अब मे ह दूसर ढाहर बात ल नइ लमा के 31 अक्टूबर के अवइया जेठउवनी या देवउठनी ल लेके आप मन से थोकन गोठियाहू। लोगन ल कहानी अउ कालपनिक बात म उलझइया मनखे मन कथे कि देवसयनी एकादशी ले देवउठनी एकादसी तक यानी चार महीना भगवान बिष्णु ह सयनकाल के अवसथा म होथे अउ ए समय म कोई सुभ काम ल नइ करे जाय कथे। त भइया हो आपे मन बतावव कि जम्मो तिहार पूजापाठ अउ धारमिक काम बुता ह इही बेरा म होथे। जइसे गनेस पूजा, नवरातरी म दुरगा पूजा, देवारी म लछनी पूजा अउ बीच बीच म काय काय पूजा नइ होय। तब तो फेर ये पूजाउजा मन ह असुभ काम आय काबर पंडित मन ह कइथे कि ए समय म देवी-देवता मन सुते रइथे। अव इकर सुते के समय म कोनो परकार के डिस्टर्ब नइ होना चाही। तब तो हमन ह बड़े जान पापी हरन काबर गनेस, दुरगा अउ लछनी पूजा म मड़माड़े आवाज म लाउंड स्पीकर बजा-बजा के भगवान ल अउ आस पास के मनखे ल जगाथन अउ परेसान करथन। बड़े-बड़े फटाका फोड़ के सुते देवधामी अउ इस्कूल म पढ़त लइका, रसपताल म परे मरिज ल झझकाथन चमकाथन। अउ अतको नही गनेस अउ दुरगा ल पानी म बोर बोर के उबुक चुबुक डूबो देथन जेकर ले ओ भगवान ल कतेक तकलीफ होवत होही अउ धरती के जीयत परानी, जीव अउ जानवर मन ल घलो पीए के पानी मिलत रिहिस उहू ह परदूसित होगे। जतका नदिया, नरवा, तरिया, डबरी रिहिस ओला हमन भगवान के नाम म पाट डरेन। का हमन अइसन करके देवी-देवता के नींद म अउ आस पास के मनखे अउ जीव जानवर के जिनगी म दखल नइ देवत हन।
Tuesday, 14 November 2017
जेठवउनी : का कोनो मनखे ह लगातार चार महिना ले सुत सकथे
अब मे ह दूसर ढाहर बात ल नइ लमा के 31 अक्टूबर के अवइया जेठउवनी या देवउठनी ल लेके आप मन से थोकन गोठियाहू। लोगन ल कहानी अउ कालपनिक बात म उलझइया मनखे मन कथे कि देवसयनी एकादशी ले देवउठनी एकादसी तक यानी चार महीना भगवान बिष्णु ह सयनकाल के अवसथा म होथे अउ ए समय म कोई सुभ काम ल नइ करे जाय कथे। त भइया हो आपे मन बतावव कि जम्मो तिहार पूजापाठ अउ धारमिक काम बुता ह इही बेरा म होथे। जइसे गनेस पूजा, नवरातरी म दुरगा पूजा, देवारी म लछनी पूजा अउ बीच बीच म काय काय पूजा नइ होय। तब तो फेर ये पूजाउजा मन ह असुभ काम आय काबर पंडित मन ह कइथे कि ए समय म देवी-देवता मन सुते रइथे। अव इकर सुते के समय म कोनो परकार के डिस्टर्ब नइ होना चाही। तब तो हमन ह बड़े जान पापी हरन काबर गनेस, दुरगा अउ लछनी पूजा म मड़माड़े आवाज म लाउंड स्पीकर बजा-बजा के भगवान ल अउ आस पास के मनखे ल जगाथन अउ परेसान करथन। बड़े-बड़े फटाका फोड़ के सुते देवधामी अउ इस्कूल म पढ़त लइका, रसपताल म परे मरिज ल झझकाथन चमकाथन। अउ अतको नही गनेस अउ दुरगा ल पानी म बोर बोर के उबुक चुबुक डूबो देथन जेकर ले ओ भगवान ल कतेक तकलीफ होवत होही अउ धरती के जीयत परानी, जीव अउ जानवर मन ल घलो पीए के पानी मिलत रिहिस उहू ह परदूसित होगे। जतका नदिया, नरवा, तरिया, डबरी रिहिस ओला हमन भगवान के नाम म पाट डरेन। का हमन अइसन करके देवी-देवता के नींद म अउ आस पास के मनखे अउ जीव जानवर के जिनगी म दखल नइ देवत हन।
लोकतंत्र का गला घोटने की हो रही साजिश
मोहब्बत की निशानी ताजमहल पर नफरत की निगाहें
लक्ष्मी पूजा से धन मिलता है तो देश गरीब क्यों?
