Sunday, 2 January 2022

झाड़-फूंक से बीमार लोग ठीक होते हैं या नहीं ?

जब भी कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है तो डॉक्टर के पास जाता है, ये हम सब जानते हैं। इसके अलावा लोग ओझा व तांत्रिक के जाल में फस जाते हैं।

तांत्रिकों के जाल में फसने वाले लोग निम्न प्रकार के होते हैं -

1. वह व्यक्ति जो डॉक्टर से ईलाज कराकर थक चुके होते हैं और उसका मानना होता है कि अब एक ही रास्ता से ठीक हो सकता हैं. वह है झाड़-फूंक से, इसीलिए मरीज को तांत्रिक के पास लेकर चले जाते हैं। इस ईलाज में व्यक्ति धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती हैं।

2. डॉक्टर के पास न ले जाकर सीधे तांत्रिक के पास ले जाता हैं। ये लोग डॉक्टर से ज्यादा तांत्रिक पर विश्वास करते है या ऐसे क्षेत्र जहां डॉक्टर नहीं होते हैं, इसलिए सीधे मरीज को तांत्रिक के पास ले जाते हैं। इसमें व्यक्ति की बीमारी छोटी है या सामान्य बीमारी है, जैसे खून की कमी, कमजोरी व थकान तो खान-पास से धीरे-धीरे ठीक हो जाता है। अगर गंभीर बीमारी है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, कहने का मतलब है अगर व्यक्ति में सामान्य बीमारी है तो रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण ठीक हो जाता हैं और मरीज को लगता है तांत्रिक के तंत्र-मंत्र के कारण ठीक हुआ हूं। अगर गंभीर बीमारी है तो व्यक्ति के रोगप्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी से नहीं लड़ पाता है, इसीलिए मरीज मर जाता हैं।

3. इसमें ऐसे लोग होते है जो डॉक्टर के पास ईलाज कराने के साथ तांत्रिक के पास भी ईलाज करता हैं। इसमें मरीज डॉक्टरी ईलाज के कारण ठीक हो जाता है और मरीज को लगता है तांत्रिक के तंत्र-मंत्र के कारण ठीक हुआ हूं।

इस प्रकार तंत्र-मंत्र से मरीज ठीक नहीं होता है। ओझा, तांत्रिक व ढोंगी बाबाओं के कारण व्यक्ति मर जाते हैं।

बच्चों का मन और उस पर प्रभाव

बच्चों का मन (mind) एक कोरा कागज के समान होता है, जिस पर परिवार और आस-पास के वातावरण का प्रभाव पड़ता है। बालमन को मुख्य रूप से परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों को ऐसे माहौल दें कि बच्चे में धनात्मक (positive) प्रभाव पड़े न कि नकारात्मक (negetive)।

आज देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया अंधविश्वास, आक्रमकता, जातिवाद और सम्प्रदायिकता खूब फैला रहे हैं। जैसे-राशिफल, भूत-प्रेत, नाग-नागिन और कई काल्पनिक धारावाहिक परोसे जाते हैं, जिसके प्रभाव बच्चे की मानसिक स्थिति में सीधे नकारात्मक (negetive) पड़ते है और बच्चे का मनोबल कमजोर होता है।

- टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक

तालाब में भूत-प्रेत की डरावनी कहानियां और लोगों में भ्रम

कुछ गांव के तालाब में भूत, प्रेत या डायन है ऐसे आपने सुना होगा। पुराने समय में ज्यादातर गांवों के तालाब में भूत-प्रेतात्मा हैं कहकर लोग डर जाते थे. जैसे ही सूरज डूबता था और शाम होती थी तो लोग तालाब में जाने से डरते थे. किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि तालाब के पास जाए।

इसके बाद लकड़ी के लिए लोगों ने पेड़ों को कटाई करना चालू किया। धीरे-धीरे तालाब के आस-पास के पेड़ का सफाया होता गया। पेड़ों की कमी होती गई। जंगली जीव-जंतु कम होता गया और मनुष्य के पास भरपूर मात्रा में बिजली से रोशनी मिलना चालू हो गया। तब लोगों के तालाब में भूत-प्रेत की कहानियां समाप्त हो गई।

भूत-प्रेत के नाम से डराकर अक्सर मां-बाप अपने छोटे बच्चे को तालाब जाने रोकते थे क्योंकि अगर बच्चा तालाब जाएगा और तैर नहीं पाए तो तालाब में डूब जाएगा. यह सोचकर बच्चों को तालाब के पास जाने से रोकते थे. जब घर के बड़े लोग तालाब जाते थे तो बच्चों को नहीं आने के लिए भूत का बहाना करते थे।

