Sunday, 26 August 2018

मनखे ल बिलहोरत हे वाट्सएप-फेसबुक


दारू, बिड़ी-सिगरेट अउ तास-जुआ के नसा ह बिलकुल पुराना होगे हे। आजकल नवा नसा आय हे, फेसबुक अउ वाट्सएप्प के नसा। ए नसा ह दिनरात मनखे ल चघे रइथे।  एकर चपेट म लइका-सियान, टूरा-टूरी, नौकरीवाला अउ घर म फोकटछाप बइठे मनखे सब नसा म मताय बइइा-भुतहा असन घुमत रइथे। होवत बिहिनिया सुतउठ के कोनो काम बुता ह कहूं जाय, फेर फेसबुक अउ वाट्सएप ल देखे बर कोनो ह नइ भुलाय। ए सोसल मीडिया के चक्कर म आजकल के छोकरा-छोकरी मन ल रात के दू बजे घलो नींद नइ आवय। आजकल सबले बड़े बुता काय आय वाट्सएप के स्टेटस ल बदलना। जम्मो कामकाज ल छोड़ के मनखे ह वाट्सएप स्टेटस ल मन लगाके बदलथे।
कोनो वाट्सएप्प म मजाक वाला मैसेज भेजही त कठले-हांसे के सिंबल दू-चार ठोक चिपका देथे। हाथ के ठेंगा दिखाके लाइक कर देथे। एकर बाद भेजइया ह घलो हाथ जोड़े वाला ओ डाहर ले भेजके अंतस के आभार ल मंड़माड़े परगट करथे। जोक-जोक म आजकल के लइका मन जकजका गे हे। पूरा पढ़ई-लिखई के सतइयानास होवत हे। महतारी ह लइका ल खाय बर बलावत हे तब लइका काहत हे राहना ओ अभी फेसबुक म झक्कास फोटू अपलोड करे हंव। ओमा संगवारी मन के अब्बड़ कमेंट आए हे, ओकर जुआब देवत हंव। लइका ह फेसबुक के कंमेंट मन ल लाइक कर-कर के बारी-बारी सबो झन ल थैंक्स काहत हे। ए परकार ओकर दिन ह फेसबुक अउ वाट्सएप के कंमेंट, लाइक अउ सेयर म निकल जथे।
अब इसकूल के गुरुजीमन घलो फेसबुक-वाट्सएप के मायाजाल म फंसे हे। लइका ल पढ़ाय ल छोड़ के कुरसी म बइठे कठलत रहाय। तब लइकामन  पूछथे कइसे गुरुजी का होगे मनेमन अबड़ हांसत हस। तब गुरुजी कइथे- चुपो रे मोर माेबाइल म अइसे जोक्स आय हे, तेला पढ़के हांस-हांस के पेट फुलगे। अब गुरुजी ह लइकामन ल पढ़ाय बर छोड़ के वेरी नाइस, सुपर, झक्कास, बम हे, फाड़ू अउ धमाल कही के वाट्सएप म रिपलाइ देवत हे। अइसने-तइसने पढ़ाय के पूरा बेरा ह सिरागे। ठिन-ठिन-ठिन घंटी बाजगे, छूट्टी होगे। आजकल इसकूल के पढ़ई ह अइसने होवत हे।
आज जम्मो तिहार ह घलो फेसबुक-वाट्सएप म हो जावत हे कोनो ल काकरो पास जाय के जरूरत नइ हे। हरेली तिहार अइस त गेड़ी अउ बइला के फोटू ल वाट्सएप म भेज देवत हे, नहीं त फेसबुक म अपलोड कर देवत हे। राखी तिहार म बहिनी अपन मयारू भाई ल राखी ल वाट्सएप म भेज के आसीरबाद ले लेथे। तब भाई घलो कमती नइ हे वहूं ह इंटरनेट म गिफ्ट के फोटू निकाल के बहिनी ल भेज के मड़माड़े मया-दुलार परदसन करथे। झंडा तिहार आगे तब तो झन पूछ सबे झन के वाट्सएप-फेसबुक म झंडा-झंडा दिखते। फेसबुकिया संगवारी मन देसभक्ति देखाय के चक्कर म झंडा के बीचोबीच अपन फोटू ल लगाके अपलोड  