Wednesday, 21 August 2024

सिक्का का दीवार पर चिपकना कोई चमत्कार नहीं


मुझे याद है जब मैं लगभग 11 साल का था। एक रिश्तेदार के साथ उनके घर गया था, उधर से ही हम लोग छत्तीसगढ़ के धमतरी के गंगरेल बांध घूमने गए। डेम से आते समय धमतरी के बिलई माता (छत्तीसगढ़ी में काली माता को बिलाई माता कहता होगा) भी चले गए। लोग यहां नवरात्रि पर्व में बड़ी श्रद्धा से दर्शन करने जाते हैं। हम भी नौरात्रि (दुर्गा पर्व) में गए थे, इसलिए वहां बहुत भीड़ थी, लोग एक-दूसरे को धक्का-मुक्की कर रहे थे।

जैसे-तैसे मंदिर में हम लोग भी प्रवेश किए। बहुत से लोग मंदिर की दीवारों पर सिक्का चिपकाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है ऐसा मानते हैं, इस मंदिर में भी ऐसी मान्यता है। इसलिए यह मंदिर मुझे आज भी याद है। अब पता नहीं कैसा होगा। मंदिर के पीछे अलग दीवार थी, दीवार पर एक चौकोन और गड्ढों पर बहुत से सिक्के चिपके हुए थे और दीवार का रंग भी हल्का काला हो गया था। कुछ लोग बड़ी श्रद्धा से अपनी जेब से सिक्का निकालकर सावधानी से दीवार पर चिपका रहे थे।

नहीं चिपकने पर लोग हो रहे थे परेशान

मेरे साथ गए लोग भी एक-एक करके सिक्का चिपकाने लगे। किसी ने एक रुपया तो किसी ने पांच रुपए का सिक्का चिपकाकर गर्व महसूस कर रहे थे। तो कोई निराश थे, क्योंकि सिक्का उसके हाथ से दीवार पर चिपका नहीं था। जिसके हाथ से सिक्का दीवार पर चिपक गया वे व्यक्ति अपने आप को शुभ, पुण्यात्मा, भाग्यशाली और मनोकामना सिद्धि व्यक्ति मान रहे थे। वहीं जिसके हाथों से सिक्का नहीं चिपका वे खुद को अशुभ, अभागे और मनखोटी समझने लगे। 

सभी सिक्के पुजारी कर लेता है अंदर

लोग कहते हैं कि अगर सिक्का दीवार पर चिपकता है या नहीं चिपकता है, दोनों स्थिति में सिक्का को उठाकर जेब में नहीं डालना है, चाहे कितने बड़े सिक्के हो। अगर बच्चे उस सिक्के को उठाता है तो उसे मना करना होता है। इसे कोई भी नहीं उठा सकता। अब आप सोच रहे होंगे कि इस प्रकार तो बहुत से सिक्के हर रोज उसी स्थान पर इक्कठे हो गए होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। उस सिक्के को कुछ समय के बाद पुजारी अंदर कर लेता है।

क्या यह सच में भाग्य मापने का यंत्र है?

मैं घर पहुंच कर बहुत दिनों से इस मंदिर के बारे में सोचता था, क्या यह सच में भाग्य मापने का यंत्र है? किसी के भाग्य सिक्का से कैसे पता चलेगा? फिर सोचता था आखिर सिक्का दीवार पर क्यों चिपका! घर की दीवारों में भी सिक्का चिपकाकर देखता था, चिपक ही नहीं रहा था। एक दिन अचानक से दरवाजे से लगी दीवार पर एक सिक्का चिपक गया। मैं बहुत खुश हुआ। मुझे लगा मैं ईश्वर को खोज लिया हूं। इस खुशी को पूरा घर में सभी को बांटा। सभी लोग आश्चर्य हो गए।

तेल की वजह से चिपकता है सिक्का

बहुत सोचने के बाद पता चला कोई ईश्वर नहीं, बल्कि तेल का कमाल है। मेरे दादाजी हर रोज सोने से पहले फल्ली तेल को अपने हाथ पैर में चिकचिक से लगाने के बाद सो जाता था और कुछ ही समय के बाद उठकर हाथ से दीवार का सहारा लेकर दरवाजे खोलता था। हाथ के तेल दीवार पर लग जाता था। बहुत दिनों से दीवार पर तेल और धूल लगने से उसमें थोड़ा चिपचिपा आ गया था। इसीलिए सिक्का दीवार पर चिपक जाता था।

मंदिर में भी तेल के कारण से चिपचिपाहट

इसी प्रकार से मंदिर की दीवार पर भी दीया जलाने का तेल समय-समय में लगाया जाता है, जिससे चिपचिपाहट बनी रहे, इसी कारण सिक्का दीवार पर चिपक जाता था। जल्दबाजी या चिपचिपाहट न होने की जगह के कारण कुछ सिक्के नहीं चिपक पाता था। और लोग इसे श्रद्धा मान लेते थे, बहुत बड़ी शक्ति मान लेते थे।

अज्ञानतावश लोग चमत्कार पर करते हैं विश्वास*

आज भी लोग अज्ञानतावश चमत्कार पर विश्वास कर लेते हैं। जब तक उद्दीपक के कारण (वस्तु कैसे कार्य करता है) समझ नहीं आएगा तब तक चमत्कार लगेगा। इसीलिए साथियों आंख बंद करके विश्वास नहीं करें और अंधविश्वास जैसी बीमारी से मुक्ति पाएं।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

हिंदुओं को 4 बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाले बताएं पालेंगे कौन?


