Tuesday, 14 November 2017

नोटबंदी से परेशानी हजार, लाभ एक भी नहीं


देश की जनता को नरेंद्र मोदी के भाषण को सुनकर चुनाव के समय ऐसा लग रहा था कि सचमूच अब देश तरक्की की राह में चल पड़ेगा। लेकिन जब से मोदी सरकार आई तब से हुआ कुछ नहीं जुमले और भाषण के अलावा। पिछले साल 8 नवंबर को पांच सौ और एक हजार के प्रचलित नोटों को बंद करके सरकार ने ऐसा लोगों को परेशान किया कि सब अपने काम-धंधे छोड़कर बैंक में लाइन लगे रहे। किसान उस समय फसल की कटाई और मिंसाई छोड़कर बैंक में पैसोें के लिए कतार पर सुबह से शाम लगे रहे। मजदूर भी अपनी रोजी-मजदूरी छोड़कर कुछ पुराने नोट को जमा करने और नए नोट लेने की मजबूरी में पेट की भूख को भूलकर बैंक में ही पैसे बदलने की आस में लगे रहे। कही-कही तो खबर आई थी कि लाइन में लगे-लगे कई लोग मर गए। तो कई जगहों पर मारपीट-लूटपाट भी बहुत हुआ। अब इस परेशानी को मोदी सरकार और मोदी भक्तों ने देशभक्ति से जोड़कर लोगों के सामने पेश करने लगे। कहने लगा कि हमारे मोदी देश के लिए घर-परिवार और पत्नी को छोड़ सकता है तो अाप लाइन में लगकर मर नहीं सकते। अब लाइन में लगकर मरने वालों को शहीद का दर्जा देने लगे। कहने लगे कि कुछ ही दिन परेशानी होगी फिर देखना देश में कालाधन, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, बेरोजगारी, भूखमरी, शोषण-अत्याचार, जाली नोट और घुसघोरी सब जड़ से खत्म हो जाएगी।
अब देखना यह है क्या वास्तव में नोटबंदी से देश बदला है। अगर हम रिजर्व बैंक अाफ इंडिया की 2016-17 की रिपोर्ट पर गौर करे तो रिपोर्ट में बताया गया है कि पुराने नोट 99 फिसदी से ज्यादा जमा हो गए हैं। जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि सभी करोड़ों के कालाधन कमाने वाले अपने रूपए बदल लिया है। वास्तविक सामने आते देख सरकार ने जनता को भ्रमित करने के लिए इस नोटबंदी को डिजिटल इंडिया से जोड़ने लगा और कहने लगा कि अब देश में सभी चीजे आनलाइन पेमेंट होगा। अब इन्हें कौन बताए कि घर बनाने से पहले नींव बनाई जाती है। यहां तो सीधा इमारत खड़ी की जा रही है बिना नींव की। सरकार को चाहिए कि पहले व्यवस्था को ठिक करे। यहां इनटरनेट और मोबाइल सर्वर इतने कमजोर है कि गांव में चले जाओं तो ठिक से बात भी नहीं हो पाती और डिजीटल इंडिया की बात कर रही है। भारत में 80 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण निवास करते हैं जो ज्यादातर अशिक्षित है। अब यहां के लोग पढ़ना ठीक से नहीं जानते तो क्या आनलाइन समझा पाएंगे। पहले तो देश के स्कूल-कालेज को बेहतर बनाना चाहिए। अब साल भर गुजरने के बाद क्या देश में कालाधन वापस आ गया ? क्या भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हुई? क्या माल्या और ललित मोदी जैसे वीआईपी भ्रष्टाचारियों को जेल के अंदर डाल पाए ? क्या स्वीस बैंक में बीजेपी नेता और पूंजीपतियों की जमा की गई संपत्ति देश में आ गई ? क्या बेरोजगारों को रोजगार मिल पाया ? क्या जनता को बेहतर शिक्षा मिल गई ? क्या गरीब, किसान, मजूदर की स्थिति सुधर पाई ?

