Wednesday, 1 February 2023

अंधविश्वास पर प्रहार करती किताब 'अंधविश्वास : रोग और इलाज'

अशोक भाटिया की किताब 'अंधविश्वास : रोग और इलाज' अंधविश्वास पर जबर्दस्त प्रहार करती है। यह किताब पाठकों को अंधविश्वास की अंधेरी रात से एक नई सुबह की ओर ले जाती है। इसमें ओझा-तांत्रिक किस प्रकार के कथित चमत्कारों की मदद से लोगों को ठगता है, उसका पर्दाफाश भी किया गया है। अंधविश्वास का जाल कैसे और किन कारणों से फैलता है, इसको बहुत ही सरल भाषा में बताया गया है। शुभ-अशुभ की बीमारी किस प्रकार लोगों के मन में घर बना लेता है और स्वार्थी लोगों ने अपना धंधा चलाने के लिए अशुभ का डर कैसे दिखता है यह बेहतर ढंग से बताया गया है। 

लेखक कहते हैं- अनपढ़ों की अपेक्षा पढ़े-लिखे लोग 'शुभ-अशुभ' नामक रोग से ज्यादा बीमार हैं। लेखन ने इस बीमारी का इलाज भी इसमें बताया है। शुभ मुहूर्त देखने के कारण व्यक्ति को किस प्रकार की हानि का सामना करना पड़ता है, शुभ-अशुभ व मुहर्त के नाम पर पंडित अपना पेट कैसे भरते हैं, लोग उसकी बातों में आसानी से कैसे फंस जाते हैं। अशुभ का डर और उसे शुभ में बदलने के उपाय क्यों होता है। बाबागीरी का सच क्या है, लोग बाबाओं के पास क्यों जाते हैं। चूर्ण-भभूत को तांत्रिक बाबा इतनी आसानी से कैसे बेच लेता है, चूर्ण का गोरखधंधा हमारे देश कैसे चल पड़ता है। स्वार्थी तत्वों ने सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण को राहु-केतु नामक काल्पनिक राक्षस से जोड़कर समाज में अंधविश्वास कैसे फैलाए हैं। ये तमाम बातें लेखक ने अपनी लेखनी में स्पष्ट की है।

किताब में कहा गया है कि ज्योतिष भविष्य बताने का दावा करता है, लेकिन कोरोना जैसे रोग फैलेगा उसे कभी नहीं बताया। इससे हम कैसे कहे कि ज्योतिष ठीक बताता है, ग्रहों और उनकी दशाओं मनुष्य पर कैसे प्रभाव डाल सकते हैं। इस पर भी लेखक ने सवाल उठाए हैं और ज्योतिष को सपने बेचने की कला कहा है। फलित ज्योतिष विवाह के लिए लड़के-लड़की के 36 गुणों का मिलान किया जाता है। इसके बावजूद भी कई घरों में तलाक होते हैं, महिला को प्रताड़ित किया जाता या पति-पत्नी में किसी एक की मृत्यु हो जाती है, कुंडली मिलाने के बाद भी ऐसा क्यों होता है? ज्योतिष लगन-मुहर्त निकालने का धंधा है।

मानसिक बीमारी का इलाज कराने ओझा-तांत्रिक के पास जाने का कारण अवैज्ञानिक सोच का नतीजा बताया गया है, जो मेरे खयाल से ठीक है। भूत-प्रेत को लेकर कैसा अंधविश्वास फैला है, आज जो धर्म है उसे सम्प्रदाय बताते हुए धर्म में अंधविश्वास, पाखण्ड व्याप्त है, जो समाज के लिए हानिकारक है, इसे हम सब जानते भी हैं। किताब में असल धर्म मानवता है, जो सभी पर लागू हो, ऐसा बताया गया है। हमारे समाज में अलग-अलग सम्प्रदाय है, जिसे हम धर्म मानते हैं। सभी को इंसानियत, मानवता को मानना चाहिए जिससे समाज के सभी लोग एकजुट होकर उन्नति कर सके। वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है और हमें क्यों जरूरी है? विज्ञान ने हमें क्या-क्या दिया है, विज्ञान हमेशा कुछ न कुछ खोजता रहता है और हमारे सामने उस सत्य को लाता है, जिससे अंधविश्वास का पर्दा उठ जाता है।

