Sunday, 18 June 2023

मूल नक्षत्र ज्योतिषियों का धंधा


लोगों को ज्योतिष हमेशा ठगते आया है और लोग बिना सोचे समझे उसकी जाल में फंसकर मेहनत की कमाई को लुटाते आ रहे हैं। इसमें मूल नक्षत्र भी एक ठगने का षड्यंत्र है। बच्चा पैदा होते ही नक्षत्र देखने के लिए किसी ज्योतिष को बुला लाते है और उससे बच्चा किस नक्षत्र में हुआ है उसे देखने को कहते हैं।

क्या कहते हैं ज्योतिष

ज्योतिष के अनुसार नक्षत्र 27 होते हैं, जिसमें 6 मूल नक्षत्र है। नक्षत्र का स्वामी केतु को माना जाता है। आठ वर्ष के बाद मूल नक्षत्र का प्रभाव अपने आप खत्म हो जाता है ऐसा कहा जाता है। मूल नक्षत्र में बच्चा पैदा हुआ है तो उस शिशु को अपने पिता से दूर रखा जाता है, पिता की नजर, छाया शिशु पर नहीं पड़ना चाहिए। अगर पड़ गए तो पिता मर जाएगा या नवजात शिशु की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। मूल नक्षत्र को 27 दिनों के अंदर में तोड़ना रहता है ऐसा ज्योतिष का कहना है।

ज्योतिष नक्षत्र के नाम पर लूटता है

मूल नक्षत्र तोड़ने के नाम पर ज्योतिष की बहुत से पैसे की कमाई हो जाती है। लोगों को नक्षत्र के नाम पर डराया जाता है जिससे उसका व्यापार चलता रहे। अगर मूल नक्षत्र का प्रभाव होता तो उस समय जन्में सभी बच्चें में इसका प्रभाव देखे जाते, लेकिन ऐसा नहीं होता है। एक हिन्दू के यहां जन्मा शिशु को मूल नक्षत्र का डर रहता है तो दूसरी ओर मुस्लिम या अन्य किसी धर्म में जन्में शिशु को मूल नक्षत्र से कोई लेना-देना नहीं होता है। अगर ग्रह का प्रभाव व्यक्ति पर पड़ता है तो हर धर्म में अलग-अलग प्रभाव कैसे हो सकता है? एक ही होना चाहिए। विज्ञान का नियम हर व्यक्ति के लिए एक ही होता है। किसी से भेदभाव नहीं करता है। हिन्दू है तो उसे कोरोना होगा या मुस्लिम है तो उसे कोरोना नहीं होगा। ऐसे तो नहीं होता है। कोई भी वायरस या रोग कोई भी धर्म और जाति को नहीं देखता है, तो ये नक्षत्र कैसे एक ही धर्म के लोगों के लिए है। 

स्वार्थ के लिए नक्षत्र का खेल

ज्योतिष अपना स्वार्थ के लिए नक्षत्र का खेल खेलता है। कोई भी ग्रह का अगर प्रभाव अच्छा या बुरा पड़ेगा तो सभी पर बराबर पड़ेगा। एक शिशु गरीब के यहां जन्म लिया और उसी समय अमीर के यहां भी शिशु का जन्म हुआ तो क्या दोनों में मूल नक्षत्र पड़ेगा? बिल्कुल नहीं, नक्षत्र का प्रभाव नहीं होता है। यहां पर आर्थिक स्थिति सबसे अधिक मायने रखती है। गरीब के घर में जन्में शिशु की सही देखभाल नहीं हो पाती है, जिससे उस शिशु का सही विकास नहीं हो पाता है। इस वजह से उसे स्वास्थ्य, शिक्षा और बेहतर रोजगार नहीं मिल पाते हैं। उसे हर समय जिंदगी तकलीफ देती है और पढ़ने के समय में रोजगर की तालाश में लगा रहता है। खाने के लिए संघर्ष करता रहता है। 

आर्थिक और सामाजिक स्थिति का प्रभाव

वहीं दूसरी तरफ अमीर के घर में जन्में शिशु का सही समय में सब सुख-सुविधा के कारण शिशु को कोई कष्ट नहीं होता है और वह शिशु को हर चीज, जो वह चाहता है पैसे की बल बूते मिल जाता है। स्वास्थ्य के साथ ही बेहतर शिक्षा मिलने के कारण उसे कोई तकलीफ नहीं होती है। ये सब कारण के पीछे कोई मूल नक्षत्र नहीं होता है, बल्कि परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति है. लेकिन लोगों की गरीबी और अज्ञानता का फायदा उठाकर ज्योतिष अपना धंधा चमकता रहता है और अपनी जेब भरता रहता है। कुछ बुरा हो जाने के भय से लोग ज्योतिष के जाल में फंस जाते हैं। हमें चाहिए कि बच्चे की परवरिश, खान-पान, साफ-सफाई और शिक्षा पर ध्यान दें और डर की दुकान चलाने वाले ज्योतिष्यों से दूर रहे तभी हमारी आने वाली पीढ़ी का बेहतर भविष्य होगा।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

शादी के लिए कुंडली मिलाने के बजाय कराएं ब्लड जांच


हिंदू धर्म में शादी के लिए भावी वर-वधु की कुंडली मिलाने की आज सामान्य परंपरा बन गई है। कुंडली में 36 गुण होते हैं, जिसमें 18 गुण 50 प्रतिशत गुण मिलना अनिवार्य होता है। अगर नहीं मिलता है, तो रिश्ते से मना कर देता है, चाहे कितना भी बढ़िया घर से रिश्ते हो। ज्यादातर लड़का-लड़की की शादी कुंडली के कारण ही रुक जाती है और वह व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है, अगर करना भी चाहे तो घर वाले उसे बिना कुंडली के शादी के लिए मना कर देते हैं। कुंडली से कोई फायदा नहीं, यह ज्योतिषयों का केवल धंधा है, कुंडली की जगह होने वाला जीवन साथी के परिवारिक पृष्ठभूमि को जाने। लड़का/लड़की में कोई अवगुण है क्या? उसके लिए आस-पास उसके दोस्तों से जानकारी प्राप्त करें। कोई अनुवांशिक बीमारी का शिकार तो नहीं है, उसे ब्लड टेस्ट से जानकर दोनों के टेस्ट को मिलान करें। यानी खुद के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अनुवांशिक बीमारियों से बचें। बहुत सी जातियों में एक ही जाति में शादी करने के कारण अनुवांशिक बीमारियां जाने का नाम नहीं ले रहा है। जाति को लेकर जितना कट्टरता है, उतना ही उस जाति की अनुवांशिक बीमारियां फैल रही है।