बेहतर शिक्षा नहीं होने से अंधकार में देश


हमारी जिंदगी में तालीम की अहमियत बहुत होती है। शिक्षा से ही हम उचित-अनुचित, अच्छाई-बुराई, यर्थाथ-काल्पनिक और सही-गलत के बीच भेद कर पाते हैं। देश में स्कूल-कालेज की गुणवत्ता गिरती जा रही है। अब ज्यादा पैसा कमाने के लिए स्कूल-कालेज ही सबसे बड़ा धंधा बन गया है। जिससे जगह-जगह प्राइवेट स्कूल-कालेज छोटी सी जगह और दो-चार रूम में संचालित हो रहे हैं। हमारे देश के संविधान में समानता और धर्मनिरपेक्षा की बात कही गई है, लेकिन यह चीजें कही दिखाई नहीं देती। यहां समानता की बात करे तो गरीबों के लिए सरकारी स्कूल और अमीरों के लिए महंगा प्राइवेट स्कूल खुले हुए हैं। जिससे देश में दो नागरिकता पैदा हो गई है। अब पूंजीपति लोग ज्यादा से ज्यादा महंगे स्कूल में अपने बच्चों को एडमिशन करा कर गर्व महसूस करते हैं, तो गरीब के बच्चे जर्जर और संसाधनहीन स्कूल में दालभात खाने जाते हैं। लोगों का बचपन स्कूल से ही शुरू होता है। जिसे ज्ञान-विज्ञान की जगह के लिए जाना जाता है, लेकिन सरकारी स्कूल हो या प्राइवेट सभी स्कूलाें में बच्चों को ज्ञान-विज्ञान से दूर पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान और काल्पनिक बातों में उलझा कर रखा जाता है। अब जिस स्कूल में सरस्वती पूजा होती हो वहां के बच्चे क्या खाक चंद्र, मंगल और अंतरिक्ष में जाएगा। उसे तो यहीं बताया जाता है कि सब प्रभु की महिमा है पूरा अंतरिक्ष भगवान संचालित कर रहा है। राजधानी के स्कूलाें में अभी सहस्त्रबाहु जयंती पर बच्चों को महाआरती कर उनकी काल्पनिक गाथा बताया जाएगा। मैंने देखा है स्कूल-कालेजों में कोई भी कार्यक्रम होता है तो प्रारंभ सरस्वती पूजा के साथ होता है। क्या हमारा देश में सिर्फ हिंदू ही पढ़ते हैं अन्य धर्म के नहीं। हमें शिक्षा, समाज, राजनीति से धर्म, जाति, पंथ और संप्रदाय को दूर रखना चाहिए। ताकि समानता और वैज्ञानिक सोच के साथ देश का विकास हो सके।

छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़िया के कदर नही अउ मनावत हे राज उछाह