लेखक ने 68 पेज की छोटी किताब में अपने लेख के साथ मुंशी प्रेमचंद के अंधविश्वास, डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर, डॉ. अब्राहम टी. कोवूर, हरिशंकर परसाई जैसे प्रगतिशील लेखकों के लेख का संग्रह किए है, जिसमें अंधविश्वास पर कड़ा प्रहार किए हैं। इसके अलावा अंधविश्वास विरोधी लघुकथाएं का संग्रह है, जिसमें पाखंड और पाखण्डियों का पर्दा उठता है।


इस किताब में कम शब्दों में अंधविश्वास पर बहुत बड़ा प्रहार किया गया है, जो बहुत ही सराहनीय है, लेकिन मेरा मानना है इस प्रकार की किताब को बड़ा रूप देने की जरूरत है। आज समाज में जिस प्रकार के अंधविश्वास, पाखण्ड को बढ़ावा देने वाली अनेक साहित्य उपलब्ध है या कहूं पाखण्डियों की बाढ़ सी आ गई है। टेलीविजन, अखबार, आस-पास सभी जगह पर अंधविश्वास पैर फैलाएं बैठे हैं, ऐसी कठीन परिस्थिति में हमें "अंधविश्वास : रोग और इलाज" जैसी अनेक किताब, फ़िल्म, साहित्य की जरूरत है।

हरियाणा के अशोक भाटिया सर ने मुझे किताब भेजकर अध्ययन करने का मौका दिया और पढ़कर सुझाव के लायक समझे, इसके लिए पूरा मन से उन्हें शुक्रिया। भाटिया सर को इस किताब में बेहतरीन लेख लिखने और लेख संकलित करने के लिए बहुत-बहुत बधाई।

- मनोविज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

ब्राह्मणों के ग्रंथों में तेली और सभी पिछड़ा वर्ग की जातियां शूद्र


तेली और सभी पिछड़ा वर्ग की जातियां शूद्र है, वैश्य नहीं, लेकिन कुछ लोगों को वैश्य होने का गर्व है, वे ब्राम्हण से पूछे या अपने धार्मिक ग्रंथों में खोजे, असलियत पता चल जाएगा।

तुलसीदास दुबे द्वारा लिखित रामचरितमानस में कहा गया है कि "जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।" अर्थात तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि वर्ण में सबसे नीचे हैं। हिंदू धर्म के अनुसार अपने ही भाई बंधू को चार वर्णों में बांटे गए हैं, इसमें सबसे पहला नंबर पर ब्राम्हण (सबसे उच्च, जिनको ज्ञान अर्जन और ज्ञान देने का अधिकार है), दूसरे नंबर पर क्षत्रिय (ये ब्राम्हणों की रक्षा करेगा), तीसरे नंबर पर वैश्य या बनिया (इनका का काम व्यापार करना) और चौथे नंबर में शूद्र या नीच (जो मेहनत कश है, इसमें तेली और सभी पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी शामिल है, इन लोगों का काम ब्राम्हण और ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना है) ऐसा धार्मिक ग्रंथ में कहा गया है। रामचरितमानस में यह भी लिखा है कि "पूजहि विप्र (ब्राम्हण) सकल गुण हीना । शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा ।।" अर्थात ब्राह्मण चाहे कितना भी ज्ञान गुण से रहित हो, उसकी पूजा करनी ही चाहिए, और शूद्र चाहे कितना भी गुणी ज्ञानी हो, वो कभी पूजनीय नही हो सकता।" रामचरितमानस में यह भी कहा गया है कि "ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥" अर्थात ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री ये सब प्रताड़ना के ही अधिकारी हैं। अब आप ही बताए यह न्याय है कि अन्याय? 

