Saturday, 23 September 2023

मेहनत करे कोई, जेब भरे कोई


खेत में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी किसान के हाथ में कुछ पैसे नहीं बचता, सब बराबर हो जाता है। कई बार खराब मौसम के कारण फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे किसान के पास खाने के लिए भी नहीं रहता और अलग से कर्ज में डूब जाते हैं।

मौसम सही-सही रहा तो फसल बढ़िया पैदा हो जाती है, लेकिन फिर संकट आ खड़ा होता है। फसल का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता। जिससे फसल को पानी से भी कम मूल्य में बेमन बेचना पड़ता है। फिर वही फसल पूंजीपति स्टोर कर के रख लेता है, जब किसान के पास वह फसल नहीं होता। किसान पूरी फसल को बेच चुके होते हैं तब उस फसल का बाजार में अधिक मूल्य हो जाता है, इससे आम जनता को मंहगाई का सामना करना पड़ता है। शहरी लोगों को लगता है दाल-चावल, गेंहू, सब्जी जो किसान उतपन्न करते हैं उसका मूल्य बढ़ा है तो किसान को फायदा हो रहा है। कुछ लोगों को ऐसा भी लगता है किसान ही ये सब का दाम बढ़ा दिया है, जिससे महंगाई बढ़ गई है। और सब्जी बेचने वालों से मोलभाव करने लगते हैं।

जिसने कभी मेहनत नहीं की और खेती नहीं की उन सभी लोग आज देश में ऐशोआराम कर रहे हैं, मुफ्त में खा रहे हैं। मेहनत करने वालों के खून-पसीने की कमाई खा रहे हैं। जिसमें हमारे राजनेता पहला स्थान पर है। एक विधायक की सैलरी और पेंशन पूरा देश कंगाल हो गया है। मेहनत करने वालों से कहता है कि गरीब जनता को मुक्त में चावल दे रहे हैं। उस नेताओं से पूछना चाहिए कि कौन से खेत में फसल लगाया था? कहां मेहनत किया था या कौन से अपने बाप- दादाओं के घर से लाए। नेताओं के चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों के बाद इतने पैसे आ जाते हैं जिससे उसके कई पीढ़ी बैठकर खा सकती है। इतने पैसे कौन सी मिट्टी में पैदा किया उसका जवाब जनता को मांगना चाहिए। सब सुविधा नेताओं और अधिकारियों के पास है।

मेहनत करने वाली जनता से मूलभूत आवश्यकताओं को भी छीन लिया है। और जनता आज अंधविश्वास की अफीम के नशे में चुर होकर जी रही है। जिस देश और समाज में अंधविश्वास और नशे की तल हो वहां के लोगों को सही गलत कुछ नहीं दिखता और मूर्ख को भी सत्ता का ताज पहना देता है। इसलिए सरकार कभी नहीं चाहती कि जनता होशियार बने और अंधविश्वास व नशे से दूर रहे। सरकार लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं चाहती।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

Thursday, 21 September 2023

गणेशोत्सव का इतिहास और हमारा समाज


देशभर में गणेशोत्सव की धूम है, लेकिन आप अपने विवेक के साथ सोचिए क्या गणेश की कहानी सत्य हो सकती है। मुझे तो यह पूरी तरह काल्पनिक लगती है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मैल से कैसे पैदा हो सकता है। इस कहानी में एक महिला (पार्वती) अपने शरीर की गंदगी से बच्चा बना देता है और वह कुछ समय में इतना बड़ा हाे जाता है कि महिला के पति (शंकर) भी नहीं पहचान पाता है। जब वह बच्चा (गणेश) शंकर को घर के अंदर प्रवेश करने पर रोकता है तो शिव शंकर गुस्से से गणेश का सिर काट कर धड़ से अलग कर देता है। जब गणेश की मां पार्वती देखती है तब शंकर पर क्राधित होकर कहती है- ये क्या अनर्थ किया तुमने अपना ही पुत्र को मार दिया। इसे जिन्दा करना होगा, नहीं तो हम सभी देवी मिलकर पूरी सृष्टि को नष्ट कर देंगे।

तब सभी देवता चिंतित होकर शिव से इस समस्या का समाधान करने को कहते हैं। फिर शंकर देवों को आज्ञा देता है कि दूसरे नवजात शिशु का सिर काट कर लाए। कोई नवजात शिशु नहीं मिलता तो हाथी का बच्चा का सिर काटकर ले आते हैं और उसे गणेश के मृत शरीर में जोड़ देता है और गणेश पुनः जीवित हो जाता है। इस प्रकार की काल्पनिक कहानी पाखंडी लोग गढ़ दी है और भोली-भाली जनता इस कहानी को सत्य मानकर नकली भगवान की पूजा कर रहे हैं।

पूरी तरह से अवैज्ञानिक और काल्पनिक

वैज्ञानिक दृष्टि से देखे तो कोई भी व्यक्ति के शरीर पर किसी भी जानवर का सिर नहीं जोड़ा जा सकता है। यहां तक जानवर के खून को मनुष्य के शरीर में नहीं डाला जा सकता है। मनुष्य के खून को दूसरे व्यक्ति के शरीर में डालने से पहले कौन सा ब्लड ग्रुप है उसकी सावधानी से जांच की जाती है, जब संभव हो तब खून को निकालकर बीमार व्यक्ति के शरीर में डाला जाता है।