इसी प्रदीप मिश्रा को अंधभक्त सुनने जाते हैं। कुछ भी बोल दिया और ये लोग उसे मान लिए। कभी अपने दिमाग का उपयोग कीजिए और सोचिए एक लोटा जल से कोई समस्या का हल नहीं हो सकता। ना ही कोई बच्चा बिना पढ़े बेल पत्र के भरोसे पास हो सकता है। अब प्रदीप मिश्रा ने चार बच्चे पैदा करने की बात कही है। दो बच्चे अपने लिए एक बच्चा सनातन के लिए और एक बच्चा सेना के लिए कहते हुए चार बच्चे पैदा करने की बात कही। ऐसा बयान ज्यादातर सनातन धर्म में आते रहते हैं, लेकिन इसमें कुछ होना जाना नहीं। बस कथा वाचक को क्या है, जो भी मुंह में आए बक देता है।

हमारा देश जनसंख्या के नाम पर विश्व में प्रथम स्थान पर है। जरा सोचिए जनसंख्या अगर ज्यादा है तो हमें क्या नुकसान है। आप यह मत कहना कि मुस्लिम तो दो बीवियां रखता है, बच्चे भी ज्यादा पैदा करता है। मुझे पता है बहुत लोग बिना जाने-समझे ऐसी बातें करते रहते हैं। आप को एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। आप दो भाई और एक बहन हैं, आपके पिता के पास 20 एकड़ जमीन है, जब ये जमीन पिता से आप दोनों भाई और एक बहन के पास जाएगी तो कितनी-कितनी जमीन मिलेगी। वहीं 6 एकड़ के आस-पास। फिर आप चार बच्चे पैदा करेंगे तो चारों को बांटने पर डेढ़ एकड़ ही बचेगी। इस प्रकार की जमीन कम होती जाएगी। रहने के लिए जगह नहीं रहेगी और भीषण गर्मी का सामना करते हुए खाने-पीने के सामान में भी कमी होती जाएगी। मंहगाई बढ़ेगी। इस प्रकार न जाने क्या-क्या मुसीबतों से सामना करना पड़ेगा। चार बच्चे को पैदा करने से लेकर उसे जिंदा रखने के लिए मां-बाप को कितनी कठनाइयों का सामना करना पड़ेगा। आज एक बच्चा को पालना कठिन है तो चार बच्चे को पालना बहुत मुश्किल काम है। बच्चे के खाने-पीने, कपड़े, दवाइयां, पढ़ने के लिए अच्छा स्कूल, अच्छी किताबें ये सब कौन देगा।

हां मुफ्त में कुछ नहीं मिलेगा, सब झूठा वादा है, सत्ता पाने के लिए। असल में मुफ्त तो धर्म के ठेकदारों और सत्ता सुख भोगने वालों को मिलता है। उसकी नकल आम जनता नहीं कर सकती है। महंगाई तो आम जनता को जीने नहीं दे रही। मजदूर और किसान को कड़ी धूप में मेहनत करने के बाद दो वक्त की रोटी मिल पा रही है। धर्म के ठेकेदार चार बच्चे पैदा करने को कहकर इनके मजाक बना रहे हैं। खुद तो एक-दो बच्चे या बच्चे ही पैदा नहीं करते और दूसरों को चार बच्चे पैदा करने की बात कहकर देश के मुफलिसों से मजाक कर रहे हैं। चार बच्चे पैदा करने पर इन बच्चों का पालन-पोषण कौन करेगा। हिन्दूओं में ही बहुत से लोगों का चार से आठ बच्चे हैं। कभी सनातन हिन्दू कहने वालों को उन बच्चों को देखकर इन पाखंडियों के मन में कुछ दया आया होगा। ज्यादा बच्चे रखने का दर्द क्या होता है उन माता-पिता से पूछिए जो अपने परिवार के पेट भरने के लिए दिन और रात जद्दोजहद कर रहे हैं। उनके पास न तो ठीक से तन ढ़कने के लिए कपड़े है और न हीं धूप, ठंड और बारिश से बचने के लिए छप्पर है। इनके दर्द को समझने का प्रयास कभी सनातन ने नहीं किया? 

-मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

भाग्य और भगवान भरोसे ये कैसी जिंदगी


जिंदगी में कठिनाई है, लेकिन इसे भगवान भरोसे छोड़ी नहीं जा सकती। मुसीबत क्यों आई है इसे समझना होगा, फिर संकट से निकलने के लिए हाथ-पैर मारना होगा। तब कही जाकर परेशानी दूर हो पाएगी। भगवान भरोसे चलकर कोई भी व्यक्ति मुसीबत से नहीं निकल पाए है, इसलिए कहते हैं भगवान भरोसे मतलब जिसका कोई भरोसा नहीं। इसके भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार कई लोग किस्मत और भगवान भरोसे बैठ जाते हैं। फिर क्या बाद में इन्हें पछताना पड़ता है और ऐसे लोग असफल होने के बाद भी खुद को दोषी नहीं मानते, बल्कि अपनी किस्मत को कोसते चुप बैठ जाते हैं. कामचाेर लोग कहने लगते हैं कि किस्मत में यही लिखा था और भगवान की यही मर्जी थी। ऐसा कहकर अपनी गलती और आलस्य को छुपा लेते हैं। यह कभी नहीं कहता कि मैं समय रहते उस समस्या से निकलने की कोशिश नहीं की। हाथ में हाथ धरे बैठा रहा।

आप ही बताए अगर आपको मानसिक या शारीरिक रूप से थोड़ा सा भी अच्छा न लगे तब आप क्या करेंगे? क्या आप यह सोचकर कि जो किस्मत में लिखा है वहीं होगा या भगवान की यही मर्जी है बोलकर कुछ नहीं करेंगे? या तुरंत किसी विशेषज्ञ के पास जाकर दिखाएंगे? कितना भी कट्टर धार्मिक किस्मत में विश्वास करने वाला हो मुसीबत के समय मंदिर-मस्जिद में समस्या का हल नहीं खोजेगा, न ही भगवान भरोसे घर में बैठेगा। वह दौड़कर अस्पताल ही जाएगा और कहेगा बुरे वक्त में किस्मत ने साथ दिया तब बचा हूं, भगवान ने बचा लिया, नहीं तो मैं मर ही जाता। इसी को कहते हैं दोगलेपन।

