Wednesday, 2 August 2023

वैज्ञानिक के नाम पर कलंक

 
आज देश में वैज्ञानिक दृष्टीकोण खत्म होने और अंधविश्वास बढ़ने की वजह हमारे देश के कथित वैज्ञानिकों की निम्न सोच है. जिनको विज्ञान भरोसे रहना चाहिए, वे आज पूरी तरह से भगवान भरोसे बैठे हैं. ऐसे में सामान्य लोगों में तार्किक और वैज्ञानिक विचार कौन फैलाएगा. ऐसे कथित वैज्ञानिकों के कारण ही आज लोग पृथ्वी को शेषनाग पर टिकी हुई समझते है और सूर्य को कोई वानर संतरा समझकर निगल गया मानते हैं. वहीं सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को राहु-केतु द्वारा मुंह में दबाना समझते हैं.

चंद्रयान-3 मिशन के लिए देश के कथित वैज्ञानिकों को अपनी मेहनत पर भरोसा बिलकुल नहीं है, बल्कि उन्हें काल्पनिक ईश्वर पर आस है. लॉन्चिंग से पहले इसरो के वैज्ञानिक पूजा-पाठ करने में जुटे हैं. वैज्ञानिकों की एक टीम आंध्र प्रदेश के तिरूपति वेंकटचलपति मंदिर पूजा-अराधना के लिए पहुंची. अब इन कथित वैज्ञानिकों को जिस समय यान को लेकर तैयारी करनी चाहिए उस समय मंदिर पर माथा टेकने पहुंच गए है. आप ही बताइए परीक्षा के दौरान बच्चे तैयारी नहीं करेंगे और पूजा-पाठ करेंगे तो उनका क्या हाल होगा.

भारतीय संविधान में भी वैज्ञानिक दृष्टीकोण की बात कही गई है, लेकिन आज देश में पूरी तरह से इसके विपरित कार्य हो रहा है. संविधान के मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद 51ए) के अंतर्गत स्पष्ट लिखा गया है कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह ''वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे.'' इसके बावजूद भी भारत देश के कथित वैज्ञानिक वैज्ञानिक दृष्टीकोण का कब्र खोदकर गाड़ने में लगे हुए हैं. यह समाज के लिए बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय है.

जिनके कंधों पर वैज्ञानिक दृष्टीकोण की जिम्मेदारी है, जब वहीं वैज्ञानिक दृष्टीहिन हो जाए तो समाज और पिछड़ता जाएगा. लोगों में ज्ञान-विज्ञान का अभाव हो जाएगा. जिससे यहां की जनता पूरी तरह से अंधविश्वास के नशे में चुर हो जाएंगे. इससे देश की तरक्की पूरी तरह से बंद हो जाएगी और लोग भाग्यवादी बनकर चुपचाप बैठ जाएंगे. अगर समाज का विकास करना है तो सभी बुद्धिजीवी लोगों की जिम्मेदारी है कि अंधविश्वास से बचे और दूसरों को बचाए, तभी एक बेहतर समाज का निर्माण होगा.

- गनपत लाल, सांगठनिक सलाहकार, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

सार्वजनिक जगहों पर अंधविश्वास का नंगा नाच


आज समाज में अंधविश्वास विकराल रूप ले चुका है। ग्रामीण हो या शहरी कोई भी अंधविश्वास से अछूते नहीं है। गली-मोहल्ले, हाट-बाजार, बस, रेल, स्कूल-कॉलेज, टेलीविजन, न्यूज पेपर सभी जगहों पर अंधविश्वास अपना चरण पसार चुका है। लोग अज्ञानतावश अंधविश्वास के जाल में फंस चुके हैं। अज्ञानता से निकलने के लिए अच्छे स्कूल-कॉलेज के साथ अच्छी शिक्षा देने वाले शिक्षक चाहिए। लेकिन यहां तो शिक्षा को बाजार भाव बना कर उसे बोली लगाई जाती है, हर चौक-चौराहे पर ठेले के रूप में स्कूल मिल जाएंगे। जिसमें शिक्षा नाम भर रह जाता है, शिक्षक खुद अंधविश्वासी रहते हैं, खुद पाखंड में पड़े रहे वे दूसरों को क्या ज्ञान देंगे। ऐसे भी आज की शिक्षा प्रणाली में काल्पनिक ग्रन्थों को शामिल करके तर्कशील साहित्य से दूर किया जा रहा है। जिससे आम जनता शिक्षा से दूर रह कर अज्ञानी बने रहें और पाखंडियों की लूट चलती रहे।

रेल में तांत्रिक का पोस्टर

मुझे एक दोस्त ने रेल के अंदर (बैठने के स्थान पर) लगा पोस्टर की फोटो भेजा। जिसमें तांत्रिक रजा बंगाली का काला-जादू, टोना-टोटके, तंत्र-मंत्र के प्रचार और बड़ी से बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए सम्पर्क करने के लिए नम्बर भी दिया गया था। जब उस नम्बर से सम्पर्क किया तो फोन उठाने वाले ने अपना परिचय राजस्थान के रहने वाला रजा बंगाली के रूप में दिया। उसने क्या समस्या है पूछा। जब उससे पोस्टर सार्वजनिक जगह पर लगने की बात कही तो, उसने सरकार से मान्यता प्राप्त है कहकर फोन रख दिया।

तांत्रिक की लूट खुलेआम जारी

आज वैज्ञानिक युग में भी अंधविश्वास के नाम पर लूट का बाजार जोरों से खुलेआम क्यों चल रहा है? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सरकार इस ओर ध्यान क्यों नहीं दे रही है? इस पोस्टर को रेलवे विभाग नजरअंदाज क्यों कर रहा है, ऐसे बहुत से सवाल है, जिसका एक ही उत्तर है ज्यादातर लोग अंधविश्वास से जकड़े हुए हैं। देखकर भी अनदेखा कर देता है, इसका फायदा ओझा-तांत्रिक को जाता है। खुलेआम कहीं भी अपना प्रचार सामग्री लगा देता है। इस पोस्टर के जरिए भोली-भाली जनता इसके जाल में आसानी से फंस जाती है और लाखों रुपए लुटा जाती है।

