Wednesday, 29 November 2017

टोनही आैर बैगा के खेल में जा रही जानें



आज अंधविश्वास के चलते लोग अपने ही घरवाले का खून कर रहे हैं। वही कई लोग डर-डर के जी रहे हैं। गांव हो या शहर बैगा और टोनही के खेल में अंधविश्वासी लोग मर और मार रहे हैं। हाल ही में पलारी के अमेरा गांव के एक ऐसा मामला प्रकाश में आया है, जिसमें एक अंधविश्वासी पिता ने बैगा के कहने पर भूत भगाने के लिए अपने ही 12 वर्षीय बेटे की बलि चढ़ा दी। वहीं पिछले महीनों रायपुर के पुरानी बस्ती में एक युवक ने अपनी ही मां को टोनही होने के संदेह में तावा से पीट-पीट कर हत्या कर दी।
यह घटनाएं हमारे समाज काे आइना दिखाती है कि हम आज कितनों भी आधुनिक होने का ढोंग करे फिर भी बहुत ज्यादा आडंबर, अंधविश्वास, अवैज्ञानिक सोच और रूढ़ीवादी की चादर ओढ़े हुए हैं। देश में जब तक अंधविश्वास और अंधविश्वास फैलाने वाले बैगा, ओझा और ढाेंगी बाबाओं पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई नहीं होगी तब तक यह समस्याएं जस के तस बनी रहेगी। वही लोगों में जब तक वैज्ञानिक सोच नहीं होगी तब तक बदलाव की कोई कल्पणा नहीं की जा सकती।
आज तो स्थिति ऐसी है कि आदमी अपनी मोटरसाइकिल, कार, घर और अन्य चीजों को भूत और टोनही की नजर लगने से बचाने के लिए कई तरह के उपाय करते दिखते हैं। गांव हो या शहर अंधविश्वास में जकड़े लोग मोटरसाइकिल में ताबिज कंडा बांधे रहते हैं। वही कार में नारियल या नींबू-मिर्च लगा कर घूमते हैं। तो कई अंधविश्वासी लोग अपने घर में नारियल और नींबू-मिर्च और भयानक देवी-देवताओं की तस्वीर लगाकर अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं। इसके चलते सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं होती है। लोग बुरी नजर से अपनी दुकान को बचाने के लिए नींबू-मिर्च लगाते हैं और सड़क पर फेक देते हैं। जिससे भयभीत और कमजोर लोग अपनी गाड़ी को इस नींबू-मिर्च से बचाने के चक्कर में गिर कर हाथ-पैर तोड़ डालते हैं। तो कभी बड़ी घटना भी हो जाती है। वही चौक-चौराहों में मंदिर होने से लोग गाड़ी का हैंडिल छोड़ कर भगवान को नमस्ते करने के चक्कर में ध्यान भटकने से दुर्घटना हो जाती है।
इस देश में अंधविश्वास की बीमारी से ग्रसित लोग भले जान दे दें या अपने ही घरवालों को मौत के घाट उतार दे, लेकिन इस बीमारी से लड़ने के लिए कोई कोशिश नहीं करेगा। हमें चाहिए कि इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए छोटे-छोटे बच्चों को उनके मनोबल से परिचित कराए और काल्पनिक भूत-प्रेत, देवी-देवताओं, ताबीज-कंडे, बैगा-बाबा और अंधविश्वास के ठेकेदारों से दूर रखे। तभी परिर्वतन संभव है। 