हाथी का सिर और मनुष्य का धड़ को जोड़ना असंभव

चलो मान लेते हैं उस समय अज्ञानता के कारण बिना सोचे समझे हाथी का सिर गणेश के शरीर में जोड़ने का प्रयास किया होगा। लेकिन हाथी का सिर मनुष्य का सिर से बहुत बड़ा होता है, अगर तुरंत जन्म लिया हुआ हाथी का सिर भी एक मनुष्य का बच्चा में फिट किया जाए तो आकार में हाथी का सिर बड़ा होने के कारण सर्जरी करना असंभव है।

सभी देवी-देवता मनगढ़त कहानी

इसके अलावा और भी कई सवाल है। जैसे कोई भी व्यक्ति के चार हाथ कैसे हो सकते हैं? बहुत से देवी-देवताओं की तस्वीरों और मूर्तियों में आपने देखा होगा चार हाथ वाला दिख ही जाएगा। जिसमें एक गणेश की मूर्ति भी शामिल है। दुनिया में आज तक किसी मनुष्य को चार हाथ के नहीं देखा या पाया गया। सभी मनुष्य दो हाथ के ही है। इस प्रकार के चार हाथ और चार मुंह के भगवान काल्पनिक नहीं तो और क्या?

अब ये मत कहना कि भगवान के लिए कोई असंभव नहीं। भगवान पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए। ठीक है, मान लेते हैं भगवान बहुत शक्तिशाली है उसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं है, तो आप बताएंगे कि शक्तिशाली, सर्वज्ञानी ईश्वर अपने ही पुत्र को क्यों नहीं नहीं पहचान सके। एक बच्चा गणेश जब शंकर को रोकता है, जिससे शिव क्रोध में आकर बच्चा को मार देता है, इतना क्रोधी है भगवान। उस समय उसकी बुद्धि कहां चली गई थी।

क्रोधित व्यक्ति को कैसे कह सकते हैं भगवान

इतना क्रोधित थे शिव कि गणेश को इतना बेरहमी से मारा जिससे उसका सिर पूरा नष्ट हो गया। जब भगवान है तो गणेश का नष्ट सिर को वापस भी ला सकता था, उसके लिए नामुमकिन नहीं होना चाहिए था। क्या जरूरत थी बेजुबान हाथी का बच्चा का सिर काटकर हत्या करने की? और वह भी तो किसी का बच्चा है। अपना स्वार्थ के लिए दूसरे का बच्चा (चाहे कोई जानवर ही क्यों न हो) उसकी बलि देना गलत है। इसे कैसे भगवान कह सकते हैं?

गणेशोत्सव की शुरूआत कैसे हुई

गणेशोत्सव या गणेश पूजा की शुरूआत महाराष्‍ट्र से हुई है। कहा जाता है कि गणेशोत्‍सव की नींव आजादी की लड़ाई के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने रखी थी। 1894 में स्‍वतंत्रता संग्राम के दौरान तिलक पुणे में गणेश की मूर्ति स्थापित की। 10 दिन तक खूब पूजा-पाठ हुआ। बताया जाता है कि 11वें दिन जब गणेश की मूर्ति की यात्रा निकाली गई तो एक दलित व्यक्ति ने उसे प्रणाम करने के लिए छू दिया। इतने में ब्राम्हणों ने कहा कि गणपति अपवित्र हो गया। सभी पुजारियों ने गंगाधर तिलक को गरियाते हुए कहने लगे कि देखा, गणपति को सार्वजनिक किया, तो धर्म डूब गया। अब कौन ब्राह्मण इस मूर्ति को अपने घर में रखेगा ? तभी तिलक ने कहा, अरे चिल्लाते क्यों हो ? शांत रहो मैं धर्म को डूबने कैसे दूंगा ? धर्म को डुबोने की अपेक्षा हम इस अपवित्र मूर्ति को ही डुबो देते हैं और इस प्रकार गणपति की मूर्ति को डुबो दिया गया। इसी दिन से यह गणेश विसर्जन का रिवाज चल पड़ा। यह पूरी तरह से शूद्रों का अपमान है, लेकिन यहीं शूद्र (SC, ST, OBC) बड़े हर्षोउल्लास के साथ अपना अपमान का त्योहार मनाते हैं।

मेहनत, समय, धन और प्रकृति की बर्बादी

गणेश की मूर्तियों को बनाने में बहुत ही ज्यादा समय, धन और मेहनत लगते हैं। बड़ी-बड़ी मूर्तियों को खरीदकर नदी में बहाने से समाज का कोई कल्यान नहीं होता, बल्की देश और लोगों की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाती है। अगर इसी पैसों से लोग अपने घर और समाज के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत चीजों पर खर्च करते तो उनका बेहतर विकास होता। बड़ी-बड़ी मर्तियों से तालाब, नहर, नदियां और अन्य जल स्त्रोत पूरी तरह से बर्बाद होते जा रहे है। भगवान और धर्म की आड़ पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। गणेशोत्सव के दौरान पूरे 11 से 15 दिनों तक सड़कों पर धर्म की आड़ पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया जाता है। 

