये कानून ल लागू करे म अड़े हे। भले कतको किसान मर जाए। भले देस बरबाद हो जाए। 
अब हमन बात करबो ये कानून काय आय जेकर देस भर म भारी विरोध होवत हे। पहला कानून 'कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020' आय। ए कानून म सरकार ह काहत हे कि किसान ह अपन उपज के मंडी ले बाहिर बजार म बेच सकथे। अब सवाल ये हे कि का खुला बजार म किसान मन ल ओकर उपज के सही दाम मिल पाही। अभी भी तो सरकार ह पूरा धान ल नइ खरीद सकत हे अउ किसान मन ह कोचिया के हाथ म बेचत हे। का सही दाम कोचिया ह किसान ल देवत हे। अब सरकार ह मंडी ल बंद करके दलाल मन ल छूट दे बर जावत हे। अउ ये कानून बने के बाद किसान के उपज के समर्थन मूल्य के घलो गारेंटी नइ हे। बिहार के सरकार ह 2006 म मंडी ल बंद कर दे रहिस फेर उहां के किसान ल अभी तक कोई फायदा नइ होहे। दूसरा कानून आय 'कृषि सशक्तिकरण व संरक्षण और कृषि सेवा विधेयक' ये कानून ह करार अउ ठेकेदारी खेती पद्धति ल वैधता देथे। किसान के जमीन ल बड़े बड़े कंपनीमन किराया से लिही अउ चिटफंड कंपनी असन भाग जाही अउ किसानमन ल अदालत म फरियाद करे के भी हक नइ राहय। ये किसान ल ओकरे जमीन म मजदूर बनाय के उदीम आय। एकर ले सोसन ह अउ बड़ही। तीसरा कानून 'आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक 2020' ये कानून म किसान के साथ साथ आम उपभोक्ता के जेब घलो कटही। पहली 'आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955' जमाखोरी अउ काला बाजारी ल रोके बर बनाय रहिस। पहली जमाखोरी ल अपराध कहे जाय अब ये नवा कानून के बने ले येला महापुन्य कहे जाही। जेकर ले महंगाई ह हकन के बड़ही अउ देस के जनता ल चार आंसू रोवाही। 
अतका खतरनाक कानून होय के बाद भी सरकार ह कइसनो करके किसान आंदोलन ल खतम करे के कोसिस करत हे। पहली कहिस कि ये आंदोलन पंजाब बस में होवत हे, जिहां कांग्रेस के सरकार हे। फेर हरियाणा के किसान मन घलो अपन खेत ल बचाय बर भारी संख्या में आंदोलन म सामिल होगे तब कहिस कि ये किसान नोहे खालिस्तानी आय। तेकर बाद पूरा देस भर म किसान आंदोलन ह जोर पकड़ लिस, तब कहिस कि ये विपक्ष के चाल आय। फेर कहिस कि किसानमन ल सरकार के खिलाफ भड़कावत भरमित करत। अरे कइसे गोठियाथे सत्ता ओकर अउ गोदी मीडिया ओकर तब किसान कइसे भरमित हो जाही। गोदी मीडिया तो चीख चीख के किसानमन ल आतंकवादी बतावत हे। का देस भर के किसान, मजदूर, विद्यार्थी, नौजवान अउ सबो जांगरतोड़ कमइया ह आतंकवादी, खालिस्तानी अउ देसद्रोही आय। बड़ सरम के बात आय। अइसन कहइया सरकार अउ मीडिया ल धिक्कार हे। ये तो अइसे होगे जेकरे ल खाना ओकरे संग बकबकना। अन्नदाता जउन ह सबके पेट ल भरथे आज उही ल नेतामन बदनाम करत हाबय।
कतको तोड़े के कोसिस करिस फेर सफल नइ होइस, तब 26 जनवरी के दिन दिल्ली के ट्रेक्टर रैली म दिप सिद्दू जइसे बेजेपी के चमचा ह ए आंदोलन म घूस के उपदरव करिस। ताहन ले टीवी वाला मन बिना देखे सोचे समझे कोलिहा असन नरियाय ल धर लिस। अउ किसान मन ल देस के गद्दार कहे ल लागिस। एकर बाद सरकार ल आंदोलन के जगह ल खाली करे के बहाना मिल गे। अउ जबरदस्ती किसान मन ल खदेड़े बर धर लिस। एकर ले किसान नेता राकेस टिकैत रो डारिस। ओकर आंसू ल देखके जगह जगह किसानमन के महापंचायत होय ल धर लिस अउ ये आंदोलन ह जोरदार रफ्तार पकड़ लिस। सरकार ह अब सकबका गेहे। किसान आंदोलन के दमन करे बर बिजली, पानी अउ इंटनेट ल बंद कर दे हे। सरकार ल लागथे कि जरूरत के सबो सुविधा ल बंद करे ले किसानमन अपन घर लहुट जाही। अब ये आंदोलन ह रुकने वाला नइ हे। चाहे सरकार ह सड़क ल खनवाय, कटीली तार, खीला लगवाय, आंसू गैस, पानी के बौछार, लाठी अउ गोली चलवाय कतको जुलुम करय फेर अब किसान ह अपन हक ल लेके रही अउ खाली हाथ घर नइ लहुटने वाला हे। 

गनपत लाल, रायपुर

Sunday, 29 November 2020

किताबें जोर-जोर से फड़फड़ाती हैं

बंद अलमारी से बार-बार आवाज आती हैं
किताबें जोर-जोर से फड़फड़ाती हैं
वे बहुत कुछ बताना चाहती हैं
दुनिया की तस्वीर दिखाना चाहती हैं

उन्हें इस इस बात का खेद है
वे बहुत दिनों से यहां कैद है
नहीं पढ़े किसी ने उनकी बातें
नहीं पलटे किसी ने उनके पन्नें

वे कुछ नई-पुरानी कहानी सुनाना चाहती हैं
फिर किताबें मुस्कुराना चाहती हैं
बंद अलमारी से बार-बार आवाज आती है
किताबें जोर-जोर से फड़फड़ाती हैं

- गनपत लाल

समाज में कहीं नफरत न होती

समाज में कहीं नफरत न होती 
अगर ये मंदिर न होते, मस्जिद न होती 
देश में कहीं लड़ाई न होती
अगर मूंछ न होती, दाढ़ी न होती 
न तिलक होता, न टोपी होती 
मजहब के नाम पर दुकान न होती