जबले छत्तीसगढ राज ह बने हे तब ले सरकार ह लगातार राज उछाह मनावत हे। भले किसान मन आत्महत्या करे, लइका मन ह भोकवा राहय, जवान टूरा-टूरी मन बेरोजगार घुमय, रसपताल म मरीज ह इलाज बिना तरस के मर जाय, मजदूर अउ किसान ल ओकर मेहनत के पइसा मत मिलय, इस्कूल कालेज म गुरुजी मत रहाय, भले सरकारी स्कूल अउ कालेज ल बंद करके प्राइवेट स्कूल कालेज के दलाली करे अउ कतेक समस्या ल आेरयाबे। इहा तो सरकार ह छत्तीसगढ़िया मन ल ठग के छत्तीसगढ़ ल बेचे म पूरा ताकत ल लगा देहे। जनता ल भुलवारे बर आनीबानी के जाल ल बिछावत हे। अब राज उछाह ल लेके रमन कका ह पइसा ल पानी कस बोहाही अतका खर्चा म तो छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया मन के तसवीर अउ तकदीर दूनो बदल जतीस। ए बखत तो मे ह सुनत हव कि फेर नवा रइपुर म पांच दिन के उछाह मनाही। जेमा बालीवुड के सिंगर सुखबिंदर सिंह अउ केके ह आके दू ठन गाना सुनाही अउ करोड़ों रुपया ल समेट के ले जाही। भले हमर छत्तीसढ़िया कलाकार मन ह टुकुर टुकुर देखत रही।
राज उछाह बर एक महिना पहिली ले तियारी शुरू हो जथे लेकिन धान खरीदी बर काही तियारी नइ होय। तेकर सेती किसान मन ल अपने कमइ के धान ल बेचे बर अउ पइसा बर घलो लाइन म लगे ल परथे। कभू सरवर ह ठप हो जथेे त कभू किसान मन ल धान भरे बर बोरा नइ मिलय। सरकार ह हर बखत चुनाव म किसान मन के धान ल 2100 रुपया म लेबो कही के भुलवारत आवत हे। फेर धान के रेट ह नइ बढ़हीस उही 11 रुपया किलो म बेचावत हे मतलब हमर किसान मन के धान के कीमत ह एक ठाेक पानी बाटल जेन ह 25 ले 30 रुपया म बेचाथे ओतको नइ हे। अब किसान के धान के मूल्य ह तो नइ बढ़हीस अउ उल्टा पेट्रोल-डीजल, ट्रेकटर, दवई अउ बीजहा धान के कीमत ह मड़माड़े बढ़ गे। तब अइसने म किसान ह करय त करय का। ए साल सरकार ह किसान मन ल एक क्वींटल के पाछू तीन सौ रुपया बोनस देके अइसन छाती ठोकत हे अउ अहसान जतावत हे। जइसे अब किसान मन ल कमायच ल नइ लागय। जे दिन हमर किसान मन के मुख ले उदासी के बादर ह साफ होही अउ खुशी के मड़माड़े बरसात होही। उही दिन छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया मन के असली उछाह आही।
ए बखत एक ठोक अउ बात सुनत हव कि गुजरात के 18 ठोक इसटाल लगही कहीके मतलब छत्तीसगढ़ी संसकिरति ह तो पूरा नंदा गेहे जउन ह बाचे हे वहू ल गुजराती रंग म रंगे के कोसिस होवत हे। अउ छत्तीसगढ़ी भाखा ल लेकेे भासा आयोग बनाय अबड़ साल होगे फेर छत्तीसगढ़ी कोनो मेर लागू नइ होहे। तेकर सेती हमर भाखा अउ माटी के सुगंध ह सिरावत नजर आवत हे। जउन दिन छत्तीसढ़, छत्तीसगढ़िया अउ छत्तीसढ़ी के कदर होही उही दिन हमर छत्तीसगढ़ के नवा बिहान आही।

कलम पर चहुंमुखी हमले


अकबर इलाहाबादी ने कहा था कि 'खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो' मतलब उस दौर में पत्रकारिता की ताकत कमान और तलवार से भी अधिक थी। देश और समाज को बदलने और राह दिखाने में अखबारनविसों की बड़ी भूमिका रहती थी। अब इस ताकत को मिटाने और दबाने के लिए चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अखबार पर बंदिश लगाने वाले काला कानून पिछले दिनों पेश कर मीडिया आैर लोकतंत्र पर थपड़ मारी है। जिसका विरोध की आवाज कहीं भी नहीं सुनाई दे रही है। भाजपा सरकार और भाजपा कार्यकर्ता और उनके चमचे को छोड़ दिजिए, लेकिन देश के युवा भी मौन हैं। क्या हम अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलम की ताकत को मरते हुए देखना चाहते हैं। अब राजस्थान में ही नहीं पूरे देश भर में पत्रकारिता और पत्रकारों की स्थित बहुत ही खराब है। मीडिया अब पूंजीपतियों, सरकार, गुंडो फर्जी बाबा और धर्म के धंधा करने वालों के कब्जे में है। लगातार कुछ घटनाएं पत्रकार और पत्रकारिता को चोट पहुंचाई है। बाबा राम रहीम की असलियत को प्रकाशित करने वाले रामचंद्र छत्रपति को उनके घर के सामने हत्या कर दी गई। बंगलौर की निडर पत्रकार गौरी लंकेश को उनके घर घुंसकर गोली मर दी गई। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर में देखे तो पनामा पेपर का खुलासा करने वाली माल्टा की जर्नलिस्ट डैफने कारूआना को उनकी कार के साथ बम से उड़ा दिया गया। देश और विदेश में पूंजीपतियों द्वारा पत्रकार और पत्रकारिता को खरीदा जा रहा है। चाहे वह धन बल से हो या बाहुबल से। इतनी भयावह स्थिति होने के बाद भी देश के कुछ साहसी पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर लिख रहे हैं। जिससे भ्रष्टचार के रस में डुबे लोग और सरकार पूरी तरह से डरे हुए हैं। देश के केंद्र सरकार मीडिया को खरीदने में लगी है, वहीं पूंजीपति द्वारा संचालित मीडिया भी बिकने और सरकार के हाथों में नाचने के लिए व्याकुल है। जिससे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सके। वैसे तो टीवी और अखबाराें में गांव, ग्रामीण, खेती, किसानी
, मजदूर, किसान, जमीन और जंगल पूरी तरह से खत्म हो गया है। कुछेक अखबार जो छोटे वर्ग के लोगों की आवाज बुलंद कर रहे हैं, उनको अब सरकार और धनवानों द्वारा पूरी ताकत से मिटाया जा रहा है। अब कहीं अखबार की भाषा पूरी तरह से चाटुकारिता न हो जाए और टेलीविजन चैनल की आवाज भाट की आवाज न हो जाए।