जागरूक लोगों को लेनी होगी जिम्मेदारी

भगवान के नाम पर जोर-जोर से कानफोड़ू डीजे बजाया जाता है। यह आवाज सुनकर अगर भगवान होता तो आत्महत्या कर लेता। डीजे पर अश्लील गाने बजाते हुए भक्त गांजा, भांग और शराब के नशे में झूमते नजर आते है। सड़क पर कोई लड़की मिल जाए तो ये छेड़छाड़ करने में उतारू हो जाते हैं। इस प्रकार धर्म के नाम पर सड़क पर नगा नाच जारी है। शासन-प्रशासन पूरी तरह से आंख और कान बंदकर अपाहिज की तरह मौन है। सरकार को वोट बैंक की चिंता है, इसलिए जनता को धर्म की अफीम देकर मस्त है। सभी नेता भोली-भाली जनता को धर्म और भगवान जैसी काल्पनिक बातों पर उलझाकर सत्ता की मलाई खा रहे हैं। अब जागरूक लोगों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी और अपने समाज को विवेकवान बनाना होगा, तभी यह भेड़िया धसान खत्म होगी और हमारी पीढ़ी बेहरत होगी।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

Thursday, 14 September 2023

भीड़ के पीछे भेड़िया धसान चल रहे लोग


आज भीड़ का दौर चल रहा है। जिधर भीड़ जा रही है, उधर लोग भाग रहे हैं। लोग समझते हैं कि बहुत लोग (भीड़) उस दिशा में जा रहे हैं तो यही रास्ता सही है या बहुत से लोग मान रहे हैं तो यही सही है। इस प्रकार लोग भीड़ के साथ चलने लगता है। कभी यह नहीं सोचता कि जिस भीड़ के साथ चल रहा हूं क्या वह सच में सही है? आगे खाई में तो डूबा तो नहीं देगा? ऐसा सवाल कभी नहीं आता बस भीड़ चल रही है तो हम भी चले, बहुत से लोग गलत नहीं हो सकता। ऐसा सोचकर भीड़ के साथ चलने लगता है। संत कबीर ने सही कहा है "कैसी गति संसार की ज्यों गाडर की ठाट, एक परा जो गड्‌ढे में, सबै गड्‌ढे में जात।"

व्यक्ति पर भीड़ डातली है दबाव

ऐसा कदापि नहीं है कि भीड़ गलत नहीं हो सकती। भीड़ गलत हो सकती है। इसका प्रमुख कारण सत्ताधारी शोषकों का डर है। क्या पता सही को सही कहे और आपको सत्ता में बैठे लोग दंडित कर दे। इसलिए हर व्यक्ति अपना बचाव चाहता है। मुंह बंद करके भीड़ के साथ ही चला जाता है। इस भीड़ से एक दो व्यक्ति अगर निकलकर सत्य को उजागार करना चाहे तो उसकी मुंह बंदकर दी जाती है, उस व्यक्ति पर भीड़ अपने साथ चलने के लिए दबाव डालती है।

एक उदाहारण

स्कूल की क्लास में बहुत से बच्चे उपस्थित थे। हर गुरुवार की तरह आज भी सरस्वती की पूजा करने के लिए तैयारियां चल रही थी। इसमें एक बच्चा शांतिपूर्ण पढ़ाई कर रहा था। कुछ समय के बाद जब पूजा की सभी तैयारी हो गई तो सभी बच्चे टेबल से उठकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए। लेकिन एक छात्र जो शान्तिपूर्ण पढ़ाई कर रहा था वह पढ़ ही रहा था, टेबल से उठने का नाम नहीं लिया। तब सभी बच्चे उस बच्चे को ऐसा देखते रहे जैसे कोई अपराधी क्लास में आ बैठा हो। सभी को देखकर वह छात्र भी टेबल से उठकर खड़ा हो गया। तब जाकर जोर-शोर से पूजा चालू हुई। ऐसे बहुत से उदाहारण हमारे दिनचर्या में रोज घटित होते हैं, जहां भीड़ व्यक्ति को दबा देती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के नाते भीड़ में दबकर रह जाता है, वहां से निकल नहीं पाता।

भीड़ के पीछे न चले

अपना रास्ता खुद ढूंढें, सत्य क्या है? इसे जानने की कोशिश करें। लोग जा रहे हैं तो क्यों जा रहे हैं, आगे कहां तक जाएगा। उसके साथ हम क्यों चले? अपना विवेक से सोचें। तभी देश और समाज का भला हो सकता है, नहीं तो अंधविश्वास के अंधेरे में डुबकी लगाते रह जाओगे।

- टिकेश कुमार

क्या विज्ञान की तरक्की से अंधविश्वास खत्म हो रहा है?


