Sunday, 12 March 2017

होलिका दहन या पर्यावरण दोहन

देश भर में परम्परा के नाम पर पर्यावण के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। जागरूक नागरिक भी होलिका दहन के लिए जंगल और अन्य जगहों से लकड़ी इकठ्ठा कर जलाते हैं। आज धीरे-धीरे जंगल का नाश होता जा रहा है। वहीँ कई प्रकार के जीव-जंतु विलुप्त होते जा रहे हैं। पेड़-पौधे और हरियाली का नामो निशान नहीँ है। फिर भी हम क्यों पर्यावरण और खुद का नुकसान करने के लिए अड़े हुए है। गांव हो या शहर सभी गली चौक चौराहों पर होलिका दहन करके हम खुशियां मनाते हैं। जिसके लिए कई पेड़ों की बलि देनी पड़ती है। वही लकड़ी जलने से वायु भी दूषित होती है। जिससे फेफड़ो से सम्बंधित कई बीमारी का खतरा होता है। वही जली हुई राख तालाब और नदी में जाकर पानी को भी खराब करती है।
एक बात और समझ नहीँ आती कि हम कुछ दिन पहले 8 मार्च को महिला दिवस मना कर महिलाओं का सम्मान की बात करते है। लेकिन होलिका (महिला) को जला कर हम ख़ुशी मनाते हैं। ये कैसा समाज है ? इससे आने वाली पीढ़ी को हम महिलाओं के प्रति नफरत का संदेश देते हैं। हमे इस पुरानी रूढ़ि-परम्परा को खत्म कर पर्यावरण और समाज को बचाना होगा। क्यों न हम अब होलिका दहन बन्द करके होलिका चमन के नाम से पेड़ लगाए और महिलाओं के लिए प्रेम का संदेश दे कर हरियाली फैलाए।

Tuesday, 7 March 2017

आवाज

सभी जगह हो रहे हैं महिलाओं पर अत्याचार
कही भी सुरक्षित नहीँ
स्कूल, कालेज, गली, मोहल्ले, बाजार
कही दहेज की मांग
कही शोषण और बलात्कार
अब आ रही है आवाज
मांग रही है महिलाएं अपना अधिकार

महिलाओं ने खाई है कसम
पूरा हक लेकर ही लेगा दम
ये लड़ेगी नहीं रूकेगा कदम
बुराई का दुश्मन, अच्छाई का हमदम
अब आ रही है आवाज
मांग रही है महिलाएं अपना अधिकार।

Friday, 3 March 2017

आजादी

हमको चाहिए आजादी
देश के दलालों से 
मजदूर-किसान के 
खून चूसने वालों से 
अशांति और दंगा से 
जाति-धर्म के पंगा से

भ्रष्ट सरकार से 
महंगाई की मार से 
भक्षक हवलदारों से 
देश के गद्दारों से 
हमको चाहिए आजादी

गरीबों की भूख से 
अशिक्षा के दुःख से 
युवाओं की बेरोजगारी से 
नफरत की बमबारी से 
हमको चाहिए आजादी।

स्कूल बंद, दारू दुकान चालू

सरकार को शर्म आनी चाहिए दो साल पहले 3000 स्कूलों को युक्तियुक्तकरण के तहत बन्द कर दिए। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में जन आक्रोश देखने को मिला लेकिन सरकार ने इस पर कोई सुध नहीँ ली। अब शराबबन्दी की मांग प्रदेश भर में उठ रही है लेकिन सरकार 700 शराब दुकान को बंद करने के लिए तैयार नहीँ है।
अब राज्य में रमन ब्रांड शराब बिकेगी। इस बात को लेकर रमन और उनके मंत्री अपने आप को गर्वान्वित महसूस कर रहे हैं। जबकि जनता इस बात को लेकर शर्मसार है। लोग चिंतित है कि 'धान के कटोरा' कही 'दारू के बोतल' न बन जाए। सरकार जनता की मौत से राजस्व कमाना चाहती है। इस राजस्व का मोह छोड़ने के लिए तैयार ही नहीँ है। मुख्यमंत्री लोगों को बैकुफ बनाने के लिए बार-बार कह रहे हैं कि सरकार शराबबन्दी की ओर बढ़ रही है। तो मैं पूछता हूं क्या शराब बिकना बन्द हुई ? क्या शराब दुकान बंद हुई ? और न ही शराब की दुकान में कटौती हुई है राजमार्ग की दुकान को आबादी क्षेत्र में लगाने के लिए और सरकार खुद शराब बेचने के लिए अड़ी है।  सरकार कह रही है उचित समय में शराबबन्दी करेंगे तो क्या जनता मौत के मुँह में समा जायेगी तब उचित समय आएगा। जनता को मारकर विकास की बात करना शोभा नहीँ देती। आज सभी पार्टी जनता की भलाई छोड़ कर अपनी राजनीति की रोटी सेकने में लगी हुई है, एक-दूसरे के ऊपर कीचड़ उछालने में पूरी ताकत झोंक दी है। अगर यही ताकत जमीनी स्तर में काम करने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजी-रोटी और अन्य मूलभूत सुविधा के लिए लगाते तो निश्चित ही छत्तीसगढ़ की तस्वीर बदल जाती। गांव में एक अच्छा नियम है जो शराब बेचता है, तो उसे ग्रामीण बहिष्कृत कर गांव से बाहर निकाल देते हैं। इसी प्रकार अब जनता को सोचना है कि जो सरकार पुरे छत्तीसगढ़ में दारू बेच रही है उसको क्या सजा देनी है ?