करथे। एमन भुला जथे कि असोक चक्र के जगह काकरो फोटू लगाना या झंडा म कोनो किसम के कांट-छांट करना झंडा अउ देस के अपमान आय। देसभक्ति ह बने बात आय फेर भक्ति के चक्कर म काही उलटा-पुलटा नइ करना चाही। काही तिहार होय मनखे ह अपन घर भीतरी म खुसरे-खुसरे मना लेथे। जब होरी तिहार आथे तब गांव म न जियादा नगाड़ा बाजे अउ न रंग उड़े पूरा सुन्ना असन लागथे। काबर जम्मो संगवारी ह रंग-गुलाल ल फेसबुक-वाट्सएप म एक-दूसर ल भेजे म बियस्त रइथे। देवारी तिहार के दिन कोनो ह फटाका के एनिमेशन वाले फोटू ल घलो भेज देथे। जउन ह सहीच के फुटत तइसे दिखथे। सिरतोन म आज पूरा जमाना ह बदल गे हे। मनखे ह भीड़ म घलो अकेल्ला रइथे। संगवारीमन के बीच घलो डोंगरी म रहे असन रइथे। आजकल ए सोसल मीडिया ह मया-पिरित, संगी-संगवारी, दाई-ददा, घर-परिवार, पढ़ई-लिखई, खेलई-कुदई ले दूरिहा करत जावत हे।
सोसल मीडिया ल बने काम बर उपयोग करना चाही। अउ बेरा-बेरा म उपयोग करना चाही कोनो जिनिस के अति ह दुरगति आय। आजकल के मनखे मन उपयोग कम दुरुपयोग जियादा करत हे। सोसल मीडिया म मया-पिरित के जगह म एक जाति ह दूसर जाति ल अउ एक धरम ह दूसर धरम ल नीचे दिखाय के अउ नफरत फइलाय के काम म लगे हे। कतको जगह ए वाट्सएप-फेसबुक म अफवाह फइला के कोनो ल गाय कटइया, कोनो ल लइका धरइया अउ कोनो ल चोरहा कही के मार डरत हे। संगवारी मन ल सोचना चाही कोनो भी मैसेज ल बिना पढ़े, बिना सोचे-बिचारे अउ बिना जाने-सुने कभू भी फारवड नइ करना चाही।
वाट्सएप-फेसबुक के कारन दोस्ती-यारी अउ रिस्ता-नता ह घलो दूरिहावत हे। पहली जब एक संगवारी ह दूसर संगवारी घर बइठे बर जावय अउ अपन दुख-सुख ल एक-दूसर ले बिसरावय तब कतेक बने लायग। फेर आजकल सोसल मीडिया म जम्मो बात ल कही डरथे, लेकिन ए गोठ म मया गे सुगंध नइ आवय। वाट्सएप-फेसबुक के सेती लइकामन चिड़चिड़ापन के सिकार होवत हे। एकर ले ओकर दाई-ददा मन परेसान रइथे। लइकामन के बात-बात म गुस्सा करना अउ चिल्लई ह अब साहज होगे हे। घर के सियानमन ल घलो चाही की नान-नान लइकामन ल मोबाइल  झन देवय। जब जाने-सुने के लइक हो जही त ओकर जरूरत के हिसाब ले मोबाइल ल देना चाही। पढ़ईया लइकामन ल घलो चाही की मोबाइल अउ इंटरनेट के उपयोग बने कारज बर  करय। जइसे काेनो परकार के जानकारी लेना हे त इंटरनेट ह बड़ सुघ्घर काम आथे। फेर आजकल जानकारी या पढ़ई-लिखई बर कमती अउ फोकट टेमपास बर जियादा होवत हे। पढ़ईया लइकामन पढ़ई म जियादा अउ मोबाइल म कम धियान देवय तभे उकर जिनगी ह सवरही अउ ओमन आगे बढ़ी। पढ़ई के संगेसंग खेलई-कुदई घलो करना चाही। एकर ले सरीर ह बने रइथे। सोसल मीडिया के उपयोग करे, फेर बेरा-बेरा म। अउ बने काम-बुता बर।