आज विज्ञान का प्रकाश सभी तरफ तेजी से फैल रहा है, लेकिन क्या इस आधुनिक कहे जाने वाले समाज से अंधविश्वास का अंधेरा खत्म हो रहा है? यह सवाल अंधविश्वास से छुटकारा पाने वाले हर एक व्यक्ति के मन में उठ रहा होगा। मैं बताना चाहूंगा कि अंधविश्वास बहुत ही खतरनाक जानलेवा है, जिसमें हर धार्मिक परिवार किसी न किसी पाखंड, अंधविश्वास में फंसा हुआ है। इस अंधविश्वास की समस्या से समाज हजारों साल से तड़प रहा है। आये दिन अंधविश्वास से लोगों की मौत हो रही है।

घटना का कारण पता नहीं होता तब तक चमत्कार

मनुष्य में किसी घटना को लेकर ज्ञान नहीं रहता तब तक उस घटना में चमत्कार लगता है। जब उस घटना के कारण को समझने लगते हैं तब धीरे-धीरे चमत्कार खत्म हो जाता है। उस चमत्कार से होने वाला अंधविश्वास भी नष्ट हो जाता है। इसलिए हर घटना के कारण को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करना चाहिए। जिससे हम और हमारा समाज चमत्कार को नमस्कार न करें और अंधविश्वास से मुक्त रहें।

विज्ञान और अंधविश्वास की लड़ाई

विज्ञान के आने से अंधविश्वास बहुत कमजोर पड़ जाता है। कुछ ऐसा अंधविश्वास जो धर्म से अछूते है खत्म हो जाता है, लेकिन जहां धार्मिक अंधविश्वास की बात आती है वहां अंधविश्वास को खत्म करना अंधों को आईना दिखाने जैसा है। इतिहास गवाह है- धर्मग्रंथों के हिसाब से पूरी दुनिया में ये अवधारणा प्रचलित थी कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है। निकोलस कोपलनिक्स ने धार्मिक अवधारणा के उलट कहा कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, तब उनका बहुत विरोध हुआ। कोपलनिक्स के निधन के बाद जब गैलीलियो ने उस थ्योरी को सार्वजनिक करते हुए बताया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है तब गैलेलियो को पूरी जिंदगी नजरबंद रखा गया।

विज्ञान को विरोध का सामना

विज्ञान को धार्मिक विरोध का सामना करना पड़ता है, चाहे कितना भी वैज्ञानिक मत रख ले, फिर धीरे-धीरे वही धर्म को मनना पड़ा कि वैज्ञानिक खोज ही सत्य है। ऐसा गैलीलियो के साथ भी हुआ पहले विरोध हुआ फिर तीन सौ सालों बाद धार्मिक चर्च को माफी मांगते हुए गैलीलियो की थ्योरी को सत्य मनाना पड़ा और आज हम सब पढ़ते है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।

लोगों को वैज्ञानिक चेतना की जरूरत

आज वैज्ञानिक चांद पर जा चुके हैं और सूर्य के लिए भी यान भेज चुके हैं, लेकिन अंधविश्वास से समाज नहीं निकल पा रहा है। विज्ञान जितना तरक्की करें, लेकिन अंधविश्वास को खत्म करने के लिए लोगों को वैज्ञानिक चेतना की जरूरत है, तभी देश और समाज अंधविश्वास से निकल सकते हैं। एक अंधविश्वास खत्म होता है तो दूसरा अंधविश्वास का जन्म होता है, ऐसा ही चलता रहता है। कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ के लिए अंधविश्वास को फैलाते हैं, जिससे उसका घर-परिवार चल सकें। इसके लिए हर एक तर्कशील व्यक्ति को पाखंडी तांत्रिक के कथित चमत्कारों को वैज्ञानिक जांच पड़ताल कर के खंडन करने की जरूरत है।

- टिकेश कुमार

Wednesday, 23 August 2023

वैज्ञानिक चांद पर


वैज्ञानिक चांद पर पहुंचे
चाहे पहुंचे मंगल पर
राहु-केतु और शनि का डर
लोगों को नहीं छोड़ेगा
शुभ-अशुभ का भय नहीं छोड़ेगा
अंधविश्वास लोगों को नहीं छोड़ेगा
पाखंड करना लोग नहीं छोड़ेंगे

जाति का भेदभाव नहीं छूटेगा
धर्म के नाम पर लड़ना नहीं छोड़ेंगे
अज्ञानी लोग यही कहेंगे
सूर्य को हनुमान ने निगल लिया था
तो चंद्र में पहुंचना कौन सी बड़ी बात है
धर्म ने पहले से ही खोज कर ली थी

जब धर्म ने सब कुछ खोज ली
तो इतनी खर्च करके
चांद में जाने की क्या जरूरत
एक मंत्र मारो और चांद पर जाओ

विज्ञान कितना भी तरक्की करे
जब तक अंधविश्वास है
आम जनता की तरक्की नहीं होगी
खोजते रह जाएंगे पाखंड में ज्ञान
और पाखंड करते-करते
पृथ्वी भी खत्म न हो जाए
फिर कहां का चांद
और कहां की धरती
सब खत्म हो जाएंगे एक साथ

इसलिए महामानव बुद्ध कह गए
पाखंड छोड़ो, अंधविश्वास मिटाओ
धरती को एक नई दुनिया बनाओ
इंसान-इंसान की खून से न खेले
ऐसा एक संसार बनाओ