जेठवउनी : का कोनो मनखे ह लगातार चार महिना ले सुत सकथे

हमर देस म आनीबानी के मनगढ़त उपटपुटांग कहानी ह अबड़ दिन के चलत आवत हे। पौरानिक कहानी म कहे गे हे कि आसाढ़ महीना के सुक्ल पक्छ के एकादशी म भगवान बिष्णु अउ देवी-देवता मन ह सुत जथे। जउन ल गियानी पंडित मन ह देवसुतनी एकादसी कथे। फेर चार महिना के बाद कातिक सुक्ल पक्छ के एकादसी म बिष्णु अउ जम्मो देवधामी मन ह भरभरा के उठ जथे। एला पूजापाठ के धंधा करइया मन ह देवउठनी अउ हमर छत्तीसगढ़िया मन ह जेठवउनी कथे। वइसे तो हमर पौरानिक कहानी म जइसन असल जिनगी म नइ होय वइसन कलपना करे हाबय। अब का कोनो मनखे ह बिना खाय-पिए चार महिना ले सुत सकथे आपे मन बतावव। अइसने कुंभकरन ल घलो छह महिना ले सुतइया बताय हे। अभी तक ले हमर धरती म अइसन परानी के खोज नइ होय हे जेन ह छह महिना ले सुतथे अउ छह महिना ले मड़माड़े खाथे।
अब मे ह दूसर ढाहर बात ल नइ लमा के 31 अक्टूबर के अवइया जेठउवनी या देवउठनी ल लेके आप मन से थोकन गोठियाहू। लोगन ल कहानी अउ कालपनिक बात म उलझइया मनखे मन कथे कि देवसयनी एकादशी ले देवउठनी एकादसी तक यानी चार महीना भगवान बिष्णु ह सयनकाल के अवसथा म होथे अउ ए समय म कोई सुभ काम ल नइ करे जाय कथे। त भइया हो आपे मन बतावव कि जम्मो तिहार पूजापाठ अउ धारमिक काम बुता ह इही बेरा म होथे। जइसे गनेस पूजा, नवरातरी म दुरगा पूजा, देवारी म लछनी पूजा अउ बीच बीच म काय काय पूजा नइ होय। तब तो फेर ये पूजाउजा मन ह असुभ काम आय काबर पंडित मन ह कइथे कि ए समय म देवी-देवता मन सुते रइथे। अव इकर सुते के समय म कोनो परकार के डिस्टर्ब नइ होना चाही। तब तो हमन ह बड़े जान पापी हरन काबर गनेस, दुरगा अउ लछनी पूजा म मड़माड़े आवाज म लाउंड स्पीकर बजा-बजा के भगवान ल अउ आस पास के मनखे ल जगाथन अउ परेसान करथन। बड़े-बड़े फटाका फोड़ के सुते देवधामी अउ इस्कूल म पढ़त लइका, रसपताल म परे मरिज ल झझकाथन चमकाथन। अउ अतको नही गनेस अउ दुरगा ल पानी म बोर बोर के उबुक चुबुक डूबो देथन जेकर ले ओ भगवान ल कतेक तकलीफ होवत होही अउ धरती के जीयत परानी, जीव अउ जानवर मन ल घलो पीए के पानी मिलत रिहिस उहू ह परदूसित होगे। जतका नदिया, नरवा, तरिया, डबरी रिहिस ओला हमन भगवान के नाम म पाट डरेन। का हमन अइसन करके देवी-देवता के नींद म अउ आस पास के मनखे अउ जीव जानवर के जिनगी म दखल नइ देवत हन।