किसी से कोई भेदभाव न होता
अगर हिन्दू का नाम रहीम होता 
मुस्लिम का नाम राम होता 
धर्म के नाम पर दंगे न होते 
अगर लोग नैतिक रूप से नंगे न होते 
भगवान-अल्लाह के नाम पर पंगे न होते 

मोब लिंचिंग के नाम पर पिटाई न होती
किसी मासूम की जान न जाती 
किसी के लिए सुअर घृणा का प्रतीक न होता
किसी के लिए गाय माता न होती 

एक दूसरे को मारने के लिए डंडे न होते 
अगर ये मौलवी न होते, पंडे न होते 
चारों तरफ मोहब्बत की नदियां बहती 
हर जगह प्रेम की इबादत होती 

- गनपत लाल

Sunday, 4 November 2018

समाज के अंतस के अवाज लोकगीत : लक्ष्मण मस्तुरिया

जनकवि अउ गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया उमरभर छत्तीसगढ़ी साहित्य के सेवा करिन। मस्तुरिया भले ए दुनिया ल छोड़ के चल दिस फेर ओकर गीत ह सबर दिन छत्तीसगढ़ के माटी म गुंजत रही। ओकर गीत के संदेस ह मनखे ल अन्याय के खिलाफ लड़े बर तकात देवत रही। गीतकार, लेखक, कवि, गायक, शिक्षक, पत्रकार लक्ष्मण मस्तुरिया के जनम 7 जून 1949 म ग्राम मस्तूरी, जिला बिलासपुर म हाेय रहिस। वोकर लइकापन ले पढ़ई-लिखई म बड़ रूचि रहाय। स्कूल म जब पढ़त रहाय तभे कबिता लिखे के शुरू कर दे रहिस। छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक जागरन मंच ‘चंदैनी गोंदा’ के अबड़कन गीत के लिखइया अउ ‘देवार डेरा’, ‘कारी’ लोकमंच बर गीत सिरजइया। रायपुर दूरदर्शन से प्रसारित धारावाहिक लोकसुर के निर्माता लक्ष्मण मस्तुरिया के बड़ सुरता आवत हे। दू साल पहली लक्ष्मण मस्तुरिया संग लोकगीत ल लेके मोर गोठ-बात होय रहिस। ओहर मोर जम्मो सवाल के जवाब बड़ सुघ्घर ढंग ले दे रहिस।        

सवाल- लोकगीत के सुरूआत कइसे होइस होही ?    
मस्तुरिया- लोकगीत ह बहुत जुन्ना आय। जब समाज बनिस तभे लोकगीत बनिस। समाज के सुख-दुख ह लोकगीत म सुने ल मिलथे। तुलसी के दोहा ले पहली लोकगीत रिहिस हे। ओ समय तुलसी दास ह “बन निकल चले दूनो भाई” गीत ल लोकगीत कहे हे। एकर बाद अइसने-अइसने तुलसी अउ कबीर के गीत अउ पद ल मनखेमन लोकगीत माने लागिस। फेर संस्कार के गीत जइसे बिहाव, सोहर गीत ल घलो लोकगीत मानिस। 

सवाल- त लोकगीत आपमन का ल मानथंव ?
मस्तुरिया- जउन ह जनसमूह के सरल गीत हे, उही लोकगीत आय। एमा भासा अउ बियाकरन के बंधना नइ रहाय। लोकभासा ले ही लोकगीत बने हे। जउन गीत ह मनखे मन ल भा जथे अउ ओकर बीच छा जथे उही ल लोकगीत कहे जाथे। जउन समय कोनो मनोरंजन के साधन नइ रिहिस, तब समुदाय म उच्छाह अउ खुसी बर गाना गाए जाए। अइसन गीत ह गांव-गांव म चले ल धर लय। वइसे कोनो गीत ल लोकगीत बने बर अबड़ बेरा लागथे।

सवाल- आप के गीत ल गांव के मनखेमन लोकगीत मानथे अउ उच्छाह के मउका म गाथे-गुनगुनाथे। का अपन गीत ल लोकगीत मानथंव ?
मस्तुरिया- मैं अपन गीत ल कइसे लोकगीत मानहू। अउ कहूं त ए अपने गुन गवइ असन होगे। लोकगीत तो लोगन मन तय करथे। मैं ह तो बस देवार डेरा के जउन गीत रहिस ओला सुधार के सरल अउ सुघ्घर बनाय हंव। अगर लोगन मन मोर गीत ल लोकगीत मानथे त लोकगीत आय। ए तो समाज के ऊपर निरभर करथे। जब गांव-गांव म कोनो गाना ल खास मउका म गाय जाथे अउ लोगन के जुबान म रइथे उही ह लोकगीत कहलाथे।

सवाल- देवार डेरा के गाना ल सुधारे बर काबर परिस ?
मस्तुरिया- पहली देवार डेरा के गाना म भासा ल समझे बर थोकन दिक्कत होवय। जइसे ‘दौना म गोंदा केजुआ मोर बारी म आबे काल रे’ एला सुधार के ‘चौरा म गोंदा रसिया मोर बारी म’ करेंव। इही परकार के ‘चंदर छबीला रे बघली ल’ सुधार के ‘मंगनी म रे मया नइ मिलय रे मंगनी म’ करे हंव। अइसन कइ ठोक गीत ल सुधारे के जरूरत परिस। एकर ले ए गीतमन सारथक होगे।

सवाल- गीत लिखइ अउ गवइ काम म कब ले भीड़े हव ?
मस्तुरिया- वइसे तो 1960 ले गीत अउ कबिता लिखे के सुरू कर दे रहेंव। एकर बाद 1971 म इही बुता म पूरा रम गेंव। ओ समय कृष्ण रंजन, पवन दीवान अउ मैं ह शिक्षक रहेन। फेर मैं गुरुजी के नौकरी ल छोड़के ‘चंदैनी गोंदा’ मंच ले जुड़ेंव। एकर बाद मैं ह देवार डेरा के गीत ल सुधारे के काम करेंव। एकर अलावा कारी लोकनाट्य म घलो बहुत अकन गीत के सिरजन करेंव। आे समय सबझन छत्तीसगढ़ी के सेवा निसुवारथ ढंग ले करय।