वैश्य बड़े व्यापारी को कहते हैं। कोई भी साहू (तेली) और सभी पिछड़ी जातियां वैश्य नहीं है। ओबीसी शूद्र है और obc की आबादी ज्यादा होने से भी कोई भी जगह बड़े अधिकारी नहीं है। चाहे तो यूनिवर्सिटी, मीडिया, न्यायालय, मेडिकल विभाग, सभी जगह उच्च वर्ग ही है, जो 5% है। obc खेती, मजदूरी, सफाई जैसे छोटे छोटे काम में जुटे हुए हैं और अपने आप को वैश्य समझ रहे हैं। 

एक बार फिर दोहरा देना चाहता हूं- ग्रन्थ के अनुसार कथा करने का अधिकार ब्राम्हण को ही है, क्योंकि एक मात्र ब्राम्हण ही उच्च है और भगवान है, बाकी सब गुलाम है, ऐसे धार्मिक ग्रंथ में कहा गया है। आज भी देख सकते हैं, कही भी कथा, प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं, तो ब्राम्हण ही करता है और करोड़ों रूपए ले जाता है और हम obc उसको खुले मन से बिना कुछ सोचे समझे दान कर देते हैं। चाहे कथा के नाम पर अंधविश्वास ही क्यों न हो। obc कथा करना चालू कर देंगे तो इन पाखण्डियों का धंधा बंद हो जाएगा, लेकिन पाखण्ड बढ़ता जाएगा। छत्तीसगढ़ की यामिनी साहू को कथावाचन करने पर ब्रम्हानों द्वारा धमकी दी गई और कहां गया कि तुम शूद्र हो, कथा नहीं मुजरा करो।

ओबीसी, आदिवासी और दलित लोगों को बेहतर शिक्षा के लिए ध्यान देना चाहिए। हम सभी को अंधविश्वास, पाखण्ड और समाज में फैले सभी कुरीतियों से दूर रहना चाहिए, जिसमें नशा भी है। नशे चाहे शराब के हो या अंधविश्वास पाखण्ड के, दोनों ही बहुत खतरनाक होते हैं।

- टिकेश कुमार

Thursday, 13 January 2022

डर की वजह से समाज में व्याप्त है अंधविश्वास



आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग अंधविश्वास के जाल से नहीं निकल पा रहे हैं। पढ़-लिख कर भी लोग अंधविश्वास की खाई में जाकर गिर रहे हैं। विज्ञान पढ़ने वाले अवैज्ञानिक और कुतर्क की ओर बढ़ रहे हैं। इन सबके प्रमुख कारण डर (fear) है। लोगों के मन में पहले से भूत-प्रेत, डायन, भगवान और स्वर्ग-नर्क का डर बैठा दिया हैं।

इस डर से लोगों में एक सामान्य चिंता विकृति जिसे फोबिया (phobia) कहते है, उत्पन्न हो गया हैं। फोबिया मतलब व्यक्ति के लिए कोई खतरा नहीं होता है तो भी व्यक्ति उस वस्तु या परिस्थिति से डरता हैं। भूत (ghosts) का डर जिसे फासमोफोबिया कहते हैं। व्यक्ति भूत के डर से अंधेरे कमरे या अंधेरी जगह से डरते हैं, जबकि भूत नहीं होता। इसलिए व्यक्ति का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा तो भी उससे डरता हैं।

ईश्वर (God) का डर जिसे थियोफोबिया (theophobia) कहते है। लोग ईश्वर के डर के कारण पुजारियों की झोली भरते हैं। डोंगी, ओझा पुजारियों ने स्वर्ग-नरक व पाप-पुण्य के नाम से ईश्वर के डर दिखकर लोगों को ठगते हैं। जबकि ईश्वर मनुष्य के नुकसान क्यों करेगा क्योंकि ईश्वर भ्रम मात्र है।

- टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक

Tuesday, 11 January 2022

डायन (टोनही) एक भ्रम

आप लोगों ने सुना होगा कि डायन अंधेरी रात में बुंग-बुंग जलती हुई निकलती है। कुछ इसी प्रकार की बातें गांव के एक 60 साल के बुजुर्ग से सुनने को मिली। बुजुर्ग ने बताया कि जब मैं 15 साल का था तब मैं पास के गांव में मड़ई (मेला) के कार्यक्रम से नाचा (सांस्कृतिक कार्यक्रम) देखकर वापस घर आ रहा था, उस समय रात के लगभग दो बजे होंगे। मैं पैदल अपने धुन से चल रहा था तभी अचानक पीछे से सन की आवाज आई। मैं पीछे मुड़कर देखा तो कुछ बुंग-बुंग (कम-ज्यादा) जलती रोशनी दिखाई दी। मैं आगे बढ़ता गया और वह भी मेरे पीछे-पीछे आ रही थी। मैं अपना गति तेज किया तब भी मेरे पीछे-पीछे आ रही थी। वह जमीन से एक या डेढ़ फिट ऊपर थी और यह रोशनी बुंग-बुंग जलते हुए मेरा पीछा कर रही थी। वह पक्का डायन (टोनही) ही थी।