Tuesday, 28 November 2017

आवव गरब ले बोलव छत्तीसगढ़ी


छत्तीसगढ़ ल भले अलग राज बने 17 साल होगे अउ छत्तीसगढ़ी भासा ल लेके भले अलग आयोग बनगे फेर अभी ले छत्तीसगढ़ी कोनो मेरा लागू नई होहे। अउ एकर कारन हमी मन हरन। काबर छत्तीसगढ़ म रही के हमन ह छत्तीसगढ़ी बोले बर लजाथन-सरमाथन त दूसर भासा के बोलइया मन ले हमन कइसे छत्तीसगढ़ी के आस लगा सकथन। सोचे के बात तो ए हरे कि आज छत्तीसगढ़िया मन ह मानसिकता बना ले हे कि छत्तीसगढ़ी बोलइया मन ह गवांर होथे। अउ एकर बर एक पैमाना घलो तय कर डारे हे कि जउन ह अंगरेजी बोलथे हो ह मंडल, हिंदी बोलइया गरीब अउ छत्तीसगढ़ी बोलइया भिखारी। अइसन मानसिकता ह महतारी भासा बर खतरनाक आय। कही अइसे मत हो जाए कि छत्तीसगढ़ी भासा ह नंदा जही। अब बेरा आगे हे ए भासा ल जतन के रखे के तभे हमर संस्कृति अउ पहचान ह बचे रही। 
आज के नेता अउ अभिनेता मन ह अपन काम साधे बर दू-चार लाइन छत्तीसगढ़ी बोल देथे। कोनो मंत्री अउ विधायक ह छत्तीसगढ़िया मन कर दू लाइन छत्तीसगढ़ी बोल के अइसे दिखाथे कि जानो-मानो ओ ह छत्तीसगढ़ी भासा के बोलइया आय। ओकर आफिस म मिले बर कोनो मनखे ह चल देथे त हिंदी अइसन बोलही अउ रोब दिखाही जानोमानो उही ह हुसीयार आय बाकी सब भोकवा। छालीवुड के बात करे जाय तो निर्माता-निर्देशक अउ हीरो-हिरोइन ह घलाे अपन असल जिनगी म छत्तीसगढ़ी म नइ गोठियाय। भले पूरा ढाई घंटा के फिलिम म बनावटी छत्तीसगढ़ी बोलही। सुटिंग के बेरा तो अइसे हिंदी अउ इंगलिस बोलथे कि छत्तीसगढ़ी के सुध घलो नइ रहाय। अब अइसन मनखे ह कोनो फिलिम बनाही त का छत्तीसगढ़ के कला-संस्कृति ह दिख पाही। अउ का अइसन फिलिम ह चल पाही।
छत्तीसगढ़ी भासा के साथ अन्याय करे म छत्तीसगढ़िया मन के घलो हाथ हाबय। अब तो गांव के मनखे सहर म का आ जथे पूरा अपन महतारी भासा ल भूला जथे। अउ कोनो गांव देहात के संगवारी मिलथे ओकरो ले छत्तीसगढ़ी म नइ गोठियाय। इहा के मनखे ह जब तक ले छत्तीसगढ़ी बोले म गरब नइ करही अउ अधिकार के साथ नह बोलही तब तक कतको छत्तीसगढ़ी ल लेके संगठन बनही अउ आयोग बनही फेर पोठलगहा काम नइ होवय। आज तो होवत लइका ल अंगरेजी के रंग म रंगे बर ओकर दाई-ददा ह पूरा ताकत ल लगा दे हे। वइसे भासा सिखना कोई गलत बात नोहे। ए तो अउ बढ़िसा आय। फेर दूसर भासा ल सिखे बर अपन महतारी भासा ल भुला देना कतका खराब आय। आज कोनो अपन लइका ल छत्तीसगढ़ी सिखाय-बताय के कोसिस नई करय। सबे झन ह अपन लइका ल महंगा ले महंगा इंगलिस इसकूल म भरती कराथे। ताहन लइका ह न तो ढंग से छत्तीसगढ़ी सिख पाय न हिंदी अउ अंगरेजी तो बस रटे रूटाय रइथे। ताहन लइका के न घर के न घाट के जइसन हो जथे। अब ओला अंगरेजी नइ आय न हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी। ए कतेक जायज हे हमर संस्कृति ल भूला के दूसर के ल अपनाय बर मूड़ी-पूछी एक कर देना। कहू अइसे मत हो जाए छत्तीसगढ़ी भासा मर जही। अब बेरा आ गे हमन ह अभी ले अपन महतारी भासा ल लेके जागरूक हो जावन। हमर अवइया पीढ़ी ल घलो सिखावन अउ गरब ले बोलन छत्तीसगढ़ी भासा ल।