- गौतम गणपत

Monday, 13 August 2018

रेडियो म बकबकावत हे

हमर मुखिया ह रेडियो म बकबकावत हे
मंडमाड़े अपन गुन गावत हे
रंग-रंग के गोठ म
लोगन ल भरमावत हे
एती गांव-सहर के मनखे
डेंगू-पीलिया म मरत जावत हे
जउन गांव म
न हास्पिटल के ठिकाना न डाक्टर के
उहां घलो बिकास के गंगा बोहावत हे

किसान मरत हे करजा म
फेर आय ल दुगुना बतावत हे
आनी-बानी के वादा करके
थूक-थूक म बरा चुरोवत हे
न धान के भाव बढ़िस
न किसान के इसथिति सुधरिस
तभो ले छत्तीसगढ़ ह
धान के कटोरा कहलावत हे

चुनाव के बेरा म
लेपटाप, टेबलेट, मोबाइल बटवावत हे
छेरी ल हरियर चारा के
लालच देखाके कटवावत हे
सरकारी इसकूल ल बंद करा के
जगह-जगह पराइवेट इसकूल खोलवावत हे
लइकामन निकलगे भोकवा
तभो ले हुसियार कहलावत हे
हमर मुखिया ह रेडियो म बकबकावत हे।

- गौतम गणपत

Friday, 10 August 2018

किसान के अंतस ल हरियाथे हरेली तिहार

जब किसान मन ह खेत के बियासी के काम-बुता ल पुरा कर लेथे। खेत-खार ह हरियर-हरियर लुगरा पहिन लेथे तब छत्तीसगढ़ के पहली तिहार हरेली ह किसानमन बर खुसी अउ उच्छाह लेके आथे। हरेली तिहार ल सावन महिना के अमावस्या के दिन मनाया जाथे। ए दिन किसानमन अपन नागर-बइला, हंसिया, कुदारी, गैती, रापा अउ किसानी के जम्मो जिनिस ल तरिया ले धोके लानथे अउ अंगना म एक जगह रखके पूजा करथे। सियानमन बर तो ए दिन ह खास तो आय संगे-संग लइकामन बर घलो ए दिन ह बहुत उच्छाह के आय। काबर ए दिन लइकामन ल घलो गेड़ी चढ़े बर मिलथे अउ गुड़हा चिला खाय बर घलो मिलथे। तेकरे सेती लइकामन घलो ए तिहार के सालभर अगोरा करत रइथे। ए दिन बिहिनिया ले गांवभर म चहल-पहल दिखथे। घर के महतारी ह ए दिन घर के साफ-सफाई म लग जथे। घर-द्वार ल लीप-बुहार के अंगना म चउक पूरथे। चउक पुरे ठउर म खेती-किसानी के सबो सामान ल रख के पूजा करे जाथे। हमर छत्तीसगढ़ म हमेसा ले जीव-जंतु, पेड़-पौधा, तरिया-नदिया के पूजा करे के रिवाज हे। इहा के मनखे ह परकिरिति के पुजारी आय। 
किसान के जिनगी म बइला के बड़ महत्ता हे एकरे सेती। एकरे सेती किसानमन बइला ल भगवान असन मानथे। हरेली के दिन घलो किसानमन अपन-अपन बइला ल तरिया म खलखल ले धोके अउ ओकर सींग म वारनिस रचा के पूजा करथे। बारिस के दिन म गाय-गरवा ल बीमारी ले बचाय खातिर हरेली के दिन बरगंडा, नमक अउ आटा ल मिलाके लोंदी बना के खवाय जाथे। ए पौसटिक लोंदी ह बइला-गाय ल बरसात के बीमारी ले लड़े के ताकत देथे। हरेली के दिन म गाय-गरूआ, नागर-बखर के संगे-संग खेत के फसल के घलो पूजा करे जाथे। हरेली के दिन गांव म खेल के घलो मजा ले जाथे। ए दिन गेड़ी उदड़, नारियर फेंक, कबड्डी अउ कई ठोक लोक खेल के आयोजन होथे। गेड़ी दउड़ लइका म लइका ह गेड़ी म चड़के मड़माड़े दउड़थे। तब गेड़ी म लगे नारियर के बूच ले रच-रच के आवाज आथे। जियादा आवाज के आनंद ले बर रस्सी म थोकन माटीतेल डाल दे जाथे। नारियर फेंक परतियोगिता म सियानमन अपन हाथ अजमाथे। बल भर जउन ह जियादा दूर नारियर ल फेंकथे उही ह विजेता बनथे। तब हारे खिलाड़ी ह जीते खिलाड़ी ल नारियर भेंट करके सुवागत करथे। ए दिन खिलाड़ी अउ दरसक ल मरमाड़े खुरहेरी खाय ल मिलथे। गांव म कई जगह कबड्डी के घलो खेल होथे। ए दिन मार माड़ी कोहनी के छोलवत ले कबड्डी खेले जाथे। ए दिन नोनीमन घलो खेले-कुदे म पीछू नइ रहाय। गांव के चउक म नोनीमन जोरिया के फुगड़ी खेलथे अउ फुगड़ी फू होरे फुगड़ी फू गाना ल बड़ मन लगा के गाथे। ए प्रकार के देखे जाय तो सबे झन बर हरेली के तिहार ह खुसी अउ उच्छाह लेके आथे। ओकरे सेती ए दिन ह लइका-सियान ल बड़ भाथे।