एक और कारण है जब तालाब के पानी के पास कोई व्यक्ति नहीं होता हैं (तालाब शांत होता है) तब मेंढक पानी से बाहर होता हैं, जैसे ही कोई व्यक्ति जाता है, सभी मेढक एक साथ झपाक से पानी में कूद जाता हैं, तब व्यक्ति को भ्रम हो जाता है की कहीं भूत-प्रेत तो नहीं। तालाब को शांत देखकर जंगली जानवर भी पानी पीने के लिए आ जाता है, कोई व्यक्ति को देखते ही भाग जाता है। इससे भी लोगों को भ्रम हो जाता है कि कोई प्रेतात्मा इस तालाब से भागा हैं।

टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक

पीपल पेड़ के नीचे भूत-प्रेत का डर

जब मैं लगभग 6-7 साल का छोटा सा बच्चा था। उस समय गांव में बिजली की कमी के कारण पूरा अंधेरा रहता था। गलियों पर लाईट नहीं थीं। गांव के   कई घरों में बिजली नहीं थी और थी भी तो एक बल्ब, जो घर के अंदर में जलता था। घर का द्वार में कोई लाईट नहीं थी, इसलिए गली में चलने वाले लोगों को अंधेरा का सामना करना पड़ता था।

एक दिन की बात है, शाम के समय हम कुछ दोस्तों के साथ तालाब के पास घूमने के लिए निकले थे और तालाब के पार पर बैठकर हम सब आपस में बाते कर रहे थे। हमें समय का पता ही नहीं चला। रात होने लगी, तभी अचानक हमारी दृष्टि पीपल पेड़ के नीचे बुंग-बुंग (झिलमिलाती) रोशनी पर पड़ी। हम लोग धड़ से उठ खड़े हुए, उसमें से  किसी एक दोस्त ने कहा टोनही (डायन) है भागों, किसी ने कहा भूत तो किसी ने प्रेतात्मा और हम सब कुछ सोचना-समझना छोड़कर भागने लगें। भागते-भागते गांव की एक दुकान में गए, वहां कुछ बुजुर्ग के साथ मेरे दादा जी भी बैठें थे। हम सब को हांफते देखकर मेरे दादा ने पूछा क्या बात है बेटा? हम सब एक आवाज में तालाब पार के पीपल के नीचे भूत कहने लगें और पूरी बात बताई।

तब दादा ने हमें बताया कि कोई भूत-प्रेत, टोनही (डायन) या प्रेतात्मा नहीं हैं और न ही होता है। वहां तालाब के पास पीपल पेड़ के नीचे दीया (दीपक) जल रहा था। उस तालाब के पास मृत व्यक्ति के परिवार वाले पीपल पर मटकी बांधकर उसके नीचे शाम को दीये जलाते हैं। जब तुम लोग वहां बैठकर आपस में बात कर रहे होंगे उसी बीच कोई जाकर दीया जलाया होगा और धीरे-धीरे हवा चलने के कारण दीया टिमटिमा रहा था।

हम सब बच्चों ने दीया को भूत-प्रेत, टोनही या प्रेतात्मा समझ गए। जिसे भूत भ्रम (illusions) कहते हैं।

टिकेश कुमार

ASO का कार्यक्रम

अंधविश्वास के अंधेरे में तार्किक प्रकाश फैलाने वाले संत गुरु घासीदास

'मंदिरवा म का करे ल जइबो, अपन घट के देव ल मनइबो, पथरा के देवता ह हालत ए न डोलत, अपन मन ल काबर भरमइबो' ये बातें संत गुरु घासीदास ने तब कही थी, जब वे जगन्नाथ पुरी यात्रा जा रहे थे तो आधे रास्ते से लौटकर वापस घर आ गए। बताया जाता है कि संत गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ के सारंगगढ़, रायगढ़ से वापस आ गए, लेकिन वे जगन्नाथ दर्शन के लिए नहीं गए।

संत घासीदास ने घर लौटकर लोगों से कहा कि मंदिर में क्या करने के लिए जाओगे। जो पत्थर खुद की रक्षा नहीं कर सकता वह लोगों की रक्षा कैसे करेगा। और आपकी समस्या कैसे सुनेगा। उन्होंने लोगों से मंदिर न जाने की अपील की। उन्होंने कहा कि हम कितना मूर्ख हैं पत्थर की पूजा कर रहे हैं, जो न देख सकता है, न सुन सकता है और न ही बोल सकता है। और न ही कुछ खा-पी सकता है। ऐसे पत्थर के पास जाकर हम लोग समय और धन व्यर्थ ही गवा रहे हैं।