Monday, 20 November 2017

बियारा-बारी के जिमीकांदा

जब जिमीकांदा साग के नाम ल कोनो सुनथे त ओकर मुंहू ले लार टपकना सवभाविक बात आय। ए जिमीकांदा ह उपर ले माटी असन दिखथे अउ चाने म थोकन ललमुहा होथे। ए ह गांव-गांव म पाए जाथे। कोनो ह अपन बारी, म त कोनाे ह बियारा म अउ जेकर घर जगा नई हे ओमन ह अंगना म जिमीकांदा ल लगाथे। वइसे तो जिमीकांदा ल छत्तीसगढ़ी साग के राजा कहे जाथे। एला अम्मट म रांध ले, चाहे मसलहा म अबड़ मिठाथे। गांव के सियान मन ह जिमीकांदा साग ल बड़ गुनकारी मानथे। गांव के डोकरी-डोकरा मन ह बताथे कि जिमीकांदा साग खाय ले केंसर असन बड़का बीमारी ले घलो बचे जा सकत हे। फेर एक ठन गोठ घलो सुने ल मिलथे ए साग ल खाज-खजरी वाले मनखे ल नइ खाना चाही। बाकि सबे मनखे ह जिमीकांदा साग के सुआद ल चाट-चाट के ले सकत हे।
घर के माईलोगिन मन ह बताथे कि ए साग ल बनाय बर पहली जिमीकांदा ल बियारा ले खन के ले आना चाही। तेकर बाद बने तरिया म खलखल ले धोके सुखो दे। सुखाय के बाद बने गरम पानी म उसन के साग म रांधे के लइक चानी-चानी पउले बर लागथे। ताहन चनाय जिमीकांदा ल पर्रा म रख के छानी उपर बढ़िया घाम म सुखाय जाथे। कड़कड़ ले सुखाय के बाद एेला साग रांधे जाथे। साग रांधे बर पहली तेल म मेथी-सरसो के फोरन देके मही म बनाय ल पड़थे। ताहन मत पूछ रे भइया एकर सुवाद ल। रांधत ले पारा-परोस के मन घलो जान जाथे कि आज इकर घर जिमी कांदा के साग चुरत हे कही के। ताहन परोसी मन ह अपन-अपन घर ले कटोरी ल धर-धर के साग मांगे ल आ जथे।
ए जिमी कांदा के साग के देवारी तिहार म बड़ महत्ता हे। ए दिन तो मनखे ले पहली गाय-गरवा मन ल भात-साग खवाय जाथे। एकर बाद घर के सियान अउ लइका मन ह अमटाहा जिमीकांदा अउ कुम्हड़ा (मखना) के मड़माड़े मजा लेथे। देवारी के दिन घरो-घर जिमीकांदा अउ कुम्हड़ा के साग ह चुरे रहीथे। तेकर सेती ए दिन कोनो ल का साग ए कही के पूछे के जरूरत नइ पड़े। वइसे तो हर दिन हमर छत्तीसगढ़ म कोनो मनखे ह मिलथे त गोठ-बात के सुरूआत ह खलो का साग ए फलानिन कही के सुरू होथे। फेर ए दिन ए प्रश्न के छुट्टी हो जथे। काबर सबे झन ह तो जानत हे जी इकर घर घलो जिमीकांदा अउ मखना के अमटाहा साग बने हे कही के।