Monday, 30 July 2018

अंधबिसवास के कांवर म लदाय मनखे

जब सावन ह आथे त चारो मूड़ा म हरियर-हरियर दिखथे। ए ला देखके मन ह बड़ उच्छाह ले नाचे ल धर लेथे। फेर का करबे पोंगापंथीमन सावन के महीना ल भूत-परेत, जंतर-मंतर, पूजा-पाठ अउ ठूआ-ठोटका के बता के रंग म भंग कर देहे। बड़े दुख के बात तो ए हरे कि हमर मेहनत-मजदूरी करइया भाईमन अंधबिसवास के कांवर ल धर के रेंगत-रेंगत सिवलिंग म पानी चघाय बर जाथे। भले उकर खेत म पानी पले चाहे मत पले। उकर घर म लइकामन बर दाना-पानी रहाय चाहे मत रहाय। फेर बोलबम के नारा लगावत गांजा-भांग पियत सिव के लिंग के पूजा करे बर जाथे।
हर साल सुने ल मिलथे कि झारखंड के बैजनाथधाम अउ देवघर म भगदड़ म कावरियामन मरत हे। अइसन इकर भक्ति म का कमी आ जथे। भगवान के दरसन करे बर जाथे अउ भगवान ल पियारा हो जथे। ए भक्तमन ल ओकर दाई-ददा अउ ओकर बाई ह झन जा कही के बरजथे तभो ले नइ मानय। घर जइसे पवितर मंदिर अउ दाई-ददा जइसे देवी-देवता ल लतिया के पखरा ल अपन बाप-महतारी समझथे। भले ओकर घरवाली ह तरिया-बोरिंग ले पानी डोहर-डोहर के बीमार पर जही फेर ए कांवरियामन घर के पानी लाय बर नइ सकय। फेर कांवर म पानी धर के डीजे के कानफोड़ू धून म गांजा-भांग पिये अंड-बंड गारी बकत भगवान ल खुस करथे। ए कइसन भगवान आय जउन ह सावन के मरमाड़े बाड़ आवत पानी म घलो भक्तमन ले पानी के मांग करथे। कइ जगह तो कांवरियामन पानी के बाड़ म मर जथे त कई जगह गाज गिरे म सीधा ऊपर के टिकट मिल जथे। फेर महासक्तिसाली महादेव ह अपन भगत ल नइ बचा सकय।