ज्ञान के लिए स्कूल जरूरी, धार्मिक स्थल नहीं

जानकर व्यक्ति अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में इसलिए पढ़ने भेजते है, क्योंकि उसके बच्चे पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक वैगेरा बने। जब उनको भगवान और भाग्य में भरोसा है तो उनको स्कूल-कॉलेज की जरूरत ही क्यों? भाग्यवादी लोग तो कहते हैं कि भगवान के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता तो ऐसे लोगों को पढ़ने लिखने का क्या काम। उन्हें सोचना चाहिए कि किस्मत या भगवान ने चाहा तो हमें खुद-ब-खुद ज्ञान आ जाएगा। जिसको जो बनना होगा किस्मत ने चाहा तो बन जाएगा। किस्मत ने चाहा तो बिना परीक्षा के पास हो जाएंगे. ऐसे सोचने वालों को तो पढ़ने और परीक्षा देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

धार्मिक माहौल विवेक को कर रहा खत्म

इस मूर्खता का प्रभाव ज्यादातर गरीब लोगों में पढ़ रहा है। गरीब व्यक्ति आज शिक्षा से कोसों दूर है, अगर सरकारी स्कूल के भरोसे शिक्षा के लिए दाखिला हो भी जाता है तो उस बच्चे को बराबर क्लास लेने वाले टीचर नहीं मिलते। ऐसे में बच्चे दाल-भात तक सीमित हो जाते हैं। बच्चा अगर घर में पढ़ना भी चाहेगा तो आस-पास के वातावरण उसे पढ़ने नहीं देगा। इस समस्या से हर गरीब के बच्चे जूझते हैं। आस-पास का वातावरण पढ़ने योग्य नहीं मिलता है। दो वक्त की रोटी से अगर फुरसत मिल जाए तो धार्मिक क्रिया-कलाप उसे पढ़ने नहीं देता। सुबह उठते ही धार्मिक गाने के साथ ठन-ठन की आवाज में घंटी बजना चालू हो जाता है तो कहीं नमाज की आवाज सुनाई देती है। गणेश पर्व में ग्यारह दिनों के लिए गणेश पंडाल, दुर्गा पर्व में नौ दिन उपवास के साथ नंगे पैर चलकर पंडाल के आस पास भटकना और कानफाड़ू डीजे के शोर में नाचने का दौर चलता रहता है। सावन आते ही कवाड़ लेकर नंगे पैर बीच सड़क पर जोर-जोर से आवाज करते चलना। गरीब के बच्चे पढ़ना छोड़ दिवाली में जुआ और पटाखे के लिए पैसे इकठ्ठा करने दूसरों के घर की सफाई के लिए चले जाते हैं, घर वालों को भी लगता है कि बच्चा दिवाली के लिए पैसे एकत्र कर रहा है, इससे घर में कुछ तो सहयोग होगा।

प्राथना से नहीं पढ़ाई से होंगे बच्चे पास

इस प्रकार होली आते-आते पढ़ने का पूरा समय निकल जाता है। परीक्षा भी खत्म होने की स्थिति में रहती है। फिर परीक्षा के समय ऐसे छात्र दोस्तों से कहता फिरता है यार मेरी तो कुछ तैयारी ही नहीं हुई, टीचर ने ठीक से क्लास नहीं ली या सेलेबस पूरा नहीं किया। समय नहीं होने के कारण पढ़ नहीं पाया। घर वालों ने बहुत काम करवाया। यहां तक खेत में काम कराने भी ले गया वगैरह-वगैरह। बहुत से बच्चे को ऐसा भी लगता है कि भगवान ने चाहा तो उसे पास करा देंगे, इसलिए भी नहीं पढ़ता। माता-पिता पूजा-पाठ करते देख बच्चे भी भगवान से प्राथना करते हैं कि हे प्रभु पास करा देना नारियल के साथ लड्डू चढ़ाऊंगा।

भगवान भरोसे छात्र हो जाते हैं फेल

जब परीक्षा का रिजल्ट आता है तब फेल होते ही छात्र कहने लगता है कि किस्मत ने साथ नहीं दिया और भगवान ने धोखा दिया। बहुत पूजा-पाठ करने के बाद भी फेल हो गया। यही प्रभु की इच्छा थी। फेल होना मेरी किस्मत में थी इसलिए फेल हो गया आदि। यह नहीं कहता कि मैं मेहनत नहीं किया। किस्मत और भगवान भरोसे बैठा था या बहुत ज्यादा काम होने के कारण पढ़ाई नहीं कर पाया। इसीलिए किस्मत या भगवान भरोसे बैठने की बजाय मेहनत और ईमान पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

-टिकेश कुमार, अध्यक्ष एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

जमीं से आसमां तक विज्ञान का दखल, फिर भी अंधविश्वास का खलल



आज विज्ञान की सहायता से जमीन के अंदर को भी देख सकते हैं। मैं उस समय अचंभित हुआ जब मेरे घर के बोरवेल में केबल और एक तार नीचे गिर जाने के कारण मोटर पंप फंस गया था। हमें लगा कि इस ग्रामीण इलाके में बोरवेल से मोटर को निकाल पाना बहुत कठिन होगा। लेकिन जब मोटर पंप निकालने वाले आए तब सबसे पहले एक छोटी सी चीज को बैग से बाहर निकाला। इसमें लाईट भी जल रही थी और सेम टू सेम टार्च ही जैसा लग रहा था। इसे केबल के साथ बोरवेल के नीचे डालते गया। जिसके हाथ में मोबाईल था वह व्यक्ति केबल पकड़े व्यक्ति से कह रहे थे धीरे-धीरे नीचे जाने दें।

यह सब देख कर मैं उनसे पूछ पड़ा- भईया यह क्या है? नीचे जो केबल के साथ डाले हैं? उसके जवाब में आया- यह कैमरा है, जो नीचे केबल कितने दूर में फंसा है वो सब दिखाएगा। जिससे हमारा काम आसान हो जाएगा और हम उसी हिसाब से टोचन डालकर उसे निकाल लेंगे। यह सब सुनकर मेरे मन को खुशी मिली और मेरे मुंह से निकल पड़ा आप लोग इतने हाइटेक है भईया। चोवा भईया ने कहा हां समय के साथ चलना पड़ता है। फिर नीचे कैमरा डालकर देखने लगा। जिस मोबाइल से कैमरा कनेक्ट था उसमें अब स्पष्ट रूप से दिख रहा था।