यहां 60 साल के बुजुर्ग जब 15 साल का था, मतलब 1976 की बात है। उस समय उस गांवों में बिजली नहीं थी। लोग रात के अंधरे से निपटने के लिए दीया (दीपक) या कंडील (लालटेन) का सहारा लेते थे। रात में कहीं जाना हो तो कंडील लेकर निकलते थे क्योंकि रास्ते में बिजली नहीं थी। गांव में सड़क नहीं थी इसीलिए यात्री कंडील लेकर यात्रा करते थे।

जब यह लड़का (अब बुजुर्ग) मड़ई देखकर आ रहा था उस समय उसके पीछे भी कोई व्यक्ति कंडील लेकर आ रहा था। व्यक्ति कंडील को हाथ में पकड़कर चल रहे थे तब कंडील जमीन से एक या डेढ़ फीट ऊपर था और व्यक्ति के चलने के साथ हवा उस कंडील में पड़ती थी इस कारण से कंडील बुंग-बुंग (कम-ज्यादा) जल रही थी।

लड़का जो अभी बुजुर्ग है उसने उस समय कंडील को डायन (टोनही) समझ गया, जिसे मनोविज्ञान में भ्रम (illusion) कहते हैं। कई बार अंधरे में राह चलते कोई रस्सी दिख जाए तो भी उसे सांप समझ बैठते हैं। इसलिए कोई भी चीजों को बिना जाने-समझे नहीं मानना चाहिए।

टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक

Monday, 10 January 2022

भूत-प्रेत व्यक्ति को नहीं छुपाता, व्यक्ति के लापता होने के कई कारण

गांव का एक यादव लड़का था। लगभग 10 साल पहले लापता हुआ था, आज तक वापस लौटकर नहीं आया। कुछ लोग कहते हैं गांव के ईमली पेड़ की डायन (टोनही) उस लड़के को छुपा दिया है।

हम लोग उसके परिवार से बात की तब पता चला कि उस लड़का को कोई डायन नहीं छिपाया है, बल्कि उस लड़के में मानसिक बीमारी के लक्षण थे। पहले तो उसके पिताजी कहने लगे कि लड़का को कोई प्रेत या डायन छिपा दिया हैं। उसके पिता ने बताया कि लड़का को लापता से पहले भूत-प्रेत के साथ हड्डियां व कंकाल दिखाई देता था। उसके चारों ओर हड्डी ही हड्डी व कंकाल दिखता था और उसका चेहरा पसीने से लाल हो जाता था और एकदम से घबरा जाता था।

एक दिन आस-पास के लोगों के कहने पर उनके घर वालों ने लड़का को ओझा तांत्रिक (बईगा) के पास लेकर गए। तांत्रिक ने झाड़-फूंक व तंत्र-मंत्र कर भभूत खाने को दिया और ठीक हो जाएगा कहकर घर जाने को कहा। ऐसे ही कुछ समय तक झाड़-फूंक चलता रहा। एक दिन अचानक से लड़का बकरी चराते गांव के जंगल में लापता (गुमशुदा) हो गया। तंत्र-मंत्र कुछ काम नहीं आया रिश्ते-नाते सब के यहां पता किया, लेकिन आज तक उस लड़का को खोज नहीं पाए।

उस लड़के को मानसिक बीमारी मनोविदालिता (Schizophrenia) था। ऐसे रोगी में प्रायः देखा गया है कि विभ्रम (hallucination) होता हैं। विभ्रम में कुछ नहीं (उद्दीपक) होने के बावजूद भी रोगी को लगता है कि वहां कुछ दिख रहे हैं। आवाज नहीं आती है तब भी रोगी को इसी चीज या व्यक्ति की आवाज सुनाई देती है।

यहां पर भी लड़का को हड्डियां, कंकाल नहीं होने पर भी उसे दिखाई देता था। ठीक से ईलाज नहीं होने के कारण लड़का सुध (चेतना) खो गया और बकरी चराते-चराते कहीं चला गया। इस रोगी लड़का को मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक की आवश्यकता थी न कि ओझा व तांत्रिक की।

टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक

Thursday, 6 January 2022

कोई चमत्कार नहीं बल्कि हाथों की सफाई, लोगों को पाखंडियों से बचने की जरूरत - प्रो. मुंडे


रायपुर. एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ) की ओर से दो दिवसीय अंधविश्वास उन्मूलन कार्यक्रम का आयोजन नवा रायपुर स्थित ग्राम बिरबिरा में हुआ. कार्यक्रम में मुख्य वक्ता लेखक प्रो. मछिन्द्रनाथ मुंडे और महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की राज्य सचिव सुशीला मुंडे शामिल हुए. प्रो. मुंडे ने ने बताया कि ढोंगी बाबा किस तरह भोले-भाले जनता को अपने जाल में फंसाते हैं. उन्होंने कहा कि पाखंडी बाबा सिर्फ अपनी जेब भरने वाले होते हैं. इसकी करनी और कथनी में अंतर है. इन बाबाओं से बचने की जरूरत है और लोगों को समझाने की आवश्यकता है. तभी एक अच्छे समाज की कल्पना कर सकते हैं.

कार्यक्रम के पहले दिन मंगलवार को सुशीला मुंडे ने पृथ्वी की उत्पत्ति और जीव-जंतुओं का विकास के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि 460 करोड़ साल पहले पृथ्वी उत्पत्ति हुई. फिर धीरे-धीरे जीव-जंतुओं का विकास होता गया. इसके बाद 40 हजार वर्ष पहले आधुनिक मानव होमो सोपियन आया. आज लोग अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं फिर भी अंधविश्वास की चंगुल से नहीं छूट पाए. सुशीला ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए शिक्षा में बदलाव बहुत ही जरूरी है. तार्किक बातों की शिक्षा में शामिल करने से ही समाज में बदलाव होगा. वहीं परिवार और अपने आस-पास में भी तमाम रूढ़िवाद का पूरजोर विरोध करना होगा.
चमत्कारों का पर्दाफाश

प्रो. मुंडे ने ढोंगी बाबाओं द्वारा दिखाए जाने वाले चमत्कारों का पर्दाफाश किया. उन्होंने खाली हाथों को लहराते हुए नोटों की बारिश की. प्रो. मुंडे ने बताया कि ढोंगी बाबा ऐसे ही चमत्कार के फेर में लोगों को फंसाता है. प्रो. मुंडे ने कहा कि पाखंडी बाबा कई चमत्कार दिखाने का दावा करते हैं, लेकिन असलियत में यह नहीं होता है. बल्कि आपको गुमराह करने की कोशिश होती है. इसको हमें समझने की सख्त जरूरत है. क्योंकि आज तक दुनिया में कोई मरा हुआ व्यक्ति को जीवित नहीं कर सका है. उन्होंने कहा कि कोई पाखंडी बाबा चमत्कार नहीं करते बल्कि, भक्तों को वह काम देते हैं. इन बाबाओं से बचने के लिए पहले समूह पर चर्चा करने की आवश्यकता है. इसके अलावा पुलिस और प्रशासन आदि को ध्यानाकर्षण कराने की जरूरत होती है. उन्होंने बाबागिरी का मुकाबला कैसे करें इसके बारे में भी बताया. उन्होंने कहा कि हमें पहले तो स्वास्थ्य, कानून और काउंसलिंग पर जोर देने की आवश्यकता है. उन्होंने ये भी कहा कि कई पाखंडी बाबाओं के पास बचने के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप होता है. इसको सोशल मीडिया में वायरल कर पर्दाफाश करना होगा.

राशिफल और ज्योतिष शास्त्र पूरी तरह असत्य

प्रो. मुंडे ने राशिफल और ज्योतिष शास्त्र को पूरी तरह से असत्य बताया. उन्होंने कहा कि ज्योतिष कमाई के लिए ग्रह-नक्षत्रों का सहारा लेते हैं और गलत जानकारियां लोगों तक पहुंचाते हैं, जिसका विरोध किया जाना चाहिए. प्रो. मुंडे ने हाथों की सफाई से एक चम्मच को मोड़ते हुए नीचे गिरा दिया. इसी तरह कैलेंडर में शॉर्टकट से गुणा-भाग करने का तरीका बताया. इसके अलावा उन्होंने ज्योतिष गणना खेल का पर्दाफाश किया. प्रो. मुंडे ने बेल्ट से एक उंगली में लोहे को उठाकर सब को दिखाया कि किस प्रकार पाखंडी बाबा लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. उन्होंने बिना माचिस के नारियल पर आग लगाकर दिखाया. साथ ही नारियल के अंदर से रंगीन कपड़ों के टुकड़े को निकाल कर दिखाया. प्रो. मुंडे ने पानी से दिया जलाकर सबको चौंका दिया. दरअसल पानी में केमिकल मिलाकर उसमें आग लगाई गई. साथ ही पानी से चना बना कर सबको चौंका दिया.
मन की बीमारियों के बारे में विस्तार दी जानकारी