लोकतंत्र का गला घोटने की हो रही साजिश

देश में जहां-जहां भाजपा सरकार है चाहे केंद्र हो या राज्य वहां पूरी तरह से लोकतंत्र का गला घोटने की कोशिश हो रही है। अभी तो सरकार मतलब जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी हो गई है। वर्तमान में देश की जनता न्यायालय और प्रेस से कुछ उम्मीद रखती है। जिस पर सरकार लगातार वार कर रही है। राजस्थान में वसुंधरा सरकार सोमवार से शुरू हो रहे विधानसभा के सत्र में एक ऐसा विधेयक लाने जा रही है, जिसमें भ्रष्ट सरकार या अधिकारी के खिलाफ एफआईआर करने के लिए सरकार से इजाजत की जरूरत पड़ेगी। यह विधेयक सन 1975 में इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस की सरकार ने देश भर में पूरी तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी थी उनकी याद दिलाता है। इसी प्रकार अब किसी भी भ्रष्ट नेता, अधिकारी, कर्मचारी, विधायक, सांसद, मंत्री और अन्य सरकारी कर्मचारियों को अब सरकार बताएगी कि महाभ्रष्ट मंत्री या सांसद पूरी तरह से दुध के धुले हैं। पहले से न्यायालय का अवमानना कानून लागू है जिसके अनुसार किसी भी जज के खिलाफ एक लब्ज भी नहीं बोला जा सकता। इसी प्रकार अब सरकार का अवमानना कानून भी लागू हो रहा है, जिससे आप सरकार के खिलाफ मुंह नहीं खोल सकते। अगर जुबां फिसली तो दो साल की जेल की सजा होगी। इस प्रकार सरकार तानाशाही नीति को लागू करने में जोर दे रही है। पहले देश अंग्रेजों के गुलाम था, अब अपने ही देश के कुछ लोग कानून व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था को खराब करने में लगे हैं। राजस्था
न में ये बिल पास हुआ तो बगैर सरकार की अनुमति के अफसरों के खिलाफ कोई एफआईआर नहीं होगी। 180 दिनों तक अनुमति नहीं मिलेगी तो कोर्ट के आदेश से एफआईआर होगी। तब तक सरकार उन भ्रष्टाचार के खिलाफ व्याप्त सबूतों के नामो-निशां मिटा देगी। कुछ पत्रकार पत्र-पत्रिका और अन्य माध्यमों से घोटाले का खुलासा करने का साहस जुटा पाते हैं। उनको भी अब इस विधेयक से यहां किसी व्यक्ति के खिलाफ 180 दिनों तक कोई खबर नहीं छापने दिया जाएगा। जिससे अब यह लगता है कि देश में फिर से इंदिरा के समय से कई गुणा बदतर स्थिति हो गई है। अब कहीं भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं दिखाई देती अगर अाप सरकार की आलोचना करेंगे ताे मारे जाएंगे।