Sunday, 19 February 2017

लोकगीत जनसमूह के अंतस की आवाज : ममता

लोकगीत के बारे में जानने के लिए छत्तीसगढ़ की स्वर कोकिला लोकगायिका पद्मश्री ममता चन्द्राकर से बातचीत की गई। वे छत्तीसगढ़ की पहली हस्ती हैं जिन्हें लोकगायन के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान मिला। वर्तमान में ममता चन्द्राकर आकाशवाणी रायपुर में निदेशक के पद पर पदस्थ हैं। वे चार दशक से ज्यादा समय से छत्तीसगढ़ी लोकगीत गा रही हैं। वे लोकगीत के लिए मशहूर हैं। जब भी सुआ, गौउरा-गउरी, बिहाव, करमा, और ददरिया कही बजता है तो उसमें ममता चन्द्राकर के गीत जरूर सुनाई पड़ते हैं। यहां प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत -

- लोकगीत आप किस गीत को मानते हैं ?
पारम्परिक गीत जो लिखित न हो, वहीँ लोकगीत है। ये गीत जन-जन में व्याप्त होते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले होते हैं। यह ज्यादातर मौखिक होते हैं, लिपिबद्ध नहीँ होते हालांकि अब लिपिबद्ध करने लगे हैं।

- लोकगीतों की उतपत्ति के विषय में अपने विचार बताइए ?
लोकगीत जनसमूह के अंतस की आवाज है। यह गीत जब लोक या समूह में व्याप्त हो जाए और परम्परागत चलते रहे। लोकगीत की उत्पत्ति जनसमूह में गुनगुनाया जाने वाले गीत ही लोकगीत का रूप धारण कर लेते हैं।

- लोकगीतों से सामाजिक जीवन कितना प्रभावित हुआ है ?
लोकगीत हमेशा से लोगों के जीवन में खुशियां और सकारात्मक विचार पहुंचाने में सक्षम रहे हैं। लोकगीत के माध्यम से लोग जागरूक भी हुए हैं। इस प्रकार आज भी इसे संचार के प्रभावी और सशक्त माध्यम मान सकते हैं।

- क्या लोकगीतों में बदलाव आते हैं ?
हां, बिलकुल, लोकगीत समूह के गीत होते हैं और यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले गीत है। जब समूह की भाषा या बोली और जीवन शैली में परिवर्तन आते हैं, तो लोकगीत में बदलाव होना स्वभाविक है।

- लोकगीतों को बचाए रखने के लिए क्या करना चाहिए ?
लोकगीतों के संग्रहन करने की आवश्यकता है। लोकगीतों को स्कूली शिक्षा में शामिल किया जाना चाहिए। इस क्षेत्र में शोध कार्य से भी इसके बारे में समझा और जाना जा सकता है।

Thursday, 16 February 2017

दारू ह लिही परान

ये भइया मोर बात ल तै मान 
दारू ह लिही एक दिन तोर परान 
डउकी-लइका मरत हे भूख म 
सुते हस गली म, घर के कईसन सियान 
कुकुर सुंघत अउ मुँहू म मूतत हे 
सूरा बरोबर सुते हस, नई हे तोला धियान
कइसे घर-बार चलही
कइसे नोनी-बाबू ह पढ़ी 
कइसे जिनगी सम्हरही नइहे तोला ग्यान
घर के जम्मो खेत ल बेचेस
बेच डरेस महतारी के जेवर-गहना ल
ददा रोज दिन बरजत हे
फेर नई मानस ओकर कहना ल
अतका सुघ्घर जांगर हे 
बुता-काम करे बर काबर पड़त हे जियान 
अब आज ले किरिया खाले संगवारी
नई पियन कभू दारू ल 
तभे होही तोर नवा बिहान।