हमारा भारत देश में ज्यादातर समय पूजा-पाठ में व्यतित होता है। कहा जाता है कि लक्ष्मी की पूजा करने से धन-संपत्ति की बारिश होती है। इसलिए दीपावली त्योहार में अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, शहरी-ग्रामीण और सभी वर्ग के लोग तल्लीन होकर मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं, लेकिन अभी तक भारत देश को गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी और अन्य समस्याओं से मुक्ति नहीं पाई। बल्कि यहां की जनता गुलाम मानसिकता के शिकार हो गई। अब सोचने की बात यह है कि समाज अपनी अगली पीढ़ी को किस ओर ढंकेल रहा है। लोगों को मेहनत में कम और पूजा-पाठ में ज्यादा विश्वास होने लगा है, जिससे आत्मविश्वास कमजाेर पड़ता जा रहा है। अब आधुनिक युग में शिक्षित लोग भी विज्ञान पर कम और चमात्कार पर ज्यादा विश्वास करने लगा है। अगर पूजा-पाठ से मनोकामना पूरी होती तो यहां कोई इंसान असंतुष्ट नहीं होते। इतनी बड़ी आबादी सुबह से शाम और देर रात तक लाउंड स्पीकर बजा-बजा कर भगवान को याद करते हैं, लेकिन उनकी समस्याएं जस के तस बनी रहती है। हमें भेड़ धसान चाल चलने से पहले साेचना होगा कि हम और हमारा समाज कहा जा रहे हैं ? क्या लक्ष्मी पूजा करने से रुपयों की बारिश होती है ? क्या दुर्गा पूजा करने से शक्ति मिलती है? क्या सरस्वती पूजा रकने से ज्ञान मिलता है ? तो भारत देश को विश्व में सबसे धनवान, सर्वशक्तिमान और बहुत ही ज्ञानवान होना चाहिए। इस वक्त मुझे भगत सिंह की कही गई बात याद आती है, 'अपने बच्चों को यह कहना कि तुम छनभंगुर और कमजोर हो, जो भी कर्ता-धर्ता ईश्वर है, इससे बच्चों की आत्मशक्ति खत्म हो जाती है।' यह बात सत प्रतिशत सहीं है
किसानों की चिंता या चुनाव की
त्याेहारों पर पर्यावरण व खुद से खिलवाड़ तो नहीं ?
Sunday, 12 March 2017
होलिका दहन या पर्यावरण दोहन
देश भर में परम्परा के नाम पर पर्यावण के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। जागरूक नागरिक भी होलिका दहन के लिए जंगल और अन्य जगहों से लकड़ी इकठ्ठा कर जलाते हैं। आज धीरे-धीरे जंगल का नाश होता जा रहा है। वहीँ कई प्रकार के जीव-जंतु विलुप्त होते जा रहे हैं। पेड़-पौधे और हरियाली का नामो निशान नहीँ है। फिर भी हम क्यों पर्यावरण और खुद का नुकसान करने के लिए अड़े हुए है। गांव हो या शहर सभी गली चौक चौराहों पर होलिका दहन करके हम खुशियां मनाते हैं। जिसके लिए कई पेड़ों की बलि देनी पड़ती है। वही लकड़ी जलने से वायु भी दूषित होती है। जिससे फेफड़ो से सम्बंधित कई बीमारी का खतरा होता है। वही जली हुई राख तालाब और नदी में जाकर पानी को भी खराब करती है।
एक बात और समझ नहीँ आती कि हम कुछ दिन पहले 8 मार्च को महिला दिवस मना कर महिलाओं का सम्मान की बात करते है। लेकिन होलिका (महिला) को जला कर हम ख़ुशी मनाते हैं। ये कैसा समाज है ? इससे आने वाली पीढ़ी को हम महिलाओं के प्रति नफरत का संदेश देते हैं। हमे इस पुरानी रूढ़ि-परम्परा को खत्म कर पर्यावरण और समाज को बचाना होगा। क्यों न हम अब होलिका दहन बन्द करके होलिका चमन के नाम से पेड़ लगाए और महिलाओं के लिए प्रेम का संदेश दे कर हरियाली फैलाए।