Sunday, 19 November 2017

काश ! मंदिर-मस्जिद छोड़ देश की वर्तमान स्थिति पर होती बहस


देश में लगातार मंदिर-मस्जिद की बहस चली आ रही है। इसके लिए कई लोंगों ने जान भी दी है तो कई लोगाें ने जान भी ली है। देखा जाए तो सभी राजनीतिक पार्टी हमेशा से ही मंदिर-मस्जिद और जाति-धर्म को लेकर जनता को तबाह करने में लगी हुई है। आयोध्या में 1992 में दो हजार से अधिक लोगों को मारकर मस्जिद को ढहाना बहुत ही बर्बतापूर्ण कार्य था। यह कैसा धर्म है जो एक दूसरे के प्रति नफरत का जहर फैलाता है। इस विष को पीने से डेढ़ लाख की हिंसक रैली मरने-मारने को उतारू हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोध्या के मस्जिद को किसी भी प्रकार के नुकसान नहीं पहुंचाने की वचनबद्धता के बावजूद भी कट्टरपंथी ने विवेकशून्य होकर देश में दंगा कर राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े करने में जूट जाते हैं। क्या यही सहिष्णुता है ? बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवानी धर्म रैली निकालकर जिस प्रकार लोगों को भड़काने का काम किया यह बहुत ही निंदनीय है। किसी भी नेता को इस प्रकार के मजहब और धर्म के नाम पर जनता को गलत राह पर ले जाना उचित नहीं है। भले ही कोई भी धर्म बहुत सहिष्णुता, प्रेम और भाईचारा का दिखावा करे, लेकिन धर्म के नाम पर हजारों-लाखों की हत्या करने में पीछे नहीं हटते।
आयोध्या में लगातार मंदिर-मस्जिद का मसला गरमाता रहा है। वहीं जब देश में भगवा सरकार आई तो फिर स्कूल, कालेज,हास्पिटल, रोजगार और अन्य मूलभूत सुविधाओं को छोड़कर जनता को धर्म और मजहब के भयानक कुंआ में ढंकेल रही है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार सीना ठोकर कह रहे हैं कि आयोध्या में राम मंदिर बनाने से कोई भी ताकत नहीं रोक सकती। अगर योगी अपनी यही ताकत राज्य के विकास कार्यों में लगाया होता तो आज यूपी की तस्वीर कुछ और होती। लोगों को जीने की कला सीखाने वाले रविशंकर ने आयोध्या में जाकर और सीएम योगी से मिलकर मंदिर-मस्जिद मसला की आग में फिर घी डाल दिया है। अब इस रविशंकर को कौन जीने की कला सीखाएं। चुनाव की तारीख घोषित होते ही राजनेता और उनके चेले संत-बाबा ऐसे ही मुद्दों में वोटरों को उलझा कर रख देते हैं। ऐसे मामलों में कोर्ट का समय और धन बर्बाद होता ही है। साथ ही जनता को विकास कार्यों का भी लाभ नहीं मिल पाता। लगातार ऐसे मसले उठते रहे और इनसे आम जनता को कुछ मिला नहीं सिवाय बर्बादी।
अब भगवा बीजेपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस के राहुल भी चुनाव देख मंदिर के शरण लेने लगे हैं। उन्हें वोटरों को रिझाने के लिए मंदिर की घंटी बजाने की जरूरत पड़ रही है। इस प्रकार की छोटी सोच ने ही हमेशा से राजनेताओं को जनता की वास्तविक विकास एजेंडे से दूर रखता है। बीजेपी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी राम मंदिर को लेकर बहुत जाेर दे रहे हैं। बीजेपी के सांसद साक्षी महाराज ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी मंदिर निर्माण शुरू करने के बाद ही उतरेगी। आज पूरी तरह देश को मजहब और धर्म के नाम पर बांटने और विनाश करने की बड़ी भूमिका सभी राजनैतिक दल निभा रही है। अब सोचना जनता को ही है कि इस प्रकार की ओछी राजनीतिक करने वालों को क्या सबक सिखाया जाए। 