सवाल- अब तक आप कतेक अकन गीत लिखे अउ गाए हव ?
मस्तुरिया- वइसे तो मैं गाना बहुत कम गाए हंव। मोर संग चलव रे, बखरी के तुमा नार, मैं छत्तीसगढ़िया अंव, चल गा किसान असाढ़ आगे, मन काबर आज तोर उदास हे अउ कुछेक गाना गाए हंव। उही लगभग 300 ले जियादा गीत के रचना करे हंव। मोर गाना ल कइ ठोक छत्तीसगढ़ी फिलिम म साामिल घलो करे हे।

सवाल- पहली अउ अब के गाना म का बदलाव देखथव ?
मस्तुरिया- बदलाव होय हे। पहली के गीत म संदेस रहाय, लेकिन आजकल के गीत म संदेस तो छोड़ कुछ समझ घलो नइ आय। आजकल धंधा जियादा होगे हे। गीत के नाम म काही ल पोरसत हे। 
 

Thursday, 20 September 2018

कहिनी : नोनी के बिहाव

जब नोनी ह बड़े बाड़ जथे तब दाई-ददा ल ओकर बिहाव के संसो ह खाय ल धर लेथे। पटवारी मेहत्तर अउ ओकर बाई सतवंतिन ह घलो अपन नोनी सुरेखा बर बने असन  दुलहा खोजत हे। काबर सुरेखा के कालेज के पढ़ई पूरा होगे हे। दूर-दूर के आनी-बानी के सगामन आवत हे। जतका सगा आवत हे ओमन सुरेखा के सुघरई ल देख के मोहा जावत हे। फेर समस्या ए बात के हे कि कम पढ़े-लिखे छोकरा ल सुरेखा ह हिन देवत हे, काबर ओ ह बने असन पढ़े-लिखे अउ समझदार घरवाला चाहत हे। अउ जउन ह पढ़े-लिखे हे ओकर म सुरेखा ल समझदारी नइ दिखत हे, काबर पढ़े-लिखे छोकरा अउ ओकर दाई-ददा ह आते साथ पहली दहेज के बात करथे। दहेज म कार, पइसा, फटफटी अउ आनी-बानी के जिनीस के लिस्ट बन जथे। अतेक भारी-भरकम सामान के सूची ल पटवारी मेहत्तर ह कइसे पूरा कर सकही। ओकर खेत-खार बिलकुल नइ हे। जउन भी रहिस हे ओला दू झन नोनी मन के बिहाव म बेच डरे हे। अब सबले छोटे नोनी सुरेखा के बिहाव करके गंगा नाहय के सोचत हे। फेर का करबे दहेज के दानव ह रद्दा म खड़े हे। रोज दिन अइसने सगामन आवत-जावत हे। सगामन के चाहा-पानी अउ नास्ता म कतको पइसा ह सिरागे हे। अइसे-तइसे एक साल ह बितगे।
पटवारी मेहत्तर अउ ओकर घरवाली सतवंतिन ल नोनी के बिहाव के संसो ह बड़ सतावत हे। एक दिन पटवारी मेहत्तर ह कइथे- बिना बड़का दहेज के सुरेखा के बिहाव नइ होय तइसे लागथे।
सतवंतिन- कइसे नइ होही हमर नोनी सुरेखा म का कमी हे। बड़ सुघ्घर हे।  कालेज के पढ़ई करे हे। रांधे-गढ़े ल घलो बने आथे।
पटवारी मेहत्तर- कमी सुरेखा म नइ हे, कमी तो दहेज म हे। सगामन दहेज म कार मांगत हे। कार बिना कतको बने नोनी ह बेकार हे।
सतवंतिन- तब का करबो हमन। हमर मन कर जउन खेतखार रहिस ओ ह तो दू झन नोनी के बिहाव म सब झर गे। अब ए नोनी के बिहाव ह कइसे होही।
पटवारी मेहत्तर- तैं ह संसो झन कर ओ नाेनी के दाई। मैं ह मोर पीएफ के पइसा ल निकाल के अउ लोन म पइसा लेके दुलहा बर कार अउ जम्मो जिनिस ल ले लानहू। ए साल कइसनो करके सुरेखा के बिहाव होही।
सुरेखा ह अपन कुरिया म ए बात ल सुते-सुते सुनत रहाय। सुरेखा ह सोचथे ए कइसन समाज आय जिहां बेटी के बिहाव बिना दहेज के नइ हो सकय। कोनो दुलहा ल बने दुलहिन के जरूरत नइ हे, जरूरत हे त बने दहेज के। मनखे आज कतेक सुवारथी होगे हे। परेम के जगह म आजकल सबे ह पइसा के पुजारी होगे हे।
आज फेर सुरेखा ल देखे बर सिंचाई बिभाग के अधिकारी घनाराम अउ ओकर बेटा इंजीनियर बिकास ह पहुंचे हे। घनाराम ल ओकर लइका के पढ़ई अउ नउकरी ल लेके बड़ गरब हे। सुरेखा ह पानी धर के सगामन कर अइस अउ टप-टप पांव परिस। ताहन भितरी डाहर चल दिस।
पटवारी मेहत्तर- ए दे देख लव जी इही नोनी आय। घनाराम- वाह, बने तो हे जी। कतेक पढ़े हे ?
पटवारी मेहत्तर- हिंदी म एमए करे हे। ए बाबू ह का पढ़े हे अउ का करथे जी  ?
घनाराम मेछा ल अइठत मोर बेटा बिकास ह एमटेक करे हे अउ भिलाई म इंजीनियर हे।
पटवारी मेहत्तर- त का बिचार हे सगा हो।
घनाराम- बिचार तो बने हे। फेर..
पटवारी मेहत्तर- फेर का। बने फरिया के बताव सगा हो।
घनाराम- दहेज म का देहू जी।
पटवारी मेहत्तर- का दे सकबो हमर तो जियादा कुबत नइ हे फटफटी दे देबो।
घनाराम- आजकल फटफटी ह तो चना-मुररा होगे सगा। कार-वार देतेंव त रिस्ता ह आगे बढ़तिस।
मेहत्तर- ले न भइ का होही हमन हमर डाहर ले पूरा कोसिस करबो।