पंजाब के एक मित्र के कहने पर हिंदी में अनुवाद- 
अंधविश्वास के कांवर में दबे लोग

जब सावन का महीना आता है तो प्रकृति पूरी तरह से हरियाली से लद जाती है। इस हरियाली को देखकर मन उत्साह से नाचने लगता है, लेकिन कुछ पोंगापंथियों ने इस महीना को भूत-प्रेत, जादू-मंत्र, पूजा-पाठ और टोने-टोटके का बता कर रंग में भंग कर दिया है। बड़ी दुख की बात तो यह है कि हमारे मेहनत करने वाले मजदूर भाई इस अंधविश्वास में फंसकर कांवर लेकर पैदल कई किलोमीटर चलकर मंदिर के शिवलिंग को पानी चढ़ाते हैं। वे इतने मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं कि अपने घर-परिवार और खेत-खार भी भूल जाते हैं। उनके खेत में सिंचाई नहीं होती और उनके बच्चें भूख से बिलखते रोते रहते हैं, लेकिन बोलबम के नारे लगाते हुए गांजा, भांग और शराब पीकर शिवलिंग की पूजा करते हैं।

हर साल खबर आती है कि झारखंड के बैजनाथधाम, देवघर और अन्य जगहों पर भगदड़ में कांविरयों की मौत हो गई। ऐसी इनकी भक्ति में क्या कमी रह जाती है जो भगवान के दर्शन के लिए गए रहते हैं, लेकिन भगवान को ही प्यारा हो जाते हैं। इस कांवरियों को उनके घर वाले कांवर यात्रा न जाने के लिए बहुत मना करते है, फिर भी नहीं मानते। अपने मां-बाप और पत्नी की एक भी बात न सुनकर पत्थर के शिवलिंग को अपने मां-बाप समझते हैं। इतनी मेहनत करके महादेव पर जल चढ़ाने वाले लोग अपने घर के काम-काज इतने लगन से नहीं करते। उनकी पत्नी और मां घर-परिवार और मवेशियों के लिए तालाब और हैंडपंप से पानी भरती है, लेकिन वही कांवरिया अपने कांवर से इनकी मदद पानी लाने में नहीं करते। भले उनकी मां और पत्नी दिनरात काम के दबाव में बीमार पढ़ जाए, लेकिन इन्हें कोई मतलब नहीं। इन्हें तो सिर्फ शिव और उनके प्रसाद गांजा-भांग खूब पसंद है। कांवर में पानी लेकर डीजे की कानफोड़ू धुन में अश्लील गाली देते हुए भगवान को खुश करते हैं। यह कैसा भगवान है जो हर साल हर सावन भारी बारिश और बाढ़ के दिनों में स्नान करने की मांग करते है। कई जगह जल चढ़ाने जा रहे कांवरिया बाढ़ में और बिजली गिरने से मर जाते हैं। फिर भी महाशक्तिशाली महादेव अपने भक्तों को नहीं बचा पाते।