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार
अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

Monday, 21 August 2023

सांप कभी दूध नहीं पीता और न ही कोई नागमणि होती है


आज समाज में सांप के दूध पीने की बात होती है और लोग अफवाह के चलते सांप को दूध पिलाने के लिए शिवलिंग और नागराज सांप की मूर्ति में दूध को चढ़ाने के लिए लंबी लाइन लगाकर एक-एक करके सभी कटोरी-गिलास, लोटे भर दूध को उलचकर आ जाते हैं।

नागराज (King Cobra) जिसे लोग नागदेव या शेषनाग भी कहते हैं

नागराज को लोग देव के रूप में पूजते हैं। नागराज को पूजने के लिए हर साल नांगपंचमी के रूप मनाया जाता है। विशेषज्ञ की माने तो नागराज दुनिया में सबसे लंबा और जहरीला सांप है। यह 18 फिट तक बढ़ता है। भारत में यह सांप दक्षिण राज्यों तथा आसम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा में मिलता है। काले, हरे और भूरे रंग में आता है। इस सांप के शरीर पर उलटे(V) के लकीरों के सफेद पीले रंग के चौड़े पट्टे होते हैं। बढ़ती उम्र के हिसाब से पट्टे धुंधले हो जाते हैं। इसका फन शरीर के अनुपात से बहुत छोटा होता है। यह अपना शरीर जमीन से 3 फीट तक ऊपर उठाता है। 

सांप कभी दूध नहीं पीता है

सांप के दूध पीने की बात सरासर गलत है, क्योंकि सांप जब पृथ्वी पर था तो उस वक्त कोई स्तनधारी प्राणी जो दूध देता हो, नहीं था। इसीलिए उसका मुख्य खाद्य अनेक प्रकार के कीड़े, चूहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से सांप के होंठ नहीं होती और न ही उसकी शरीर की बनावट दूध हजम करने लायक बनी है। वह पूरी तरह से मांसाहारी है, अगर दूध पिला दिया जाए तो सांप मर जाता है।

हजारों लीटर दूध बर्बाद होता है

नांगपंचमी में नागसांप को दूध पिलाने के नाम पर हजारों लीटर दूध नाली में बह जाता है। लोग सुबह से शिवलिंग और नागदेव पर इतना दूध उधेड़ता है, जैसे वह दूध नहीं पानी हो। एक तरफ लोगों के पीनी के लिए दूध नहीं है तो दूसरी तरफ अंधविश्वास के चलते दूध को मंदिर की मूर्तियों में डालकर पूरा दूध गन्दी नाली में बह जाता है। किसी को कुछ नहीं मिलता। क्या इसीलिए गाय दूध दी थी? कि नाली में बहाकर वेस्ट कर दे।

नाग के पास कोई नागमणि नहीं होती है

सांप के पास किसी भी प्रकार की मणि नहीं होती यह सब फिल्म, कहानियां, टीवी चैनल और बड़े बुजुर्गों से सुनी कथाओं से उपजी हैं। कोई भी व्यक्ति आज तक नागमणि नहीं देखा है, सब कही-सुनी बातों पर विश्वास कर लेता है। और उसी अफवाह को समाज में लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिलाते रहता है।

इच्छाधारी नाग नहीं होता है

इच्छाधारी नाग-नागिन अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर लेता है, ऐसा फिल्मों में दिखाया जाता है, वह सब एक मनगढ़ंत कहानी है। कोई इच्छाधारी नाग-नागिन नहीं होता है। यह भी कहा जाता है कि इच्छाधारी नाग या नागिन को मार दिया जाता है तो दूसरा इच्छाधारी नाग सांप को मरे हुए नाग की आंखों में मारे हुए व्यक्ति दिखाई देता है और बदला लेता है। यह भी सरासर अंधविश्वास है। आज तक कोई इच्छाधारी नाग-नागिन  नहीं देखे है, सब अफवाहों और टीवी के काल्पनिक धारावाहिक के कारण लोग उसे सही मानने लगते हैं।

लेखक - मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेश (एएसओ)
संदर्भ - 'सर्पविज्ञान' किताब - गजेन्द्र सुरकार

Thursday, 10 August 2023

वास्तु शास्त्र सबसे बड़ा अंधविश्वास


वास्तु शास्त्र एक अंधविश्वास फैलाने वाले शास्त्र के अलावा कुछ भी नहीं है। अभी अधिकतर वेब खबरों और टेलीविजन में सुबह से शाम तक लगभग तीन से चार ऐसी खबरें रहती हैं जिसमें वास्तु शास्त्र के होते हैं, उसमें वास्तु नियम के बारे में बताया रहता है। किस दिशा में बेडरूम हो, कौन सा दिन शुभ होता है, घड़ी किस दिशा में लगाए और कौन सी घड़ी लगाए, रंग क्या होगा। कौन सा पौधा घर और अपने आस-पास नहीं लगाना चाहिए। घर की द्वार किस दिशा में रहना चाहिए? सीढ़ी किस दिशा में बनानी चाहिए, किचन की दिशा, खिड़की की दिशा, सोने की दिशा कैसी होनी चाहिए। ऐसी बहुत से वास्तु नियम दिए रहते हैं एक नियम पर एक खबर रोज देखने को मिलती है।

वास्तु शास्त्र क्या है?