अखबार और टेलीविजन में तांत्रिक का प्रचार

अखबार के पन्नों पर बड़े-बड़ें अक्षरों में तांत्रिक का विज्ञापन आजकल सामान्य हो गया है। चाहे उस अखबार में समाचार रहे या न रहे, लेकिन पाखंडियों के प्रचार का साधन जरूर रहेगा। ऐसा ही टीवी को चालू करते ही ज्योतिष तांत्रिक देखने को मिलता है। जिसमें राशि फल के साथ किसका शुभ, किसका अशुभ होने वाला है, कंडा-ताबीज, किस रंग के कपड़े पहने, ऐसी मूर्खता भरी बातें करने वाले तांत्रिक को दिखाया जाता है।

लोगों को जागरूक होने की जरूरत

तांत्रिक-बाबाओं से बचने के लिए लोगों को खुद समझदार बनने की जरूरत है। ज्योतिष तांत्रिक के किसी भी विज्ञापन के नम्बर पर सम्पर्क न करें। कोई भी तांत्रिक का फोन, एसएमएस आपको आए तो उससे बात न करें। अपनी कोई भी समस्या उससे साझा न करें। अंधविश्वास से सम्बंधित एसएमएस आपको आता है तो उसे नजरअंदाज करे। अंधविश्वास फैलाने वाले व्हाट्सएप ग्रुप से बचे। ज्योतिष के टीवी कार्यक्रम से खुद दूर रहें (अंधविश्वास फैलाने वाला कार्यक्रम न देखे) और अपने बच्चाें को भी अंधविश्वास से सम्बंधित कार्यक्रम से दूर रखें। 

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेश (एएसओ)

Saturday, 8 July 2023

आधुनिक युग में भी जारी है तंत्र मंत्र के नाम पर लूट

आज आधुनिक युग में लोग बहुत सी डिग्रियां लेकर बैठे हैं, इसके बावजूद भी अंधविश्वास के जाल में फंसे हुए हैं। अपने आप को पढ़ा-लिखा और मॉडर्न कहने वाले ऐसे बहुत से व्यक्ति आपके आस-पास मिल जायेंगे। जो अंगूठे छाप तांत्रिक बाबाओं के सामने घुटने टेक कर, उसकी मूर्खता पूर्ण बातों पर फंस जाते हैं। बुरी आत्मा से मुक्ति, संकट मोचन, हर क्षेत्र में उन्नति, गड़े खजाने निकालने के नाम पर हवन, पूजा-पाठ और न जाने क्या-क्या तरकीब बताकर डिग्रीधारियों को लाखों रुपए का चूना लगा देता है। 

तांत्रिक के पास दिव्य शक्ति होती तो खुद का संकट दूर करता

आज भी पाखंडी के झांसे में आकर लुटाने का सिलसिला जारी है। लोग इतना भी नहीं सोचते कि उसके पास विध्न बाधा को दूर करने की शक्ति होती तो खुद का संकट और बाधा को दूर करता। खुद के ऊपर बाधा, संकट आता है तो वह विज्ञान के सहारा लेता है, विज्ञान में संकट का निवारण खोजता है। लेकिन अंधविश्वासी लोग इस पाखंडी तांत्रिकों के पास जाते हैं और उसके पास अपना कष्ट का निवारण खोजते हैं और धन के साथ अपनी इज्जत को भी गवा देते हैं।

रायपुर में हवन के नाम लाखों की लूट

सुनने में आया है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुरानी बस्ती के लेखराम साहू नामक व्यक्ति तांत्रिक के झांसे में आ गया और उससे चालीस लाख रुपए उस तांत्रिक ने लूट लिया है। इतनी बड़ी रकम इतनी आसानी से कैसे लूट लिया होगा? इसमें कोई दोमत की बात नहीं है। लोग प्रेत-आत्मा, अपशगुन से आज भी डरा हुआ है, इसी डर का फायदा उठाकर तांत्रिक लोगों को डराता है। लेखराम साहू के साथ भी ऐसे ही हुआ। उसे परिवार में घोर संकट और परिवार के किसी भी सदस्य के असमय मृत्य होने का डर दिखाया गया। और उससे बकरों की बलि देने, हवन में चढ़ाने के लिए एप्पल का मोबाइल और टीवी मांगा गया। उससे व्यक्ति इतना डर गया कि उसकी सभी मांगें को पूरा कर दिया।

हवन-पूजा के नाम पर खुद का पेट भरता है तांत्रिक

पूजा-पाठ, हवन-कुंड और कई पाखंड के नाम से तांत्रिक खुद का पेट भर रहा है। पहले यजमान को डराया जाता है, जब वह डर जाता है तब उसे छोटी सी पूजा करना है कहकर कुछ पूजा सामग्री लेने के लिए पहले कम पैसे की मांग करता है। यजमान कम पैसा खर्च हो रहा है सोचकर उसकी बात मान लेता है और उसे पैसे और सामग्री दे देता है। फिर दुबारा डराकर थोड़ा ज्यादा मांगता है और यजमान डर के कारण फिर दे देता है, ऐसे ही तांत्रिक खुद का पेट भरता रहता है। लास्ट में जब यजमान पूरी तरह से लुटा जाता है तब थक कर बैठ जाता है। बहुत ही कम लोग होते हैं जो पुलिस में शिकायत करते हैं। इसी कारण बहुत से तांत्रिक खुलेआम घूम रहे हैं।