Wednesday, 18 July 2018

जनता की आवाज ही असली कविता

जिन्हें मैं हमेशा किताबों में पढ़ता हूं, उनसे साक्षात भेंट करने का मौका पुणे के पत्रकार भवन में एक कार्यक्रम के दौरान हुआ। वे हिंदी के मशहूर प्रगतिशील कवि राजेश जोशी है। नवनिर्माण सांस्कृतिक मंच की ओर से 'ए डिस्कशन आन मार्क्सिस्ट परसेप्शन आफ आर्ट एंड लिटरेचर' का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में राजेश जी बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए। इस दौरान मुझे उन्हें पहली बार सुनने और उनसे बातचीत करने का अवसर मिला। उनकी 1987 में लिखी कविता 'जो सच-सच बोलेंगे मारे जाएंगे' आज की स्थिति को बयां करती है। वर्तमान में सही को सही और गलत को गलत कहना आसान नहीं है।
बातचीत के दौरान राजेश जी ने कहा कि आज राजनैतिक माहौल बहुत ही खतरनाक है। नेता अपने स्वार्थ के लिए देश का इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। इस प्रकार उल्टे सीधे बयानबाजी करने वाले और देश को जाति-धर्म के नाम पर बांटने वाले नेताओं की आलोचना करने की बड़ी जिम्मेदारी साहित्यकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी वर्ग की है। हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए भारी कीमत चुकानी होगी। समाज में जब कभी भी गलत दिखाई दे तो उसकी निंदा करने में बिलकुल भी नहीं घबराना चाहिए। कवि सिर्फ वो नहीं जो कविता लिखते हैं, कवि तो वह है जिनकी लेखनी में जनता की आवाज हो। समाज के अंदर ऐसी दृष्टि हो जो उचित-अनुचित को समझ सके। रचना के लिए दो घटक होते हैं- समय और समाज। इसे देखने के लिए व्यापक और निष्पक्ष निगाहें की जरूरत होती है।
आज पूरी तरह से भेड़ धसान का दौर चल रहा है। विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद भी कई लोग विवेकशून्य होकर अंधविश्वास में फंसे हैं। ऐसे डाक्टर बहुत देखने को मिलते है, जो उंगलियों में अंगूठी पहनते हैं और झांड़-फूंक व जादू-टोने पर विश्वास करते हैं। ऐसे व्यक्ति की पूरी पढ़ाई व्यर्थ है। पढ़-लिखकर भी काल्पनिक और अर्नगल बातों पर विश्वास करते हैं। इस प्रकार के मूर्खों का मन को बदलना बहुत ही कठिन काम है। कवि और पत्रकार को चाहिए कि समाज में भ्रम और अंधविश्वास न फैलाकर अपनी पूरी ताकत वैज्ञानिक और प्रगतिशील विचार को जन-जन तक फैलाने में लगाए। चाहे समाज में विकृत्ति हो या सत्ता में खामियां। इसके खिलाफ बेझिझक और खुलकर लिखना होगा। साहित्य का काम गलत चीजों का हमेशा प्रतिरोध करना है। समाज में जब-जब विकट स्थिति आएगी, तब-तब साहित्य रास्ता दिखाने का काम करेगा।

Wednesday, 4 July 2018

अंधविश्वास की दलदल में भारतीय समाज

जब किसी का मनोबल कमजोर हो जाए और वैज्ञानिक सोच खत्म हो जाए तब वहां अंधविश्वास जन्म लेता है। दुनियाभर में एक से बढ़कर एक खोज हो रही है, लेकिन भारत देश में आज पूजा-पाठ, जादू-टोने, बैगा-गुनिया, ठुआ-टोटके और न जाने क्या-क्या चल रहे हैं। दिल्ली के बुराड़ी संतनगर में एक ही परिवार के 11 सदस्यों ने पूजा-पाठ करते हुए मोक्ष पाने के लिए फांसी लगा कर जान दे दी। घर में मिली चीजें बयां करती है कि यह भाटिया परिवार लगातार तंत्र-मंत्र के कार्य में लिप्त था। यह परिवार तांत्रिक विद्या पर विश्वास रखता था। ललित और उसकी पत्नी टीना ने परिवार के 9 सदस्यों के साथ मौत के मूंह में समा गए। घर की दीवार में पाइप लगाकर 11 छेद करना और सुरक्षा के लिए तीन कील गाढ़कर जदबंदी से अंधविश्वास की पुष्टि होती है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 11 मौतों का कारण फांसी बताया जा रहा है।
इस प्रकार देशभर में अंधविश्वास बहुत ही खतरनाक रूप से अनपढ़ से लेकर पढ़े-लिखे लोगों को जकड़ा हुआ है। विवेक शून्य होकर जादू-टोने पर विश्वास करने वाले लोग कहीं पर जान दे रहे हैं तो कहीं पर जान ले रहे हैं। देश अंधविश्वास की भारी दलदल में फंसा हुआ है। कहीं पर बारिश के लिए मेढ़क-मेढ़की का विवाह किया जा रहा है। कहीं शांति के लिए जोर-जोर से घंटा और लाउडस्पीकर बजाया जा रहा है। बाजार में नींबू और मिर्च खाने के लिए कम और दुकान और घर में लटकाने के लिए ज्यादा उपयोग किया जा रहा है। सड़क पर नींबू-मिर्च से गाड़ी को बचाने के लिए गिर-मर रहे हैं। सड़क के किनारे कई जगहों पर मंदिर होने से लोग गाड़ी चलाते हुए प्रणाम करने के चक्कर में गिरकर हाथ-पैर तोड़ रहे हैं। कहीं टोनही-डायन के नाम पर महिलाओं की हत्या की जा रही हैं। कहीं बइगा-गुनिया के चक्कर में आकर पैसा लूटा रहे हैं। कई जगह तांत्रिक के कहने पर अपने ही बच्चे की बलि दी जा रही है। आजकल के बच्चे स्कूल में पास होने के लिए पढ़ने में कम और पूजा-पाठ में ज्यादा विश्वास करते हैं। वहीं पालक भी बच्चों को वैज्ञानिक और प्रगतिशील विचारों से दूर रखकर अंधविश्वास के जाल में फंसा रहे हैं। जब तक वास्तविक दुनिया में काल्पनिक चीजें खत्म नहीं होगी तब तक यह अंधविश्वास लोगों को अपना शिकार बनाता रहेगा।