कुंडली मिलाने के बाद घर में अशांति क्यों

ऐसा भी देखने को मिल जायेंगे की कुंडली में 36 गुण मतलब पूरा 100 प्रतिशत मिलने के बावजूद शादी के बाद कुछ ही दिनों में पति/पत्नी की मृत्यु हो जाती है। पति शराबी रहता है या शराबी हो जाता है और आए दिन परिवार में खटपट, मारपीट और लड़ाई होती रहती है। उस समय उस कुंडली मिलाने वाला ज्योतिष को कभी नहीं पूछते ऐसा क्यों हुआ? क्या कुंडली ठीक से नहीं मिलाया था या कुंडली देखते समय अंधे हो गया था? ऐसा प्रश्न कोई उस ज्योतिष से नहीं पूछता। और सब अपना भाग्य को दोष देकर सन्तुष्ट हो जाते हैं। अगर दाम्पत्य जीवन खुशमय बीत रहा हो तो उसके कारण कुंडली को मानता है।

सही गुण को छोड़कर कुंडली के काल्पनिक गुण के शिकार

सही अर्थ में देखा जाए तो कुंडली लोगों को भ्रमित करने का तरीका है, इसमें कुछ गुण नहीं होता है। कोई भी ज्योतिष किसी को बिना देखे परखे उसके गुन को कभी नहीं बता सकता कि उस व्यक्ति में कितना गुण-दोष है। अगर कुंडली से गुण दिखता तो वह पहले खुद का और अपना परिवार का गुण देखता, तो औरों के गुण-दोष देखने से अच्छा होता। कोई भी व्यक्ति के गुण देखने के लिए उसके परिवारिक पृष्ठभूमि, आस-पास का वातावरण और दोस्त कैसे है, उसे जानना होगा। उसके व्यवहार का अध्ययन करना होगा। कैसे व्यवहार करता है, झगड़ालु तो नहीं है, नशे तो नहीं करता होगा, चरित्र तो ठीक है आदि गुण-अवगुण को देखना होगा। ये सारी बाते देखने के बाद भी कुंडली के गुण देखना नहीं भूलते, जिससे बढ़िया रिश्ता से कुंडली में दोष देख कर उस रिश्ता को मना कर देते हैं और कुंडली के काल्पनिक बातों के शिकार हो जाता है। कुछ लोग तो कुंडली को भगवान का लिखा हुआ मानकर कुंडली गुण मिलने के बाद सीधे शादी कर लेता है। रिश्ता कैसा है, उसका व्यवहार क्या है, जानने की कोशिश नहीं करता है, फिर बाद में रोना रोता है, भाग्य को कोषते रहता है।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

अंधविश्वास का विरोध जरूरी क्यों


आप सभी जानते हैं कि अंधविश्वास ने समाज को कितना क्षति पहुंचाया है और पहुंचा रहा है। यह देश और समाज के लिए बहुत घातक है। अंधविश्वास ने कई लोगों की जिंदगी बर्बाद की है और बहुत से घर उजाड़ा है। अंधविश्वास, पाखंड और सामाजिक कुरीतियां लोगों के आर्थिक, शारिरीक और मानसिक रूप से शोषण किया है, सबको ठगने का काम किया है। अंधविश्वास लगातार समाज को कमजोर बना रहा है। 

जैसे कोई भी नशा समाज के लिए जानलेवा है, ठीक इसी प्रकार अंधविश्वास समाज को दीमक की तरह कुतरता जा रहा है और समाज इस कष्ट का बीड़ा उठाते आया है। आज यह दीमक भारी रूप ले चुका है और समाज के लिए बहुत बड़ी चुनौती साबित हो रही है। विज्ञान ने हमेशा नई खोज के साथ इसका पर्दाफाश करते हुए आ रहा है। आज लोग विज्ञान का उपयोग करते हैं, लेकिन आधुनिक होकर भी बहुत पिछड़ेपन को दर्शाता है। व्यक्ति कितना भी सभ्य बन जाएं, लेकिन अंधविश्वास से उबर नहीं पा रहे हैं, ये बहुत ही दुखद है कि पढ़-लिख कर भी लोग अंधविश्वास से निकलना नहीं चाहते हैं। जो पढा-लिखा नहीं है वे तो अज्ञानतावश अंधविश्वास के शिकार हो रहे हैं, उसे सही-गलत कोई बताने वाला नहीं है, लेकिन डिग्रीधारी लोग जान-बूझ कर भय की वजह से अंधविश्वासी बने वैठे हैं, इससे बड़े मूर्ख कोई नहीं हो सकते।

इतिहास गवाह है, डायन के नाम से बहुत सी महिलाओं की जान चली गई है। अपने ही परिवार के लोगों को जादू-टोने के शक में हत्या की गई। ओझा तांत्रिक ने लोगों को बहुत लूटा है और लूट रहा है। तांत्रिक बाबाओं ने महिलाओं का शारीरिक शोषण किया है। ऐसे बहुत से अंधविश्वास के कारण समाज को नुकसान उठाना पड़ता है, इसीलिए अंधविश्वास, पाखण्डवाद और सामाजिक कुरीतियों का हमें पूरजोर विरोध करना चाहिए और लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करना होगा। इसी में देश और समाज का हित है और देश का विकास होगा।

-मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

बचपन से ही अंधविश्वास के बीज


बच्चा पैदा नहीं हुआ रहता है और अंधविश्वास चालू हो जाता है। जब बच्चा गर्भ में रहता है तो उसकी मां को नजर न लगे इसके लिए तरह-तरह के टोटके किए जाते हैं। मां और बच्चा स्वस्थ रहे इसके लिए अच्छा खान-पान की जरूरत होती है। हरी-हरी सब्जी, फल और प्रोटीन युक्त खाने की जरूरत होती है, लेकिन यहां इस अवस्था में महिला खुद अंधविश्वास के चक्कर में पड़ी रहती है या घर के लोग अंधविश्वासी है तो उसके आदेश को ठुकरा नहीं सकती है, इसलिए टोटके करती है। समाज पुरुष प्रधान है, यह बात भी सत्य है, लेकिन इसमें अभी मैं नहीं जाऊंगा। महिला पुरुष के आदेश को मानती है, लेकिन ज्यादातर महिलाएं ही अंधविश्वास में पड़ती है, पति अंधविश्वासी नहीं है तब भी पत्नी पति को यह कह कर चुप करा देती है कि तुम कुछ नहीं जानते जी! इस प्रकार महिलाएं बाबाओं के चक्कर में फंस जाती हैं।

बच्चे पैदा होते ही कोई पोंगा पंडित को बुलाया है, फिर क्या! वही मूल-अमूल नक्षत्र और पंचाग जैसे काल्पनिक चीजों पर समय और धन की बर्बादी शुरू हो जाती है। इस नक्षत्र में हुआ तो मूल उस नक्षत्र में हुआ तो अमूल, अजीब-अजीब बातें करके पंडितजी पोंगा बजाना चालू कर देता है। जजमान को डराया जाता है, मूल को नहीं कटाएगा तो बच्चा ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहेगा। अगर बच भी गया तो परिवार को चैन से रहने नहीं देगा, ऐसी बहुत सी बातें लगातार बताई जाती है। घर में संतान पैदा होने की खुशी को गम में बदल देता है। सभी लोग बच्चे को लेकर चिंतित हो उठता है और पंडित के पैरों पर गिरकर कहता है- पंडित जी आप किसी भी तरह से इस बालक के मूल को अमूल कर दीजिए।

फिर पंडित जी (मुस्कुराते हुए) ज्यादा कुछ नहीं करना है, (लंबी लिस्ट जजमान के हाथ में देते हुए) ये कुछ पूजा सामग्री लिख दिया हूं। जब इन चीजों की व्यवस्था हो जाए तो सूचित कर देना और चला जाता है।

शिशु की गर्दन पर ताबीज इस प्रकार बांधा जाता है कि उससे बड़े बच्चा अकेले में खेलते हुए उस ताबीज के धागे को पकड़कर खीच दे तो मृत्यु हो जाए। फिर मां-बाप रोते-चिल्लाते भाग्य को दोष देता रह जाएंगे, कुछ नहीं कर सकते। मस्तक में बड़ा सा काला टीका और आंख में काजल इस प्रकार लगाए जाते हैं कि आंख दिखाई ही न पड़े। अच्छा खासा दिखने वाला चेहरा को कौआ जैसे काला बना देता है और कहता है बच्चे को किसी की नजर न लगे। गजब है दोस्तों बच्चे की नजर बंद करके और चेहरा को काला करके कैसी हास्य वाली बातें कही जाती है। किसकी नजर की बात करते हैं? किसकी नजर से बच्चा को बचाया जाता है? घोर आश्चर्य! जिस-जिस की नजर पड़ती है सब अपने ही होते हैं। घर-परिवार, रिश्ते-नाते ही होते हैं तो किसकी नजर लग जाएगी। वैसे कोई बुरी नजर नहीं होती है। यह पूरी तरह से काल्पनिक है और इससे पाखंडियों का धंधा चलता है।

छोटे बच्चें में अधिक टोटके देखने को मिलता है इसके प्रमुख कारण है- बहुत बीमार पड़ना। बच्चे बहुत से बैक्टेरिया और वायरस से नहीं लड़ पते हैं और बार-बार बीमार पड़ जाते हैं। इससे बच्चे के अभिभावक को लगता है कि किसी डायन, बुरी आत्मा, का प्रकोप लग गया है, किसी की बुरी नजर लग गई है, इसलिए बार-बार शिशु को बीमार कर देता है और टोटका को जारी रखता है। इस कार्य में अनपढ़ लोग के साथ डिग्रीधारी लोग भी अछुते नहीं है। समाज में पढ़े-लिखे होने का सम्मान पाने के बावजूद भी ऐसे अंधविश्वास से आज तक ऊबर नहीं पाए हैं। समझदार लोग हर चीजों को समझने का पूर जोर कोशिश कर रहे हैं। कोई तंत्र-मंत्र, बुरी नजर, काला जादू, भूत-प्रेत, डायन कुछ नहीं होता है; ये सब मन का भ्रम है। कुछ भी कथित चमत्कार होता है, वह आपके लिए तब तक चमत्कार है जब तक आप उसके कार्य-कारण को नहीं जानते हैं, जब कार्य के पीछे होने वाला कारण को खोज लेते हैं तो वह चमत्कार नहीं रह जाता है। चमत्कार दिखा-दिखा के ओझा-तांत्रिक बाबा लोगों को डरा-डराकर ठगने का काम करते हैं। आप सतर्क रहिए और शुरक्षित रहिए।