Wednesday, 15 November 2017

जाति समाज लोगों को प्रताड़ित करने का साधन


देश में लिखित संविधान होने के बाद भी सभी जातियों ने अपने-अपने ढंग से अलग से संविधान बना कर देश के कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। जाति समाज अपनी ही जाति के लोगों को प्रताड़ित कर मरने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अंतरजातिय विवाह, प्रेम विवाह, मृत्यु भोज, मुंडन और न जाने क्या-क्या पैसे वसूली करने का हथियार भी बना लिया है। पिछले दिनों 9 नंवबर को धरसींवा के खैरखुट की एक महिला बिसाहिन साहू को सामाजिक बहिष्कार से त्रस्त होकर आत्मदाह करने को मजबूर होना पड़ा। महिला के बेटे दशरथ साहू ने अंतरजातिय विवाह किया है। जिसको लेकर साहू समाज ने 50,000 रुपए दंड दिया। जिसे नहीं पटा पाने पर इस परिवार को समाज से बहिष्कार कर दिया गया।
बहिष्कार के बाद भी लगातार परिवार के मुख्या महिला बिसाहिन को लगातार बैठक बुला-बुला कर प्रताड़ित करने लगा। जिससे महिला ने तंग आकर आत्महत्या करने के लिए मिट्टीतेल छिड़क कर आग लगा ली। जो पूरी तहर से 90 प्रतिशत जल गई है। अभी वे अंबेडकर हास्पिटल में भर्ती है, लेकिन अब तक समाज के प्रमुख ने इन्हें देखने भी नहीं आए। यह कैसा संवेदनहीन समाज है। जो हमेशा अपनी ही जाति के भाई-बहन को परेशान करते रहते है। ऐसे मौत के जिम्मेदार जाति समाज और पदाधिकारियों पर कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इस प्रकार छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में से हर दिन अखबारों और टेलीविजन के माध्यम से कई घटनाएं सामने आती है। अंतरजातिय प्रेम विवाह करने पर कई जगह लड़की या लड़का की हत्या कर दी जाती है। तो कहीं हत्यारे जाति समाज के भय से प्रेमी जोड़े आत्महत्या कर लेती है। वही कई जागरूक पालक इस स्थिति में खुलकर जाति समाज के विरोध में सामने आते हैं तो कई रूढ़ीवादी में जकड़े अज्ञानी पालक अपने ही बच्चे के हत्यारे बन जाते हैं या खुद आत्महत्या कर लेते हैं। जिसको पुलिस, सरकार, न्याय व्यवस्था, मीडिया और लोग तमाशबीन की भांति देखते रहते हैं।
इस मामले में महाराष्ट्र राज्य आगे है यहां सबसे पहले अंधविश्वास निर्मूलन कानून बना और सामाजिक बहिष्कार प्रतिषेध अधिनियम लागू हो गया है। यह कानून महाराष्ट्र की जनता में व्याप्त जागरूकता को दिखाता है। वहीं छत्तीसगढ़ में इस कानून पर चर्चा चलते ही समाज के आड़ में भारी-भरकम पैसा कमाने वाले जाति समाज विरोध में पूरी ताकत छोक दिया है। जो यहां की अज्ञानता को दिखाता है। आज के आधुनिक युग में भी यह जातिप्रथा का दंश खत्म नहीं हो रहा है, बल्कि यह और भी भयावह होते जा रहे हैं। सोचने की बात तो यह है कि युवा वर्ग भी इस पुरानी रूढ़ी की चादर ओढ़े दुबक कर सो रहे हैं। जिस दिन यह ताकतवर युवक-युवतियां खुलकर समाज को चुनौति देंगे उसी दिन देश को बांटने वाले जाति समाज का नाश होना तय है।

झुमकी तरोई रे भइया


झुमकी तरोई रे भाई.. झुमकी तरोई गोंदा फूल केरा बारी म... ए गाना ल नाचा म दू झन जोक्कड़ ह बड़ सुघ्घर ढंग ले गाथे। अउ सुनइया देखइया ल घलो बड़ निख लागथे। आज आनीबानी के फिलिम बने के बाद भी हमर छत्तीसगढ़ के नाचा ह अपन पहचान ल बना के रखे हे। नाचा के जोक्कड़ अउ नजरिया ह रात भर मनखे ल सकेल के रखथे। हमर किसान मन ह जब मिंसाई कुटाई के काम बुता ले थक जथे तब नाचा ह ओकर मन बर टानिक दवई असन काम करथे। गांव म नाचा ल लेके लइका अउ सियान म गजब के उछाह देखे ल मिलथे। 
नाचा के माध्यम ले समाज के छूआ छूत, जाति पाति, आंडबर अउ अंधबिस्वास के समस्या ल दिखाय जाथे। जउन ल दरसक मन ह देखथे अउ गुनथे। ए परकार के नाचा ह लोगन मन के बीच जागरूकता लाय म घलो बड़ काम करथे। नाचा के परी (जउन ल नजरिया कहे जाथे) रात भर गाना गा गा के देखइया के मन ल हरिया देथे। नचकाहरा के गाना संग ओकर घुंघरू अउ तबला, पेटी, झुनकी अउ मंजीरा के धुन ह देखइया मन के अंतस ल खुसी रंग म रंग देथे। तेकर सेती देखइया मन ह कतको जाड़ म घलो एकर मजा लेथे। 
नाचा म मनोरंजन के संगे संग सामाजिक समस्या ल बड़ जोरदार ढंग ले दिखाय के कोसिस करे जाथे। गांव म जइसे पुस महिना ह सिराथे ताहन मड़ई मेला के सिजन ह आ जथे। दिन म मड़ई म काम बुता अउ छोटे छोटे जीनीस के लेवई चलथे त रात म गुरतुर गुरतुर नाचा गम्मत के रसपान करे ल मिलथे। नाचा ह बिहिनिया जुआर बेरा के उगते साठ बंद हो जाथे। ए प्रकार गांव के जीवन म नाचा के बड़ महत्व हे। 