तांत्रिक बाबाओं से रहें दूर

हमारे देश में पाखंडियों की कमी नहीं है, आए दिन तंत्र-मंत्र, हवन, चमत्कार के नाम से लोगों को लूटते रहते हैं। लोगों को इस तांत्रिक से दूरी बनानी चाहिए। कोई भी तांत्रिक, ज्योतिष के पास भविष्य मत दिखाइए, झाड़-फूंक मत कराए, तांत्रिक बाबाओं के मठ में न जाए, इसके साथ कथाकरने वाले पाखंडी की कथा सुनने न जाए। आपने परिवार और आस-पास के लोगों को भी ऐसे पाखंडी बाबाओं से दूर रहने के लिए कहे। जब तांत्रिक को यजमान ही नहीं मिलेगा तो उसका धंधा पूरी तरह से बंद हो जाएगा।

मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

Wednesday, 5 July 2023

बच्चों के लिए अंधविश्वासी मां बाप घातक


गांव से स्कूली पढ़ाई खत्म कर मुझे कॉलेज के लिए शहर में रहना पड़ा। उस समय मैं जहां रहता था ठीक उसके नीचे वाला फ्लोर में पति-पत्नी और उनका एक बच्चा लगभग डेढ़/दो साल का होगा रहते थे। पति-पत्नी दोनों कम पढ़े-लिखे थे, इसलिए कारखाना में मजदूरी करते थे। उसका बच्चा बहुत रोया करता था। जब बच्चा बहुत रोता था, तो उनके माता-पिता सुखी मिर्ची के साथ न जाने क्या-क्या डालकर पूरा घर को धुआं-धुआं कर देता था। जिससे पूरा वातावरण में मिर्ची की खरखराहट आने लगती थी। एक दिन जब बहुत धुआं उठकर खरखराहट करने लगा तब मैं नीचे जाकर देखा तो पूरा हाल में धुआं-धुआं फैला हुआ था, कुछ नजर नहीं आ रहा था। धुएं के कारण नाक से पानी आ रहा था और लगसतार छींक भी। बच्चा बहुत रो रहा था जब मैं इस धुआं के बारे में उनसे पूछा कि कौन किया है यह सब? तो सामने वाला ने बताया कि जब भी बच्चा रोता है ऐसे ही करते हैं। फिर जिसने धुआं किया था वह व्यक्ति बाहर आया। मैं उससे पूछा- भैया यह सब क्या हो रहा है? क्या चीज जला रहे हो? तब उस व्यक्ति ने बताया कि बच्चा रो रहा है इसलिए ठुआ (टोटके) कर रहा हूं। उस समय बहुत धुआं के कारण उसे बस इतना ही कहा इससे बच्चा रोना बंद नहीं करेगा, बल्कि और अधिक रो रहा है, कुछ भी मूर्ख जैसे कर रहे हो। फिर मैं वापस चला आया।

अंधविश्वासी को समझाना कठिन काम

दूसरे दिन उस व्यक्ति से मिला तो उसे समझाया भैया बच्चा रोता है तो उस बच्चे को क्या हुआ है, उसे क्या चाहिए। उस पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन आप लोग तो अंधविश्वास में पड़कर बच्चा को कोई कुछ जादू-टोना कर दिया है सोचकर टोना-टोटका करने लग जाते हो। उस व्यक्ति ने कहा आप नहीं मानते हो इसलिए नहीं जानते। जिसका बच्चा रहता है वह सब लोग करते हैं, कह कर चला गया।

धुएं की वजह से मासूम हुआ गंभीर

फिर एक-दो दिन बाद पता चला कि वह मासूम और गंभीर हो गया। तब अड़ोस-पड़ोस के लोगों के समझाने के बाद उसे उसके मां-बाप ने अस्पताल ले गया। अस्पताल में जब डॉक्टर ने देखा तो बताया कि धुएं की वजह से बच्चे को बहुत ज्यादा परेशानी हो रही है और उसका कुछ दिनों तक इलाज किया गया। तब जाकर शिशु ठीक हुआ। ज्यादातर अंधविश्वासी तर्क करना नहीं चाहते और कोई उसे बताए तो वह सुनना नहीं चाहते या उससे पूछे तो उसके पास जवाब नहीं होता है।

धुआं सेहत के लिए हानिकारक

विज्ञान की माने तो धुआं स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। उसमें अलग से मिर्ची डालकर और भी घातक बना दिया जाता है। धुएं की वजह से लोगों को सांस लेने में परेशानी होती है, जिससे व्यक्ति की जान भी जा सकती है। इसका मासूम बच्चे पर बहुत ही खतरनाक प्रभाव पड़ता है। उसकी आंख और नाक बहुत ही सेंसिटिव होने के कारण वह धुआं को सह नहीं सकता है। जिससे बड़ी बीमारी हो सकती है या मौत भी हो सकती है।

अंधविश्वास से बचना चाहिए

अंधविश्वास में लोग क्या-क्या नहीं करते खुद के नुकसान तो करता ही है साथ में आस-पास के लोगों को भी परेशानी में डाल देता हैहै। बच्चे के रोने पर धुआं करना बहुत जगहों पर देखा गया है, जिसमें ग्रामीण और शहरी दोनाें जगहों पर ऐसा अंधविश्वास होता रहता है। कई घरों में कमरों को धुआं करते रहते हैं। ऐसे अंधविश्वास से सभी लोगों को बचना चाहिए और अपने आस-पास के लोगों को भी जागरूक करना चाहिए। यहीं नहीं घर में जलाने वाली अगरबत्ती और धूपबत्ती भी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होती है। वैज्ञानिक का मानना है कि अगरबत्ती के धुएं बीड़ी-सिगरेट से भी ज्यादा घातक है। इसलिए धुएं से हमेशा दूर रहे और अपना तन, मन, धन और पर्यावरण को बचाएं।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