लोकगीत निरंतर बहने वाली नदी के समान : लक्ष्मण मस्तुरिया

गीतकार, लेखक, कवि और गायक लक्ष्मण मस्तुरिया का जन्म 7 जून 1949 को ग्राम मस्तूरी, जिला बिलासपुर में हुआ। वे छात्र जीवन से ही लेखन कार्य में लगे हुए हैं। छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक जागरण मंच 'चंदैनी गोंदा' के सर्वाधिक गीतों के सर्जक और 'देवार डेरा', 'कारी' लोकमंच के गीतों के रचयिता। रायपुर दूरदर्शन से प्रसारित धारावाहिक लोकसुर के निर्माता। उनके गीत 'मोर संग चलव रे' ने छत्तीसगढ़ में अलग पहचान बनाई है। उनसे लोकगीत को लेकर हुई बातचीत प्रस्तुत है -
लोकगीत की शुरुआत के बारे में बताइए ?
- लोकगीत की शुरुआत बहुत पहले से हुई है, जब समाज बना तभी से लोकगीत बना। तुलसी के दोहे से पहले भी लोकगीत थे। उस समय तुलसी दास ने "बन निकल चले दोनों भाई" गीत को लोकगीत कहा है। फिर इसी प्रकार लोग तुलसी और कबीर के गीतों और पदों को लोकगीत मानने लगे। इसके बाद जो संस्कार के गीत जैसे विवाह, सोहर और अन्य गीतों को लोकगीत की श्रेणी में रखे।
लोकगीत आप किस गीत को मानते है ?
- जो जनसमूह के साधारण और सरल गीत हैं, वह लोकगीत है। इसमें भाषा और व्याकरण जैसी बंदिशे नहीँ होती। लोकभाषा से ही लोकगीत बनता है। जो गीत लोगों में व्याप्त हो और अधिक प्रसिद्धि पा लेता है वही लोकगीत है। जब कोई मनोरंजन के साधन नहीँ होते थे, तब समुदाय में उत्साह और ख़ुशी के लिए गाना गाए जाते थे। इस प्रकार गीत समुदाय में व्याप्त हो जाते थे। वैसे तो लोकगीत बनने की प्रक्रिया बहुत लंबी है।
लोग आपके गीतों को लोकगीत मानते है। क्या आप मानते है ?
- मैं अपने गीतों को कैसे लोकगीत कह सकता हूँ। यह तो लोक या समुदाय तय करता है। मैंने तो बस देवार डेरा के जो गीत थे उसको सुधार कर सार्थक और प्रभावी बनाया है। अगर लोग मेरे गीतों को लोकगीत मानते है, तो लोकगीत है क्योंकि लोकगीत लोगों के ऊपर निर्भर करता है। जब समुदाय के द्वारा कोई गीतों को स्वीकार लेते है वही लोकगीत है।
देवार डेरा के गीतों को सुधारने की जरूरत क्यों महसूस की ?
- पहले देवार डेरा के गीतों में भाषा और अन्य कई कमियां थी। लोगों को समझ नही आता था। जैसे 'दौना म गोंदा केजुआ मोर बारी म आबे काल रे' को सुधार कर 'चौरा म गोंदा रसिया मोर बारी म' किया। इसी प्रकार से 'चन्दर छबीला रे बघली ल' सुधार कर 'मंगनी म रे मया नई मिलय रे मंगनी म' किया।
गीत लेखन और गायन के क्षेत्र में कब से कार्य कर रहे हैं ?
- वैसे तो 1960 से गीत और कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था। वही 1971 से पूर्ण रूप से इस कार्य में लगा। उस समय कृष्ण रंजन, पवन दीवान और मैं शिक्षक थे। फिर मैं शिक्षक की नौकरी छोड़कर 'चंदैनी गोंदा' मंच से जुड़ गया। इसके बाद मैंने देवार डेरा के गीतों को सुधारने का भी कार्य किया। इसके अलावा कारी लोकनाट्य में भी बहुत से गीतों का सृजन किया। उस समय सभी छत्तसगढ़ी के लिए निस्वार्थ कार्य करते थे।
आप कितने गीतों की रचना किए और गाए ?
- वैसे तो मैं गाना बहुत कम गाया हूं। मोर संग चलव रे, बखरी के तुमा नार, मे छत्तीसगढ़िया अव, चल गा किसान असाढ़ आगे, मन काबर आज तोर उदास हे और कुछेक गाना। वही लगभग 300 से ज्यादा गीतों की रचना हुई है। मेरे गीतों को कई फिल्मों में शामिल किए और कई गायकों ने गाए। 
पहले के गीतों में और अब के गीतों में क्या बदलाव देखते है ?
- बदलाव आया है। पहले के गीतों में सन्देश हुआ करते थे, लेकिन आजकल के गीतों में सन्देश तो छोड़ो कुछ समझ  नहीँ आता। आजकल व्यवसायिक ज्यादा हो गया है। गीत के नाम से कुछ भी परोसा जा रहा है।