घनाराम- कोसिस-वोसिस का होथे जी। देना हे त देना हे कह, नही त नही।
मेहत्तर- देबो गा सगा हो काबर नइ देबो जब सबे झन के मन आगे हे, त दहेज म कार जरूर देबो।
घनाराम- ले समधी महाराज पंडित करा बिहाव के तिथि ल निकाल के हमन बतावत हन। आपमन बिहाव के तियारी करव।
मेहत्तर- ठीक हे समधी महराज बने जलदी तिथि ल बांध के बिहाव ल कर देबो।
सगामन अपन घर चल दिस। सुरेखा अउ बिहाव के तिथि घलो तय होगे। दूनों डाहर बिहाव के तियारी जोरसोर ले होवत हे। पटवारी मेहत्तर ह पइसा के बेवस्था करे बर रोज दउड़-धूप करत हे। काबर सगा मन दहेज म कार मांगे हे। पटवारी मेहत्तर ह सोचत हे कइसनों करके कार ले बर चार-पांच लाख के बंदोबस्त हो जतिस। बाकी छोटे-मोटे खरचा के बेवस्था ह बनत रही। अपन पीएफ के पइसा ल निकाले बर अउ बैंक ले लोन ले बर जम्मो फारम ल जमा कर देहे। एती दूनो घर के सादी के कारड ह सगा मन ल बटावत हे। अब देखते-देखत बिहाव ह चार दिन बाचे हे। फेर पटवारी मेहत्तर के बैंक लोन ह अभी ले पास नइ होय हे। एकर संसो म घेरी-बेरी मेहत्तर ह बैंक म जा-जा पूछथे। मोर लोन ह पास होगे का ? जब नइ होहे कइथे, तब अधिकारी मन ले हाथ जोड़के बिनती करथे लोन ल पास कर देतेव सर। मोर नोनी के बिहाव हे। कइसनोे करके लोन ल पास करके हमर लाज ल बचा लेतेव। बैंक अधिकारी कइथे- हमन ह तोर फारम ल भेज देहन। मेन आफिस ले जब पास होके आही तब हमन कुछ कर सकथन। बाकि हमर हाथ म नइ हे जी। अब बिहाव के दिन घलाे आगे फेर लोन के कोई अता-पता नइहे। 
अब सुरेखा के दाई-ददा के मन म संसो के मंड़माड़े करिया घटा ह छागे हे। सोचत हे कहूं कार नइहे कबो त बरात ह लहुट के नइ चल दिही। अब बरात ह घलो गांव म पहुंच गे। परघाय के तियारी घलो होय ल लागिस। जब बरतियामन सुरेखा के घर म अइस त ओकर मन के जोरदार सुवागत करे गिस। अउ जम्मो सगामन ल बने खवइस-पियइस। जब दुलही-दुलहा ह बिहाव के मंडप म बइठिस। तब बरतिया डाहर के दू-चार झन सियानमन बिकास के ददा घनाराम ल कइथे- कइसे गा सगा मन तो दहेज म कार देवइया रहिस का। दिखत नइहे। तब घनाराम ह सुरेखा के ददा ल पूछिस कइसे समधी महाराज कार देवइया रहे हव कहां हे। तब पटवारी मेहत्तर ह कइथे- लोन ह पास होय म देरी होगे समधी महाराज। लोन आजे पास होइस हे काली मैं ह दमाद बाबू ल कार दे दुहूं। अतका म रखमखाय घनराम खुरसी ले उठ गे कइसे गोठियाथंव जी। जब कार के बात होय रहिस हे त अभी होना चाही। नहीं त ए बिहाव ह नइ हो सकय। ए बात ल सुनके मेहत्तर ह हाथ-पांव जोड़े ल धर लिस। समधी महाराज आपमन हमर ऊपर भरोसा करो भइ हमन काली कार खरीद के आपके घर भेज देबो। ए सादी ल होवन दव। घनराम- नहीं ए बिहाव ह नइ हो सकय। घनाराम जम्मो बरतिया ल कइथे- चलो जी ए बिहाव नइ होवय, ए तो सरबा धोखा आय। घनाराम ह अपन बेटा बिकास ल मंडप ले उठा के सबो बरतियामन ल वापस लहुटे बर कहिस। 
बरतिया म एक झन सुरेखा के कालेज के संगवारी संतोस घलो आय रहाय। सुरेखा अउ संतोस ह संगवारी तो रहिस फेर एकर मन के अंतस म मया के फूल घलो उलहोवत रहिस। कालेज के पढ़ई पूरा होय के सेती एक-दूसर ल अपन दिल के गोठ ल नइ बता पइस। आज संतोस ह सोचथे कि सुरेखा के मंडप ले बरतियामन चल दिही त इकर बड़ बेज्जती होही अउ सुरेखा संग बिहाव कोन करही। अब संतोस ह गुने ल धर लेथे कालेज के समय म मैं ह अपन अंतस के बात ल सुरेखा ल नइ बता पायेंव आज मैं हिम्मत करके सबके सामने ए बात ल बताहू। संतोस सबके सामने खड़ा हाेके कइथे- सुरेखा संग बिहाव मैं ह करूहूं। तब जम्माे बरतिया अकचका के देखे ल धर लिस। अउ सुरेखा ह संतोस ल देखके बड़ खुस होगे काबर वहू ह संतोस ल पसंद करत रहिस। पटवारी मेहत्तर ह अपन नोनी ल  पूछथे का तोला दुलहा पसंद हे ? तब सुरेखा हा हव कइथे। अतका म ओकर दाई-ददा अउ संतोस खुस होगे। सात फेरा लगिस। संतोस अउ सुरेखा सबर दिन बर एक होगे। सुरेखा के दाई-ददा ह बेटी दमाद के बड़ खुसी-खुसी बिदा करिस।

- गौतम गणपत

भारत में पाखंडी बाबाओं की सूची लंबी क्यों ?