सुरक्षित निकला मोटर पंप

कुछ समय के बाद वायर बोरवेल के अंदर दिखने लगा (यह वीडियो अपलोड कर दिया हूं) सच में केबल और मोटर को निकालने में बहुत आसानी हुआ। आखिरकार मेहनत रंग ला ही दिया और पूरा केबल और मोटर पंप सुरक्षित रूप से बाहर निकल गया। उसी मोटर और केबल को फिर से ठीक कर सेट कर दिया गया है। अब पहले जैसा चल रहा है।

तार्किक सोच के अभाव में उपज रहा अंधविश्वास

विज्ञान ने हमें इतना सब दिया है, इसके बावजूद लोग अंधविश्वास में पड़ जाते हैं। लोग अज्ञानता की वजह से सोचते हैं कि जादू-टोने करके बोरवेल से पानी रोक देता है, बोरवेल में मोटर को चलाने नहीं देता है या नीचे गिरा देता है और पूरा जमीन सुखा पड़ जाता है। लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान ने आज प्रगति की धीरे-धीरे जादू टोना का भ्रम दूर होता जा रहा है, फिर भी अभी लोगों के बीच में अंधविश्वास कम नहीं हुआ है। आज भी तार्किक सोच के अभाव में लोग काला जादू में विश्वास कर रहे हैं।

अंधविश्वास में लोग कर रहे विश्वास

जब मैं छोटा था उस समय गांव में ज्यादातर हेंडपंप ही चलता था। गांव में सरकारी बोरवेल खोदने के बाद पानी नहीं आता था तब लोहे का ढक्कन से ढक कर रख दिया जाता था। बच्चे के पत्थर मार-मारकर खेलने से ढक्कन खुल जाता था और बच्चे को बोरवेल के अंदर पत्थर मारने में मजा आता था, क्योंकि पत्थर के नीचे जाते ही उधर से धड़ाम से आवाज आती थी और ऊपर से आवाज करने पर नीचे भी वही आवाज रिपीट होती थी, जिससे लगता था नीचे कोई व्यक्ति या भूत होगा। ये तो बच्चे की बात है। यहां तो बड़े बूढ़े भी इस अंधविश्वास में विश्वास करते थे और अभी भी बहुत से लोग कर रहे हैं। लोग यह भी कहते हैं कि काला जादू से नीचे बोरवेल में पानी नहीं आने देता, तंत्र-मंत्र, जादू टोना से तांत्रिक पानी को पूरी तरह से बांध देता है। बोर सुखा पड़ जाता है और फसल बर्बाद हो जाती है। कई जगह तो यह भी सुनने में मिलता है कि बोर में दो साल तक पानी बढ़िया दिया फिर बंद हो गया, अब पानी ही नहीं आता।

धीरे-धीरे नीचे गिरता जा रहा जलस्त्रोत

आज जगह-जगह बोरवेल होने के कारण जमीन में पानी का लेवल या स्रोत कम होता जा रहा है, इसलिए कुछ साल चलने के बाद बोर में पानी आना बंद हो जाता है, मतलब बोर में पानी के स्रोत कम हो गया है। बोर सुखा है, उसमें तंत्र-मंत्र या जादू टोना से पानी लाने की बात झूठ है। तांत्रिक नींबू को मंत्र कर के बोरवेल में डालने के बाद फुल पानी आने का दावा करके लोगों को ठगता है। तांत्रिक के नींबू को बोरवेल में डालते ही धड़म की आवाज आती है, यह आवाज बोरवेल में पानी होने के कारण आती है। इसी को प्रेत-आत्मा के बाहर निकलने की बात कह कर तांत्रिक बोरवेल मालिक को लूट कर चला जाता है।

बेहतर समाज बनाने के लिए करें प्रयास

लोगों में जागरूकता लाने और अंधविश्वास से मुक्ति के लिए हर तर्कशील व्यक्ति को आगे आने की जरूरत है। हर अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़िवाद को चुनौती देने की जरूरत है, जिससे समाज को बेहतर बनाया जा सकें।

-टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

आडंबर और अंधविश्वास के अंधेरे में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले गुरु घासीदास


'मंदिरवा म का करे ल जइबो, अपन घट के देव ल मनइबो, पथरा के देवता ह हालत हे न डोलत, अपन मन ल काबर भरमइबो' (मंदिर में क्या करने जाएंगे, अपने हृदय के अच्छे विचारों को मानेंगे, पत्थर के देवता हिलता-डुलता नहीं है, अपने मन को क्यों भ्रमित करेंगे) इस बात को घासीदास जी उस समय कहा जब वे जगन्नाथ पुरी के यात्रा में जा रहे थे। उसके बाद आधे रास्ते से सारंगगढ़, रायगढ़ से वापस हो गए। और उन्होंने कहा कि मंदिर में क्या करने जाएंगे। जो अपनी खुद की रक्षा नहीं कर सकता वह क्या मनुष्य की सुनेगा। हम लोग कितने बड़े मूर्ख हैं, पत्थर की पूजा करते हैं जो कुछ बोल नहीं सकता है, न चल सकता है, न खा सकता है, न पी सकता और न उठ-बैठ सकता है। उसके तीर्थ जाकर हमलोग अपने समय और धन को नष्ट कर रहे हैं। 

इस प्रकार के अंधविश्वास, रूढ़िवाद और परंपरावाद के खिलाफ जोरदार विरोध किए। घासीदास जी ने मूर्ति पूजा कभी नहीं करने की बात कही और लोगों को अपने मनोबल को बढ़ाने की अपील की। इसके लिए उन्होंने कहा कि अपने हृदय के अच्छे विचारों को मानेंगे, मन से बढ़कर के कुछ देवता नहीं है। हम लोग पत्थर की पूजा करते हैं। ये हमारी मानसिक बीमारी है, मन को पूजा-पाठ और पाखंड से दूर रखकर कर्म और मेहनत में विश्वास करें।