-आपका
मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

अंधविश्वास का डर जानलेवा


गांव और शहर, अनपढ़ और पढ़े-लिखे व्यक्ति सब लोग डायन और भूत के भय के कारण थरथर कापते रहते हैं। जब हम छत्तीसगढ़ की बात करते हैं तो यहां के लोग डायन और भूत की कहानी सुनाने लग जाते हैं। और डर के कारण अच्छे-अच्छे लोग के पसीने निकल जाते हैं। कोई झूठी बात को बार-बार और जगह-जगह बोलने से वे बातें सच्ची जैसी लगती हैं। अभी तक मैं जीतने भी बात सुना हूं, उसके लिए मुझे सख्त प्रमाण नहीं मिला। सब हवा-हवाई बातें बताते हैं। 

गांव के कुछ ओझा-तांत्रिक (बइगा-गुनिया) से भी बातचीत की, फिर वे लोग भी गोल-मटोल और उल्टा-पुलटा ढंग से जवाब दिए। हमारा पढ़े-लिखे समाज में आज भी महिलाओं को डायन के नाम पर लगातार मारने की घटना घोर अंधविश्वास को दिखाती है। सोचने की बात यह है कि आज पढ़े-लिखे व्यक्ति भी गांव के अनपढ़ व्यक्ति की काल्पनिक कहानी को मान कर उससे भी आगे निकल गइ हैं। जबकि पढ़े-लिखे व्यक्ति को चाहिए कि अंधविश्वास के कुंआ में डूबते हुए जनमानस को निकाले। लेकिन क्या करें ये लोग अंधविश्वास और झूठी बातों के तूफान में उड़ रहे हैं।

छोटी सी उम्र से सुनते आ रहा हूं कि डायन (टोनही) के पास ऐसी शक्ति होती है कि वे हजारों लोगों को एक अकेले मार सकती है। आग और पानी भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। तब मैं ये पूछना चाहता हूं कि गांव में कोई महिला को डायन कह कर लोग मारते हैं, तब उस समय वह अपनी जान को क्यों नहीं बचा पाती। अपनी जान को नहीं बचा सकती वह बेचारी क्या दूसरे की जान ले सकती है और दूसरे के अहित कर सकती है। एक और बात सुनने में मिलते हैं कि डायन से सिर्फ तांत्रिक ही मुकाबला कर सकता है, कहते हैं कि तांत्रिक के पास भी बड़ी-बड़ी शक्तियां होती हैं। वह कितनी भी बीमारी हो एक ही बार में ठीक कर देता है। तब मैं ये पूछता हूं कि हमारे देश में और छत्तीसगढ़ में इतने अस्पताल और डॉक्टरों की बाढ़ कैसे आ गई है। 

तांत्रिक से बीमारियों का इलाज होता तो अस्पताल में भीड़ नहीं होती

गांव के तांत्रिक से सभी बीमारियों का इलाज होता तब ये भीड़ अस्पताल में नहीं दिखती। जिन तांत्रिक सभी बीमारी और समस्या के निपटारा की बात करते हैं वे खुद डॉक्टर के अस्पताल में क्यों इलाज करता है, उसके पास तो सभी बीमारियों से निपटने की शक्ति है तो खुद इलाज नहीं करता। जादू-टोना, ओझा-तांत्रिक समाज के अंदर ऐसे समा गए है जो समाज के लिए बहुत खतरनाक है। जब तक से ये बीमारी के नाश नहीं होती है, तब तक लोग डर-डर कर मरते रहेंगे।

गांव में आज भी कोई व्यक्ति को बुखार और दूसरी बीमारी होती है तो वे डॉक्टर को नहीं दिखा कर ओझा-तांत्रिक के पास जाते हैं। भले उसकी जान चली जाए। एक मेरे करीबी के पढ़े-लिखे व्यक्ति जिसकी बच्ची के शरीर में खाज-खुजली हो गई थी वे तांत्रिक के पास झाड़फूंक करवाता था। इस ओझा-तांत्रिक के चक्कर में डॉक्टरी इलाज नहीं हो पाया तो उसकी बच्ची की खुजली शरीर में फैलने लगी तब मैं इसको कहा कि इसका इलाज कोई चर्म रोग विशेषज्ञ से कराए, तब वे मेरी बात को बहुत मुश्किल से माना और डॉक्टर के पास ले गए तब जाकर वह बच्ची ठीक हुई।

सरकार आंख बंदकर देख रही तमाशा

अब जो कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़े हैं और जो पढ़-पढ़ा रहे हैं। वे भी ऐसे झाड़-फूंक में विश्वास करते हैं तो गांव के साधारण व्यक्ति से क्या उम्मीद कर सकते हैं। गांव के अनपढ़ लोग तो ये पढ़े-लिखे (डिग्रीधारी) लोगों को देखकर उसके पीछे-पीछे जाते हैं। इस प्रकार के समाज में अंधविश्वास को फैलाने में ये पढ़े-लिखे अंधविश्वासी लोग का बड़ा हाथ है। वैसे अगर तांत्रिक की बात करें तो ये लोग बीमार व्यक्ति को टोटके और भूत-प्रेत, डायन, प्रेत के भय दिखा के पैसा लूटता है। ऐसे अंधविश्वास फैलाने वालों पर कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। जिससे हमारा समाज को अंधविश्वास की दलदल से बचाया जा सके, लेकिन सरकार आंख बंदकर तमाशा देख रही है।

बचपन में सुनी हुई काल्पनिक कहानियां कोमल मन में डालती है खतरनाक प्रभाव

जानकार लोग कहते हैं कि बचपन में सुनी हुई काल्पनिक कहानियां बच्चों के कोमल मन में खतरनाक प्रभाव डालती है। जिससे वे व्यक्ति जीवन भर नहीं निकल पाता है। मनुष्य बच्चे के जन्म होते ही उसके गले पर ताबीज और हाथ में काला धागा, यहां तक के उसके पैर में भी काला धागा बांध देते हैं। ये अंधविश्वास के धागे फिर जीवन भर नहीं छूटते। जब बच्चे अपने माता-पिता से पूछते हैं कि ये धागे और ताबीज-कंडा को किसलिए पहने, तब वे बच्चे को डांटकर चुप करा देते हैं। नहीं तो तरह-तरह के प्रेत और डायन की कहानियां सुनाकर बच्चे का मनोबल को गिराया जाता है। जो उस बच्चे की उम्र भर कष्ट देता है।