Tuesday, 14 November 2017

नोटबंदी नाग तो जीएसटी अजगर


8 नवंबर 2016 को मोदी सरकार ने जिस प्रकार से नोटबंदी का एलान किया वह फुफकारते नाग से कम नहीं था, जिसे गरीब, मजदूर, किसान और छोटे-छोटे व्यापारी को डसने के लिए ढिला गया था। नोटबंदी नाग ने सौ से अधिक लोगों को काट डाला। इसी प्रकार 1 जुलाई 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी लागू कर ऐसा जश्न मनाया जैसे 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिलने पर मनाया गया था। धूमधाम से जीएसटी लागू किया गया, लेकिन यह भी एक अजगर सांप से कम नहीं है जो डसता तो नहीं है लेकिन लोगों को जकड़ कर लील देता है।
जैसे ही गुड्स एंड सर्विस टैक्स लगाया गया तो आम उपभोक्ता के साथ व्यापारी वर्ग में भी हलचल मच गई। एक टैक्स कहकर भारी भरकम टैक्स वस्तु और सेवाओं में लगने लगे। जिससे लोगों का जेब और ढिला होने लगे। जब लोगों ने इसका जमकर विरोध करना शुरू किए तो भाजपा सरकार कहने लगी कि इससे महंगाई कम होगी, सभी चीजे सस्ती मिलेगी, टैक्स चोरी बंद होगी, आम उपभोक्ता को लाभ होगा और न जाने क्या-क्या जुमले की बारिश की गई। इसका टेलीविजन और अखबारों में इतना प्रचार-प्रसार किया गया कि लोगों को लगे कि अब सचमूच खुशहाल जीवन मिल जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बितता गया तो लोगो को समझ आ गया कि होने वाला कुछ नहीं है। समस्या जस के तस बनी रहेगी। फोकट में ढोल पीटा जा रहा है।
जीएसटी के लगभग आधा वर्ष पूरा होने के बाद भी महंगाई में अंकुश नहीं लगने पर लोगों का विरोध साफ दिखाई दे रहे हैं। जिसकों देखकर सरकार इतना घबरा गई कि नोटबंदी की तरह बार-बार नियम में संशोधन करने की जरूरत पड़ गई। गुजरात का चुनाव को देखते हुए मोदी सरकार को पांच प्रतिशत जीएसटी कम करना पड़ा ताकि गुजरात के वोटर कहीं सबक न सिखा दे। जिसमें घोषणा की गई कि अब 215 चीजें सस्ती मिलेगी। इसका भी भारी प्रचार किया जा रहा है। जैसे अब देश की जनता की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाएगी। अब देखना यह है कि इस जरा सा बदलाव का आम उपभोक्ताओं को कितना लाभ मिल पाता है। क्या पेट्रोल 80 से 40 रुपए लीटर हो जाएगा ? क्या गैस सिलेंडर 800 से 400 हो जाएगा ? क्या जर्जर सरकारी स्कूल-कालेज की स्थिति में सुधार आएगी? क्या मेहनतकश मजदूर किसानों को उनका हक मिल पाएगा ? 