Wednesday, 15 February 2017

छत्तीसगढ़िया मन ल दरुआ बनाके मारत हे

रमन सरकार ह छत्तीसगढ़ के सिधवा जनता ल दारू पीया-पीया के दरूआ अउ निठल्ला बना के मारत हे। एकर असन लबरा-दोगला मनखे कोनो नई हे। पिछले चुनावी वायदा म सराबबन्दी करे के बात कहे रहिस। फेर आज ये सरकार ह इहा के जनता ल दारू पियाय अउ जीव ल ले बर अड़े हे।
जबले सुपरिम कोट के आदेस आहे कि नेसनल हाइवे के 500 मीटर के दायरे म दारू दुकान नई होना चाही। एकर सेती अब दारू कोचिया मन साढ़े चार सौ दुकान ल चलाय बर साफ मना कर दे हे। छत्तीसगढ़ म दारू दुकान ल पहली नीलामी म लेके ठेकेदार मन चलावत रहिस। अब ये सदकारज ल करे बर सरकार बीड़ा उठावत हे। ताकि पूरा छत्तीसगढ़ के सुवाह हो जाए। छत्तीसगढ़ म सात सौ ले ज्यादा दारू दुकान हे। हर साल 1200 लाख लीटर दारू बिकथे। एकर ले 3900 करोड़ रुपिया के कारोबार होथे।
एक डाहन सरकार ह हेलमेट ल दुरघटना के बचाव बर जरुरी बतावत हे। बने बात हे। फेर पुलिस मन घलो येला लेके पईसा वसूली अभियान चलावत हे ठीक नोहे। सबले ज्यादा दूरघटना दारू पी के गाड़ी चलाय ले होथे। भाई जब हेलमेट बर लगन लगाके अभियान चलावत हे। अउ मनखे मन ल चमका-धमका के करोड़ो रूपया लूटत हे। त अतके उदिम दारू ल बन्द करे बर काबर नई करय। दारू ह तो सब दूरघटना अउ अपराध के कारन आय। तभो ले सरकार ह दारू बेचे बर काबर अड़े हे। येला लेके छत्तीसगढ़ के मनखे म जोरदार गुस्सा देखे बर मिलत हे। अब तो छत्तीसगढ़ ल दारू अव दरूआ के नाम से देस भर म अलग पहचान मिलगे हे। रमन तो ये फिलिम के खलनायक लागथे जेहा दारूवाले बाबा के रोल म हे। अब सब मनखे ल हीरो के रोल म उतर के एकर विरोध करना हे।

Tuesday, 14 February 2017

सागौन सोने के समान, लोकगीत पर घुन नहीँ लगता : कविता

छत्तीसगढ़ की सर्वाधिक सुमधुर लोकप्रिय गायिका श्रीमती कविता वासनिक की सफलता के पीछे उनके पिता श्री रामदास रिहकने के साथ-साथ पूरे परिवार के हाथ है। स्व. रामचन्द्र देशमुख ने चंदैनी गोंदा के भव्य मंच ने उसे तराशा और संवारा है। श्रीमती वासनिक की सांस्कृतिक से ही उनकी गायन में सहजता सरजता और तन्मययता झलकती है। गहन संघर्ष के बीच वे इस मुकाम तक पहुंच पाई है। उनकी जन्म दुर्ग में 18 जुलाई 1962 को हुआ। वे बीएसी (बायो) तक पढ़ाई करके राजनांदगांव में एसबीआई बैंक में उप-प्रबंधक के पद पर पदस्थ है। पिता रामदास रिहकने ने उसे घुट्टी में  संगीत पिलाया। वे बचपन से ही 10 बरस के उम्र में मंच में  लोकगीत प्रस्तुत करती आ रही है। वे छत्तीसगढ़ की संस्कृति के लिए वरदान है। अब तक उन्होंने देश भर में लगभग चार हजार प्रस्तुतियां दे चुकी है।