प्रो. मुंडे ने मन और मन की बीमारियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने कहा कि दिमाग में रासायनिक परिवर्तन की वजह से मानसिक बीमारी होती है. लोग अज्ञानतावश मन की बीमारी को ठीक कराने के लिए तांत्रिक का सहारा लेते हैं. प्रो. मुंडे ने लोगों से अपील की है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को झाड़-फूंक न कराएं, उन्हें मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक के पास इलाज के लिए ले जाएं. प्रो. मुंडे ने कहा आग खाकर और कलाई पर आग का मशाल को चलाकर दिखाया. वहीं खाली लोटे से पानी निकालकर दर्शकों को चकित कर दिया. साथ ही नींबू से आग निकालकर भी दिखाया. उन्होंने बताया कि इस प्रकार के चमत्कार दिखाकर ढोंगी तांत्रिक ठगने का काम करता है.
बाबागिरी और पाखंड की खुली पोल

सुशीला मुंडे ने बाबागिरी और पाखंड की पोल खोली. उन्होंने बताया कि देश में चमत्कारी बाबा, आध्यात्मिक बाबा, अवतारी बाबा, जड़ी-बूटी बाबा और ज्योतिष बाबा कहकर ढोंगी तांत्रिक लगातर जनता को अपने जाल में फंसा रहे हैं. भय और अशिक्षा की वजह से लोग फरेबी तांत्रिकों के फेर में फंस जाते हैं. स्वर्ग-नरक की काल्पनिक बातों में ढोंगी बाबा जनता को उलझा देता है. उन्होंने चमत्कारों की भुल-भुलैया में न फंसने की अपील की है.
युवाओं से बेहतर समाज बनाने की अपील

कार्यक्रम का समापन बुधवार को हुआ. सुशीला मुंडे ने संगठन निर्माण और पदाधिकारियों की भूमिका को लेकर जानकारियां साझा की. उन्होंने अंधविश्वास को मिटाने के लिए युवाओं से एंटी सुपरस्टेशन आर्गेनाइजेशन के जरिए स्वच्छ समाज बनाने के लिए आह्वान किया. कार्यक्रम के समापन अवसर पर एएसओ के उपाध्यक्ष गौरव प्रसाद ने आभार व्यक्त किया.
कार्यक्रम में ये रहे मौजूद

कार्यक्रम में एएसओ के अध्यक्ष टिकेश  कुमार, उपाध्यक्ष गौरव प्रसाद, कोषाध्यक्ष राजू कुमार, सचिव जितेंद्र, मीडिया सलाहकार वाकेश कुमार, सांगठनिक सलाहकार गनपत लाल, मोती लाल, अनुसुइया, सत्तू राम, शिव साहू, भूखेंद्र, मोहन साहू, तोमन साहू, रोशन साहू, लिक्कू साहू, हीरा लाल, ताराचंद साहू, टोमेश तारक, सोमनाथ सेन, हरिश चन्द्र साहू और बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे.

Sunday, 2 January 2022

अंधविश्वास क्या है?

अंधविश्वास ऐसे व्यवहार को कहते है जिसमें ऐसे उद्दीपक तत्व जिसे प्राणी को देने से भविष्य में कार्य करने की क्षमता को प्रभावित नहीं करता है। लेकिन प्राणी या व्यक्ति को ऐसे लगता है कि यह तत्व व्यक्ति के भविष्य के कार्य को प्रभावित करता हैं। दिन-प्रतिदिन के जीवन में ऐसे व्यवहार अनेकों मिल जाते है, जैसे- पैर पर छिपकली गिरना शुभ मानना, घर के दरवाजे पर शुभ-लाभ लिखना शुभ मानना, पूर्व दिशा मुख करके दिया जलाना को शुभ मानना, बिल्ली द्वारा रास्ता काटने को अशुभ मानना, रात को नाखून काटना अशुभ मानना, नींबू-मिर्ची के ठुवे को खुदना अशुभ मानना, घर से निकलते समय थाली को रास्ते पर देखना अशुभ मानना आदि। इन सभी व्यवहार अंधविश्वासी व्यवहार है इससे भविष्य से कोई संबंध नहीं हैं।