का साग ए ढेलिया-फोटू रमकेलिया

अगहन के महिना आगे हे अब गांव-गांव म लुवई मिंजई के बुता ह जोरदार चलत हे। मे ह इतवार के माेर गांव गे रहे हंव। तब मोर बबा ह कथे जा न रे खेत डाहर ल देख के आ जबे। त मोरो मन ह उही डाहर रम गे अउ गुने लागेंव अबड़ साल होगे हे खेत ल देखे नइ हंव। फेर मोला लकर धकर संझा जुआर ले रइपुर लहुटना भी रहिस। तब मोर मन ह मड़माड़े कहे ल लागिस खेत खार ल किंजर आ कही के। ताहन मे ह भात बासी काही नइ खाएंव अउ रेंग देव खेत डाहर। खेत म सब लुवइया अउ भराही करइया मन जोरयाय रहाय तब अइसन लागिस जइसे खेत म कोनो मड़ई मेला होवत हे। मेड़े मेड़ जावत जावत मोला फोटू रमकेलिया दिख गे। जेमां फर अउ फूल ह मड़मारे झूले रहाय। तब मोला नानपन के सुरता अागे कइसे मे ह जब गांव म रहांव त मोर महतारी ह धान लुवइ मिंजइ के दिन म खेत ले फोटू रमकेलिया ल ला के अम्मट म रांधय अउ अबड़ मिठाय। जे दिन ए साग ह चुरे रहाय ओ दिन मोर महतारी ल पुछंव का साग रांधे हस दाई कही के तब गुरतुर ढंग ले कहाय का साग ए ढेलिया फोटू रमकेलिया। तब मोरो मन ह गदगद हो जाय अउ मे ह घेरी बेरी साग चुरत कराही ल देखंव। अउ वो दिन दू कांवरा उपराहा भात घलो खावंव। नानपन के ए सुरता ह मोर अंतस ल हरिया दिस। अउ मोर मन म अभी ले फोटू रमकेलिया साग ह ममहावत हे। 

भाजपा की ओछी मानसिकता


हमारे देश में लड़कियों-महिलाओं को देवी मानकर पूजा की जाती है, लेकिन दूसरी तरफ भगवा भाजपा सरकार लड़कियों को कमरे में जंजीर से बांध कर रखने की कोशिश कर रही है। पिछले दिनों ऐसे कई घटनाएं छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, हरियाणा, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और कई अन्य स्थानों से सामने आई। इस पर गाैर करे ताे लड़कियों को लेकर भाजपा की ओछी मानसिकता साफ दिखती है। अभी-अभी मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोचिंग से लौटती छात्रा के साथ सामुहिक बलात्कार हुआ। जिसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए उनके पालक ने थाना में गुहार लगाई, लेकिन एक दिन तक एफआईआर दर्ज भी नहीं हुई। ले दे के रिपोर्ट होने के बाद अभी तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बलात्कार की इस घटना पर मध्यप्रदेश के सभी लड़कियों का मामा कहलाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अब लड़कियों को शाम सात बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलने का आदेश जारी कर दिया गया है। वहीं कोचिंग सेंटर संचालकों को भी यह आदेश जारी किया है कि शाम सात बजे के बाद किसी भी छात्राओं को नहीं पढ़ाया जाए, अगर पढ़ाते हैं, तो उसका जिम्मेदारी खुद ले। इस प्रकार की सोच आधुनिक समय में कितना जायज है। क्या हम फिर से लड़कियाें को घर के कमरे में कैद करके रखना चाहते है। अगर लड़कियों के शाम को निकलने से बलात्कार होता है तो क्यो न बलात्कारी लड़कों को शाम होते ही कमरे में बांध कर रखने का आदेश दिया जाए।
छत्तीसगढ़ में भी लगातार बस्तर की आदिवासी महिलाओं और लड़कियों के साथ पुलिस कर्मचारियों द्वारा लगातार बलात्कार की घटना सामने आती है, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं होती है। कुछ महिने पहले रक्षाबंधन के दिन बस्तर के एक स्कूल कार्यक्रम में जवानों द्वारा टायलेट में घुसकर स्कूली लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने की घटना हुई थी। जिस पर सरकार और शासन-प्रशासन ने कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की। वहीं पिछले समय हरियाणा के बीजेपी नेता के बेटे ने एक लड़की की कार का पीछा करने और बलात्कार करने की कोशिश की। लड़की ने साहस के साथ कार को
 स्पीड से चलाकर अौर पुलिस को इंफार्म कर अपनी इज्जत बचाई। जिस पर भी भाजपा सरकार शर्म महसूस नहीं की। मुख्मंत्री मनोहर खट्टर भाषण में 'रात में निकलने वाली लड़की नंगी होकर क्यों नहीं निकलती' कहने वाले क्या कार्रवाई करेगा। अब इस प्रकार के घटिया सोच वाले लोग लड़कियाें और महिलाओं को पूरी तरह रूढ़िवादी सोच की बेड़ियों में जकड़ने में लगे हैं। ये लोग तय करेंगे कि लड़कियों को क्या पहनना चाहिए, मोबाइल रखना चाहिए कि नहीं, घर से शाम को निकलना चाहिए कि नहीं।