Monday, 26 June 2023

देवी-देवताओं का सच


हमारे देश में देवी-देवताओं की अनेक तस्वीरें और मूर्तियां देखने को मिलती हैं। जिसमें किसी के चार हाथ, चार सिर के अलावा हाथी का सिर भी है। सभी ज्वैलरी सिंगार, माला, मुकूट, अस्त्र-शस्त्र हाथ में धारण किए रहते हैं। लेकिन आपने कभी सोचा है कि इन तस्वीराें को किसने बनाई होगी? ईश्वर को मनुष्य ने बनाया या मनुष्य को ईश्वर ने इसका उत्तर मिलने के बाद भी मनुष्य उस उत्तर को स्वीकार न करते हुए फिर यही दोहराता है कि ईश्वर ने पूरा संसार को बनाया है, उसके बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। सभी जानते है, बेमौसम बारिश होती है, अधिक ठंडी, गर्मी पड़ती है, फुटपाथ में गरीबी की जंदगी बिताते-बिताते कई लोग मर जाते हैं। इसका जिमेदार कौन है? जीवन ठीक चलता है तब कहता है "सब ऊपर वाला की कृपा है" और जब दुख मिलता है तब कहता है "भगवान हमारी परीक्षा ले रहा है, किस जन्म में पाप किया था, उसे इस जन्म में भोग रहा हूं" ऐसे कई किस्से है, जिसमें अपने दोष को छुपाकर कई लोग भगवान पर थोप देते हैं।

देवी-देवताओं की कल्पना

मनुष्य यह देखकर हैरान था कि हवा का चलना, बिजली का चमकना, बादल गरजना, ऊपर से पानी गिरना, सूर्य से धूप मिलना और आग का जलना। आग को अग्निदेव, सूर्य को सूर्यदेव, हवा को पवनदेव और इसे आदेश देने वाला इंद्रदेव है ऐसा मान लिया गया। शुभ कार्य करने से पहले देवी-देवता को खुश रखने के लिए उसकी पूजा करने लगे। अगर पूजा नहीं करेंगे तो भगवान नाराज हो जाएगा और हवा, पानी, बिजली गिरकर रंग में भंग कर देगा, इसलिए उसे खुश रखने के लिए फल-फूल चढ़ाकर प्राथना करता थे। धीरे-धीरे अज्ञानता की वजह से अनेक भगवान की कल्पना की गई। कुछ पाखंडी अपना स्वार्थ के लिए इसका फायदा उठाकर लोगों को धर्म और भगवान के नाम से डराना चालू कर उसे विकराल रूप दिया।

देवी-देवताओं की तस्वीरें किसने बनाई?

आज जिस देवी-देवताओं की तस्वीरें की पूजा की जाती है। उस चित्र को 19 वीं शताब्दी में केरल के एक छोटे से गांव "किलिमानुर" में जन्में राजा रवि वर्मा जो विख्यात चित्रकार थे, ने बनाया है। सब तस्वीरें राजा रवि वर्मा की कल्पनाशक्ति की उपज हैं। खुद सोचिए, उस पुराने समय में जैसे दिखाया गया है वैसे कपड़े, हथियार, ज्वैलरी भगवान के पास कहां से आया, कलर, पेपर भी बाद में आया। जितने भी तस्वीर, मूर्ति है सब मनुष्य ने ही बनाया है।

सब लूट का हथकंडा

भगवान के नाम से आज कितनों का व्यापार जोरों से चल रहा है। हर जगह उनकी दुकान खुली हुई है। उस दुकान में भगवान की मूर्ति, फोटो, किताब, माला, अंगूठी, वस्त्र-शस्त्र, अगरबत्ती, रुई, यहां तक भगवान को भी बेचा जाता है और करोड़ों रुपए की कमाई की जाती है। इस धंधे को चलाने के लिए लोगों को भगवान के नाम से डराया जाता है, ऐसे नहीं करेगा तो पाप पड़ेगा। तुम्हारा परिवार कष्ट भोगेगा। सुख-शांति चाहिए तो पूजा-पाठ करें।

पूजना है तो इंसान को पूजिए

इंसान से बड़ा भगवान नहीं हो सकता। आज सब अपने-अपने भगवान को बड़े बताने में लगे हैं। भगवान के नाम पर एक-दूसरे का विरोध करने लगते हैं. यहां तक की भी नौबत आ जाती है कि लोग मार-काट करने से भी पीछे नहीं हटाते हैं। इस दुनियां में अगर इंसान भगवान के नाम से मर जाएगा तो बचेगा कौन? उस निर्जीव भगवान, जो किसी का सहारा नहीं कर सकता। मारने के बाद क्या भगवान उसे जीवित कर देगा, कभी नहीं करेगा। बहुत से लोग धर्म, भगवान के नाम से लड़ मरे, लेकिन कोई भगवान-अल्लाह बचाने नहीं आया, न मारे हुए को जिंदा किया। इसलिए इंसानियत को जिंदा रखे। जीव-जंतु, पर्यावरण को भगवान के नाम से क्षति न पहुचाएं। एक दूसरे का सहयोग करें, यही आपका धर्म है।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

मैं अंधविश्वासी नहीं हूं कहने वालों की सच्चाई


आज समाज अंधविश्वास रूपी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है और यह बीमारी मनुष्य को सदियों से पकड़ा हुआ है। लेकिन कोई भी व्यक्ति मानने को तैयार नहीं है कि उसे इस बीमारी ने पकड़ा है, उसका इलाज भी संभव है। पागल को पागल बोलेंगे तो आपको ही मारने-काटने को दौड़ेगा। ऐसा ही हाल अंधविश्वासी लोगों का है, भूल से भी आप उसको अंधविश्वासी और पाखंडी कह देंगे तो आपको कुत्ते से भी ज्यादा भौंकने के साथ काटने के लिए दौड़ेगा। इस कड़ी कठिनाइयों के बावजूद हमारे देश में अनेक समाज सुधारक इन अंधविश्वासी-पाखंडी लोगों के इलाज का बीड़ा उठाया और अभी भी उठाते आ रहे हैं। बहुतों ने इस समाज सुधार के कार्य को आगे बढ़ाते हुए, पाखंडीपंथी को तर्क देते हुए उन पाखंडियों के हाथों अपनी जान भी गवा बैठे। उन्हें देश और समाज के खातिर शहीद होना पड़ा।