वास्तु शास्त्र हमेशा विवादों में रहा है। वास्तु शास्त्र बिना सिर पैर के एक अवैज्ञानिक शास्त्र है। लेकिन कुछ स्वार्थी लोग इसे शास्त्र कहकर लोगों को डराने का काम करते हैं। उनका मानना है कि वास्तु शास्त्र घर में रहने वालों के स्वास्थ्य और खुशी को बनाए रखने का शास्त्र है। इसमें भी वास्तुशास्त्री का एक मत नहीं है, अलग-अलग वास्तु शास्त्र की किताब में अलग-अलग बातें लिखी है, इससे यह सिद्ध होता है कि वास्तु शास्त्र पूरी तरह से अवैज्ञानिक है।

हर वास्तु नियम अंधविश्वास से परिपूर्ण

जैसे घर में टूटी हुई घड़ी नहीं रखना चाहिए, टूटा व क्रैक आईना घर में नहीं रखना। मेरे घर में एक बड़ा सा आईना है, जिसमें क्रैक है, उसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं, उसी से अपनी शक्ल हमेशा देखता आ रहा हूं और मेरे घर के सभी लोग उसी आईने से बाल बनाते हैं। आज तक कुछ नहीं हुआ। हां बाकी फ्रेश आईने की तलना में इस पर कुछ धुंधला दिखता है, इसका कारण आईने का पुराना होना और फटे हुए क्रैक पर फॅवीकोल लगा है, इसलिए एकदम चमक नहीं दिखता। पुरानी घड़ी भी घर में सालों से लगा है, उसका भी आईने जैसा हाल है, उसका भी शीशा टूटा हुआ है। शीशा टूटे होने के बाद भी बहुत दिनों तक घड़ी चलती रही.. एक दिन बंद हो गया और उसमें मेरी छोटी सी तस्वीर लगी है, इसलिए मैं उसे वही पर रखना उचित समझा। और एक नई घड़ी लेकर दूसरी दीवार पर लगा दी।

वास्तु में दिनों के लेकर शुभ-अशुभ

वास्तु में दिनों को लेकर बहुत शुभ-अशुभ का खेल खेला जाता है। गुरुवार के दिन पोछा नहीं लगाना चाहिए। अगर ऐसा कोई करता है तो बृहस्पति ग्रह का प्रभाव पड़ता है और मनुष्य में नकारात्मक ऊर्जा उतपन्न होता है। गुरुवार के किसी को पैसा नहीं देना चाहिए, मंगलवार को बाल नहीं कटाना चाहिए। गुरुवार और मंगलवार को वास्तु में शुभ दिन माना जाता है। बहुत से घर और कार्यालय जो बहुत तरक्की कर रहे हैं गुरुवार की सुबह से ही सफाई, पोछा कर अपने कार्य में लग जाते हैं। गुरुवार के बहुत से पैसों के लेनदेन होते हैं, बड़ा-बड़ा व्यापार चलता है। मंगलवार के शुभ होता तो हर परीक्षा मंगलवार को होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता है। शनिवार है सोचकर परीक्षार्थी परीक्षा नहीं देगा तो कैसे पास होगा? कभी ऐसा सुना है मंगलवार को परीक्षा हुई थी, इसलिए अच्छे अंक मिला या बिना पढ़े पास हो गया।

वास्तुशास्त्र में न पड़े

व्यक्ति को अपनी सहूलियत के अनुसार कार्य करना चाहिए, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि खुद और आस-पास के लोगों को दिक्कत न हो। घर बनाते समय बहुत से लोग वास्तु के अनुसार दिशा देखकर बनाते हैं, जिससे बहुत से असुविधा का सामना करना पड़ता है। इसीलिए अपने सुविधा के अनुसार घर, सीढ़ी, बेडरुम, किचन, दरवाजा और अपनी जरूरत की सामग्री को बजट और सुविधा के अनुसार लगाएं। अगर वास्तु दिशा के अनुसार घर बना लिए और उस घर में पर्याप्त मात्रा में हवा-धूप नहीं मिल रही और नाली का पानी निकल नहीं पा रहा तो उस घर में व्यक्ति बीमार पड़ेगा ही। इसी कारण अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए घर, भवन, दुकान का निमार्ण करें। वास्तु शास्त्र में न पड़े।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाजेशन (एएसओ)

Saturday, 5 August 2023

चमत्कार के फेर में लुटा रहे लोग


भारतीय समाज झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और जादू-टोने के जाल में पूरी तरह से फंसा हुआ है। लोग तांत्रिक के जाल में आसानी से फंसकर अपनी मेहनत से कमाए हुए धन को तांत्रिक (बैगा) और धार्मिक लुटेरे को आसानी से लुटा देते हैं। हर व्यक्ति को चमत्कार चाहिए। जिसका फायदा ओझा-तांत्रिक को मिलता है इसीलिए तांत्रिक चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगता है। उस चमत्कार में लोगों को अद्भुत दैवीय शक्ति दिखती है, कुछ लोग तो पाखंडी तांत्रिक को ही भगवान मानने लगते हैं और उसकी जय-जयकार करने लगते हैं। अंधविश्वासी लोग अपने पाखंडी गुरु के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते। चाहे वह बात कितनी भी सत्य की कसौटी पर खरी उतरे, उस बात को आसानी से टाल देता है और उल्टा कहेंगे कि हमारे धर्म के बारे में कुछ न कहिए।