घासीदास जी समानता की बात भी कही। उसका कहना है कि मनखे-मनखे एक समान (मानव-मानव एक समान)। अरे भाई सभी मनुष्य एक बराबर है, जाति-धर्म के भेद को बनाकर क्यों लड़-मर रहे हो। गुरु घासीदास ये सब इसलिए कहा क्योंकि वे खुद इस पीड़ा को भोग चुके थे। गुरु घासीदास जी का जन्म 18 दिसंबर 1756 में छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले (वर्तमान में बलौदा बाजार-भाटापारा जिले) के गिरौदपुरी गांव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। 

उस समय में गरीब कमजोर के ऊपर बहुत शोषण और अत्याचार होते थे। अपने आप को उच्च जाति कहने वाले पाखंडी लोग कमजोर मनुष्य को शिक्षा और सार्वजनिक जगहों से दूर रखकर अपमानित करने के लिए नीच जाति कहते थे। इस पीड़ा को देखकर घासीदास जी सतनामी पंथ बनाए। दबे-कुचले मनुष्य को इकठ्ठा किए और कहा कि ये सब अपने आप को उच्च जाति समझने वालों और जाति-धर्म के नाम पर धंधा करने वालों की चाल है। जो आडंबर में फंसाकर शोषण और अत्याचार करते हैं, इसीलिए तुम लोग पोथी-पुराण और पत्थर पूजा में मत उलझो और सत्य को जानो और मानो। 

जो दिख रहा है उस पर भरोसा करो, काल्पनिक बात के खुल कर विरोध करो। जो यथार्थ को मानेंगे, वहीं सतनामी कहलाएंगे। इस प्रकार के दलित-शोषित वर्ग को इकट्ठा करके समाज में बहुत बदलाव किए, तब जाकर शोषित-पीड़ित लोगों को सम्मान मिल पाए। पिछड़ा वर्ग के मनुष्य के लिए घासीदास जी मसीहा हैं। जो वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशील विचारों को फैलाकर आडंबर के पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाए। गुरु घासीदास जी अंधविश्वास और रूढ़िवाद के घोर अंधेरे में ज्ञान का प्रकाश कर नया सबेरा लाए।

लेखक- गनपत लाल (छत्तीसगढ़ी से हिंदी अनुवाद- टिकेश कुमार)

Wednesday, 22 November 2023

क्या कोई लगातार चार महीने तक सो सकता है ?


हमारे देश में कई प्रकार की मनगढ़त और उटपुटांग कहानियां बहुत दिनों से चली आ रही हैं। एक पौराणिक कहानी में बताया गया है कि आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष के एकादशी में भगवान विष्णु और सभी देवी-देवता सो जाते हैं। इसे पुरोहित लोग देवसुतनी एकादशी कहते हैं। इसके बाद चार महीने के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष के एकादशी में विष्णु और सभी देवी-देवता भरभराकर उठ जाते हैं। इसे पूजा-पाठ के नाम पर मुफ्त खाने वाले लोग देवउठनी एकादशी कहते हैं।

वैसे तो हमारी पौराणिक कहानियों में ऐसी-ऐसी काल्पनिक बातों की भरमार है, जो असल जिंदगी में कभी नहीं हो सकता। अब आप ही बताइए कि कोई भी व्यक्ति बिना खाए-पीए लगातार चार महीने तक सो सकता है? ऐसे ही रावण के छोटे भाई कुंभकरण को लेकर कहा जाता है कि वह छह महीने तक सोता था, यह भी संभव नहीं है। अभी तक धरती में इस प्रकार का प्राणी की खोज नहीं हुई जो लगातार छह महीने तक सोए और जगने के बाद लगातार छह महीने तक खाना खाते रहे।

लोगों को काल्पनिक बातों और कहानियों में उलझाकर रखने वाले पंडा-पुरोहित बताते हैं कि देवसयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक यानी चार महीने भगवान विष्णु सयन अवस्था में होते हैं और इस समय में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। वहीं दूसरी ओर इसी चार महीने के भीतर व्रत-त्योहार, पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड की भरमार रहती है। जैसे गणेशोत्सव, नवरात्री, दशहरा, दीवाली और कई प्रकार के त्योहार होते हैं। जब देवी-देवता सोए रहते हैं, तभी लोग भारी आवाज में लाउड स्पीकर बजाकर और पटाखे के धमाके के साथ पूजा-पाठ कर क्यों डिस्टर्ड करते हैं? 

सोए हुए देवी-देवता को परेशानी हो या न हो, लेकिन लाउड स्पीकर और पटाखे से स्कूल-कालेज में पढ़ने वाले बच्चे जरूर परेशान होते हैं। तेज आवाज की वजह से अस्पताल में भर्ती मरीज को तकलीफ होती है और कई दम भी तोड़ देते हैं। इसी चार महीने के भीतर नदी और तालाब में देवी-देवताओं की मुर्तियों को लोग डूबो देते हैं। क्या पानी में डूबोने से देवी-देवता की नींद नहीं खुलती हाेगी? काल्पनिक भगवान की नींद उड़े या न उड़े, लेकिन जल स्त्रोत पूरी तरह से प्रदूषित हो रहा है। लोगों के लिए पीने और उपयोग करने के लिए पानी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। वहीं जलीय जीव-जंतु धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं।

- गनपत लाल

Saturday, 23 September 2023

मेहनत करे कोई, जेब भरे कोई


खेत में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी किसान के हाथ में कुछ पैसे नहीं बचता, सब बराबर हो जाता है। कई बार खराब मौसम के कारण फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे किसान के पास खाने के लिए भी नहीं रहता और अलग से कर्ज में डूब जाते हैं।