भारत देश में बाबाओं को गिनने चले तो पूरा दिन और पूरी रात बीत जाएगी फिर भी गिनना आसान नहीं, लेकिन सवाल यह है कि इस आधुनिक समय में भी इस प्रकार के ढोंगी और बलात्कारी धर्म गुरुओं की संख्या कैसी बढ़ रही है ? अंधभक्तों की संख्या कैसी बढ़ रही है ? लोग मेहनत पर कम और पूजा-पाठ पर ज्यादा विश्वास क्यों कर रहे हैं ? ढ़ोगी बाबा की बातों में आकर रुपए कैसे लुटा रहे हैं ? अपनी बेटी-बहू और बहन को हैवान बाबाओं के आश्रम में भेजकर बलात्कार का शिकार क्यों बना रहे है ? ये सभी बातें सोचने की है।
तर्कवादी विचारक पेरयार कहते हैं कि शास्त्र, पुराण और उनमें दर्ज देवी-देवताओं में मेरी कोई आस्था नहीं है, क्योंकि वो सारे के सारे दोषी हैं। मैं जनता से उन्हें जलाने तथा नष्ट करने की अपील करता हूं। इस बात पर गौर करें तो जितने भी सारे सवाल है उनका पूरा जवाब मिल जाता है। बाबा धर्म का अफिम खिलाकर भक्तों को यर्थाथ से दूर किसी काल्पनिक दुनिया में ले जाता है। इसके बाद फिर लूट-खसोट का खेल शुरू होता है। फिर अंधभक्त शिष्याें से पैसे, धन-संपत्ति और हवस की सारी भूख मिटा लेता है। धर्म के धंधे करने वाले लोग धर्म शास्त्र और देवी-देवताओं का खौफ ऐसा फैलाता है कि कम पढ़े-लिखे लोग आसानी से इनके जाल में फंस जाते हैं। काल्पनिक भगवान का भय से अनपढ़ के साथ-साथ महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले लोग भी वैज्ञानिक विचार को नजरअंदाज कर काल्पनिक और बेतुकी बातों पर विश्वास करने लगते हैं। सिर्फ विश्वास नहीं करते बल्कि अंधविश्वास फैलाने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
दिल्ली के एक ज्योतिष स्वंभू अाशु महाराज अपने ही शिष्य महिला और उनकी नाबालिग बेटी को दिल्ली के आश्रम में रेप किया। इस प्रकार की खबर अब सामान्य हो गई है। लगातार बाबाओं की पोल खुल रही है। फिर भी उनके भक्तों और शिष्यों की कमी दिखाई न देना आश्चर्य लगता है। कार्ल मार्क्स ने सही कहा था कि धर्म अफिम के समान है। आज धर्म आैर धार्मिक कार्य के नाम पर लोग अपनी विवेक बुद्धि सब खो बैठते हैं। फिर पाखंडी धर्म गुरु अपने चेले को मंदारी का बंदर जैसा नचाता है। अंधविश्वास की शराब पीकर मदमस्त उनके चेले सुध-बुध खोकर खूब नाचते हैं। बलात्कार के आरोपी आशु महाराज का असली नाम आसिफ मोहम्मद है। यह बाबा पहले पंचर बनाने का काम करता था। पुलिस पूछताछ के दौरान उसने यह बताया कि मुस्लिम धर्मगुरु बनने पर उसे उतने पैसे नहीं मिल सकते थे जितने हिंदू धर्मगुरु बनने पर मिलते। आशु नाम रखते ही उसका ज्योतिष का धंधा चल निकला। इसी प्रकार अपने आपको बापू करने वाले मासूम बेटी से बलात्कार करने के जुर्म में जेल की हवा खा रहा है। बिलकुल सही पहचाना बात आसाराम की हो रही है। आसाराम ने धर्म की दुकान गुजरात के अहमदाबाद से कर पूरे देशभर में धंधा फैलाया। इनके इतने भक्त हो गए कि जब कोर्ट ने इसे उम्रकैद की सजा दी तो उनके अंधभक्तों की भीड़ भारी हंगामा और प्रदर्शन करने लगे। मार्डन और राकस्टार बाबा भी खूब चला भक्तों के बीच। जी हां राम रहीम। सिरसा के डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पिछले साल रेप के मामले में दोषी पाया गया। ये बाबा खूद अपने भक्तों को लुभाने के लिए फिल्म बनाया और बतौर एक्टर काम भी किया। रामरहीम का काला चेहारा दिखाने में रामचंद्र छत्रपति की बड़ी भूमिका रही। जिनकी कीमत पत्रकार को जान से चुकानी पड़ी।
इस प्रकार रामपाल, दाती महाराज, राधे मां, सच्चिदानंद गिरी, ओम बाबा, निर्मल बाबा, भीमानंद महाराज, बृहस्पति गिरी, नारायण साईं और बाबाओं धर्म के धंधेबाजों की सूची लंबी होती जाएगी।