खुद का अंधविश्वास लोगों को विश्वास लगता है

मैं जब भी लेख पोस्ट करता हूं। बहुत से मित्र का ज्यादातर यही प्रश्न रहते हैं कि आप दूसरे धर्म के खिलाफ क्यों नहीं लिखते। हमारे धर्म के ही अंधविश्वास आपको दिखाई देता है या कोई कहता है कि हमारे धर्म में कोई अंधविश्वास नहीं है, ये तो सब विश्वास है, भूत-प्रेत, डायन को हम नहीं मानते, हम भी अंधविश्वास के खिलाफ है, ऐसे धार्मिक अंधविश्वासियों के प्रश्न रहते हैं। नशा करने वाला नशेड़ी कहता है 'मैं तो तंबाकू बस खाता हूं' और वह आपको तंबाकू के बहुत से फायदे बताते हुए, शराब, गांजा और बाकि नशे को गलत बताएगा। ऐसा ही अंधविश्वासी लोगों का है, खुद को अंधविश्वासी नहीं मानेगा। स्वयं के बारे में सुनना नहीं चाहेगा, दूसरों के बारे में कहना ही अच्छा लगता है। अपना पिछवाड़ा खुद को नहीं दिखता, दूसरों के पिछवाड़े गंदा है देखकर खुश होता है। तथाकथित बुद्धिजीवी और आम लोगों से कहना चाहता हूं कि 'अपना पिछवाड़ा पहले धोने की जरूरत है।

भूत-प्रेत दिखना अंधविश्वास, भगवान दिखना विश्वास?

भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, डायन को हम नहीं मानते, बस 'भगवान पर विश्वास' है, ऐसे अंधविश्वास से हमें बचाएं कहने वाले लोग मिलते ही रहते हैं। भूत-प्रेत भ्रम है किसी ने नहीं देखा। तो क्या भगवान-अल्लाह को किसी ने देखा? भगवान का भ्रम हो तो विश्वास और भूत-प्रेत का भ्रम हो तो अंधविश्वास, इसी को कहते है 'अपना बच्चा अंधा पड़ोसी का चश्मा देख हंसी आय'। ओझा तांत्रिक अपनी दुकान बंद नहीं करना चाहता। दूसरी तरफ धार्मिक पाखंडी भगवान के नाम की दुकान को बंद न हो इसके लिए पूरा जोर लगा रखा है और उस दुकान के ग्राहक अपना लेन-देन की दुकान और उसमें बिकने वाली वस्तु को अच्छा समझता है, उसे अच्छा लगता है। दूसरे की दुकान और वस्तु खराब लगता है। गलत किसी भी के हो, कितनी भी ताकतवर हो गलत ही रहेगा। सभी समझदारों को चाहिए कि समाज में व्याप्त तमाम अंधविश्वासों को खुलकर विरोध करें तभी बदलवा संभव है।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

दिनों को लेकर शुभ अशुभ के फेर में न पड़ें, रोजाना करें बेहतरीन काम


सामान्य लोगों में दिनों को लेकर कई प्रकार के भ्रम पल रहे हैं. अच्छे काम की शुरूआत करने से पहले दिन और समय देखने का अंधविश्वास समाज में व्याप्त है. व्यक्ति का जन्म और मृत्यु के लिए कोई मुहूर्त नहीं होता, लेकिन लोग जीवनभर शुभ-अशुभ के चक्कर में अपना समय और धन बर्बाद कर देते हैं. बच्चे का नामकरण, शादी, घर में प्रवेश, वाहन खरीदने, कपड़े खरीदने और सभी प्रकार की खरीदी के लिए लोग दिन और समय देखते हैं. कई लोग शनिवार को सबसे खतरनाक दिन मानते हैं तो कई व्यक्ति मंगलवार और गुरुवार को सबसे शुभ दिन मानते हैं. यह मानसिकता अज्ञानता और अंधविश्वास की उपज है.

समाज में तार्किक और वैज्ञानिक सोच के इंसानों की बहुत कमी

अंधविश्वास आजकल चरम सीमा पर है. भले ही डिग्रीधारी लोगों की संख्या बढ़ गई है, लेकिन तार्किक और वैज्ञानिक सोच के इंसानों की आबादी बहुत कम है. कई लोग नए कपड़े और आभूषण पहनने के खास दिन का इंतजार करते हैं. विवेकहीन व्यक्तियों का मानना है कि शुभ घड़ी में नए कपड़े-गहने पहनने से बिगड़े काम भी बन जाते हैं. सही मुहूर्त में इन्हें धारण कर काम करने से उस काम में सफलता मिलती है. 

ज्योतिष शुभ-अशुभ के जाल में फंसाकर भर रहा है अपनी जेब

आजकल ज्योतिष मुफ्त में अपना पेट भर रहा है. ज्योतिष अज्ञानी लोगों को शुभ-अशुभ के जाल में फंसाकर अपनी जेब भर रहा है. ज्योतिष के अनुसार शॉपिंग के लिए शुक्रवार का दिन सबसे अच्छा है. इसका कहना है कि शुक्र को धन, ऐश्वर्य व सुख, वस्त्र का कारक ग्रह माना जाता है. शुक्रवार को नए कपड़े खरीदने पर शुक्र देव प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा होती है. अब काेई बताए क्या शुक्रवार, गुरुवार और मंगलवार (जिसे शुभ दिन माना जाता है) को कोई बूरे काम, चोरी, लूट-पाट, हत्या, बलात्कार या प्राकृतिक घटनाएं आगजनी, आंधी-तूफान, बिजली गिरना, बाढ़ आना, भूकंप, भारी बारिश से इमारत गिरना, चक्रवात और भी अन्य दुर्घटनाएं नहीं होती?

शनिवार को शिशु का जन्म होगा तो क्या कोई फेंक देगा?