बी एफ स्कीनर मनोवैज्ञानिक ने 1948 में अंधविश्वास व्यवहार को अपने प्रयोगशाला में चूहे पर अध्ययन करके देखा। स्कीनर के अनुसार- अंधविश्वास व्यवहार से तात्पर्य वैसे व्यवहार अनुबंधन से होता है जिसमें अनुक्रिया तथा पुनर्बलन (reinforcement) के बीच एक स्पष्ट अकार्यात्मक (nonfunctional) या संयोग संबंध होता है। ऐसी परिस्थिति में प्राणी को यह अनुभव होता है कि उसके अमुक व्यवहार का कारण अमुक पुनर्बलन ही है जबकि सच्चाई यह है कि उस व्यवहार तथा पुनर्बलन में कोई वास्तविक संबंध नहीं होता है।

अंधविश्वास के चलते कितनों की जान गई हैं, आए दिन सुनने को मिलता है कि झाड़-फूक ने बच्चे या महिला की ली जान। अमुक गांव की महिला को टोनही के नाम पर जिंदा जलाया। ऐसे कई मामले सामने आते है, हम उस समय ताजुब या आश्चर्य पड़ जाते है जब विज्ञान विषय के विद्यार्थी या शिक्षक विज्ञान से परे ओझा-तांत्रिक के जल में आ जाता है। पोस्टग्रेजुएट व्यक्ति मुहर्त राशिफल के कुतर्क पर विश्वास करने लग जाता है, पुनर्जन्म होगा सोचकर मंदिर के भगवान के सामने हाथ का नस काटकर मर जाता है।

टिकेश कुमार

व्यक्ति के भीतर बुरी आत्मा,भूत-प्रेत, पिशाच नहीं, यह एक मानसिक बीमारी

प्राचीन काल के जीववादी विचारधारा में ग्रीक,चीन तथा मिस्र आदि देशों की कुछ जातियों का भी यही मानना था कि जब व्यक्ति के प्रति भगवान (गॉड) की कृपा दृष्टि समाप्त हो जाती है तो ईश्वर की ओर से अभिशाप या दंड के रूप में व्यक्ति के मन, बुद्धि भ्रष्ट हो जाता है और व्यक्ति किसी प्रेत या बुरी आत्मा के चंगुल में फंस जाता है।

इसलिए उसका उपचार का तरीका भी काफी अलग था। अपदूत-निसारन विधि से प्रार्थना करना, जादू-टोना, झाड़-फूंक, कोड़े मारना, लम्बे समय तक भूखे रखना तथा शराब के शोधक पिलाना आदि। उस समय के चिकित्सकों का मानना था कि इस प्रकार के उपचार से मानसिक रोग से ग्रसित व्यक्ति का शरीर इतना कष्टदायक हो जाएगा, जिससे शरीर में प्रवेश की हुई बुरी आत्मा अपने आप शरीर छोड़कर भाग जाएगी और तब व्यक्ति स्वस्थ हो जाएगा। इसी प्रकार दूसरी विधि ट्रीफाइनेशन है। इस विधि में नुकीले पत्थरों से मार-मार कर ऐसे व्यक्तियों की खोपड़ी में एक छेद कर देते थे। इस विधि से उपचार करने वालों का मानना था कि खोपड़ी में छेद करने से बुरी आत्मा शरीरी से बाहर निकल जाएगा और व्यक्ति ठीक हो जाएगा।

जीववादी चिंतन के बाद एक विवेकी तथा वैज्ञानिक विचारधारा  मेडिकल विचारधारा का जन्म हुआ। जिसमें ग्रीक चिकित्सक हिपोक्रेट्स जिन्हें आधुनिक चिकित्साशास्त्र का जनक माना गया है, ने एक क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मानसिक रोग की उत्पत्ति कुछ स्वभाविक कारणों से होती है, न कि शरीर के भीतर बुरी आत्मा के प्रवेश कर जाने से या देवी-देवताओं के प्रकोप से।