- गौतम गणपत

Tuesday, 4 September 2018

कहिनी : भूत के राहपट

बात एक गांव के आय। समारू के घर के पीछोद म लीम के नीचे सौचालय हे, फेर ओकर कपाट ह टूट गेहे। एकर सेती दिनमान ए सौचालय के उपयोग करत नइ बनय। तब ए घर के मन संझाकुन सौचालय म जाथे।  लगती सावन म टिपिर-टिपिर पानी गिरत रिहिस। तब समारू के गोसइन मनटोरा ह दिन बुड़े के बाद घर के पीछोद म बने सौचालय म जाथे। सौचालय म खुसरते साथ मनटोरा ल  हकन-हकन के दू राहपट पड़थे। जब एती-ओती ल देखथे त ओला कोनाे नइ दिखय। तब मनटोरा ह मंड़माड़े चिचयावत भागथे। अउ भूत-भूत कही के गोहार पारत घर भीतर चल देथे।
जब समारू ह संझा कुन किंजर के आथे, त मनटोरा ह ओला बताथे कि हमर बियारा के सौचालय म भूत रइथे। अतका बात ल सुनके समारू कइथे- कइसे गोठियाथस पगली। रोज-दिन ओ सौचालय म जावत हन फेर एको दिन अइसन बात नइ होहे। दिनमान मे ह उही मेर बइला बांधे बर गे हंव, तब तो भूत-परेत ह मोला नइ दिखीस। मनटोरा- नहीं मैं ह सिरतोन काहत हंव। मोला भूत ह जोरदार दू राहपट मारे हे, ऐ देख ले रोल उपट गे हे। समारू देखथे त सही म ओकर गाल म मारे के चिन्हा ह रहाय। तब ए बात ल सोच-सोच के रातभर दुनों परानी के नींद नइ परिस।
होवत बिहिनिया दूनो झन जाके सौचालय ल देखथे। त काही नइ रहाय। समारू अउ मनटोरा ल अब डर लागे ल धर लिस। काबर लगती सावन के महिना रहाय। ए दिन गांव म भूत-परेत, टोनही-टमानी, मरी-मसान, जादू-टोना, फूंक-झार अउ ठूआ-ठाेटका के बात ह सुने बर मिलथे। गांव वालामन कइथे कि ए दिन जम्मो सैतानी ताकत मन जाग जइथे। तेकर सेती गांव ल बइगामन ले बंधाय जाथे। कई झन बताय रहाय कि सावन के महिना म टोनही-भूत ह मनखे ल जियादा  सताथे। ए बात ल दुनो परानी दिनभर गुनत रहाय। रही-रही के सौचालय म जाके देखय भूत आगे का। मनटोरा कइथे- भूत ह दिनमान नइ आवय। अंधियार म आथे। जब सांझ हो जही तब जाके देखबे।
समारू ह डरराय ल धर लेथे। नहीं मैं नइ जावंव मोला अबड़ डर लागथे। मनटोरा कइथे कइसन डरपोकना आव। एक घांव जाके देखतेव जी का हरे ते। तब मनटोरा के घेरी-बेरी बरजे म समारू ह दिन बुड़े के बाद अंधियार होते साथ सौचालय के भीतरी म जइसे जाथे, वहू ल तीन राहपट पड़ जथे। कंझाय समारू ह ए दाई-नई बाचव ओ महूं ल भूत ह मार दिस। सिरतोन म इहां भूत रहिथे। जब दिनमान होइस त समारू अउ ओकर बाइ ह ए बात ल जम्मो पारा-परोस के मनखे मन कर गोठिया डरिस। ए गोठ ह पूरा गांवभर म फइल गे। समारू के बियारा म सौचालय कर नीम तरी भूत निकलथे। तब समारू ल कइ झन कइथे। बइगा-गुनिया ल दिखा लेतेस जी। समारू ह मनेमन सोचे ल धर लेथे। मनटोरा कइथे बइगा कर जाय ले पहली हमर गांव के मास्टरजी ल पूछ लेतेस।
गांव के मास्टरजी कर बड़ बहिनिया ले समारू ह गिस। समारू कइथे मास्टरजी हमर घर के पिछोद म नीम तरी सौचालय के भीतरी म अंधियार होथे त भूत निकलथे। मास्टर जी कइथे बिहिनिया-बिहिनिया ले अइसने मजाक करे बर आय हस जी समारू। तोला अउ काही नइ सुझीस। समारू- नहीं मास्टर जी मैं मजाक नइ करत हंव सिरतोन बात आय। भूत ह गोसइन मनटोरा अउ मोला राहपट-राहपट मारे हे। कोई लबारी बात नोहे। तभो ले मास्टर जी ह ओकर बात ल नइ पतियावत रहिस। काबर ओ ह पढ़े-लिखे मनखे आय। अइसन भूत-परेत अउ टोनही-टमानी म बिलकुल बिसवास नइ करय। समारू कइथे का गुनत हस मास्टरजी कोनो बइगा-बाबा बतातेस जउन ह ए भूत ल भगा सकय। मास्टरजी कइथे। मोला भइया तोर बात म काही बिसवास नइ हे। जबरन गांव-गोहार पारत हस। मैं ह खुद चल के देखहू। कतका बेर निकलथे भूत ह ओला बता। समारू- नहीं मास्टरजी हमन ल हकन-हकन के भूत ह मारे हे तैं झन जा तहूं ल मार दिही। अरे मैं तो देखे बिना नइ पतियावंव रे भाई। समारू ठीक हे मास्टरजी संझा जुआर आ जबे हमर घर।
मुंधियार होइस ताहन मास्टरजी ह पहुंचगे। मास्टरजी के संग सरपंच अउ गांव के मन घलो चार-पांच झन आगे। मास्टर जी कइथे तोर घर के भूत-परेत के बात ह हमर गांव अउ दूसर गांव म घलो फइल गे हे। लइकामन अब अंधियारकुन घर ले निकले बर डरराथे। अब ए बात ह तो आज पता चल जही का सिरतोन तोर घर के बारी के सौचालय म भूत हाबय कि नहीं। सिटिर- सिटिर पानी ह गिरत रहाय। मास्टरजी ह सौचालय म खुसरिस अतका म दू राहपट उहू ल परगे। मास्टरजी टार्च धरे रहाय। बंग ले बार दिस। देखथे त बेंदरा ह खुसरे रहाय। मास्टरजी सबो झन ल किहिस देखंव भइया तुहर भूत ल। ए बेंदरा ह बरसात के पानी ले बाचे बर इहां रोज खुसर जथे अउ होवत बहिनिया भाग जथे। जउन ल भूत के राहपट काहत रहेव, ओ ह बेंदरा के राहपट आय। जबरन भूत-परेत के गोहार पारत हव। इही ल कइथे भय नाम भूत। पहली कोनो चीज ल ठीक ढंग ले जांच परख लेना चाही। तेकर बाद कोनो बात ल पतियाना चाही। सरपंच अउ गांव के जम्मो मनखे कइथे सिरतोन म समारू अउ मनटोरा फोकट के गांव भर ल भूत के  डर देखावत रहिस। भूत-परेत, टोनही-टमानी अउ जादू-टोना बिलकुल नइ होवय। मनखे के भरम अउ अगियानता ले भूत के डर ह उपजथे।