मौसम सही-सही रहा तो फसल बढ़िया पैदा हो जाती है, लेकिन फिर संकट आ खड़ा होता है। फसल का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता। जिससे फसल को पानी से भी कम मूल्य में बेमन बेचना पड़ता है। फिर वही फसल पूंजीपति स्टोर कर के रख लेता है, जब किसान के पास वह फसल नहीं होता। किसान पूरी फसल को बेच चुके होते हैं तब उस फसल का बाजार में अधिक मूल्य हो जाता है, इससे आम जनता को मंहगाई का सामना करना पड़ता है। शहरी लोगों को लगता है दाल-चावल, गेंहू, सब्जी जो किसान उतपन्न करते हैं उसका मूल्य बढ़ा है तो किसान को फायदा हो रहा है। कुछ लोगों को ऐसा भी लगता है किसान ही ये सब का दाम बढ़ा दिया है, जिससे महंगाई बढ़ गई है। और सब्जी बेचने वालों से मोलभाव करने लगते हैं।

जिसने कभी मेहनत नहीं की और खेती नहीं की उन सभी लोग आज देश में ऐशोआराम कर रहे हैं, मुफ्त में खा रहे हैं। मेहनत करने वालों के खून-पसीने की कमाई खा रहे हैं। जिसमें हमारे राजनेता पहला स्थान पर है। एक विधायक की सैलरी और पेंशन पूरा देश कंगाल हो गया है। मेहनत करने वालों से कहता है कि गरीब जनता को मुक्त में चावल दे रहे हैं। उस नेताओं से पूछना चाहिए कि कौन से खेत में फसल लगाया था? कहां मेहनत किया था या कौन से अपने बाप- दादाओं के घर से लाए। नेताओं के चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों के बाद इतने पैसे आ जाते हैं जिससे उसके कई पीढ़ी बैठकर खा सकती है। इतने पैसे कौन सी मिट्टी में पैदा किया उसका जवाब जनता को मांगना चाहिए। सब सुविधा नेताओं और अधिकारियों के पास है।

मेहनत करने वाली जनता से मूलभूत आवश्यकताओं को भी छीन लिया है। और जनता आज अंधविश्वास की अफीम के नशे में चुर होकर जी रही है। जिस देश और समाज में अंधविश्वास और नशे की तल हो वहां के लोगों को सही गलत कुछ नहीं दिखता और मूर्ख को भी सत्ता का ताज पहना देता है। इसलिए सरकार कभी नहीं चाहती कि जनता होशियार बने और अंधविश्वास व नशे से दूर रहे। सरकार लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं चाहती।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

Thursday, 21 September 2023

गणेशोत्सव का इतिहास और हमारा समाज


देशभर में गणेशोत्सव की धूम है, लेकिन आप अपने विवेक के साथ सोचिए क्या गणेश की कहानी सत्य हो सकती है। मुझे तो यह पूरी तरह काल्पनिक लगती है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मैल से कैसे पैदा हो सकता है। इस कहानी में एक महिला (पार्वती) अपने शरीर की गंदगी से बच्चा बना देता है और वह कुछ समय में इतना बड़ा हाे जाता है कि महिला के पति (शंकर) भी नहीं पहचान पाता है। जब वह बच्चा (गणेश) शंकर को घर के अंदर प्रवेश करने पर रोकता है तो शिव शंकर गुस्से से गणेश का सिर काट कर धड़ से अलग कर देता है। जब गणेश की मां पार्वती देखती है तब शंकर पर क्राधित होकर कहती है- ये क्या अनर्थ किया तुमने अपना ही पुत्र को मार दिया। इसे जिन्दा करना होगा, नहीं तो हम सभी देवी मिलकर पूरी सृष्टि को नष्ट कर देंगे।

तब सभी देवता चिंतित होकर शिव से इस समस्या का समाधान करने को कहते हैं। फिर शंकर देवों को आज्ञा देता है कि दूसरे नवजात शिशु का सिर काट कर लाए। कोई नवजात शिशु नहीं मिलता तो हाथी का बच्चा का सिर काटकर ले आते हैं और उसे गणेश के मृत शरीर में जोड़ देता है और गणेश पुनः जीवित हो जाता है। इस प्रकार की काल्पनिक कहानी पाखंडी लोग गढ़ दी है और भोली-भाली जनता इस कहानी को सत्य मानकर नकली भगवान की पूजा कर रहे हैं।

पूरी तरह से अवैज्ञानिक और काल्पनिक

वैज्ञानिक दृष्टि से देखे तो कोई भी व्यक्ति के शरीर पर किसी भी जानवर का सिर नहीं जोड़ा जा सकता है। यहां तक जानवर के खून को मनुष्य के शरीर में नहीं डाला जा सकता है। मनुष्य के खून को दूसरे व्यक्ति के शरीर में डालने से पहले कौन सा ब्लड ग्रुप है उसकी सावधानी से जांच की जाती है, जब संभव हो तब खून को निकालकर बीमार व्यक्ति के शरीर में डाला जाता है।

हाथी का सिर और मनुष्य का धड़ को जोड़ना असंभव

चलो मान लेते हैं उस समय अज्ञानता के कारण बिना सोचे समझे हाथी का सिर गणेश के शरीर में जोड़ने का प्रयास किया होगा। लेकिन हाथी का सिर मनुष्य का सिर से बहुत बड़ा होता है, अगर तुरंत जन्म लिया हुआ हाथी का सिर भी एक मनुष्य का बच्चा में फिट किया जाए तो आकार में हाथी का सिर बड़ा होने के कारण सर्जरी करना असंभव है।

सभी देवी-देवता मनगढ़त कहानी

इसके अलावा और भी कई सवाल है। जैसे कोई भी व्यक्ति के चार हाथ कैसे हो सकते हैं? बहुत से देवी-देवताओं की तस्वीरों और मूर्तियों में आपने देखा होगा चार हाथ वाला दिख ही जाएगा। जिसमें एक गणेश की मूर्ति भी शामिल है। दुनिया में आज तक किसी मनुष्य को चार हाथ के नहीं देखा या पाया गया। सभी मनुष्य दो हाथ के ही है। इस प्रकार के चार हाथ और चार मुंह के भगवान काल्पनिक नहीं तो और क्या?