धर्म के नाम पर लूटना आसान

आज धर्म के नाम पर लूटना इतना सरल है जितना कागज को जलाना। जितने भी तांत्रिक है अपने आप को अल्लाह, भगवान और गॉड के दूत या खुद को भगवान समझता है, इसेके नाम से चमत्कार करता है और आम लोगों को लूटता है। लूट रहा है ये बात जानते हुए भी लोग उसका खुलकर विरोध नहीं कर सकते, क्योंकि धर्म का मामला है, आस्था और श्रद्धा को ठेस नहीं पहुंचना चाहिए सोचकर मुहं बंद कर लेते हैं और धार्मिक अंधविश्वास तेजी से आगे बढ़ता है।

जितने भी धर्म के लोग आज दिख रहे हैं सब इंसानियत के खून करने से नहीं हिचकिचाते हैं, जब भी जरूरत पड़े धर्म की रक्षा के लिए मनुष्य का कत्ल करते आ रहे हैं। यहां पर मुझे महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन के कहे शब्द याद आते हैं- "मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को सिखाता भाई का खून पीना।" हिंदुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़कर इलाज नहीं।

क्या मनुष्य से बड़ा धर्म है? धर्म को मनुष्य ने बनाया है या मनुष्य को धर्म ने बनाया? सोचने वाली बात तब होती है जब कट्टरपंथी धर्म रक्षा के नाम पर मनुष्य के कत्ल कर अपने आप को धर्म रक्षक समझता है। धर्म रक्षक नहीं भक्षक है।

चमत्कार में न पड़े

कोई दैवीय शक्ति से चमत्कार नहीं होता है इसके पीछे वैज्ञानिक विधि रहता है या हाथ की सफाई। ऐसे कथित चमत्कारों और पाखंडियों की पोल खोलने का काम हमारा संगठन लगातार कर रहा है। संगठन के कार्यकर्ता लगातार लोगों के बीच जाकर जन-जागरूकता अभियान चला रहे हैं। हमारे साथी कार्यक्रम के दौरान सभी कथित चमत्कार करके दिखाते हैं और यह कैसे होता है उसे भी बताते हैं। जिससे आम जनता पाखंडियों की लूट से बच सकें।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाजेशन (एएसओ)

Wednesday, 2 August 2023

संतान की चाह में अंधविश्वास ने ले ली जान


आज आधुनिक युग में भी लोग अंधविश्वास से जकड़े हुए हैं। इसका ताजा उदाहारण छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के उरला थानांतर्गत ग्राम बरबसपुर से मिला है। ऐसी आए दिन खबरें मिलती है कि फलाना तांत्रिक बाबा ने इलाज के नाम से लूटा या पूजा-पाठ कराने के लिए लाखों रुपए लूट लिए, तो कहीं सर्प कांटने पर इलाज करते-करते रोगी की जान चली जाती है।

संतान की चाह में बैगा (तांत्रिक) के पास गए थे नवदंपति

कोरबा के उरगा थाना अंतर्गत ग्राम बरबसपुर के रामाधार पटेल (28 वर्ष) और सुशीला पटेल (27 वर्ष) शादी के एक साल बाद भी संतान नहीं होने से हताश थे। इसका इलाज भी कराया, लेकिन सफल नहीं हुई तो पति-पत्नी को लगने लगा कि कोई काला जादू-टोना किया है, इसलिए बच्चा नहीं हो रहा है। इसका तोड़ के लिए दोनों तांत्रिक रामलाल यादव के पास चले गए। तांत्रिक झाड़-फूंक करने के बाद पति-पत्नी को पूड़िए में दवा दी जिसे खाने के लिए कहा। पुड़िया खोलकर देखा तो उसमें पान के साथ कुछ जड़ी-बूटी थी, उसे खाते ही दोनों पति-पत्नी की तबीयत बिगड़ने लगी तो अस्पताल ले गया, जिससे पत्नी की मृत्यु हो गई और पति के हालत बिगड़ी हुई है।

जादू-टोने पर आज भी विश्वास

आज भी लोग जादू-टोना, तंत्र-मंत्र में विश्वास कर के अपने रिश्तेदार, भाई-बंधु और आस-पास के लोगों को डायन के नाम से बदनाम करते हैं। जिससे आधुनिक समाज को कलंकित होना पड़ता है। आए दिन जादू-टोना, सैतान और डायन के नाम पर महिलाओं की हत्या की जाती है। सामान्य बीमारी होने पर भी तांत्रिक के पास इलाज कराने जाते हैं, मानसिक बीमारी होने पर तो बहुत बड़ा शैतान या डायन के हाथ समझकर झाड़-फंक और बड़ी से बड़ी पूजा करते हैं। जिससे धन खर्च तो होता ही है, उसके साथ शारिरिक और मानसिक रूप से मरीज को कष्ट झेलना पड़ता है, यहां तक भी मरीज की जान भी चली जाती है।