गौतम गणपत

Sunday, 26 August 2018

मनखे ल बिलहोरत हे वाट्सएप-फेसबुक


दारू, बिड़ी-सिगरेट अउ तास-जुआ के नसा ह बिलकुल पुराना होगे हे। आजकल नवा नसा आय हे, फेसबुक अउ वाट्सएप्प के नसा। ए नसा ह दिनरात मनखे ल चघे रइथे।  एकर चपेट म लइका-सियान, टूरा-टूरी, नौकरीवाला अउ घर म फोकटछाप बइठे मनखे सब नसा म मताय बइइा-भुतहा असन घुमत रइथे। होवत बिहिनिया सुतउठ के कोनो काम बुता ह कहूं जाय, फेर फेसबुक अउ वाट्सएप ल देखे बर कोनो ह नइ भुलाय। ए सोसल मीडिया के चक्कर म आजकल के छोकरा-छोकरी मन ल रात के दू बजे घलो नींद नइ आवय। आजकल सबले बड़े बुता काय आय वाट्सएप के स्टेटस ल बदलना। जम्मो कामकाज ल छोड़ के मनखे ह वाट्सएप स्टेटस ल मन लगाके बदलथे।
कोनो वाट्सएप्प म मजाक वाला मैसेज भेजही त कठले-हांसे के सिंबल दू-चार ठोक चिपका देथे। हाथ के ठेंगा दिखाके लाइक कर देथे। एकर बाद भेजइया ह घलो हाथ जोड़े वाला ओ डाहर ले भेजके अंतस के आभार ल मंड़माड़े परगट करथे। जोक-जोक म आजकल के लइका मन जकजका गे हे। पूरा पढ़ई-लिखई के सतइयानास होवत हे। महतारी ह लइका ल खाय बर बलावत हे तब लइका काहत हे राहना ओ अभी फेसबुक म झक्कास फोटू अपलोड करे हंव। ओमा संगवारी मन के अब्बड़ कमेंट आए हे, ओकर जुआब देवत हंव। लइका ह फेसबुक के कंमेंट मन ल लाइक कर-कर के बारी-बारी सबो झन ल थैंक्स काहत हे। ए परकार ओकर दिन ह फेसबुक अउ वाट्सएप के कंमेंट, लाइक अउ सेयर म निकल जथे।
अब इसकूल के गुरुजीमन घलो फेसबुक-वाट्सएप के मायाजाल म फंसे हे। लइका ल पढ़ाय ल छोड़ के कुरसी म बइठे कठलत रहाय। तब लइकामन  पूछथे कइसे गुरुजी का होगे मनेमन अबड़ हांसत हस। तब गुरुजी कइथे- चुपो रे मोर माेबाइल म अइसे जोक्स आय हे, तेला पढ़के हांस-हांस के पेट फुलगे। अब गुरुजी ह लइकामन ल पढ़ाय बर छोड़ के वेरी नाइस, सुपर, झक्कास, बम हे, फाड़ू अउ धमाल कही के वाट्सएप म रिपलाइ देवत हे। अइसने-तइसने पढ़ाय के पूरा बेरा ह सिरागे। ठिन-ठिन-ठिन घंटी बाजगे, छूट्टी होगे। आजकल इसकूल के पढ़ई ह अइसने होवत हे।
आज जम्मो तिहार ह घलो फेसबुक-वाट्सएप म हो जावत हे कोनो ल काकरो पास जाय के जरूरत नइ हे। हरेली तिहार अइस त गेड़ी अउ बइला के फोटू ल वाट्सएप म भेज देवत हे, नहीं त फेसबुक म अपलोड कर देवत हे। राखी तिहार म बहिनी अपन मयारू भाई ल राखी ल वाट्सएप म भेज के आसीरबाद ले लेथे। तब भाई घलो कमती नइ हे वहूं ह इंटरनेट म गिफ्ट के फोटू निकाल के बहिनी ल भेज के मड़माड़े मया-दुलार परदसन करथे। झंडा तिहार आगे तब तो झन पूछ सबे झन के वाट्सएप-फेसबुक म झंडा-झंडा दिखते। फेसबुकिया संगवारी मन देसभक्ति देखाय के चक्कर म झंडा के बीचोबीच अपन फोटू ल लगाके अपलोड  करथे। एमन भुला जथे कि असोक चक्र के जगह काकरो फोटू लगाना या झंडा म कोनो किसम के कांट-छांट करना झंडा अउ देस के अपमान आय। देसभक्ति ह बने बात आय फेर भक्ति के चक्कर म काही उलटा-पुलटा नइ करना चाही। काही तिहार होय मनखे ह अपन घर भीतरी म खुसरे-खुसरे मना लेथे। जब होरी तिहार आथे तब गांव म न जियादा नगाड़ा बाजे अउ न रंग उड़े पूरा सुन्ना असन लागथे। काबर जम्मो संगवारी ह रंग-गुलाल ल फेसबुक-वाट्सएप म एक-दूसर ल भेजे म बियस्त रइथे। देवारी तिहार के दिन कोनो ह फटाका के एनिमेशन वाले फोटू ल घलो भेज देथे। जउन ह सहीच के फुटत तइसे दिखथे। सिरतोन म आज पूरा जमाना ह बदल गे हे। मनखे ह भीड़ म घलो अकेल्ला रइथे। संगवारीमन के बीच घलो डोंगरी म रहे असन रइथे। आजकल ए सोसल मीडिया ह मया-पिरित, संगी-संगवारी, दाई-ददा, घर-परिवार, पढ़ई-लिखई, खेलई-कुदई ले दूरिहा करत जावत हे।
सोसल मीडिया ल बने काम बर उपयोग करना चाही। अउ बेरा-बेरा म उपयोग करना चाही कोनो जिनिस के अति ह दुरगति आय। आजकल के मनखे मन उपयोग कम दुरुपयोग जियादा करत हे। सोसल मीडिया म मया-पिरित के जगह म एक जाति ह दूसर जाति ल अउ एक धरम ह दूसर धरम ल नीचे दिखाय के अउ नफरत फइलाय के काम म लगे हे। कतको जगह ए वाट्सएप-फेसबुक म अफवाह फइला के कोनो ल गाय कटइया, कोनो ल लइका धरइया अउ कोनो ल चोरहा कही के मार डरत हे। संगवारी मन ल सोचना चाही कोनो भी मैसेज ल बिना पढ़े, बिना सोचे-बिचारे अउ बिना जाने-सुने कभू भी फारवड नइ करना चाही।
वाट्सएप-फेसबुक के कारन दोस्ती-यारी अउ रिस्ता-नता ह घलो दूरिहावत हे। पहली जब एक संगवारी ह दूसर संगवारी घर बइठे बर जावय अउ अपन दुख-सुख ल एक-दूसर ले बिसरावय तब कतेक बने लायग। फेर आजकल सोसल मीडिया म जम्मो बात ल कही डरथे, लेकिन ए गोठ म मया गे सुगंध नइ आवय। वाट्सएप-फेसबुक के सेती लइकामन चिड़चिड़ापन के सिकार होवत हे। एकर ले ओकर दाई-ददा मन परेसान रइथे। लइकामन के बात-बात म गुस्सा करना अउ चिल्लई ह अब साहज होगे हे। घर के सियानमन ल घलो चाही की नान-नान लइकामन ल मोबाइल  झन देवय। जब जाने-सुने के लइक हो जही त ओकर जरूरत के हिसाब ले मोबाइल ल देना चाही। पढ़ईया लइकामन ल घलो चाही की मोबाइल अउ इंटरनेट के उपयोग बने कारज बर  करय। जइसे काेनो परकार के जानकारी लेना हे त इंटरनेट ह बड़ सुघ्घर काम आथे। फेर आजकल जानकारी या पढ़ई-लिखई बर कमती अउ फोकट टेमपास बर जियादा होवत हे। पढ़ईया लइकामन पढ़ई म जियादा अउ मोबाइल म कम धियान देवय तभे उकर जिनगी ह सवरही अउ ओमन आगे बढ़ी। पढ़ई के संगेसंग खेलई-कुदई घलो करना चाही। एकर ले सरीर ह बने रइथे। सोसल मीडिया के उपयोग करे, फेर बेरा-बेरा म। अउ बने काम-बुता बर।