Saturday, 23 June 2018

नानकीन कहिनी : पताल के भाव

साग-भाजी बेचइया गली-गली म चिल्लावत रहिस- ताजा-ताजा पताल, भाटा, गोभी, रमकेलिया, करेला, कुंदरू ले लव। ओतकी बेरा म गांव के गोटनिन ह अपन घर ले निकल के कइथे- पताल ल कइसे किलो लगाय हस गा।
सब्जी बेचइया ह बोलथे- 20 रुपया किलो ताय मालकिन।
गोटनिन- वाह रे सब जगह 10 रुपया म बेचावत हे अउ तैं ह मोला ठगत हस।
सब्जी बेचइया- नहीं मालकिन मैं का ठगहूं जतका म बेचत हंव ओकर ले जियादा पइसा एला उबजाय बर ट्रेक्टर, टूल्लूपंप, खातू-कचरा अउ बनिहार-भुतियार में लाग जथे मालकिन। फेर का करबे मजबूरी म बेचत हन। लेवइयामन ल का ठगबो अउ कतेक जियादा पइसा ले लेबो।
फेर दूसरा दिन साग-भाजी बेचइया ह अउ आथे। तब पताल ल 10 रुपया किलो बताथे। तभो ले गोटनिन कइथे- सबे जगह बाजार म पताल ह 5 रुपया म बेचावत हे तभो ले ते ह अबड़ भाव म बेचत हस गा।
सब्जी बेचइया- अतका सस्ता होय के बाद घलो मालकिन अबड़ लागत हे। मालिक ह ओतका लाखो रुपया कमावत हे तभो ले।
गउटनिन- लाखो कमाय ते करोड़ों कमाय तोला काय करे बर हे। पइसा रही त फोकट म कोनाे ल नइ दय।
सब्जी बेचइया- फोकट म कोन पइसा मागंत हे मालकिन साग-भाजी के बदला पइसा देवत हस। 
फेर एक दिन उही सब्जी बेचइया ह आथे- तब फेर पताल के कीमत ल गोटनिन ह पूछते। सब्जी बेचइया बताथे- का करबे मालकिन ए बखत पताल के पैदावार जियादा होगे हे अउ पानी-बादर म फसल ह खराब होवत हे, तेकर सेती सब किसानमन ह पताल ल सड़क म फेकत हे। मे ह 5 रुपया किलो म बेचत हंव।
गोटनिन- अरे सबे जगह पताल ल कोनो सुंघत नइ हे दू-तीन रुपया किलो म बेचावत हे। तभो ले तैं ह पांच रुपया म बेचत हस। कम लगाबे त लुहूं।
सब्जी बेचइया ह मूड़ धरके कइथे मालकिन फोकट म दे देथंव, एकर ले कम अउ का हो सकथे। तब गोटनिन के मुंहू ह बंद हो जथे।