    प्रस्तुत है लोकगायिका कविता वासनिक से हुई बातचीत -

सवाल - आपकी झुकाव लोकगीत की ओर कैसे हुई ?
जवाब - मैं बचपन से ही 10 साल की उम्र से ही लोकगीत से जुड़ी हूं। उस समय आर्केस्टा का दौर था तभी स्व. रामचन्द्र देषमुख के द्वारा चंदैनी गोंदा का निर्माण हुआ। इसमें मुझे जुड़ने का अवसर मिला और लोकगीत-संगीत के प्रति रूचि बढ़ गई। पिता रामदास रिहकने भी लोकगीत से जुड़े होने के कारण ज्यादा ही संगीत का माहौल मिला।

सवाल - आप अपने गुरू या प्रेरक किसे मानते है ?
जवाब - सबसे पहले गुरू तो मेरे पिताजी श्री रामदास रिहकने रहे। इसके बाद स्व. रामचन्द्र देषमुख के साथ कार्य किया। पूरा परिवार मुझे इस कार्य के लिए सहयोग और प्रेरित करते रहे।

सवाल - आजकल लोकगीतों पर फिल्मी गाने हावी हो रहे है आपके क्या विचार है ?
जवाब - लोकगीत कभी खत्म नहीं हो सकते ए लकड़ी म सगोन अव धातु म सोन के समान हरे, जेला कभू घुना नई खाय। यह लोगों के जीवन के साथ चलते है। फिल्मी गाने लोकगीतों की जगह नहीं ले सकते हैं। भले लोकगीत फिल्मों में जगह पा सकते हैं।

सवाल - लोकगीत को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करनी चाहिए ?

जवाब - लोकगीतों को फिल्मों में जगह मिले और लोककलाकरों के लिए मंच मिलने से लोगों को परंपरागत गीतों के प्रति जागरूक किया जा सकता है। सरकार और संस्कृति विभाग इसके लिए बहुत ही अच्छी पहल कर रही है। जिससे कलाकारों को समय-समय पर उत्सव और अन्य अवसरों में मंच मिलते रहते हैं। इस प्रयास को और ही व्यापक करके जारी रखा जाए।

सवाल - आप लोकगीत के कौन-कौन सी विधियां प्रस्तुत करती है ?
जवाब - छत्तीसगढ़ के परंपरागत गीत सुआ बिहाव जसगीत करमाददरिया और अन्य लोकगीत की प्रस्तुति देती हूं।

सवाल - आप करमा और ददरिया के बारे में बताएंगे ?
जवाब - करमा में रिदम और ताल मुख्य होते हैं। वहीं ददरिया में कृषक कार्य में मन लगाने के लिए गाते है। इसमें पहला लाइन का संबंध दूसरे लाइन से नहीं होता है। जैसे फुटहा रे मंदिर कलस नइ हे, आज-काल के अवइया दरस नइ हे। ददरिया प्रेम का गीत भी है।

सवाल - मंच के अलावा आप फिल्मों में भी गाई है ?
जवाब - हां फिल्मों में गाई हूं पर बहुत ही कम। जैसे महूं दिवाना तहू दिवानी, मितान 420, डार और कुछेक में । वैसे तो मैं ज्यादातर मंच को ही प्राथमिकता देती हूं।

सवाल - आपने बचपन से ही मंच में गाती आ रही है और फिल्मों में भी गाई है तो बताएंगे कि दोनो में क्या अंतर और चुनौतियां है ?
जवाब - फिल्म के लिए तो स्टुडियो में गाते है। इसमें सभी प्रकार की तैयारी पहले से होती है। जबकि मंच में सभी के सामने गाना होता है। इसमें बहुत ज्यादा अभ्यास की जरूरत होती है। इसमें दर्शकों का तुरंत प्रतिक्रिया भी मिलती है। आज कल के कलाकार बहुत ही कम समय में बिना मेहनत किए जल्द ही नाम कमाने की चाह रखते है लेकिन ऐसा नहीं है इसमें बहुत ही ज्यादा मेहनत करना होता है।

सवाल - गीत-संगीत के अलावा आपकी अन्य रूचियां ?
जवाब - समाज कार्य मंच के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य करती हूं। जैसे कन्या भूर्ण हत्यादहेज प्रथा,जाति प्रथास्वच्छता को लेकर कार्य कर रही हूं।

सवाल - चंदैनी गोंदा के बारे में बताइए ?
जवाब - चंदैनी गोंदा स्व रामन्द्र देशमुख के द्वारा निर्देशित सांस्कृतिक मंच है। यह एक सांस्कृतिक लड़ाई का कार्य किया है। इसमें हम लोगों ने सिपाही की भूमिका निभाए है। किसी भी राज्य का निर्माण में संस्कृति का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है।

सवाल - इस पीढ़ी के कलाकारों को क्या संदेश देंगे ?
जवाब - लोकगीतों को बचा कर रखे और फुहंड़ता से बचे। इससे हमारी संस्कृति दुषित नहीं होगी।

Monday, 13 February 2017

प्रेम से घृणा क्यों ?

भारत देश प्रेम से उथल-पुथल है। इतिहास की बात करे तो प्रेम कहानी, पौराणिक ग्रन्थ, मंदिरों की दीवारों में प्रेम की प्रतिमाएं और वर्तमान में फिल्म, गीत-संगीत, कविता, साहित्य पूरी तरह से इसी का गुणगान है। फिर हमारे समाज में इसको क्यों बुरी चीज  कहा जाता है और नफरत की नजर से देखा जाता है। प्रेमी-प्रेमिका को कोई अपराधी से कम नहीँ आका जाता है। इसलिए युवाओं को घर-परिवार से इसे छिपा-दबा कर रखना पड़ता है। ऐसा क्यों? जबकि प्रेम तो जीवन के लिए महत्वपूर्ण चीज है। इसके बिना जिंदगी निराश और शुष्क हो जायेगी। वही मुहब्बत में नफरत की आग लगाने वाले कई दलाल भी बैठे हैं। जो समाज के लिए बहुत घातक है। यह प्रेम, प्रेमी और प्रेमिका के कट्टर दुश्मन है और हमेशा घृणा के बीज बोते हैं।
इतने प्रेम के गाथा, फिल्म और गीत-संगीत है तो प्रेम की गंगा बहनी चाहिए। लेकिन नहीँ कभी लव जिहाद के नाम पे, कभी जाति और धर्म के नाम पे दंगा होता है। आज प्रेम के कट्टरपंथी इतना हो गए है कि वैलंटाइन डे का विरोध करने के लिए सोशल मिडिया पर शहीद भगत सिंह और उनके मित्र शहीद राजगुरु और शहीद सुखदेव को 14 फरवरी को फांसी दी गई थी करके पोस्ट कर रहे थे। जब लोगों ने इसका विरोध किया तो कह दिया कि इस दिन सजा सुनाई गई। जबकि वास्तविकता यह है कि 7 अक्तूबर, 1930 को फांसी की सजा सुनाई गई और 23 मार्च, 1931 को लाहौर जेल में तीनों को फांसी दे दी गई। असामाजिक तत्व सोशल मीडिया में इस तरह शहीदों के इतिहास से खेल रहे है। जो पूरी तरह से गलत और शहीदों के अपमान है। अब वैलेंटाइन डे में ये लोग डंडे लेकर प्रेमी जोड़े के ऊपर बरसायेंगे और कभी भी प्रेम न करने के लिए संकल्प करवाएंगे।
इस व्यवस्था के लिए पूरे समाज और परिवार जिम्मेदार है। जो हमेशा से लोगों को प्यार मोहब्बत बेकार की बाते कहा करते हैं। माँ-बाप को भी चाहिए कि वे युवाओं की भावनाओ को समझे और उसे जीने और जीवनसाथी चुनने के लिए पूरे अधिकार दे। लड़कों को तो कुछ छूट मिली हुई है, लेकिन लड़कियों को आज भी सभ्य समाज में भेड़-बकरी समझी जाती है। उसे कहाँ कैसे जीना है, कहा पढ़ना है, कौन से कपड़े पहनना है, कहा आना-जाना है, किससे शादी करनी है और क्या काम करना है सब माँ-बाप तय करते हैं। कभी अपनी बेटी की चाह को जानने की कोशिश नहीँ करते फिर बाद में पछताते हैं। आज ज्यादातर प्रेमी जोड़े जब समाज में विरोध होने लगते है तो आत्महत्या कर लेते है। बहुत जगह तो यह भी सुनने में आता है कि उनके ही घर के सदस्यों के द्वारा हत्या कर दी गई। ये कैसे समाज और परिवार है ?