ऐसे में कैसे विज्ञान को पढ़ और समझ पाएंगे बच्चे

जब वे बच्चे जानने-समझने के लायक बड़े हो जाता है तब भी से वे वैज्ञानिक सोच को नहीं अपना सकता और अंधविश्वास की बेड़ी में बंधे रहते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि जो बच्चे विज्ञान और गणित की पढ़ाई करते हैं, वे भी मंत्र-तंत्र, भूत-प्रेत, डायन जैसी चीजों पर विश्वास करते हैं और ताबीज-कंडा लटकाकर घूमते हैं। तब उस बच्चे पर मुझे तरस आता है कि ये क्या विज्ञान को समझ पाएगा और क्या मिसाइल और विज्ञान के क्षेत्र में खोज कर पाएगा और क्या डॉक्टर बनकर मरीज को बचा पाएगा? अब देश-समाज को बचाना है तो अपने बच्चे को वैज्ञानिक और प्रगतिशील विचार को बताएं और सीखाएं। काल्पनिक बातों और अंधविश्वासों का खुलकर विरोध करें, तब हमारी आने वाली पीढ़ी बच पाएगी।

लेखक - गनपत लाल (छत्तीसगढ़ी से हिंदी अनुवाद - मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार)

नींबू मिर्च के साथ 'बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला'

नींबू-मिर्च के साथ 'बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला'

मैं सड़क पर मोटरसाइकिल से जा रहा था,
मेरे सामने रिक्शा चल रही थी,
मैंने देखा,
रिक्शा के पीछे नींबू-मिर्च के साथ
बहुत भयानक चित्र के साथ लिखा था
'बुरी नज़र वाले तेरा मुहं काला'
मैं दोबारा उसे फिर पढ़ा और
मेरी गाड़ी के आईने पर मैं अपनी सूरत देखा,
सच कहूं मेरा मुहं काला था,
लेकिन आप सब जानते है,
मेरी नजर बुरी नहीं है।

काला तो मैं बचपन से ही हूं, 
लेकिन कुछ काला शहर की धूल, 
प्रदूषण के कारण और भी काला हो गया था।
बुरी नजर कुछ नहीं होती है।
नींबू-मिर्च के टोटका किसके लिए?

मकान, दुकान, ठेले, घर के दरवाजे पर 
नींबू-मिर्च लटके दिखाई देते हैं
कुछ समय हम मान ले,
शहर में बहुत अपराध बढ़े है
लेकिन अपराधी को पकड़ने के लिए होती है पुलिस
आज तक किसी टोटके ने अपराध को नहीं रोका,
न ही सड़क दुर्घटना से हमें बचाया।
तो नींबू-मिर्च के टोटके क्यों?

नींबू-मिर्च जब सूख जाते हैं
तब उसे रोड पर फेंक देते हैं।
अंधविश्वासी व्यक्ति जब रास्ते पर चलता है
उस टोटका से बचने के लिए
कहीं अपशगुन मेरे में न आए,
ऐसे सोचते हुए,
घबराते हुए चलता है।
यह भी देखने को मिला है कि
घबराहट के कारण दुर्घटना भी घटी है।

तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, डायन
सब मन का भ्रम है।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, रायपुर

बच्चों को अंधविश्वास से रखें दूर

नवजात शिशु के जन्म से पहले गर्भ में ही उसके लिए अंधविश्वास का सिलसिला शुरू हाे जाता है. गोद-भराई के रस्म के नाम पर कई प्रकार के पाखंड किए जाते हैं. गर्भवती महिला को सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के समय खाना न खाने और घर से बाहर न निकलने की सलाह दी जाती है. मानव जीवन में सूर्यग्रहण-चंद्रग्रहण जैसे भौगोलिक घटनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, लेकिल पुराने और रूढ़ीवादी लोग कई प्रकार के भ्रम गर्भवती महिलाओं को लेकर पाल रहे हैं.

शिशु के जन्म के बाद न पड़ें शुभ-अशुभ के फेर में

घर में या अस्पताल में जब शिशु का जन्म होता है तो परिवार वाले कई प्रकार के अंधविश्वास की चपेट में आ जाते हैं. शिशु का जन्म कहां हुआ, कौन सा दिन, कौन सा समय और कई प्रकार के प्रश्ननों को लेकर उलझ जाते हैं. इसके बाद समय, दिन और स्थान शुभ है कि नहीं इसको लेकर पाखंडी ज्योतिष के पास जाकर बच्चे का भविष्यवाणी करते हैं, इसे कौन बताए जाे खुद का भविष्य नहीं जानता वह कैसे मासूम का भविष्य बताएगा. बच्चे के घरवाले उसका नाम भी खुद से नहीं रख सकता. नाम के लिए भी मुफ्तखोर से पूछते है कि कौन सा अक्षर से नाम रखा जाए. तब वह बताता है कि इस प्रकार का नाम रखना चाहिए. लोग मानसिक रूप से गुलाम हो गए हैं. जन्म से लेकर मृत्यु तक अंधविश्वास और पाखंड का सिलसिला चलता रहता है.