संतान के लिए दूसरे के बच्चे की बलि

महिला-पुरुष दोनों के संगम से मनुष्य जीवन मिलता है। हर दंपति चाहता है कि उनके गोद में भी बच्चा खेले। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अंधविश्वास में पड़कर झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र कराकर अपनी जान तो गंवाता ही है, साथ ही आस-पास के लोगों को भी तकलीफ देता है। कई बार तो संतान प्राप्ति के लिए तांत्रिक के कहने से दूसरे के बच्चे को बलि देकर उस निर्दोष मासूम की जान ले ली जाती है। संतान नहीं होने की वजह स्त्री या पुरुष में कोई कमी होती है, इसको दूर करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास जाकर इलाज कराना चाहिए।

समाज को अंधविश्वास से मुक्त होना चाहिए

हमारे समाज में बहुत ही अंधविश्वास है। इस अंधविश्वास से निकलने के लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है, उसके साथ अपने आस-पास के लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है। व्यक्ति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना चाहिए, बिना तर्क के हवा हवाई बातों में नहीं आना चाहिए। किसी ने कह दिया और उसे मान लेने से भी अंधविश्वास को पनाह मिलता है। अपनी बुद्धि से सोच-समझकर कार्य करना चाहिए। अगर झाड़-फूंक, पूजा-पाठ और तंत्र-मंत्र से किसी के संतान पैदा होता तो बैगा (तांत्रिक) के लिए अलग से पढ़ाई होती, डिग्रियां मिलती और तांत्रिक भी डॉक्टर के स्थान पाता। लेकिन ऐसा नहीं है। कोई जादू-टोना, टोनही (डायन), शैतान, प्रेतात्मा नहीं होते हैं, आज तक किसी ने नहीं देखा है। देखने का दावा करता है वे सब भ्रम के कारण उसे ऐसा लगता है।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाजेशन (एएसओ)

वैज्ञानिक के नाम पर कलंक

 
आज देश में वैज्ञानिक दृष्टीकोण खत्म होने और अंधविश्वास बढ़ने की वजह हमारे देश के कथित वैज्ञानिकों की निम्न सोच है. जिनको विज्ञान भरोसे रहना चाहिए, वे आज पूरी तरह से भगवान भरोसे बैठे हैं. ऐसे में सामान्य लोगों में तार्किक और वैज्ञानिक विचार कौन फैलाएगा. ऐसे कथित वैज्ञानिकों के कारण ही आज लोग पृथ्वी को शेषनाग पर टिकी हुई समझते है और सूर्य को कोई वानर संतरा समझकर निगल गया मानते हैं. वहीं सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को राहु-केतु द्वारा मुंह में दबाना समझते हैं.

चंद्रयान-3 मिशन के लिए देश के कथित वैज्ञानिकों को अपनी मेहनत पर भरोसा बिलकुल नहीं है, बल्कि उन्हें काल्पनिक ईश्वर पर आस है. लॉन्चिंग से पहले इसरो के वैज्ञानिक पूजा-पाठ करने में जुटे हैं. वैज्ञानिकों की एक टीम आंध्र प्रदेश के तिरूपति वेंकटचलपति मंदिर पूजा-अराधना के लिए पहुंची. अब इन कथित वैज्ञानिकों को जिस समय यान को लेकर तैयारी करनी चाहिए उस समय मंदिर पर माथा टेकने पहुंच गए है. आप ही बताइए परीक्षा के दौरान बच्चे तैयारी नहीं करेंगे और पूजा-पाठ करेंगे तो उनका क्या हाल होगा.

भारतीय संविधान में भी वैज्ञानिक दृष्टीकोण की बात कही गई है, लेकिन आज देश में पूरी तरह से इसके विपरित कार्य हो रहा है. संविधान के मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद 51ए) के अंतर्गत स्पष्ट लिखा गया है कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह ''वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे.'' इसके बावजूद भी भारत देश के कथित वैज्ञानिक वैज्ञानिक दृष्टीकोण का कब्र खोदकर गाड़ने में लगे हुए हैं. यह समाज के लिए बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय है.

जिनके कंधों पर वैज्ञानिक दृष्टीकोण की जिम्मेदारी है, जब वहीं वैज्ञानिक दृष्टीहिन हो जाए तो समाज और पिछड़ता जाएगा. लोगों में ज्ञान-विज्ञान का अभाव हो जाएगा. जिससे यहां की जनता पूरी तरह से अंधविश्वास के नशे में चुर हो जाएंगे. इससे देश की तरक्की पूरी तरह से बंद हो जाएगी और लोग भाग्यवादी बनकर चुपचाप बैठ जाएंगे. अगर समाज का विकास करना है तो सभी बुद्धिजीवी लोगों की जिम्मेदारी है कि अंधविश्वास से बचे और दूसरों को बचाए, तभी एक बेहतर समाज का निर्माण होगा.

- गनपत लाल, सांगठनिक सलाहकार, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)