अब ये मत कहना कि भगवान के लिए कोई असंभव नहीं। भगवान पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए। ठीक है, मान लेते हैं भगवान बहुत शक्तिशाली है उसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं है, तो आप बताएंगे कि शक्तिशाली, सर्वज्ञानी ईश्वर अपने ही पुत्र को क्यों नहीं नहीं पहचान सके। एक बच्चा गणेश जब शंकर को रोकता है, जिससे शिव क्रोध में आकर बच्चा को मार देता है, इतना क्रोधी है भगवान। उस समय उसकी बुद्धि कहां चली गई थी।

क्रोधित व्यक्ति को कैसे कह सकते हैं भगवान

इतना क्रोधित थे शिव कि गणेश को इतना बेरहमी से मारा जिससे उसका सिर पूरा नष्ट हो गया। जब भगवान है तो गणेश का नष्ट सिर को वापस भी ला सकता था, उसके लिए नामुमकिन नहीं होना चाहिए था। क्या जरूरत थी बेजुबान हाथी का बच्चा का सिर काटकर हत्या करने की? और वह भी तो किसी का बच्चा है। अपना स्वार्थ के लिए दूसरे का बच्चा (चाहे कोई जानवर ही क्यों न हो) उसकी बलि देना गलत है। इसे कैसे भगवान कह सकते हैं?

गणेशोत्सव की शुरूआत कैसे हुई

गणेशोत्सव या गणेश पूजा की शुरूआत महाराष्‍ट्र से हुई है। कहा जाता है कि गणेशोत्‍सव की नींव आजादी की लड़ाई के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने रखी थी। 1894 में स्‍वतंत्रता संग्राम के दौरान तिलक पुणे में गणेश की मूर्ति स्थापित की। 10 दिन तक खूब पूजा-पाठ हुआ। बताया जाता है कि 11वें दिन जब गणेश की मूर्ति की यात्रा निकाली गई तो एक दलित व्यक्ति ने उसे प्रणाम करने के लिए छू दिया। इतने में ब्राम्हणों ने कहा कि गणपति अपवित्र हो गया। सभी पुजारियों ने गंगाधर तिलक को गरियाते हुए कहने लगे कि देखा, गणपति को सार्वजनिक किया, तो धर्म डूब गया। अब कौन ब्राह्मण इस मूर्ति को अपने घर में रखेगा ? तभी तिलक ने कहा, अरे चिल्लाते क्यों हो ? शांत रहो मैं धर्म को डूबने कैसे दूंगा ? धर्म को डुबोने की अपेक्षा हम इस अपवित्र मूर्ति को ही डुबो देते हैं और इस प्रकार गणपति की मूर्ति को डुबो दिया गया। इसी दिन से यह गणेश विसर्जन का रिवाज चल पड़ा। यह पूरी तरह से शूद्रों का अपमान है, लेकिन यहीं शूद्र (SC, ST, OBC) बड़े हर्षोउल्लास के साथ अपना अपमान का त्योहार मनाते हैं।

मेहनत, समय, धन और प्रकृति की बर्बादी

गणेश की मूर्तियों को बनाने में बहुत ही ज्यादा समय, धन और मेहनत लगते हैं। बड़ी-बड़ी मूर्तियों को खरीदकर नदी में बहाने से समाज का कोई कल्यान नहीं होता, बल्की देश और लोगों की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाती है। अगर इसी पैसों से लोग अपने घर और समाज के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत चीजों पर खर्च करते तो उनका बेहतर विकास होता। बड़ी-बड़ी मर्तियों से तालाब, नहर, नदियां और अन्य जल स्त्रोत पूरी तरह से बर्बाद होते जा रहे है। भगवान और धर्म की आड़ पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। गणेशोत्सव के दौरान पूरे 11 से 15 दिनों तक सड़कों पर धर्म की आड़ पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया जाता है। 

जागरूक लोगों को लेनी होगी जिम्मेदारी

भगवान के नाम पर जोर-जोर से कानफोड़ू डीजे बजाया जाता है। यह आवाज सुनकर अगर भगवान होता तो आत्महत्या कर लेता। डीजे पर अश्लील गाने बजाते हुए भक्त गांजा, भांग और शराब के नशे में झूमते नजर आते है। सड़क पर कोई लड़की मिल जाए तो ये छेड़छाड़ करने में उतारू हो जाते हैं। इस प्रकार धर्म के नाम पर सड़क पर नगा नाच जारी है। शासन-प्रशासन पूरी तरह से आंख और कान बंदकर अपाहिज की तरह मौन है। सरकार को वोट बैंक की चिंता है, इसलिए जनता को धर्म की अफीम देकर मस्त है। सभी नेता भोली-भाली जनता को धर्म और भगवान जैसी काल्पनिक बातों पर उलझाकर सत्ता की मलाई खा रहे हैं। अब जागरूक लोगों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी और अपने समाज को विवेकवान बनाना होगा, तभी यह भेड़िया धसान खत्म होगी और हमारी पीढ़ी बेहरत होगी।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

Thursday, 14 September 2023

भीड़ के पीछे भेड़िया धसान चल रहे लोग


आज भीड़ का दौर चल रहा है। जिधर भीड़ जा रही है, उधर लोग भाग रहे हैं। लोग समझते हैं कि बहुत लोग (भीड़) उस दिशा में जा रहे हैं तो यही रास्ता सही है या बहुत से लोग मान रहे हैं तो यही सही है। इस प्रकार लोग भीड़ के साथ चलने लगता है। कभी यह नहीं सोचता कि जिस भीड़ के साथ चल रहा हूं क्या वह सच में सही है? आगे खाई में तो डूबा तो नहीं देगा? ऐसा सवाल कभी नहीं आता बस भीड़ चल रही है तो हम भी चले, बहुत से लोग गलत नहीं हो सकता। ऐसा सोचकर भीड़ के साथ चलने लगता है। संत कबीर ने सही कहा है "कैसी गति संसार की ज्यों गाडर की ठाट, एक परा जो गड्‌ढे में, सबै गड्‌ढे में जात।"