- गौतम गणपत

Monday, 13 August 2018

रेडियो म बकबकावत हे

हमर मुखिया ह रेडियो म बकबकावत हे
मंडमाड़े अपन गुन गावत हे
रंग-रंग के गोठ म
लोगन ल भरमावत हे
एती गांव-सहर के मनखे
डेंगू-पीलिया म मरत जावत हे
जउन गांव म
न हास्पिटल के ठिकाना न डाक्टर के
उहां घलो बिकास के गंगा बोहावत हे

किसान मरत हे करजा म
फेर आय ल दुगुना बतावत हे
आनी-बानी के वादा करके
थूक-थूक म बरा चुरोवत हे
न धान के भाव बढ़िस
न किसान के इसथिति सुधरिस
तभो ले छत्तीसगढ़ ह
धान के कटोरा कहलावत हे

चुनाव के बेरा म
लेपटाप, टेबलेट, मोबाइल बटवावत हे
छेरी ल हरियर चारा के
लालच देखाके कटवावत हे
सरकारी इसकूल ल बंद करा के
जगह-जगह पराइवेट इसकूल खोलवावत हे
लइकामन निकलगे भोकवा
तभो ले हुसियार कहलावत हे
हमर मुखिया ह रेडियो म बकबकावत हे।

- गौतम गणपत

Friday, 10 August 2018

किसान के अंतस ल हरियाथे हरेली तिहार

जब किसान मन ह खेत के बियासी के काम-बुता ल पुरा कर लेथे। खेत-खार ह हरियर-हरियर लुगरा पहिन लेथे तब छत्तीसगढ़ के पहली तिहार हरेली ह किसानमन बर खुसी अउ उच्छाह लेके आथे। हरेली तिहार ल सावन महिना के अमावस्या के दिन मनाया जाथे। ए दिन किसानमन अपन नागर-बइला, हंसिया, कुदारी, गैती, रापा अउ किसानी के जम्मो जिनिस ल तरिया ले धोके लानथे अउ अंगना म एक जगह रखके पूजा करथे। सियानमन बर तो ए दिन ह खास तो आय संगे-संग लइकामन बर घलो ए दिन ह बहुत उच्छाह के आय। काबर ए दिन लइकामन ल घलो गेड़ी चढ़े बर मिलथे अउ गुड़हा चिला खाय बर घलो मिलथे। तेकरे सेती लइकामन घलो ए तिहार के सालभर अगोरा करत रइथे। ए दिन बिहिनिया ले गांवभर म चहल-पहल दिखथे। घर के महतारी ह ए दिन घर के साफ-सफाई म लग जथे। घर-द्वार ल लीप-बुहार के अंगना म चउक पूरथे। चउक पुरे ठउर म खेती-किसानी के सबो सामान ल रख के पूजा करे जाथे। हमर छत्तीसगढ़ म हमेसा ले जीव-जंतु, पेड़-पौधा, तरिया-नदिया के पूजा करे के रिवाज हे। इहा के मनखे ह परकिरिति के पुजारी आय। 
किसान के जिनगी म बइला के बड़ महत्ता हे एकरे सेती। एकरे सेती किसानमन बइला ल भगवान असन मानथे। हरेली के दिन घलो किसानमन अपन-अपन बइला ल तरिया म खलखल ले धोके अउ ओकर सींग म वारनिस रचा के पूजा करथे। बारिस के दिन म गाय-गरवा ल बीमारी ले बचाय खातिर हरेली के दिन बरगंडा, नमक अउ आटा ल मिलाके लोंदी बना के खवाय जाथे। ए पौसटिक लोंदी ह बइला-गाय ल बरसात के बीमारी ले लड़े के ताकत देथे। हरेली के दिन म गाय-गरूआ, नागर-बखर के संगे-संग खेत के फसल के घलो पूजा करे जाथे। हरेली के दिन गांव म खेल के घलो मजा ले जाथे। ए दिन गेड़ी उदड़, नारियर फेंक, कबड्डी अउ कई ठोक लोक खेल के आयोजन होथे। गेड़ी दउड़ लइका म लइका ह गेड़ी म चड़के मड़माड़े दउड़थे। तब गेड़ी म लगे नारियर के बूच ले रच-रच के आवाज आथे। जियादा आवाज के आनंद ले बर रस्सी म थोकन माटीतेल डाल दे जाथे। नारियर फेंक परतियोगिता म सियानमन अपन हाथ अजमाथे। बल भर जउन ह जियादा दूर नारियर ल फेंकथे उही ह विजेता बनथे। तब हारे खिलाड़ी ह जीते खिलाड़ी ल नारियर भेंट करके सुवागत करथे। ए दिन खिलाड़ी अउ दरसक ल मरमाड़े खुरहेरी खाय ल मिलथे। गांव म कई जगह कबड्डी के घलो खेल होथे। ए दिन मार माड़ी कोहनी के छोलवत ले कबड्डी खेले जाथे। ए दिन नोनीमन घलो खेले-कुदे म पीछू नइ रहाय। गांव के चउक म नोनीमन जोरिया के फुगड़ी खेलथे अउ फुगड़ी फू होरे फुगड़ी फू गाना ल बड़ मन लगा के गाथे। ए प्रकार के देखे जाय तो सबे झन बर हरेली के तिहार ह खुसी अउ उच्छाह लेके आथे। ओकरे सेती ए दिन ह लइका-सियान ल बड़ भाथे।