आधुनिक मनोरोगविज्ञान का जनक फ्रेंच चिकित्सक फिलिप पिनेल ईश्वरपरक, आध्यात्मिक एवं अंधविश्वासी विचार जो मूलतः पादरियों एवं पुजारियों के अमानवीय दृष्टिकोनों को गलत बतलाते हुए इस बात पर सामूहिक रूप से बल डाला कि मानसिक रोग किसी दुष्ट आत्मा या दैविक प्रकोप के कारण नहीं होता है, बल्कि यह एक बीमारी है। जिसका उपचार अन्य शारीरिक बीमारियों के समान होना मानवीय ढंग से होना चाहिए।

इस प्रकार मानसिक रोग के संबंध में दुष्ट आत्मा-सम्बंधी विचार समाप्त हो गया और उसकी जगह पर इस रोग के सम्बंध में एक स्वस्थ, विवेकी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शुरुआत हो गई।

टिकेश कुमार

झाड़-फूंक से बीमार लोग ठीक होते हैं या नहीं ?

जब भी कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है तो डॉक्टर के पास जाता है, ये हम सब जानते हैं। इसके अलावा लोग ओझा व तांत्रिक के जाल में फस जाते हैं।

तांत्रिकों के जाल में फसने वाले लोग निम्न प्रकार के होते हैं -

1. वह व्यक्ति जो डॉक्टर से ईलाज कराकर थक चुके होते हैं और उसका मानना होता है कि अब एक ही रास्ता से ठीक हो सकता हैं. वह है झाड़-फूंक से, इसीलिए मरीज को तांत्रिक के पास लेकर चले जाते हैं। इस ईलाज में व्यक्ति धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती हैं।

2. डॉक्टर के पास न ले जाकर सीधे तांत्रिक के पास ले जाता हैं। ये लोग डॉक्टर से ज्यादा तांत्रिक पर विश्वास करते है या ऐसे क्षेत्र जहां डॉक्टर नहीं होते हैं, इसलिए सीधे मरीज को तांत्रिक के पास ले जाते हैं। इसमें व्यक्ति की बीमारी छोटी है या सामान्य बीमारी है, जैसे खून की कमी, कमजोरी व थकान तो खान-पास से धीरे-धीरे ठीक हो जाता है। अगर गंभीर बीमारी है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, कहने का मतलब है अगर व्यक्ति में सामान्य बीमारी है तो रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण ठीक हो जाता हैं और मरीज को लगता है तांत्रिक के तंत्र-मंत्र के कारण ठीक हुआ हूं। अगर गंभीर बीमारी है तो व्यक्ति के रोगप्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी से नहीं लड़ पाता है, इसीलिए मरीज मर जाता हैं।

3. इसमें ऐसे लोग होते है जो डॉक्टर के पास ईलाज कराने के साथ तांत्रिक के पास भी ईलाज करता हैं। इसमें मरीज डॉक्टरी ईलाज के कारण ठीक हो जाता है और मरीज को लगता है तांत्रिक के तंत्र-मंत्र के कारण ठीक हुआ हूं।

इस प्रकार तंत्र-मंत्र से मरीज ठीक नहीं होता है। ओझा, तांत्रिक व ढोंगी बाबाओं के कारण व्यक्ति मर जाते हैं।

बच्चों का मन और उस पर प्रभाव

बच्चों का मन (mind) एक कोरा कागज के समान होता है, जिस पर परिवार और आस-पास के वातावरण का प्रभाव पड़ता है। बालमन को मुख्य रूप से परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों को ऐसे माहौल दें कि बच्चे में धनात्मक (positive) प्रभाव पड़े न कि नकारात्मक (negetive)।

आज देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया अंधविश्वास, आक्रमकता, जातिवाद और सम्प्रदायिकता खूब फैला रहे हैं। जैसे-राशिफल, भूत-प्रेत, नाग-नागिन और कई काल्पनिक धारावाहिक परोसे जाते हैं, जिसके प्रभाव बच्चे की मानसिक स्थिति में सीधे नकारात्मक (negetive) पड़ते है और बच्चे का मनोबल कमजोर होता है।

- टिकेश कुमार, मनोवैज्ञानिक