वहीं कहा जाता है कि शनिवार और रविवार को नए कपड़े नहीं खरीदने चाहिए और अच्छे काम नहीं करना चाहिए. आप ही बताएं नए चीज खरीदने और अच्छे काम करने के लिए कोई भी समय खराब हो सकता है. आप खुद के लिए और दूसरों के लिए अच्छे करेंगे तो हमेशा आपका समय अच्छा चलेगा और जीवन खुशहाल रहेगा. क्या कोई शनिवार या रविवार को (जिस दिन को अशुभ माना जाता है) को किसी के यहां शिशु का जन्म हो जाता है तो उसे कोई फेंक देता है या जीवनभर उसका शोक मनाता है? क्या इस दिन किसी को सड़क पर नोटों की गड्‌डी मिल जाती है या कोई भी सामान मिल जाता है तो उसे फेंक देता है?

अपनी सुविधानुसार करें काम

अच्छे काम करने के लिए लोग मुहूर्त देखते हैं, लेकिन बूरे काम मौका पाते ही कर लेते हैं. समाज में लगातार अपराध बढ़ रहा है. कोई व्यक्ति किसी से लड़ाई करने, चोरी करने, बलात्कार करने और हत्या जैसे घोर जुर्म करने के लिए समय नहीं देखता. ज्योतिष, तांत्रिक, धार्मिक गुरु और अन्य मुफ्तखोर मासूम जनता को उसकी अज्ञानता का फायदा उठाकर शुभ-अशुभ, व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, यज्ञ-दान व कई प्रकार के पाखंड के नाम पर लूट रहे हैं. लोग अच्छे काम करने से पहले अपने मां-बाप और परिवार के बुजुर्ग को नहीं पूछ रहे हैं, लेकिन मुफ्त के खाने वालों के पैरों के सामने नतमस्तक होकर अपना भविष्य पूछने चला जाता है. यह कितना शर्मनाक है. लोगों को चाहिए कि कोई भी अच्छे काम करने के लिए दिन और समय के चक्कर में न पड़े और न ही पाखंडियों के पास लुटाने के लिए जाए. अपनी सुविधा अनुसार और घर के बड़े बुर्जुगों की सलाह मुताबिक काम करें तो परिवार में खुशहाली और शांति हाेगी.

- गनपत लाल, सांगठनिक सलाहकार, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

Sunday, 18 June 2023

सबसे खतरनाक पाखंड का वायरस


इस देश में पाखंडियों की कमी नहीं है। इसलिए ग्रामीण-शहरी, अनपढ़-डिग्रीधारी और गरीब-अमीर सभी अंधविश्वासी हैं। ये लोग सुबह से लेकर शाम तक कुछ न कुछ पाखंड करते रहते हैं। सुबह नहाधोकर जोर-जोर से तंत्र-मंत्र, जाप- ध्यान, ऐसा करते हैं, जिससे पड़ोसी को पता चले कि फला व्यक्ति बहुत धार्मिक है, सुबह से उठ जाता है, एक दिन भी नहीं भूलता है और इससे भी सुकून नहीं मिलता तब पड़ोसी के घर की तरफ मुहं कर पोंगा (लाउडस्पीकर) लगा कर धार्मिक गाने बजाने लगते हैं। जिससे पूरा वातावरण से पाखंड की बू आने लगती है, इतनी गंदगी तो नाली से भी नहीं आती है। इस बदबू से ऐसे पाखंड का वायरस उतपन्न होता है, जिससे आस-पास के घर में रहने वाले कमजोर मन के लोगों को भी पकड़ लेता है। फिर यह वायरस दिनों दिन बढ़ता जाता है, व्यक्ति के लिए प्राणघातक होते जाता है और अंधविश्वास के चक्कर में बहुत से लोग जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं। इस वायरस को रोकने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसी दवाई (सोच) की जरूरत है, हर मोहल्ले में ऐसी दवाई मिलनी ही चाहिए तभी हम इससे बच पाएंगे। 

स्वार्थ की उपज है पाखंड

लोग पाखंड क्यों करते हैं? ये बहुत बड़ा सवाल है। व्यक्ति अज्ञानता के कारण इस वायरस का शिकार हो जाता है, ऐसे भी लोग रहते हैं जो अपने आप को बहुत बड़ा नेक आदमी और धार्मिक सिद्ध करने के लिए ये सब दिखावे करते हैं। लेकिन सभी लोग स्वार्थ के लिए पाखंड करते हैं, आर्थिक, शारीरिक और मानसिक लाभ की चाह में ऐसे करते हैं। इन लोगों को लगता है ऐसा करने से चमत्कारी शक्ति मिलेगी या मनोकामना पूरी हो जाएगी। मैं जो कुछ मागूंगा वह सब चीजें मिल जाएंगी। सब पाखंड स्वार्थ के लिए ही किए जाते हैं।

पाखंड फैलाने में पाखंडी धर्म गुरुओं का हाथ

सभी सम्प्रदाय में एक पाखंडी गुरु होता है, जिसमें अलग-अलग पाखंड होते हैं। किसी संप्रदाय में पाखंड के लिए सोमवार को शुभ मानता है तो कोई मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, रविवार ऐसे सातों दिनों में अलग-अलग दिन को मानते रहते हैं। ये सब पाखंडी गुरु की उंगली से चलता है, उसी के अनुसार शुभ-अशुभ का निर्णय होता है। जैसे गुरु कहे वैसा ही पाखंड करना रहता है, नहीं तो घर में अशुभ हो जाएगा यह कहा जाता है। गुरु इस पाखंड और लोगों की मूर्खता का भरपूर फायदा लेता है, मोटी रकम के साथ रहने खाने सब फ्री में मिल जाता है और ऐसे गुरुओं की लूट चलती रहती है। जब तक लोग अज्ञानता के अंधरे में रहेंगे तब तक पाखंडी बाबाओं का मौज ही मौज रहेगा। इसलिए हमेशा पाखंड से बचें और विवेक की बत्ती जलाएं ताकि आप किसी के हाथ की कठपुतली न बनें और बेहतर जीवन जी सकें।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन

सर्पदंश का जहर निकालने के नाम पर लोगों को मार डालते हैं ओझा तांत्रिक


सर्प से कौन नहीं डरता? लोग अंधेरे में जाने से पहले टार्च लेना नहीं भूलते हैं, क्योंकि यही डर रहता है कि कही सांप-बिच्छू न कांट ले और हमें उसका जहर का सामना करना पड़े। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में सुविधा के आभाव और खेतखार व पेड़-पौधे के कारण आए दिन सर्पदंश के मामले सामने आते रहते हैं। जिसमें ओझा-तांत्रिक ग्रामीणों को सर्पदंश से बचाने और सर्पदंश के बाद झाड़-फूंक से ठीक करने का दावा करते हैं। उसका बड़ा-बड़ा ड्रामा और कथित चमत्कार से लोग उसकी ओर आकर्षित होकर जाते हैं। गांव में किसी व्यक्ति को सर्प कांट देता है तो उस व्यक्ति को ओझा (बैगा) के पास ले जाता है और बैगा उस मरीज को अनेकों प्रकार के झाड़-फूंक करता है, जिससे मरीज की जान चली जाती है। मृत व्यक्ति के परिवार वाले किस्मत को दोष देते हुए 'भगवान की यही मर्जी थी, इतने ही दिनों के लिए आए थे' यह कह कर शान्त हो जाते हैं। कभी ये नहीं सोचते कि इस ओझा के चक्कर में मृत्यु हुई है। सही समय में डॉक्टर को दिखाते तो उसकी जिंदगी बचाई जा सकती थी, हमें इस ओझा (बैगा) के पास नहीं आना था, ऐसा सोचने का समय कहां रहता है, सब किस्मत के भरोसे रहते हैं।

झाड़-फूंक का ड्रामा

सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति को ओझा (बैगा) के पास लाते ही तांत्रिक का ड्रामा चालू हो जाता है। हर एक ओझा-तांत्रिक का भांति-भांति का ड्रामा होता है। जोर-जोर से मंत्र पढ़कर मरीज को भभूत से झाड़ना, फूंकना, भभूत खिलाना, सर्प कांटे स्थान पर भभूत लगाना, उस स्थान पर पानी छिड़कना, मसलना और मुहं से सर्पदंश स्थान के खून को चूसना ऐसे बहुत से मूर्खतापूर्ण कार्य करता रहता है और आस-पास के लोग तमासा देखते रहते हैं। कुछ मरीज इस ड्रामा के बीच में ही खत्म हो जाते हैं। वहीं बहुत से सर्पदंश से पीड़ित लोग ठीक हो जाते हैं। तांत्रिक कहता है अब ये ठीक हो गया और सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति को घर ले जाता है, उस व्यक्ति को कुछ नहीं होता है, न ही उस तांत्रिक को कुछ होता है।  लोग उस घटना को लेकर तांत्रिक को सिद्ध तांत्रिक कहकर प्रचार करते हैं। दूसरों को कहता है कि उस तांत्रिक ने सर्पदंश स्थान को चूसकर जहर को पी गया और सर्पदंश के बाद भी व्यक्ति बच गया, तांत्रिक को कुछ नहीं हुआ। जब उसी तांत्रिक के झाड़-फूंक की वजह से सर्पदंश पीड़ित व्यक्ति मर जाता है तो उस समय यहां लोग शांत बैठ जाते हैं, कोई यह नहीं कहता उस तांत्रिक ने उसकी जान ले ली।

सांपों को लेकर सच्चाई

भारत देश में 70 फीसदी सर्प में बिलकुल जहर नहीं होता है। अब बचे 30 प्रतिशत में 10 फीसदी सांपों में भारी मात्रा में जहर होता है, बाकी में नहीं के बराबर होता है। दस फीसदी सांप के काटने से व्यक्ति का बच पाना कठिन हो जाता है। उस तांत्रिक (बैगा) के पास इसी  दस फीसदी सांप के कांटे मरीज की मृत्यु हो जाती है। बाकी 90 फीसदी सर्पदंश के शिकार व्यक्ति बच जाते हैं, इसी से तांत्रिक अपनी शक्ति सिद्धि का दावा करता है। मतलब 100 सर्पदंश व्यक्ति में कुछ ही लोग मर जाते हैं, बाकी सब बच जाते हैं। मर गए उसके लिए किस्मत ने साथ नहीं दिया या भगवान की मर्जी इतने दिनों के लिए ही आया था बेचारा कह कर तांत्रिक अपना पीछा छुड़ा लेता है। 

रायपुर जिले की एक घटना

एक घटना छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास के गांव की है। यह बात बारिश के समय की है, जब गांवों में खेती का काम चल रहा था।
मुझे फोन आया और बताया कि 18 साल की लड़की को सांप काट दिया है, हम क्या करें, कहां दिखाए?
तब मैंने पूछा- कौन सा सांप काटा है? उत्तर झट से मिला 'कोबरा'।
(मैं सोच में पड़ गया कोबरा बहुत जहरीला सांप है) मैं जितना जानता था उतना सावधानी बताते हुए कहा तुंरत सरकारी अस्पताल मेकाहारा रायपुर ले आइए।

विज्ञान चौपाल कार्यक्रम का पड़ा प्रभाव

हम कुछ ही समय पहले गांव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विज्ञान चौपाल कार्यक्रम किए थे। वहां उस व्यक्ति ने हमारा कार्यक्रम को बराबर अटेंड किया था। 
35-40 मिनट में हॉस्पिटल लेकर पहुंच गए। मैं और एक साथी पहले से हॉस्पिटल पहुंच चुके थे। मरीज के परिवार वालों से पूछा कि किसी ने देखा सच में 'कोबरा' ही है तो उन्होंने कहा 'हां' हम लोग उस सांप को देखा भी और उस सांप को मारा भी है। फिर डॉक्टर ने देखते ही बता दिया कि इसे सांप ने नहीं काटा है, उन्होंने कहा कि फिर भी कुछ टेस्ट है, इसे तुरंत करा कर दिखाए। टेस्ट से भी पता चला सांप ने नहीं काटा है। डॉक्टर ने बताया कि सांप खेलकर निकल गया और उसका कुछ स्क्रेच रह गया इसलिए ये चिन्ह पड़ा है।