इस प्रकार के अंधविश्वास, रूढ़ीवाद और परंपरावाद के खिलाफ संत गुरु घासीदास ने जोरदार विरोध किया। घासीदास जी ने मूर्ति-पूजा का जबर्दस्त खंडन किया। उन्होंने आत्मविश्वास की कमी को अंधविश्वास का कारण बताया। उन्होंने लोगों से मनोबल बढ़ाने की बात कही। इसलिए उन्होंने कहा कि आत्मविश्वास से बढ़कर कोई देवता नहीं है। पत्थर की पूजा करना एक मानसिक बीमारी है। गुरु घासीदास ने मन को पूजा-पाठ और पाखंड से दूर कर कर्म (मेहनत) में लगाने पर जोर दिया।

गुरु घासीदास जी ने समानता की बात भी की है। उनका कहना था कि मनखे-मनखे एक समान (मनुष्य-मनुष्य एक समान)। उन्होंने कहा सभी इंसान एक समान है। जाति-धर्म को लेकर क्यों लड़-मर रहे हो। गुरु घासीदास ने ये सब बातें इसलिए कही क्योंकि उन्होंने समाज में भेदभाव की पीड़ा को भोग चुके थे।

गुरु घासीदास जी का जन्म 18 दिसंबर 1756 में रायपुर जिले के गिरोधपुरी गांव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। उस समय गरीब और निम्न जातियों के लोगों पर बहुत शोषण और अत्याचार हो रहा था। अपने आप को उच्च जाति कहने वाले पाखंडी लोगों ने कमजोर लोगों को शिक्षा और सार्वजनिक जगहों से दूर रखकर नीच जाति कहकर अपमानित किया। इस पीड़ा को देखकर संत घासीदास जी ने सतनामी पंथ की स्थापना की।

दबे-कुचले लोगों को संत घासीदास ने एकजुट किया। उन्होंने कहा कि अपने आप को ऊंची जाति कहने वाले लोगों के झांसे में मत आओ। ये पाखंडी लोग आडंबर में फंसाकर शोषण और अत्याचार करते हैं। इसलिए तुम लोग पोथी-पुरान और मूर्ति-पूजा में मत फंसो और सत्य को जानो व मनो। जो दिख रहे हैं उसी पर भरोसा करो और काल्पनिक चीजों का खुलकर खंडन करो। जो सत (यथार्थ) को मानेगा वही सतनामी कहलाएगा।

इस प्रकार दलित-शोषित वर्ग को एकट्ठा करके संत घासीदास जी ने समाज में बड़ा बदलाव किया। तब जाकर शोषित-पीड़ित लोगों को सम्मान मिल पाया। पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए गुरु घासीदास जी मसीहा थे। जिन्होंने वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशील विचारों को जन-जन तक फैलाकर आंडबर के पेड़ पर तर्कशील कुल्हाड़ी से प्रहार किया। घासीदास जी ने अंधविश्वास और रूढ़ीवाद के घनघोर अंधेरे में ज्ञान का प्रकाश फैलाकर नई सुबह लाई थी। आज उनके विचारों को फिर से जनता के बीच पहुंचाने की जरूरत है, ताकि संत गुरु घासीदास के सपने पूरे हो सके।

- गनपत लाल

कोई महिला टोनही (डायन) नहीं होती

गांव के चौपाल में कुछ लोग इकट्ठे थे। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। रामू कह रहे थे कि टोनही (डायन) रात में निकलती हैं। जब गांव के सभी लोग सो जाते हैं, तब महिला (जो टोनही है) के घर से खुट-खुट आवाज आती हैं और वह महिला सिलबट्टे से कुछ ऐसे पदार्थ को कूटकर पिसता है, जिससे उस पदार्थ को मुंह में डालने या खाने से मुंह से लार टपकती हैं और उस लार से रोशनी निकलती हैं। मुंह की लार के साथ उस टोनही बस्ती से निकल कर गांव के सियार (सीमा) में ईमली और आम पेड़ के नीचे झुपती हैं।