नोटबंदी से परेशानी हजार, लाभ एक भी नहीं


देश की जनता को नरेंद्र मोदी के भाषण को सुनकर चुनाव के समय ऐसा लग रहा था कि सचमूच अब देश तरक्की की राह में चल पड़ेगा। लेकिन जब से मोदी सरकार आई तब से हुआ कुछ नहीं जुमले और भाषण के अलावा। पिछले साल 8 नवंबर को पांच सौ और एक हजार के प्रचलित नोटों को बंद करके सरकार ने ऐसा लोगों को परेशान किया कि सब अपने काम-धंधे छोड़कर बैंक में लाइन लगे रहे। किसान उस समय फसल की कटाई और मिंसाई छोड़कर बैंक में पैसोें के लिए कतार पर सुबह से शाम लगे रहे। मजदूर भी अपनी रोजी-मजदूरी छोड़कर कुछ पुराने नोट को जमा करने और नए नोट लेने की मजबूरी में पेट की भूख को भूलकर बैंक में ही पैसे बदलने की आस में लगे रहे। कही-कही तो खबर आई थी कि लाइन में लगे-लगे कई लोग मर गए। तो कई जगहों पर मारपीट-लूटपाट भी बहुत हुआ। अब इस परेशानी को मोदी सरकार और मोदी भक्तों ने देशभक्ति से जोड़कर लोगों के सामने पेश करने लगे। कहने लगा कि हमारे मोदी देश के लिए घर-परिवार और पत्नी को छोड़ सकता है तो अाप लाइन में लगकर मर नहीं सकते। अब लाइन में लगकर मरने वालों को शहीद का दर्जा देने लगे। कहने लगे कि कुछ ही दिन परेशानी होगी फिर देखना देश में कालाधन, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, बेरोजगारी, भूखमरी, शोषण-अत्याचार, जाली नोट और घुसघोरी सब जड़ से खत्म हो जाएगी।
अब देखना यह है क्या वास्तव में नोटबंदी से देश बदला है। अगर हम रिजर्व बैंक अाफ इंडिया की 2016-17 की रिपोर्ट पर गौर करे तो रिपोर्ट में बताया गया है कि पुराने नोट 99 फिसदी से ज्यादा जमा हो गए हैं। जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि सभी करोड़ों के कालाधन कमाने वाले अपने रूपए बदल लिया है। वास्तविक सामने आते देख सरकार ने जनता को भ्रमित करने के लिए इस नोटबंदी को डिजिटल इंडिया से जोड़ने लगा और कहने लगा कि अब देश में सभी चीजे आनलाइन पेमेंट होगा। अब इन्हें कौन बताए कि घर बनाने से पहले नींव बनाई जाती है। यहां तो सीधा इमारत खड़ी की जा रही है बिना नींव की। सरकार को चाहिए कि पहले व्यवस्था को ठिक करे। यहां इनटरनेट और मोबाइल सर्वर इतने कमजोर है कि गांव में चले जाओं तो ठिक से बात भी नहीं हो पाती और डिजीटल इंडिया की बात कर रही है। भारत में 80 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण निवास करते हैं जो ज्यादातर अशिक्षित है। अब यहां के लोग पढ़ना ठीक से नहीं जानते तो क्या आनलाइन समझा पाएंगे। पहले तो देश के स्कूल-कालेज को बेहतर बनाना चाहिए। अब साल भर गुजरने के बाद क्या देश में कालाधन वापस आ गया ? क्या भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हुई? क्या माल्या और ललित मोदी जैसे वीआईपी भ्रष्टाचारियों को जेल के अंदर डाल पाए ? क्या स्वीस बैंक में बीजेपी नेता और पूंजीपतियों की जमा की गई संपत्ति देश में आ गई ? क्या बेरोजगारों को रोजगार मिल पाया ? क्या जनता को बेहतर शिक्षा मिल गई ? क्या गरीब, किसान, मजूदर की स्थिति सुधर पाई ?