अवैज्ञानिक क्रियाकलापों का बच्चों पर पड़ता है बुरा प्रभाव

परिवार में होने वाले पाखंड, अंधविश्वास और अवैज्ञानिक क्रियाकलापों का प्रभाव बच्चों के मन में बहुत ज्यादा पड़ता है. पुरानी और रूढ़ीवादी सोच के घर में पलने वाले बच्चे तार्किक विचारों से दूर रहता है. बचपन से ही अंधविश्वासी परिवार मासूम को पाखंड और अंधविश्वास की दलदल में धकेल देता है. अपने बच्चे के माथे पर अंधविश्वास का कलंक लगा देता है. मासूम के हाथों और पैरों में काले धागे बांधकर उस पर पाखंड की कालिख पोत देता है. यहीं नहीं मासूम के गले और भुजाओं पर ताविज भी लटका दिए जाते हैं. जब बच्चे सावल करने लगते हैं, तो उसके घरवाले उसे डरा-धमकाकर चूप करवा देते हैं. मासूम को धमकाकर कहा जाता है कि जो भी करता-धरता है सब भगवान करता है. इस प्रकार भगवान और शैतान का भय पैदा करके बच्चों का मनोबल कमजोर किया जाता है. 

बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर दें ध्यान

घर में चल रहे पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, अगरबत्ती-दीप, दीवारों पर टंगे भयानक रूप वाली देवी-देवताओं की तस्वीरें और कई प्रकार के पाखंड का प्रभाव बच्चों के कोमल मन पर पड़ता है. ये सब क्रिया-कलाप बच्चों को मानसिक रूप से पंगु बना रहे है. वहीं पालकों को चाहिए अपने बच्चों को साफ-सुथरा रखें और पूरी तरह से अंधविश्वास से दूर रखें. बच्चों की शिक्षा पर खास ध्यान दें और उसके स्वास्थ्य व खान-पान पर भी धन खर्च करें, तभी आने वाली पीढ़ी का भविष्य बेहतर होगा.

- गनपत लाल, सांगठनिक सलाहकार, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

अंधविश्वास उन्मूलन की जिम्मेदारी


आजकल अंधविश्वास चरम सीमा पर है. सुबह अखबार के पन्ने पलटते ही राशिफल दिख जाएगा. टेलीविजन चालू करते ही कोई ज्योतिष भविष्यफल बताते हुए दिखाई देगा. दिन के उजाले हो या रात के अंधेरे सभी जगहों पर अंधविश्वास की काली छाया व्याप्त है. व्यक्ति के जन्म से पहले व मृत्यु के बाद भी अंधविश्वास का सिलसिला जारी रहता है और इसके फेर में लोग खुद व अपना पूरा परिवार का नुकसान करते रहते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल है तमाम अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़ीवाद खत्म करेंगे कौन?

सभी अंधविश्वासों का उन्मूलन बुद्धिजीवी वर्ग की जिम्मेदारी

सभी अंधविश्वासों का उन्मूलन की जिम्मेदारी बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों की है. अब यह समझदार लोग कौन है? इसमें हम शिक्षक, पत्रकार, लेखक, वैज्ञानिक, चिकित्सक और कलाकार को शामिल कर सकते हैं, लेकिन क्या सच में ये लोग तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टीकोण के हैं. आप देखेंगे इनमें से बहुत से लोंगों की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है. ये लोग खुद अंधविश्वास के जाल में जकड़े हुए हैं और आम आदमी इनको देखकर अंधविश्वास की खाई में भेड़धसान गिर रहे हैं.

समाज में शिक्षक का महत्पूर्ण स्थान

समाज में शिक्षक का महत्पूर्ण स्थान है. शिक्षक ही बच्चों को अज्ञानता से ज्ञान के प्रकाश में ले जाते हैं, लेकिन आज बच्चों के स्कूल में ही अंधविश्वास और पाखंड का प्रशिक्षण मिल जाता है. भारत देश धर्मनिरपेक्ष होने के बाद भी कक्षा लगने से पहले सरस्वती वंदना की जाती है. कक्षाओं में देवी-देवताओं की तस्वीरें लटकी दिखाई देगी. कक्षा प्रवेश से पहले विद्यार्थी सरस्वती की तस्वीर की पूजा करते हैं. गुरूवार को सरस्वती पूजा के लिए नारियल फोड़ा जाता है. ये सब कार्य वहां के शिक्षकों के नेतृत्व में होते हैं. जब ज्ञान देने वाले ही अज्ञानता में डूबे हो तों बच्चों में तार्किक और वैज्ञानिक सोच की कल्पना ही नहीं की जा सकती. जब बच्चों को खुद पर विश्वास न होकर खुदा पर भरोसा होने लगता है तो उसका मनोबल पूरी तरह से कमजोर हो जाता है. बच्चे मेहनत में कम और पूजा-पाठ व पाखंड में ज्यादा ध्यान देने लगते हैं, जिससे उसका भविष्य अंधकार में चला जाता है.

बच्चों के मन से भगवान और शैतान का डर काे करें दूर

बच्चों के भविष्य के लिए जिम्मेदार शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों के मन से भगवान और शैतान का डर काे दूर करें. साथ ही उनके अंदर तार्किक और वैज्ञानिक समझ विकसित करें. बच्चों को आसपास घटने वाली घटनाओं के बारे में वैज्ञानिक ढंग से समझाएं. काल्पनिक बातों का खुलकर खंडन करें.

अंधविश्वास फैलाने में सबसे बड़ा हाथ मीडिया का

आजकल अंधविश्वास फैलाने में सबसे बड़ा हाथ मीडिया का है. इसके अंतर्गत प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया को रख सकते हैं. आज पत्रकारिता पूरी तरह से मर चुकी है. पत्रकारिता के नाम पर नेताओं और पाखंडी बाबाओं की चाटुकारिता हो रही हैं. मीडिया सर्कुलेशन और टीआरपी बढ़ाने के लिए कई घटिया हथकंडे अपना रहा है. राषिफल, भविष्यफल, इच्छाधारी नाग-नागिन, पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, दिव्य-चमत्कार जैसी काल्पनिक चीजों को परोसने में अखबार, टेलीविजन और वेबपोर्टल लगे हुए हैं. इसके अलावा डरावनी भूत-प्रेत वाली फील्में धड़ल्ले से बन रही है. सुबह से लेकर रात तक लोग यहीं चीजें देखकर विवेक को खो रहे हैं. मीडिया को चाहिए की सभी काल्पनिक चीजों का खंडन कर ज्ञानवर्धक सामग्री प्रकाशित और प्रसारित करें. सभी पत्रकारों की जिम्मेदारी है कि वे लोगों में वैज्ञानिक चेतना जगाएं, तभी बेहतर समाज का निर्माण हो पाएगा. वहीं लेखकों को भी चाहिए कि वे तार्किक कहानी, उपन्यास और लेख लिखें, जिससे लोग सही ढंग से जीवन जीना सीख सकें. मंच और फिल्म के कलाकारों को भी यर्थात और जनता के मुद्दों की स्टोरी पर काम करें.