नीरज कहते हैं कोई टोनही नहीं होती हैं। पहले पिसा हुआ मसाले नहीं मिलता था इसलिए सिलबट्टे से खड़ा मसाले को कूट-कूटकर पिसते थे। काम ज्यादा होने के कारण खाना बनाने में अधिक रात हो जाती थी। और लोग उस खाने बनाने वाली महिला को टोनही कहने लगती थी।

फिर सरजू कहते हैं- नहीं मैं खुद देखा हूं, इसी गांव में एक औरत थी जो अंधेरी रात में गांव वालों के सामने लकलकाते लोहे का साबर को हाथ से पकड़ लिया और चन की आवाज आई उस महिला को कुछ नहीं हुआ। और उस महिला को गांव से कोसों दूर बाहर निकाल दिया गया।

तब नीरज कहते है दादा आपके समय पर गांवों में मालगुजारी शासन थी। महिला ने गांव के जमीदार की बात को नहीं माना होगा। उसकी आज्ञा या नियम का पालन नहीं किया होगा इसलिए महिला से बदला लेने के लिए महिला को टोनही कहना चालू किया होगा। इसके साथ आस-पास के लोग भी दुश्मनी में उस महिला को टोनही कहा होगा। फिर गांव में मुनादी कराई होगी कि ये महिला टोनही है इसकी परीक्षा लिया जाएगा। और उस महिला को अंधेरी रात में भरी भीड़ में गांव वालों के सामने लकलकाते साबर को महिला के हाथ में पकड़ाया होगा। महिला के हाथ पूरी तरह से जल गया होगा। अंधेरी रात के कारण जलते हाथ नहीं दिखा होगा फिर गांव वालों ने महिला को टोनही कहकर रातों-रात उसके परिवार के साथ गांव से कोसों दूर छोड़ दिया और महिला लोकलाज के कारण गांव वापस नहीं आई होगी और उधर ही मर गई होगी। इसीलिए महिला के आज तक पता नहीं चला कि किस स्थिति में है और कहां हैं।

- टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक, रायपुर

मानसिक रोग

फिलिप पिनेल एक फ्रेंच फिजीशियन थे। जिन्होंने पहली बार बताया कि मानसिक रोग भूत का असर नहीं, बल्कि एक बीमारी है।

1791 में पेरिस के मानसिक अस्पताल के  प्रभारी बनते ही मानसिक रोगियों को लोहे की जंजीर से मुक्त करके उनके साथ मानवीय व्यवहार करने का आदेश दिया।

इन आदेशों का अस्पताल के अधिकारियों द्वारा काफी मजाक उड़ाया गया और पिनेल को ही एक पागल समझा जाने लगा।

"मानसिक रोग" जिसे आज एक गंभीर रोग की श्रेणी में रखा जाता है। उसे एक दौर में भूत-प्रेत का साया समझा जाता था।

लोग चिकित्सकों के पास जाने की बजाए ओझाओं के पास जाना पसंद करते थे। ताकि, वे झाड़फूंक कर पीड़ित को मुक्ति दिला सके, लेकिन जब तक ऐसा हो पाता।

तब तक या तो पीड़ित बीमारी से मर जाता या फिर तंत्र-मंत्र से और ज्यादा पागल हो जाता।

आज भी भारत के पिछड़े लोगों में मानसिक रोगियों को ओझाओं/तांत्रिकों के पास लेकर जाते हैं और उनकी जाल में फंसकर समय व धन के साथ रोगी की जान भी चली जाती हैं।

टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक, रायपुर

Sunday, 26 December 2021

अंधविश्वास उन्मूलन कार्यक्रम और प्रशिक्षण शिविर 4 जनवरी से

रायपुर। लोगों में जागरूकता लाने और तर्कशील विचारों को बढ़ावा देने के लिए एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ) की ओर से दो दिवसीय अंधविश्वास उन्मूलन कार्यक्रम और प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम 04 जनवरी से 05 जनवरी तक किया जाएगा। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता मुंबई से महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एमएएनएस) की राज्य प्रधान सचिव सुशिला मुंडे और लेखक प्रो. मच्छिंद्रनाथ मुंडे हैं।

अंधविश्वास उन्मूलन कार्यक्रम और प्रशिक्षण शिविर नवा रायपुर के पास ग्राम बिरबिरा मे होगा। यह कार्यक्रम रोजाना सुबह 9 बजे से शुरू होगा और देर शाम तक चलेगा। एएसओ के अध्यक्ष टिकेश कुमार ने बताया कि समाज में वैज्ञानिक और प्रगतिशील सोच को बढ़ावा देने के लिए दो दिवसीय अंधविश्वास उन्मूलन कार्यक्रम और प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जा रहा है। पहला सत्र 4 जनवरी को विशेषज्ञों द्वारा मन और मन की बीमारियों के बारे में जानकारी दी जाएगी। साथ ही चमत्कार और बाबागिरी का पर्दाफाश किया जाएगा। इस दौरान दर्शकों के सवालों के जवाब भी दिए जाएंगे।