सांप काटने पर पीड़ित को तुरंत  पहुंचाएं अस्पताल

अब यह बात समझने की है कि अगर ओझा-तांत्रिक के पास लेकर जाते तो अनेक ड्रामा करने के बाद ठीक हो गया। फिर क्या लोग उसकी जयजय करना चालू कर देते। कहते कोबरा सांप काटा था उसे तांत्रिक ने ठीक कर दिया कभी ये नहीं पता करता कि सांप काटा है कि नहीं। ऐसे ही सांप जहरीला नहीं होता है या कुछ दूसरा कीड़ा काटा रहता है। सभी से अपील है कि कभी भी इस पाखंडी तांत्रिक के चक्कर में न पड़े। जब भी कोई सांप काटे तो अपने नजदीकी अस्पताल में पीड़ित को पहुंचाएं।

-मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

धन और इज्जत लूटने का काम करते हैं ओझा तांत्रिक


आज इकीसवीं सदी में विज्ञान पृथ्वी से चंद्रमा और मंगल में जा पहुंचा है। लोग आधुनिक कहलाने लगे हैं। आधुनिक युग में भी लोग ओझा-तांत्रिक के जाल में फंसे हुए हैं। गरीब हो या अमीर, अनपढ़ या पढ़ा-लिखा सभी अंधविश्वास के मायाजाल से अछुते नहीं है। ज्योतिष और तांत्रिक लोगों को मूर्ख बनाकर धन और इज्जत लूट रहे हैं और भोलेभाले लोग खुलकर लुटा रहे हैं। इनके पास सोचने-समझने के लिए भी वक्त नहीं है। पूरा समय को तांत्रिक की पूजा सामग्री के इंतजाम में नष्ट कर रहे हैं। भोली-भाली जनता बिना सोचे-समझे धन और इज्जत को इन पाखंडियों के चरणों पर अर्पित कर रही हैं। 

देश में बढ़ रहे बलात्कारी बाबा

व्यक्ति अपनी बुद्धि को उन पाखंडी बाबाओं के पास गिरवी रख देता है, इसीलिए पाखंडी की मीठी-मीठी बातों में आकर पाखंड करता है। खुद तो अंधविश्वास में डूबता है और अपने साथ में परिवार वालों को भी इस दलदल में धकेल देता है। यहां तक छोटे-छोटे बच्चों को भी ले डूबाता है। वहीं महिलाओं को घर के अंदर रखने वाले पुरुष अपनी पत्नी और बेटी को बलात्कारी बाबाओं के गुफाओं में भेज देते हैं। देश में आसाराम, रामरहीम, फलाहारी जैसे बलात्कारी बाबाओं की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। 

रूढ़ियों को तोड़ने की जरूरत

ज्यादातर लोगों के घरों में सुबह से लेकर रात तक अंधविश्वास का सिलसिला चलता रहता है। परिवार के समझदार व्यक्ति अगर पाखंड को लेकर टोकता है, तो उसकी खिल्ली उड़ाकर उसे मूर्ख, अधर्मी, कहकर उसकी मजाक उड़ा कर उसे शांत कर देते हैं और वह समझदार व्यक्ति भीड़ में अकेला पड़कर चुप रह जाता है। यहां पर मुझे राहुल सांस्कृत्यायन की बातें याद आती है *'रूढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रूढ़ियों को तोड़ने वालों के उदाहरण पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं।'* उन्होंने सच ही कहा है।

तंत्र-मंत्र का ढोंग करने वाले खुद जाते हैं अस्पताल

कथाकार भी भगवान कथा के नाम पर धर्म का चोला ओढ़कर लोगों को ठगने का काम कर रहा है। अवैज्ञानिक बातों का जोर-शोर से प्रचार कर लोगों को अंधविश्वास में ढकेल रहा है और लाखों, करोड़ों रुपए ठग कर ले जा रहा है। समाज को ऐसे पाखंडी लगतार लूटते आया है और अभी भी लूट रहा है। पाखंडियों को स्वर्ग-नर्क, नक्षत्र, कुण्डलीदोष, पाप-पुण्य, भाग्य, किश्मत जैसी बातों के अलावा कुछ नहीं आता है। ये सब कुछ धूर्त लोगों के बनाए हुए लूटने के हथकंडे हैं, लेकिन इन काल्पनिक बातों पर बहुजन लोग विश्वास करते हुए आ रहे हैं। यही तांत्रिक और ज्योतिष जब बीमार पड़ते हैं तो डॉक्टर के पास अस्पताल में इलाज कराने के लिए जाते हैं। इन पाखंडियों को अगर तंत्र-मंत्र की शक्ति पर विश्वास है तो डॉक्टरी दवाई लेना बंद कर देना चाहिए।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बनेगा बेहतर समाज

महामारी (कोरोना) के समय पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र, झाड़-फूक कुछ काम नहीं आया। इस पाखंडी के चक्कर में जिस किसी ने आया उसका अंत ही हुआ। ज्यादातर लोग दोगला चरित्र के होते हैं, इधर भी जय, उधर भी जय। जब विज्ञान की जरूरत पड़ती है तो विज्ञान के चरण में जाते हैं, बाकी समय पाखंडी बने फिरता है, विज्ञान के विरोध में काम करता है। जब दो पैरों को अलग-अलग छोर में रखकर खिंचाव होगा तो उस व्यक्ति का फटना तय है और फट रहा है। धीरे-धीरे पाखंडियों का धंधा बंद हो जाएगा, सब पाखंड खत्म हो जाएगा। अंधविश्वास बहुत बड़ी मानसिक बीमारी है और इसका अंत जरूर होगा। उस समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण होगा और बेहतर समाज होगा। कोई जाति-धर्म नहीं होगा और सब इंसान होंगे।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन