Wednesday, 28 February 2018

ले मशाले चल पड़े है लोग मेरे गांव के...

झारखंड के खूंटी जिला के कई आदिवासी ग्रामाें में अब ग्रामीण अपनी जमीन को बचाने के लिए एकजुट हो गए है। वहां के जमीन को लूटने के लिए सरकार और पूंजीपति पूरी ताकत लगा दी है। वहीं दूसरी तरफ आदिवासी इस ताकत से टकराने के लिए तैयार है। आदिवासी नेता ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए संविधान का मशाल हाथ में लेकर हक की लड़ाई के लिए आदिवासियों को संगठित करने में लगे हुए हैं। खूंटी के कई गांवाें में पत्थलगड़ी कर पत्थरों पर संविधान की पांचवी अनुसूची को लिखा जा रहा है। जिससे आदिवासी अपने अधिकार को जान सके और अपनी जल, जंगल और जमीन को बचा सकेे। खूंटी जिला के सिंजुड़ी, बहम्बा, कोचांग, साके, तुसूंगा और तोतकोरा गांव में 25 फरवरी को आदिवासी महासभा ने सम्मेलन कर गांव की जमीन को पूंजीपतियों से बचाने का आव्हान किया। वक्ताओं ने केन्द्र और राज्य सरकारों की सत्ता को चुनौती देते हुए पत्थलगड़ी की। उन्होंने ललकारते हुए कहा कि देश में केंद्र और राज्य सरकार की एक इंच भी जमीन नहीं है। आदिवासी क्षेत्र में संसद और विधानसभा का कोई भी कानून लागू नहीं होता है। हमारे गांव में हमारा राज है। सम्मेलन में हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे। उन्होंने ग्रामसभा जिंदाबाद और आदिवासी एकता जिंदाबाद और बिरसा मुंडा जिंदाबाद के नारे लगाए। सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि संविधान देश में ग्राम सभाओं को हुकूमत करने का अधिकार देता है।
पत्थलगड़ी के बाद कोचांग में एक महती सभा का आयोजन किया गया। इसमें झारखंड के जमशेदपुर, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसवां, खूंटी, रांची जिलों समेत ओड़िसा और छत्तीसगढ़ से भी लोग पहुंचे। आदिवासी महासभा के यूसुफ पुर्ती ने कहा कि सरकार कह रही है कि पत्थलगड़ी गलत है लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल आदिवासी क्षेत्रों में वर्तमान सरकार संघ राज्य क्षेत्र के सामान्य कानून को लाकर अपना हित साध रही है। युसूफ पुर्ती उर्फ प्रोफेसर ने यहां तक कह डाला कि प्रिवी काऊंसिल, बिटेन और ब्रिटेन पार्लियामेंट की सहमति के बगैर देश के संविधान में किये गए संशोधन निरर्थक हैं। उन्होंने कहा कि अनुसूचित भारत के संविधान का अनुच्छेद 13 (2) कहता है कि भारत के संविधान में कोई संशोधन होता है या संसद में या विधि मंत्रालय में कोई नया कानून बनता हो या सीएनटी एक्ट में संशोधन होता हो, तो यह आदिवासियों की इजाजत के बगैर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि संशोधन करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को प्रिवी काउंसिल ब्रिटेन से अनुमति लेनी होगी। आज तक सीएनटी एक्ट में जो 46 संशोधन हुए हैं उनके लिए प्रिवी काउंसिल से अनुमति नहीं ली गई है। इसके कारण यह गलत है। अनुच्छेद 13 (2) और अनुच्छेद 368 भी यही कहता है।
युसूफ पुर्ती ने कहा कि ग्रामीणों को जागरूक करने और ग्रामसभा को सशक्त बनाने के लिए पत्थरगड़ी की जा रही है। सरकार को पता होना चाहिए कि यह देश आदिवासियों का है। संविधान में फेरबदल ग्राम सभा की अनुमति के बगैर नहीं होना चाहिए। आदिवासी इस देश के मालिक हैं। मालिक की अनुमति के बगैर बदलाव नहीं हो सकता। हमारी अलिखित व्यवस्था थी, जिसे 1950 में लिपिबद्ध किया गया। संविधान में इस पर टीका टिप्पणी करने का अधिकार भी नहीं है। सरकार कह रही है कि हम संविधान की गलत व्याख्या कर रहे हैं। सरकार को बताना चाहिए कि यह किस तरह गलत व्याख्या है। इसके लिए सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।
आदिवासी बहुल क्षेत्र खूंटी में सम्मेलन, महासभा, महारैली और पत्थलगड़ी जैसे कार्यक्रम कर आदिवासियों को एकजुट किया जा रहा है। ताकि केंद्र और राज्य सरकार पूंजिपतियों के साथ मिलकर जमीन से आदिवासियों को बेदखल न कर सकें। इस प्रकार सभी ग्राम पंचायत अपनी पूरी ताकत गांव और जमीन को बचाने में लगा दी है। हम इस आदिवासियाें की लड़ाई का समर्थन करते हैं। साथ ही उनके साहस को सलाम करते हैं। यह जागरूकता की मशाल अमर रहें।

Tuesday, 27 February 2018

अगर देश का विकास देखना है तो चढ़े जनरल बोगी में



भारत का वास्तविक विकास अगर किसी को देखना है तो एक बार ट्रेन की जनरल बोगी में चढ़कर दिखाए। उनको देश की तरक्की से रूबरू होने का मौका मिलेगा। भारतीय ट्रेन की देर होने की घटना बहुत ही आम हो गई है। कभी भी कोई ट्रेन समय पर नहीं पहुंचती बल्कि कभी 12 घंटे देर तो कभी 24 घंटे देर यह भी कैसी देर है यह तो पूरी तरह से अंधेर है। एक-दो घंटे की देर समझ में आती है, लेकिन 24 घंटे मतलब एक दिन तक यात्री कैसा इंतिजार करेंगे। जब इस प्रकार की देर होती है तो भुगतना यात्री को पड़ता है। कभी कोई परीक्षार्थी को परीक्षा से वंचित होना पड़ता है, तो कभी कर्मचारी आफिस नहीं पहुंच पाते हैं। कभी कोई व्यक्ति अपने परिवार के सदस्य का बीमार होने का संदेश पाकर ट्रेन से घर पहुंचते-पहुंचते सदस्य की मौत हो जाती है। कभी ट्रेन पलटने से यात्रियों को मौत के मुंह में समाना पड़ता है। इस प्रकार ट्रेन की कहानी विकराल और भयानक है। भले ही सरकार हर साल रेल बजट पेश करती है, लेकिन समस्याएं जस के तस बनी हुई है। इस साल भी रेल बजट 1.48 लाख करोड़ रुपए मंजूर किया गया है। जिसमें रेलवे को हाईटेक करने की बात कही गई है। ये कैसा हाईटेक है जिसमें न तो जनरल बोगी बढ़ाने की बात कही गई है और न ही रेल की रफ्तार बढ़ाने की।
जनरल बोगी में देश की आम जनता, गरीब, मजदूर, किसान और छोटे वर्ग ठूसा कर सफर करते हैं। इस प्रकार अगर कोई जनरल बोगी में चढ़ गया तो उसे जिंदगी के लिए प्राथना करनी पड़ती है। हमारे यहां सत्ता में बैठे मंत्री जो विकास का गीत गाते हैं, उसे मात्र एक बार जनरल बोगी में बैठकर सफर करना चाहिए। तब उन्हें देश और ट्रेन का विकास पता चल जाएगा। यहां सरकार बुलेट ट्रेन चलाने की बात करती है, लेकिन आम लोगों की रेल को बेहतर बनाने की बात नहीं। यह तो ऐसी बात हो गई जैसे किसी के पैर में जूते नहीं और महंगी कमीज पहने हुए हो। देश में इस प्रकार हास्यस्पद कार्य चल रहा है। सरकार बुलेट ट्रेन चलाने के लिए जापान से कर्ज लेकर मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल प्रोजेक्ट शुरू करेगी। बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को 15 अगस्त 2022 तक करने का लक्ष्य रखा गया है। बुलेट ट्रेन चलाने के लिए कुल लागत 10,8000 करोड़ रुपए आने का अनुमान है। जिसके लिए जापान से कर्ज लिया जाएगा। जिस कर्ज को पचास साल में चुकाना होगा। अब देश की तरक्की का अनुमान लगा सकते है।
जितने पैसे में एक्सप्रेस और सुपर फास्ट ट्रेन की स्थिति बहुत ही बेहतर हो जाती, उससे कई गुणा ज्यादा पैसे बुलेट ट्रेन के लिए खर्च करना कहा तक शोभा देती है। इस कार्य पर 0.1 फीसदी के ब्याज को जोड़ें तो अट्ठासी हजार करोड़ रुपए के कर्ज के बदले भारत को जापान को 90500 करोड़ रुपए चुकाने होंगे। यानी केवल 25 सौ करोड़ रुपए ज्यादा। इस प्रकार देश की आर्थिक स्थिति भी स्पष्ट दिखाई दे रही है। हमारे देश को दूसरे देश से कर्ज लेने की जरूरत पड़ रही है। अब देश को पचास साल तक जापान का कर्ज चुकाना होगा। वहीं बुलेट ट्रेन के निर्माण कब पूरा होगा इसका भी कोई ठिकाना नहीं जब 25 साल में बुलेट ट्रेन शुरू होगी तब तक अन्य देश में इससे ज्यादा सुविधाजनक वाली ट्रेन दौड़ती दिखाई देगी। सरकार को चाहिए कि देश में मूलभूत सुविधा जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजगार पर गंभीर रूप से ध्यान दे।

Tuesday, 20 February 2018

कब तक होता रहेगा मोहब्बत का कत्ल


इस आधुनिक समाज में आज भी जाति-पांति, धर्म-संप्रदाय और ऊंच-नीच की भावना ठूस-ठूस कर भरी है। प्रेमी जोड़ों की हत्या या आत्महत्या की खबर रोज आती रहती हैं। जब लोग जाति समाज के बंधन में जकड़े होते हैं तो वे पूरी तहर से बुद्धिहिन हो जाते हैं। उसे अपनी संतान भी दिखाई नहीं देती। छत्तीसगढ़ के जांजगीर में एक प्रेमी जोड़े ने सामाजिक दबाव झेल नहीं पाने के कारण मंगलवार को ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर ली। सामाजिक और पारिवारिक ताने से तंग आकर इस जोड़े ने नफरत भरी दुनियां से विदा ले ली। इनकी लाशे पटरी पर क्षत-विक्षत हालत में कटी हुई मिली। प्रेमी युवक देवेंद्र कुमार और युवती बुकली जांजगीर के अकलतरा के ग्राम खटोला के निवासी थे। इस प्रकार की घटनाएं लगातर राज्य और देशभर में होती रहती है। इसका कारण जाति समाज से निकालने का भय है। जब तक यह जाति समाज और इसका खौफ रहेगा तब तक इस प्रकार की हत्याएं और आत्महत्याएं होती रहेगी। अगर माेहब्बत को नफरत से बचाना है तो देश में जाति समाज को पूरी तरह से खत्म करना होगा। देशभर में सभी जगहों पर सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम लागू करना होगा। साथ ही अंतरजातिय और अंतरधार्मिक विवाह को प्रोत्साहन देना होगा। जिससे लोगों के मन में समानता और भाईचारा की भावना उत्पन्न होगी। साथ ही पढ़े-लिखे और जागरूक लोगाें को इस जाति प्रथा और जाति समाज को तोड़ने के लिए आगे आना चाहिए। तभी इस तरह की घटनाओं पर विराम लगेगा। अन्यथा समाज और देश का विनाश तय है।

Thursday, 8 February 2018

टोनही अउ भूत के डर जीवलेवा




गांव अउ सहर, अनपढ़ अउ पढ़े-लिखे मनखे सबे झन टोनही अउ भूत के भय के मारे थरथर कापत रइथे। जब हमन हमर छत्तीसगढ़ के बात करथन त इहा के मनखे तो टोनही अउ मसान के कहानी सुनाय म भीड़ जथे। अउ डर के मारे बने-बने मनखे के पसीना निकाल देथे। कोनो लबारी बात ल घेरी-बेरी अउ जगह-जगह गोठियाय म ओ बात ह सिरतोन असन लागथे। अभी तक ले मे ह जतेक भी बात सुनेंव ओकर बर मोला पोठलगहा परमान नई मिलिस। सब हवा-हवाई बात ल गोठियाथे। गांव के कई झन बइगा-गुनिया मन ले घलो गोठबात करेंव फेर उहूं मन ह गोल-मटोल अउ उटपूटांग ढंग ले जवाब देथे। हमर पढ़े लिखे समाज म आज भी माइलोगिन मन ल टोनही के नाव लेके लगातार मारे के घटना ह घोर अंधबिसवास ल देखाथे। सोचे के बात तो ए हरे कि आज पढ़े-लिखे मन ह घलो गांव के अनपढ़ मन के मनगढ़त कहानी ल मान के उकरों ले आघू निकल गे हे। जबकि पढ़े-लिखे मनखे ल चाही कि अंधबिसवास के कुंआ म उबुक-चुबुक होवत जनमानस ल निकालय। फेर का करबे एमन ह ए अंधबिसवास अउ लबारी गोठ के तूफान म उड़ावत हे।
नानकून ले सुनत आवत हंव कि टोनही मन कर अइसन सक्ती होथे की ओहर हजारों झन ल एके झन मार सकथे। आगी अउ पानी घलो उकर काही नइ बिगाड़ सके। तब मे ह ए पूछना चाहथंव कि गांव म कोनो माइलोगिन ल टोनही कही के मारथे त ओ ह अपन परान ल कइसे नइ बचा सके। अपने परान ल जे ह नई बचा सकय ओ बपरी ह का दूसर के परान लिही अउ दूसर के अहित करही। एक ठोक अउ बात सुने ल मिलथे कि टोनही ले सिरिफ बइगा ह सामना कर सकथे। कहे जाथे कि बइगा कर घलो आनी-बानी के ताकत होथे। ओ ह कतको बीमारी रही एके घांव म ठीक कर देथे। तब मै ए पूछथंव कि हमर देस अउ हमर छत्तीसगढ़ म अतेक रसपताल अउ डाक्टर मन के बाढ़ कइसे आगे। गांव के बइगा ह सबे बीमारी के इलाज करतिस त ए भीड़ ह रसपताल म नइ दिखतिस। जउन बइगा ह सबे बीमारी अउ समस्या ल निपटाय के बात करथे ओ ह खुदे डाक्टर कर रस्पताल म काबर इलाज कराथे। ओकर कर तो सब बीमारी ले निपटे के सक्ती हे त खुदे इलाज नई करतिस। जादू-टोना, बइगा-गुनिया समाज के अंतस म अइसे समा गेहे जउन ह समाज बर खतरनाक आय। जब तक ले ए बीमारी के नास नइ होही तब तक मनखेमन डर-डर के मरत रही।

गांव म आज भी कोनो मनखे ल बुखार अउ दूसर बीमारी होय म ओ ह डाक्टर ल नइ दिखाके बइगा-गुनिया कर जाथे। भले ओकर परान निकल जाय। एक झन मोर करीबी पढ़े-लिखे मनखे जेकर नोनी लइका के सरीर म खाज-खुजरी होगे रहाय ओ ह बइगा कर फुकवाय-झरवाय बर जावत रहिस। तब बइगा गुनिया के चक्कर म डाक्टरी इलाज नइ होइस त ओकर लइका के खजरी हर सरीर म फइले ल लागिस तब मे ह ओ भाई ल कहेंव कि एकर इलाज कोनो बड़े चर्म रोग बिसेसज्ञ ल दिखा कही के। तब ओ ह मोर बात ल ले दे के मानिस। अउ ओ लइका ह ठिक होइस।
अब जउन ह कालेज अउ यूनिवरसिटी म पढ़े हे अउ जेन ह पढ़त-पढ़ावत हे। उहू ह अइसन झाड़-फूक म बिसवास करथे त गांव के साधारण मनखे ऊपर का आस लगाबे। गांव के अनपढ़ मन तो ए पढ़े लिखे मन ल देख के ओकर पीछू-पीछू जाथे। ए परकार के समाज म अंधबिसवास ल फइलाय म ए पढ़हंता अंधबिसवासी मन के घलो बढ़ हाथ हे। वइसने अगर बइगा के बात करे जाय तो ए मन ह बीमार मनखे ल कसराहा अउ भूत-परेत, टोनही, मसान के भय दिखा के पइसा लूटत हे। अइसन अंधबिसवास फइलइया मन बर पोठलगहा कानूनी कारवाइ करना चाही। जेकर ले हमर समाज ल बचाय जा सके।
जानकार मन कथे कि लइकापन के सुने कहानी ह ओकर केवची मन म खतरनाक परभाव डालथे। जेकर ले ओ मनखे ह जीवन भर नइ उबर पाय। मनखेमन लइका के होथे साथ ओकर गला म ताबिज अउ हाथ म करिया धागा। यहां तक के ओकर गोड़ म घलो करिया धागा बांध देथे। ए अंधबिसवास के धागा ह ताहन उमर भर नइ छूटय। जब लइका ह अपन-दाई ददा ले पूछते कि ए धागा अउ ताबिज-कंडा ल काबर पहिनबो कहि के तब ओ लइका ल धूतकार के चुप करा दे जाथे। नहीं तो आनी-बानी के परेतिन अउ टोनही के कहानी सुनाके लइका के मनोबल ल गिराय जाथे। जउन ह ओ लइका के उमर भर पेरथे। जब ओ लइका ह जाने-सुने के लइक बड़े बाड़ जथे  तभो ले ओ ह वैज्ञानिक सोच ल नइ अपना सके। अउ अंधबिसवास के बेड़ी म बंधाय रइथे।

अब सोचे के बात तो ए हरे कि जउन लइका ह बिज्ञान अउ गनित के पढ़ाई करत हे, वहू ह मंतर-जंतर, भूत-परेत, टोनही-टमानी जइसे चीज म बिसवास करथे। अउ ताबीज-कंडा लटका के घुमथे। त ओ लइका बर मोला तरस आथे कि ओ का बिज्ञान ल जान पाही अउ का मिसाइल अउ बिज्ञान के छेत्र म खोज कर पाही। मरीज ल बचा पाही। अब देस-समाज ल बचाना हे त अपन लइका ल बैज्ञानिक बउ परगतिसील बिचार ल बतावन-सिखावन। मनगढ़त बात अउ अंधबिसवास के खुल के बिरोध करन। तभे हमर अवइया पीढ़ी ह बच पाही।


Thursday, 4 January 2018

भगवाकरण की हो रही कोशिश

देश में अब स्थिति पूरी तरह से बदली-बदली नजर आ रही है। जहां-जहां भाजपा की सत्ता है, वहां-वहां पूरी तरह से भगवाकरण करने की कोशिश हो रही है। यूपी में ताजमहल को पर्यटन स्थल की सूची से हटाना और हिंदू धार्मिक स्थलों का जोरशोर से प्रचार करने के बाद अब उत्तरप्रदेश के सभी सिनेमाहालों में राष्ट्रगान के बाद इलाहाबाद में होने वाले कुंभ मेले का लोगों और टैगलाइन हर शो में दिखाने का फरमान यहां
 के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जारी कर दिया है। इसका मकसद धार्मिक और भगवा रंग में युवाओं को रंगना है। वहीं दूसरी तरफ देखे तो महाराष्ट्र के कोरेगांव भीमा में दलितों के विजय उत्सव में बीजेपी, आरएसएस और अन्य हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा पत्थरबाजी करने की घटना बहुत ही निदंदनीय है। जब दलित ने दो सौ साल पहले 1 जनवरी 1818 में मात्र 8 सौ दलितों की फौज ने अंग्रेजों की ओर से पेशआ बाजुराव द्वितीय के 28 हजार सेना को हराया था, उस खुशी में दलित इस दिन को धूमधाम से मनाते हैं। इतने वर्षों तक कभी किसी को आपत्ति नहीं हुई, लेकिन अचानक ही इस समारोह में दक्षिणपंथी लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। जिससे पूरे महाराष्ट्र में हिंसा की आग अभी भी सुलग रही है। लेकिन अभी तक महाराष्ट्र के भाजपा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। पिछले कुछ दिनों की बात करे तो भाजपा के केंद्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के भाजपा की सोच को बताते हुए धर्मनिरपेक्षता को संविधान से हटाने की बात बेशर्मी से कह कर भारतीय संविधान का अपमान किया है। हेगड़े का कहना है कि देश की धर्मनिरपेक्षता को खत्म कर हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संविधान में बदलाव लाने की जरूरत है। इस प्रकार का बयान भारत की अंखंडता और धर्मनिरपेक्षता को तोड़ने की ओर संकेत कर रहा है। वहीं गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत से फिर से यह पार्टी बहुत घमंडी हो गई। अब पूरी तरह से तानाशाही में उतर आई है। यह देश के भविष्य के लिए बहुत ही खतरनाक संकेत है।

Sunday, 24 December 2017

मोबाइल के चक्कर


काली संझा जुआर मे ह डगनिया बाजार होतव मोर घर जावत रहेंव। तब रद्दा म पीछू डाहर ले एक ठन फटफटी ह हकन के मोर फटफटी ल ठोक दिस। तब मोर दिमाग के पारा ह चढ़गे। अउ जोर से गारी देंव- कोन आय रे अंधरामन ह सोझे गाड़ी ल ठोकत हे। आंखी नइ दिखत होही त इलाज करा लय। तब पीछू डाहर ल देखथंव त एक झन जवान टूरी ह एक हाथ म बड़े मोबाइल धरे गोठियावत रहाय अउ दूसर हाथ म फटफटी के हेंडिल ल धरे रहाय। तब मोर गारी ल सुनके कहिथे- सारी सर गलती हो गई। तब मे ह ओला पियार ले समझावत कहेंव- देख वो तोर सारी कहे ले मोर गाड़ी के टूटे एंटीगेटर लाइट ह ठिक नइ हो जाए। मोबाइल म गोठियाना हे त कोनो मेर बइठ ले अउ ससन भर गोठिया। फेर बड़े जान मोबाइल म गोठियावत फटफटी ल मड़माड़े चलावत हस। तहू जाबे अउ जजमानो जाही। तब ओ छोकरी ह थोकन गुस्सा म कहिथे- जरा सी बात के लिए भासन सुना रहे हो। मैं अपने मम्मी-पापा की बात नहीं सुनती। गलती हो गई तो कह रही हूं। तब अतके बेरा म सड़क म चाय दुकान लगइया कचरू कका ह आगे। अउ ओ टूरी के गोठ ल सुन के कचरू कका ह कथे- सही तो काहत हे नाेनी महूं ह तो ठेला ले बइठे-बइठे देखत हंव। कइसे मोबाइल म गोठियावत फटफटी ल अलकरहा चलावत हस। थोकन बाचगे नाली म फेका जतेस अउ दांत ल निपोर देतेस। अउ ए बाबू ह बने ल तो काहत हे एक तो फटफटी चला नहीं तो नहीं तो मोबाइल म गोठिया। कचरू कका के डांट ल सुन के टूरी ह अपन गाड़ी ल चालू करके कले चूप फूर होगे। कचरू कका ह मोला कइथे- आजकल बेटा जउन मेर देखबे तउन मेर कतको भीड़ म घलो टूरा-टूरी मन बड़े-बड़े मोबाइल ल एक हाथ म धरके अउ दूसर हाथ म एक्सीलेटर अइठे गोठियावत मड़माड़े फटफटी चलावत रइथे। कोनो ह कान म इयरफोन ल खुसेर के गाना सुनत नही ते गोठियावत अंधाधून फटफटी ल चलाथे। अइसन फटफटी चलइ ह बने नोहे बेटा कभू बड़े जान अलहन हो जही रे। कचरू कका के गोठ ह सही मे गुने के आय। सही म आज मोबाइल ह जीव के काल होगे हे। मनखे ह थोकन लापरवाही करके बड़े जान दुरघटना ल नेवता देवत हे। अउ आजकल कंपनीमन ह फोकट म बात करे वाला आफर देवत हे तेकर सेती घलो मनखे दिन-रात काही काम बुता रहाय मोबाइल ल थोरकुन नइ छोड़न काहत हे। त कोनो मनखे ह रातभर जागके मोबाइल म चैटिंग करके अपन स्वास्थ ल बिगाड़त हे। त लइका मन ह मोबाइल म गेम अउ इंटरनेट म अपन पढ़ई ल बरबाद करत हे। सियान मन ह कथे ते ह सही बात आय कोनो जिनिस के उपयोग जरूरत के हिसाब ले करना चाही। अति ह दुरगति आय।

Tuesday, 5 December 2017

आडंबर के मिटइया गुरु घासीदास


मंदिरवा म का करे ल जइबो, अपन घट के देव ल मनइबो, पथरा के देवता ह हालत ए न डोलत, अपन मन ल काबर भरमइबो... ए बात ल घासीदास जी ह तब कहिस हे जब ओ ह जगन्नाथ पुरी के यातरा म जावत रहिस ताहन आधा बीच म सारंगगढ़, रायगढ़ ले लहुट के आगे। अउ कहिस कि मंदर म का करे बर जाबो। जेन ह अपन खुद के रकछा नइ कर सकय वो ह काय मनखे के सुनही। हमन कतेक बड़ मूरख आन पखरा के पूजा करथन जे ह न बोल सकय, न चल सकय, न खा सकय, न पी सकय अउ न उठ-बइठ सकय। तेकर तीर जाके हमन हमर समय अउ धन के नास करत हन। ए परकार के अंधबिसवास, रूढ़ीवाद अउ परंपरावाद के खिलाफ जोरदार बिरोध करिस। घासीदास जी ह मूरति पूजा कभू मत करव कहिन। अउ लोगन मन ल अपन मनोबल ल बढ़ाय के अपील करिस। एकर बर कहिस कि अपन घट के देव ल मनइबो। मन ले बढ़ के देवता कुछू नोहे। हमन ह पखरा के पूजा करथन। ए ह हमर मानसिक बीमारी आय। मन ल पूजा पाठ अउ पाखंड ले दूर रखके करम अउ मेहनत म बिसवास करव।
घासीदासजी ह समानता के बात घलो कहे हे। वोकर कहना हे कि मनखे-मनखे एक समान। अरे भइया सबे मनखे ह बराबर आय जाति-धरम के भेद ल बना के काबर लड़त-मरत हन। घासीदास ह ए सब एकर सेती कहिस कि ओ ह खुद अइसन पीड़ा ल भोग चुके रहिस। काबर घासीदास जी के जनम 18 दिसंबर 1756 म रइपुर जिला के गिरोधपुरी गांव म एक गरीब किसान परिवार म होय रहिस। ओ समय म गरीब कमजोरहा रहाय ओकर उपर बड़ सोसन अउ अत्याचार होय। अपन आप ल उच जात कहइया पाखंडी मन ह कमजोरहा मनखे मन ल सिकछा अउ सारवजनिक जगह ले दूरीहा रखके अपमानित करे बर नीच जात कहाय। ए पीरा ल देखके घासीदास जी ह सतनामी पंथ बनइस। दबे कुचले मनखे ल सेेेकेलिस। अउ कहिस कि ए सब अपन आप ल उच जाति समझइया जात-धरम के धंधा करइया मन के चाल आय। जउन ह आडंबर म फंसा के सोसन अउ अत्याचार करत हे। तेकर सेती तुमन ह पोथी-पुरान अउ पखना पूजा म मत अरझव। अउ सत ल जानव-मानव। जउन दिखत हाबय ओकर उपर भरोसा करव। कालपनिक बात के खुल के बिरोध करव। जउन ह यथारत ल मानही उही ह सतनामी कहलाही। ए परकार के दलित सोसित वर्ग ल एकट्ठा करके समाज म बड़ बदलाव करिस। तब जाके सोसित-पीड़ित मन ल सम्मान मिल पइस। पिछड़ा वर्ग के मनखे बर घासीदास जी ह मसीहा आय। जउन ह वैज्ञानिक सोच अउ प्रगतिसील बिचार ल फैला के आंडबर के पेड़ म टंगिया चलइस। घासीदास जी ह अंधबिसवास अउ रूढ़ीवाद के कुलूप अंधियारी म गियान के परकास करके नवा बिहान लइस। 

Sunday, 3 December 2017

शिक्षाकर्मी, शिक्षा और स्कूल को मिटाना चाहती है सरकार

शिक्षाकर्मी अपनी मांगों को लेकर अब आर-पार की लड़ाई में उतर आए हैं। उनके आंदोलन को रोकने के लिए सरकार पूरी तरह से बर्बरता और दमनात्मक कार्रवाई कर रही है। इसके बाद भी शिक्षाकर्मी संविलियन, सातवें वेतनमान, शासकीकरण समेत 9 सूत्रीय मांगों को लेकर पूरे परिवार के साथ डटे हुए हैं। भाजपा सरकार शिक्षाकर्मियों के साथ अब अंग्रेस सरकार से भी घटिया और अमानवीय व्यवहार कर रही है। राजधानी के धरना स्थल और ईदगाह भाठा पर धारा 144 लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी है। इस प्रकार संविधान और कानून की धज्जियां उड़ा रही है। लगातार पुलिस शिक्षाकर्मियों को अपराधाी की भांति पकड़-पकड़ कर जेल में डाल रही है। तो शिक्षाकर्मियों के साथ आए उनके बच्चे को पकड़ कर घसीट रही है। इस प्रकार अमानवीय कार्रवाई सरकार की असली चेहरा को सामने लाती है।
शिक्षाकर्मियों का आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार पुलिस और मिल्ट्री की ताकत लगा दी है। फिर भी शिक्षाकर्मी पूरे मनोबल के साथ आंदोलनरत है। पिछले दिनों कई शिक्षाकर्मियों को बर्खास्तगी का आदेश देना सरकार की बहुत तानाशाही कार्रवाई थी। साथ ही शिक्षाकर्मी नेताओं को उनके घर से उठा ले जाना भी लोकतंत्र की हत्या है। प्रदेश के मुख्या डा. रमन सिंह बार-बार शिक्षाकर्मियों को लताड़ते हुए उनकी एक भी मांगे पूरी नहीं होने की बात कह रहे है। वह शिक्षाकर्मी, शिक्षा और स्कूल के प्रति उदासिनता को दिखाती है।
शिक्षाकर्मी की मांगों पर गौर करे तो सभी मांगे जायज है। क्या इतनी महंगाई में भी कम वेतन और ज्यादा काम कोई करेगा। आज पूरी तरह से शिक्षाकर्मियों का शोषण हो रहा है। उन्हें शिक्षाकर्मी भले कहा जाता है, लेकिन न जाने वह क्या-क्या कर्मी है। कभी गांव में मतदाता सूची का काम दे दिया जाता है, तो कभी शौचालय अन्य सर्वे का, कभी चुनाव ड्युटी और शासन-प्रशासन के कामों में भीड़ा दिया जाता है। तो शिक्षाकर्मी स्वतंत्र होकर बच्चों को पढ़ाएगा क्या। वही बात शासकीकरण की है अभी तक लगातार 15 सालों से शिक्षकों की नियुक्ति कही भी नहीं हो रही है। जिस प्रकार कम पैसे और ठेकेदारी में शिक्षा का काम हो रहा है, यह शिक्षा के प्रति सरकार की उदासिनता है।
आज प्रदेश में शिक्षा की स्थिति बद से बददतर होती जा रही है, फिर भी भाजपा सरकार वाहवाही बटोरने में पीछे नहीं हट रही है। सरकार आज पूरी तरह से सरकारी स्कूलों को बंद कर शिक्षा को निजी स्कूलों के हाथों में बेचने का काम कर रही है। मंत्री, विधायक और सांसद अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाते इसलिए उन्हें आम जनता के बच्चों और शिक्षाकर्मियों की कोई चिंता नहीं है। क्योंकि उनके बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं हो रही है। क्यों न सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, मंत्री, विधायक और सांसद के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ना अनिवार्य  कर दिया जाए और निजी स्कूलाें को पूरी तरह बंद किया जाए। स्कूलों और यहां कार्यरत शिक्षक-शिक्षाकर्मी की स्थिति में सुधार किया जाए। जब तक जनता को एक समान शिक्षा नहीं मिलेगी तब तक शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं होगी। सरकार को चाहिए कि मंत्री, विधायक और सांसद की मोटी सैलरी में कटौती कर वह राशि शिक्षा, शिक्षक और स्कूल में लगानी चाहिए। साथ ही मंत्री, विधायक और सांसद को भारी-भरकम पेंशन न देकर देश और प्रदेश के विकास कार्यों में यह पैसा खर्च करना चाहिए। देश में नेताआें की कमी नहीं है, इसके लिए बहुत भारी राशि खर्च करना कितना जायज है। शिक्षाकर्मियों का आंदोलन तब तक नहीं रूकना चाहिए जब तक उन्हें सम्मानजनक वेतन और सम्मानजनक कार्य न मिल जाए। वहीं शिक्षाकर्मियों की भी जिम्मेदारी हो कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही भर्ती कराए। साथ ही सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पूरी इम्मानदारी के साथ शिक्षा दें। जिससे देश के उज्जवल भविष्य को गढ़ा जा सके।

Wednesday, 29 November 2017

टोनही आैर बैगा के खेल में जा रही जानें



आज अंधविश्वास के चलते लोग अपने ही घरवाले का खून कर रहे हैं। वही कई लोग डर-डर के जी रहे हैं। गांव हो या शहर बैगा और टोनही के खेल में अंधविश्वासी लोग मर और मार रहे हैं। हाल ही में पलारी के अमेरा गांव के एक ऐसा मामला प्रकाश में आया है, जिसमें एक अंधविश्वासी पिता ने बैगा के कहने पर भूत भगाने के लिए अपने ही 12 वर्षीय बेटे की बलि चढ़ा दी। वहीं पिछले महीनों रायपुर के पुरानी बस्ती में एक युवक ने अपनी ही मां को टोनही होने के संदेह में तावा से पीट-पीट कर हत्या कर दी।
यह घटनाएं हमारे समाज काे आइना दिखाती है कि हम आज कितनों भी आधुनिक होने का ढोंग करे फिर भी बहुत ज्यादा आडंबर, अंधविश्वास, अवैज्ञानिक सोच और रूढ़ीवादी की चादर ओढ़े हुए हैं। देश में जब तक अंधविश्वास और अंधविश्वास फैलाने वाले बैगा, ओझा और ढाेंगी बाबाओं पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई नहीं होगी तब तक यह समस्याएं जस के तस बनी रहेगी। वही लोगों में जब तक वैज्ञानिक सोच नहीं होगी तब तक बदलाव की कोई कल्पणा नहीं की जा सकती।
आज तो स्थिति ऐसी है कि आदमी अपनी मोटरसाइकिल, कार, घर और अन्य चीजों को भूत और टोनही की नजर लगने से बचाने के लिए कई तरह के उपाय करते दिखते हैं। गांव हो या शहर अंधविश्वास में जकड़े लोग मोटरसाइकिल में ताबिज कंडा बांधे रहते हैं। वही कार में नारियल या नींबू-मिर्च लगा कर घूमते हैं। तो कई अंधविश्वासी लोग अपने घर में नारियल और नींबू-मिर्च और भयानक देवी-देवताओं की तस्वीर लगाकर अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं। इसके चलते सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं होती है। लोग बुरी नजर से अपनी दुकान को बचाने के लिए नींबू-मिर्च लगाते हैं और सड़क पर फेक देते हैं। जिससे भयभीत और कमजोर लोग अपनी गाड़ी को इस नींबू-मिर्च से बचाने के चक्कर में गिर कर हाथ-पैर तोड़ डालते हैं। तो कभी बड़ी घटना भी हो जाती है। वही चौक-चौराहों में मंदिर होने से लोग गाड़ी का हैंडिल छोड़ कर भगवान को नमस्ते करने के चक्कर में ध्यान भटकने से दुर्घटना हो जाती है।
इस देश में अंधविश्वास की बीमारी से ग्रसित लोग भले जान दे दें या अपने ही घरवालों को मौत के घाट उतार दे, लेकिन इस बीमारी से लड़ने के लिए कोई कोशिश नहीं करेगा। हमें चाहिए कि इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए छोटे-छोटे बच्चों को उनके मनोबल से परिचित कराए और काल्पनिक भूत-प्रेत, देवी-देवताओं, ताबीज-कंडे, बैगा-बाबा और अंधविश्वास के ठेकेदारों से दूर रखे। तभी परिर्वतन संभव है। 

Tuesday, 28 November 2017

आवव गरब ले बोलव छत्तीसगढ़ी


छत्तीसगढ़ ल भले अलग राज बने 17 साल होगे अउ छत्तीसगढ़ी भासा ल लेके भले अलग आयोग बनगे फेर अभी ले छत्तीसगढ़ी कोनो मेरा लागू नई होहे। अउ एकर कारन हमी मन हरन। काबर छत्तीसगढ़ म रही के हमन ह छत्तीसगढ़ी बोले बर लजाथन-सरमाथन त दूसर भासा के बोलइया मन ले हमन कइसे छत्तीसगढ़ी के आस लगा सकथन। सोचे के बात तो ए हरे कि आज छत्तीसगढ़िया मन ह मानसिकता बना ले हे कि छत्तीसगढ़ी बोलइया मन ह गवांर होथे। अउ एकर बर एक पैमाना घलो तय कर डारे हे कि जउन ह अंगरेजी बोलथे हो ह मंडल, हिंदी बोलइया गरीब अउ छत्तीसगढ़ी बोलइया भिखारी। अइसन मानसिकता ह महतारी भासा बर खतरनाक आय। कही अइसे मत हो जाए कि छत्तीसगढ़ी भासा ह नंदा जही। अब बेरा आगे हे ए भासा ल जतन के रखे के तभे हमर संस्कृति अउ पहचान ह बचे रही। 
आज के नेता अउ अभिनेता मन ह अपन काम साधे बर दू-चार लाइन छत्तीसगढ़ी बोल देथे। कोनो मंत्री अउ विधायक ह छत्तीसगढ़िया मन कर दू लाइन छत्तीसगढ़ी बोल के अइसे दिखाथे कि जानो-मानो ओ ह छत्तीसगढ़ी भासा के बोलइया आय। ओकर आफिस म मिले बर कोनो मनखे ह चल देथे त हिंदी अइसन बोलही अउ रोब दिखाही जानोमानो उही ह हुसीयार आय बाकी सब भोकवा। छालीवुड के बात करे जाय तो निर्माता-निर्देशक अउ हीरो-हिरोइन ह घलाे अपन असल जिनगी म छत्तीसगढ़ी म नइ गोठियाय। भले पूरा ढाई घंटा के फिलिम म बनावटी छत्तीसगढ़ी बोलही। सुटिंग के बेरा तो अइसे हिंदी अउ इंगलिस बोलथे कि छत्तीसगढ़ी के सुध घलो नइ रहाय। अब अइसन मनखे ह कोनो फिलिम बनाही त का छत्तीसगढ़ के कला-संस्कृति ह दिख पाही। अउ का अइसन फिलिम ह चल पाही।
छत्तीसगढ़ी भासा के साथ अन्याय करे म छत्तीसगढ़िया मन के घलो हाथ हाबय। अब तो गांव के मनखे सहर म का आ जथे पूरा अपन महतारी भासा ल भूला जथे। अउ कोनो गांव देहात के संगवारी मिलथे ओकरो ले छत्तीसगढ़ी म नइ गोठियाय। इहा के मनखे ह जब तक ले छत्तीसगढ़ी बोले म गरब नइ करही अउ अधिकार के साथ नह बोलही तब तक कतको छत्तीसगढ़ी ल लेके संगठन बनही अउ आयोग बनही फेर पोठलगहा काम नइ होवय। आज तो होवत लइका ल अंगरेजी के रंग म रंगे बर ओकर दाई-ददा ह पूरा ताकत ल लगा दे हे। वइसे भासा सिखना कोई गलत बात नोहे। ए तो अउ बढ़िसा आय। फेर दूसर भासा ल सिखे बर अपन महतारी भासा ल भुला देना कतका खराब आय। आज कोनो अपन लइका ल छत्तीसगढ़ी सिखाय-बताय के कोसिस नई करय। सबे झन ह अपन लइका ल महंगा ले महंगा इंगलिस इसकूल म भरती कराथे। ताहन लइका ह न तो ढंग से छत्तीसगढ़ी सिख पाय न हिंदी अउ अंगरेजी तो बस रटे रूटाय रइथे। ताहन लइका के न घर के न घाट के जइसन हो जथे। अब ओला अंगरेजी नइ आय न हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी। ए कतेक जायज हे हमर संस्कृति ल भूला के दूसर के ल अपनाय बर मूड़ी-पूछी एक कर देना। कहू अइसे मत हो जाए छत्तीसगढ़ी भासा मर जही। अब बेरा आ गे हमन ह अभी ले अपन महतारी भासा ल लेके जागरूक हो जावन। हमर अवइया पीढ़ी ल घलो सिखावन अउ गरब ले बोलन छत्तीसगढ़ी भासा ल।