Tuesday, 7 March 2017
आवाज
सभी जगह हो रहे हैं महिलाओं पर अत्याचार
कही भी सुरक्षित नहीँ
स्कूल, कालेज, गली, मोहल्ले, बाजार
कही दहेज की मांग
कही शोषण और बलात्कार
अब आ रही है आवाज
मांग रही है महिलाएं अपना अधिकार
महिलाओं ने खाई है कसम
पूरा हक लेकर ही लेगा दम
ये लड़ेगी नहीं रूकेगा कदम
बुराई का दुश्मन, अच्छाई का हमदम
अब आ रही है आवाज
मांग रही है महिलाएं अपना अधिकार।
Friday, 3 March 2017
आजादी
हमको चाहिए आजादी
देश के दलालों से
मजदूर-किसान के
खून चूसने वालों से
अशांति और दंगा से
जाति-धर्म के पंगा से
भ्रष्ट सरकार से
महंगाई की मार से
भक्षक हवलदारों से
देश के गद्दारों से
हमको चाहिए आजादी
गरीबों की भूख से
अशिक्षा के दुःख से
युवाओं की बेरोजगारी से
नफरत की बमबारी से
हमको चाहिए आजादी।
स्कूल बंद, दारू दुकान चालू
सरकार को शर्म आनी चाहिए दो साल पहले 3000 स्कूलों को युक्तियुक्तकरण के तहत बन्द कर दिए। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में जन आक्रोश देखने को मिला लेकिन सरकार ने इस पर कोई सुध नहीँ ली। अब शराबबन्दी की मांग प्रदेश भर में उठ रही है लेकिन सरकार 700 शराब दुकान को बंद करने के लिए तैयार नहीँ है।
अब राज्य में रमन ब्रांड शराब बिकेगी। इस बात को लेकर रमन और उनके मंत्री अपने आप को गर्वान्वित महसूस कर रहे हैं। जबकि जनता इस बात को लेकर शर्मसार है। लोग चिंतित है कि 'धान के कटोरा' कही 'दारू के बोतल' न बन जाए। सरकार जनता की मौत से राजस्व कमाना चाहती है। इस राजस्व का मोह छोड़ने के लिए तैयार ही नहीँ है। मुख्यमंत्री लोगों को बैकुफ बनाने के लिए बार-बार कह रहे हैं कि सरकार शराबबन्दी की ओर बढ़ रही है। तो मैं पूछता हूं क्या शराब बिकना बन्द हुई ? क्या शराब दुकान बंद हुई ? और न ही शराब की दुकान में कटौती हुई है राजमार्ग की दुकान को आबादी क्षेत्र में लगाने के लिए और सरकार खुद शराब बेचने के लिए अड़ी है। सरकार कह रही है उचित समय में शराबबन्दी करेंगे तो क्या जनता मौत के मुँह में समा जायेगी तब उचित समय आएगा। जनता को मारकर विकास की बात करना शोभा नहीँ देती। आज सभी पार्टी जनता की भलाई छोड़ कर अपनी राजनीति की रोटी सेकने में लगी हुई है, एक-दूसरे के ऊपर कीचड़ उछालने में पूरी ताकत झोंक दी है। अगर यही ताकत जमीनी स्तर में काम करने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजी-रोटी और अन्य मूलभूत सुविधा के लिए लगाते तो निश्चित ही छत्तीसगढ़ की तस्वीर बदल जाती। गांव में एक अच्छा नियम है जो शराब बेचता है, तो उसे ग्रामीण बहिष्कृत कर गांव से बाहर निकाल देते हैं। इसी प्रकार अब जनता को सोचना है कि जो सरकार पुरे छत्तीसगढ़ में दारू बेच रही है उसको क्या सजा देनी है ?