पाखंडी बाबाओं और धर्मगुरुओं को जेल में डालें

अब वैज्ञानिक दृष्टीकोण को फैलाने का सबसे बड़ा योगदान वैज्ञानिक और चिकित्सक का है. वैज्ञानिकों को चाहिए कि नई-नई खोज करते रहे और अंधविश्वास का जोरदार विरोध करें. वहीं चिकित्सकों को चाहिए कि भगवान भरोसे न रहकर मरीजों को बचाने के लिए लगातार शोध पर मेहनत करते रहे. अस्पताल में काल्पनिक देवी-देवताओं की तस्वीरें बिल्कुल न रखें और मरीजों को मेडिकल साइंस पर भरोंसा दिलाएं. वहीं आजकल के नेता और अधिकारियों को चाहिएं कि अंधविश्वास-पाखंड से दूर रहे और अंधविश्वास फैलाने व इसके नाम पर जनता को लूटने वाले पाखंडी बाबाओं और धर्मगुरुओं को जेल में डालें. तभी देश में खुशहाली ही खुशहाली होगी. 

- गनपत लाल, सांगठनिक सलाहकार, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन

Wednesday, 1 February 2023

अंधविश्वास पर प्रहार करती किताब 'अंधविश्वास : रोग और इलाज'

अशोक भाटिया की किताब 'अंधविश्वास : रोग और इलाज' अंधविश्वास पर जबर्दस्त प्रहार करती है। यह किताब पाठकों को अंधविश्वास की अंधेरी रात से एक नई सुबह की ओर ले जाती है। इसमें ओझा-तांत्रिक किस प्रकार के कथित चमत्कारों की मदद से लोगों को ठगता है, उसका पर्दाफाश भी किया गया है। अंधविश्वास का जाल कैसे और किन कारणों से फैलता है, इसको बहुत ही सरल भाषा में बताया गया है। शुभ-अशुभ की बीमारी किस प्रकार लोगों के मन में घर बना लेता है और स्वार्थी लोगों ने अपना धंधा चलाने के लिए अशुभ का डर कैसे दिखता है यह बेहतर ढंग से बताया गया है। 

लेखक कहते हैं- अनपढ़ों की अपेक्षा पढ़े-लिखे लोग 'शुभ-अशुभ' नामक रोग से ज्यादा बीमार हैं। लेखन ने इस बीमारी का इलाज भी इसमें बताया है। शुभ मुहूर्त देखने के कारण व्यक्ति को किस प्रकार की हानि का सामना करना पड़ता है, शुभ-अशुभ व मुहर्त के नाम पर पंडित अपना पेट कैसे भरते हैं, लोग उसकी बातों में आसानी से कैसे फंस जाते हैं। अशुभ का डर और उसे शुभ में बदलने के उपाय क्यों होता है। बाबागीरी का सच क्या है, लोग बाबाओं के पास क्यों जाते हैं। चूर्ण-भभूत को तांत्रिक बाबा इतनी आसानी से कैसे बेच लेता है, चूर्ण का गोरखधंधा हमारे देश कैसे चल पड़ता है। स्वार्थी तत्वों ने सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण को राहु-केतु नामक काल्पनिक राक्षस से जोड़कर समाज में अंधविश्वास कैसे फैलाए हैं। ये तमाम बातें लेखक ने अपनी लेखनी में स्पष्ट की है।

किताब में कहा गया है कि ज्योतिष भविष्य बताने का दावा करता है, लेकिन कोरोना जैसे रोग फैलेगा उसे कभी नहीं बताया। इससे हम कैसे कहे कि ज्योतिष ठीक बताता है, ग्रहों और उनकी दशाओं मनुष्य पर कैसे प्रभाव डाल सकते हैं। इस पर भी लेखक ने सवाल उठाए हैं और ज्योतिष को सपने बेचने की कला कहा है। फलित ज्योतिष विवाह के लिए लड़के-लड़की के 36 गुणों का मिलान किया जाता है। इसके बावजूद भी कई घरों में तलाक होते हैं, महिला को प्रताड़ित किया जाता या पति-पत्नी में किसी एक की मृत्यु हो जाती है, कुंडली मिलाने के बाद भी ऐसा क्यों होता है? ज्योतिष लगन-मुहर्त निकालने का धंधा है।

मानसिक बीमारी का इलाज कराने ओझा-तांत्रिक के पास जाने का कारण अवैज्ञानिक सोच का नतीजा बताया गया है, जो मेरे खयाल से ठीक है। भूत-प्रेत को लेकर कैसा अंधविश्वास फैला है, आज जो धर्म है उसे सम्प्रदाय बताते हुए धर्म में अंधविश्वास, पाखण्ड व्याप्त है, जो समाज के लिए हानिकारक है, इसे हम सब जानते भी हैं। किताब में असल धर्म मानवता है, जो सभी पर लागू हो, ऐसा बताया गया है। हमारे समाज में अलग-अलग सम्प्रदाय है, जिसे हम धर्म मानते हैं। सभी को इंसानियत, मानवता को मानना चाहिए जिससे समाज के सभी लोग एकजुट होकर उन्नति कर सके। वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है और हमें क्यों जरूरी है? विज्ञान ने हमें क्या-क्या दिया है, विज्ञान हमेशा कुछ न कुछ खोजता रहता है और हमारे सामने उस सत्य को लाता है, जिससे अंधविश्वास का पर्दा उठ जाता है।

लेखक ने 68 पेज की छोटी किताब में अपने लेख के साथ मुंशी प्रेमचंद के अंधविश्वास, डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर, डॉ. अब्राहम टी. कोवूर, हरिशंकर परसाई जैसे प्रगतिशील लेखकों के लेख का संग्रह किए है, जिसमें अंधविश्वास पर कड़ा प्रहार किए हैं। इसके अलावा अंधविश्वास विरोधी लघुकथाएं का संग्रह है, जिसमें पाखंड और पाखण्डियों का पर्दा उठता है।


इस किताब में कम शब्दों में अंधविश्वास पर बहुत बड़ा प्रहार किया गया है, जो बहुत ही सराहनीय है, लेकिन मेरा मानना है इस प्रकार की किताब को बड़ा रूप देने की जरूरत है। आज समाज में जिस प्रकार के अंधविश्वास, पाखण्ड को बढ़ावा देने वाली अनेक साहित्य उपलब्ध है या कहूं पाखण्डियों की बाढ़ सी आ गई है। टेलीविजन, अखबार, आस-पास सभी जगह पर अंधविश्वास पैर फैलाएं बैठे हैं, ऐसी कठीन परिस्थिति में हमें "अंधविश्वास : रोग और इलाज" जैसी अनेक किताब, फ़िल्म, साहित्य की जरूरत है।

हरियाणा के अशोक भाटिया सर ने मुझे किताब भेजकर अध्ययन करने का मौका दिया और पढ़कर सुझाव के लायक समझे, इसके लिए पूरा मन से उन्हें शुक्रिया। भाटिया सर को इस किताब में बेहतरीन लेख लिखने और लेख संकलित करने के लिए बहुत-बहुत बधाई।

- मनोविज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

ब्राह्मणों के ग्रंथों में तेली और सभी पिछड़ा वर्ग की जातियां शूद्र


तेली और सभी पिछड़ा वर्ग की जातियां शूद्र है, वैश्य नहीं, लेकिन कुछ लोगों को वैश्य होने का गर्व है, वे ब्राम्हण से पूछे या अपने धार्मिक ग्रंथों में खोजे, असलियत पता चल जाएगा।

तुलसीदास दुबे द्वारा लिखित रामचरितमानस में कहा गया है कि "जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।" अर्थात तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि वर्ण में सबसे नीचे हैं। हिंदू धर्म के अनुसार अपने ही भाई बंधू को चार वर्णों में बांटे गए हैं, इसमें सबसे पहला नंबर पर ब्राम्हण (सबसे उच्च, जिनको ज्ञान अर्जन और ज्ञान देने का अधिकार है), दूसरे नंबर पर क्षत्रिय (ये ब्राम्हणों की रक्षा करेगा), तीसरे नंबर पर वैश्य या बनिया (इनका का काम व्यापार करना) और चौथे नंबर में शूद्र या नीच (जो मेहनत कश है, इसमें तेली और सभी पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी शामिल है, इन लोगों का काम ब्राम्हण और ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना है) ऐसा धार्मिक ग्रंथ में कहा गया है। रामचरितमानस में यह भी लिखा है कि "पूजहि विप्र (ब्राम्हण) सकल गुण हीना । शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा ।।" अर्थात ब्राह्मण चाहे कितना भी ज्ञान गुण से रहित हो, उसकी पूजा करनी ही चाहिए, और शूद्र चाहे कितना भी गुणी ज्ञानी हो, वो कभी पूजनीय नही हो सकता।" रामचरितमानस में यह भी कहा गया है कि "ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥" अर्थात ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री ये सब प्रताड़ना के ही अधिकारी हैं। अब आप ही बताए यह न्याय है कि अन्याय? 

वैश्य बड़े व्यापारी को कहते हैं। कोई भी साहू (तेली) और सभी पिछड़ी जातियां वैश्य नहीं है। ओबीसी शूद्र है और obc की आबादी ज्यादा होने से भी कोई भी जगह बड़े अधिकारी नहीं है। चाहे तो यूनिवर्सिटी, मीडिया, न्यायालय, मेडिकल विभाग, सभी जगह उच्च वर्ग ही है, जो 5% है। obc खेती, मजदूरी, सफाई जैसे छोटे छोटे काम में जुटे हुए हैं और अपने आप को वैश्य समझ रहे हैं। 

एक बार फिर दोहरा देना चाहता हूं- ग्रन्थ के अनुसार कथा करने का अधिकार ब्राम्हण को ही है, क्योंकि एक मात्र ब्राम्हण ही उच्च है और भगवान है, बाकी सब गुलाम है, ऐसे धार्मिक ग्रंथ में कहा गया है। आज भी देख सकते हैं, कही भी कथा, प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं, तो ब्राम्हण ही करता है और करोड़ों रूपए ले जाता है और हम obc उसको खुले मन से बिना कुछ सोचे समझे दान कर देते हैं। चाहे कथा के नाम पर अंधविश्वास ही क्यों न हो। obc कथा करना चालू कर देंगे तो इन पाखण्डियों का धंधा बंद हो जाएगा, लेकिन पाखण्ड बढ़ता जाएगा। छत्तीसगढ़ की यामिनी साहू को कथावाचन करने पर ब्रम्हानों द्वारा धमकी दी गई और कहां गया कि तुम शूद्र हो, कथा नहीं मुजरा करो।

ओबीसी, आदिवासी और दलित लोगों को बेहतर शिक्षा के लिए ध्यान देना चाहिए। हम सभी को अंधविश्वास, पाखण्ड और समाज में फैले सभी कुरीतियों से दूर रहना चाहिए, जिसमें नशा भी है। नशे चाहे शराब के हो या अंधविश्वास पाखण्ड के, दोनों ही बहुत खतरनाक होते हैं।

- टिकेश कुमार