कुमार ने बताया कि दूसरे सत्र 5 जनवरी को अंधविश्वास और पाखंड के बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी। राशिफल, ज्योतिष, वास्तुशास्त्र और अन्य विषयों पर भी मंथन होगा। इसके बाद अंधविश्वास उन्मूलन की भूमिका, संगठन क्यों और कैसे? विषय पर विचार-विमर्श होगा। फिर कार्यक्रम संपन्न होगा। उन्होंने युवाओं को इस कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है।

Wednesday, 15 December 2021

टिकेश कुमार बने एएसओ के अध्यक्ष, गौरव, जितेंद्र और राजू को भी मिली बड़ी जिम्मेदारी

रायपुर। अंधविश्वास, रूढ़िवाद व तमाम कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने और बेहतर समाज बनाने के लिए टिकेश कुमार ने एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ) की स्थापना की। बैठक में सभी की सर्वसम्मति से उन्हें अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। गौरव प्रसाद को उपाध्यक्ष बनाया गया। वहीं जितेंद्र को सचिव की जिम्मेदारी दी गई। राजू कुमार को कोषाध्यक्ष बनाया गया। साथ ही वाकेश कुमार को मीडिया सलाहकार और गनपत लाल को सांगठनिक सलाहकार चुने गए।

एएसओ के अध्यक्ष टिकेश कुमार ने कहा कि आज 21वीं सदी में भी समाज में अंधविश्वास, रूढ़िवाद और कई कुरीतियां व्याप्त हैं। ये चीजें आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास में पूरी तरह से बाधा बनीं हुई हैं। आज अंधविश्वास का संक्रमण भयानक रूप ले चुका है। लोग अज्ञानतावश अवैज्ञानिक सोच की ओर बढ़ रहे हैं। तमाम अंधविश्वास को खत्म करने के लिए हमें एकजुट होकर संघर्ष करना होगा, ताकि एक बेहतर समाज का निर्माण कर सके। सभी को खुले दिमाग से सोचने और तर्कसंगत जीवन जीने की जरूरत है, ताकि समाज को रूढ़िवाद और अंधविश्वास के बंधनों से मुक्त किया जा सके।

एएसओ के उपाध्यक्ष गौरव प्रसाद ने कहा कि भारत देश में तर्कवादी समाज सुधारकों की एक लंबी विरासत है, जिन्होंने हमेशा अंधविश्वास के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई है। हमारे यहां महामानव गौतम बुद्ध से लेकर शहीद भगत सिंह तक के तार्किक विचारों का अथाह भंडार है। 15वीं सदी में संत कबीर ने भी धार्मिक पाखंड और रूढ़ीवाद के खिलाफ बिगुल फूंका था। छत्तीसगढ़ में गुरू घासीदास ने जाति-धर्म और मूर्ति-पूजा का जबरदस्त खंडन किया। उन्होंने मनुवादियों की चूले हिला दी थी।

एएसओ के कोषाध्यक्ष राजू कुमार ने कहा कि महाराष्ट्र में तर्कवादी लेखक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने पोंगापंथियों के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा खोला था। दाभोलकर ने सन 1989 में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना की थी। वे अंधविश्वास उन्मूलन के लिए गठित संगठन के संस्थापक एवं अध्यक्ष थे। पुणे में धर्म के ठेकेदारों ने डॉ. दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को हत्या कर दी गई। अब आज इन सभी समाज सुधारकों के तार्किक विचारों को जनता तक पहुंचाने की जरूरत है।

एएसओ के सचिव जितेंद्र ने कहा कि बेहतर समाज के लिए हमें तमाम महापुरुषों की राह पर चलना होगा। पथभ्रष्ट और शोषण करने वाले हानिकारक अंधविश्वासों और कर्मकांडों का खुलकर विरोध करें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, यथार्थवाद, मानवतावाद और तार्किक सोच को विकसित और प्रचारित करना होगा। आइए प्रगतिशील विचारधाराओं को जन-जन तक पहुंचाकर बेहतर समाज बनाने में अपना बड़ा योगदान दें।