व्यक्ति पर भीड़ डातली है दबाव

ऐसा कदापि नहीं है कि भीड़ गलत नहीं हो सकती। भीड़ गलत हो सकती है। इसका प्रमुख कारण सत्ताधारी शोषकों का डर है। क्या पता सही को सही कहे और आपको सत्ता में बैठे लोग दंडित कर दे। इसलिए हर व्यक्ति अपना बचाव चाहता है। मुंह बंद करके भीड़ के साथ ही चला जाता है। इस भीड़ से एक दो व्यक्ति अगर निकलकर सत्य को उजागार करना चाहे तो उसकी मुंह बंदकर दी जाती है, उस व्यक्ति पर भीड़ अपने साथ चलने के लिए दबाव डालती है।

एक उदाहारण

स्कूल की क्लास में बहुत से बच्चे उपस्थित थे। हर गुरुवार की तरह आज भी सरस्वती की पूजा करने के लिए तैयारियां चल रही थी। इसमें एक बच्चा शांतिपूर्ण पढ़ाई कर रहा था। कुछ समय के बाद जब पूजा की सभी तैयारी हो गई तो सभी बच्चे टेबल से उठकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए। लेकिन एक छात्र जो शान्तिपूर्ण पढ़ाई कर रहा था वह पढ़ ही रहा था, टेबल से उठने का नाम नहीं लिया। तब सभी बच्चे उस बच्चे को ऐसा देखते रहे जैसे कोई अपराधी क्लास में आ बैठा हो। सभी को देखकर वह छात्र भी टेबल से उठकर खड़ा हो गया। तब जाकर जोर-शोर से पूजा चालू हुई। ऐसे बहुत से उदाहारण हमारे दिनचर्या में रोज घटित होते हैं, जहां भीड़ व्यक्ति को दबा देती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के नाते भीड़ में दबकर रह जाता है, वहां से निकल नहीं पाता।

भीड़ के पीछे न चले

अपना रास्ता खुद ढूंढें, सत्य क्या है? इसे जानने की कोशिश करें। लोग जा रहे हैं तो क्यों जा रहे हैं, आगे कहां तक जाएगा। उसके साथ हम क्यों चले? अपना विवेक से सोचें। तभी देश और समाज का भला हो सकता है, नहीं तो अंधविश्वास के अंधेरे में डुबकी लगाते रह जाओगे।

- टिकेश कुमार

क्या विज्ञान की तरक्की से अंधविश्वास खत्म हो रहा है?


आज विज्ञान का प्रकाश सभी तरफ तेजी से फैल रहा है, लेकिन क्या इस आधुनिक कहे जाने वाले समाज से अंधविश्वास का अंधेरा खत्म हो रहा है? यह सवाल अंधविश्वास से छुटकारा पाने वाले हर एक व्यक्ति के मन में उठ रहा होगा। मैं बताना चाहूंगा कि अंधविश्वास बहुत ही खतरनाक जानलेवा है, जिसमें हर धार्मिक परिवार किसी न किसी पाखंड, अंधविश्वास में फंसा हुआ है। इस अंधविश्वास की समस्या से समाज हजारों साल से तड़प रहा है। आये दिन अंधविश्वास से लोगों की मौत हो रही है।

घटना का कारण पता नहीं होता तब तक चमत्कार

मनुष्य में किसी घटना को लेकर ज्ञान नहीं रहता तब तक उस घटना में चमत्कार लगता है। जब उस घटना के कारण को समझने लगते हैं तब धीरे-धीरे चमत्कार खत्म हो जाता है। उस चमत्कार से होने वाला अंधविश्वास भी नष्ट हो जाता है। इसलिए हर घटना के कारण को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करना चाहिए। जिससे हम और हमारा समाज चमत्कार को नमस्कार न करें और अंधविश्वास से मुक्त रहें।

विज्ञान और अंधविश्वास की लड़ाई

विज्ञान के आने से अंधविश्वास बहुत कमजोर पड़ जाता है। कुछ ऐसा अंधविश्वास जो धर्म से अछूते है खत्म हो जाता है, लेकिन जहां धार्मिक अंधविश्वास की बात आती है वहां अंधविश्वास को खत्म करना अंधों को आईना दिखाने जैसा है। इतिहास गवाह है- धर्मग्रंथों के हिसाब से पूरी दुनिया में ये अवधारणा प्रचलित थी कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है। निकोलस कोपलनिक्स ने धार्मिक अवधारणा के उलट कहा कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, तब उनका बहुत विरोध हुआ। कोपलनिक्स के निधन के बाद जब गैलीलियो ने उस थ्योरी को सार्वजनिक करते हुए बताया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है तब गैलेलियो को पूरी जिंदगी नजरबंद रखा गया।

विज्ञान को विरोध का सामना

विज्ञान को धार्मिक विरोध का सामना करना पड़ता है, चाहे कितना भी वैज्ञानिक मत रख ले, फिर धीरे-धीरे वही धर्म को मनना पड़ा कि वैज्ञानिक खोज ही सत्य है। ऐसा गैलीलियो के साथ भी हुआ पहले विरोध हुआ फिर तीन सौ सालों बाद धार्मिक चर्च को माफी मांगते हुए गैलीलियो की थ्योरी को सत्य मनाना पड़ा और आज हम सब पढ़ते है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।

लोगों को वैज्ञानिक चेतना की जरूरत

आज वैज्ञानिक चांद पर जा चुके हैं और सूर्य के लिए भी यान भेज चुके हैं, लेकिन अंधविश्वास से समाज नहीं निकल पा रहा है। विज्ञान जितना तरक्की करें, लेकिन अंधविश्वास को खत्म करने के लिए लोगों को वैज्ञानिक चेतना की जरूरत है, तभी देश और समाज अंधविश्वास से निकल सकते हैं। एक अंधविश्वास खत्म होता है तो दूसरा अंधविश्वास का जन्म होता है, ऐसा ही चलता रहता है। कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ के लिए अंधविश्वास को फैलाते हैं, जिससे उसका घर-परिवार चल सकें। इसके लिए हर एक तर्कशील व्यक्ति को पाखंडी तांत्रिक के कथित चमत्कारों को वैज्ञानिक जांच पड़ताल कर के खंडन करने की जरूरत है।

- टिकेश कुमार