मोहब्बत की निशानी ताजमहल पर नफरत की निगाहें

हमारे मुल्क में हमेशा से कुछ ऐसे लोग मौजूद है जो नफरत की बीज बोया करतेे हैं। चाहे भाषा के नाम पर हो, चाहे धर्म, क्षेत्र, जाति और कुछ नहीं मिला तो गाय, गोबर, भारत माता है कि पिता, देशभक्त कौन है देशद्रोही कौन और अन्य फिजूल मुद्दों को लेकर हिंसा और लड़ाई करवाते हैं। अब इस बार भगवा सरकार और कट्टरपंथियों की नफरत की निगाहें मोहब्बत की निशानी दुनिया के सातवे अजुबों में शामिल खूबसूरत और मनमोहक ताजमहल पर पड़ गई है। उत्तर प्रदेश के टूरिज्म लिस्ट में ताजमहल को शामिल न करना यह दिखाता है कि योगी सरकार खूबसूरत इमारत ताजमहल को लोगों के दिलों से अलग कर देना चाहती है। जिसे देखने हिंदुस्तान और विदेश के पर्यटक बड़ी संख्या में हर साल आते हैं। बीजेपी के मेरठ जिले के एमएलए संगीत सोम ने एक पब्लिक मीटिंग में ऐलान किया कि ताजमहल को इतिहास से निकाल दिया जाना चाहिए। अब इसे कौन समझाए की इतिहास लिखा नहीं जाता इतिहास बनता है। अगर शाहजहां द्वारा बनवाया गया ताजमहल को इतिहास से हटाया जाएगा तो देश का पूरा इतिहास ही मिट जाएगा। अब जिस लाल किले में साल में दो बार देश की स्वतंत्रता और गणतंत्रता की खुशिया मनाते हैं उन्हें भी खत्म कर देना चाहिए। देश को लंबे समय तक गुलाम रखने वाले अंग्रेजों द्वारा निर्मित स्कूल-कालेजों को भी ढंहा देना चाहिए। जिस रेल को अंग्रेज सरकार ने बनवाई उसे भी उखाड़ फेंकना चाहिए और अखबारों को भी बंद कर अभिव्यक्ति पर रोक लगा देना चाहिए। तो बताइए जनाब हमारा इतिहास क्या है और कैसे इतिहास बनाना चाहते हैं। कही ऐसा तो नहीं की बाबरी मस्जिद गिराकर देश के हजारों बेगुनाहों की जान लेने का इतिहास को ताजमहल के नाम पर दोहराने का घटिया और घृणित कुविचार हो?

लक्ष्मी पूजा से धन मिलता है तो देश गरीब क्यों?


हमारा भारत देश में ज्यादातर समय पूजा-पाठ में व्यतित होता है। कहा जाता है कि लक्ष्मी की पूजा करने से धन-संपत्ति की बारिश होती है। इसलिए दीपावली त्योहार में अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, शहरी-ग्रामीण और सभी वर्ग के लोग तल्लीन होकर मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं, लेकिन अभी तक भारत देश को गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी और अन्य समस्याओं से मुक्ति नहीं पाई। बल्कि यहां की जनता गुलाम मानसिकता के शिकार हो गई। अब सोचने की बात यह है कि समाज अपनी अगली पीढ़ी को किस ओर ढंकेल रहा है। लोगों को मेहनत में कम और पूजा-पाठ में ज्यादा विश्वास होने लगा है, जिससे आत्मविश्वास कमजाेर पड़ता जा रहा है। अब आधुनिक युग में शिक्षित लोग भी विज्ञान पर कम और चमात्कार पर ज्यादा विश्वास करने लगा है। अगर पूजा-पाठ से मनोकामना पूरी होती तो यहां कोई इंसान असंतुष्ट नहीं होते। इतनी बड़ी आबादी सुबह से शाम और देर रात तक लाउंड स्पीकर बजा-बजा कर भगवान को याद करते हैं, लेकिन उनकी समस्याएं जस के तस बनी रहती है। हमें भेड़ धसान चाल चलने से पहले साेचना होगा कि हम और हमारा समाज कहा जा रहे हैं ? क्या लक्ष्मी पूजा करने से रुपयों की बारिश होती है ? क्या दुर्गा पूजा करने से शक्ति मिलती है? क्या सरस्वती पूजा रकने से ज्ञान मिलता है ? तो भारत देश को विश्व में सबसे धनवान, सर्वशक्तिमान और बहुत ही ज्ञानवान होना चाहिए। इस वक्त मुझे भगत सिंह की कही गई बात याद आती है, 'अपने बच्चों को यह कहना कि तुम छनभंगुर और कमजोर हो, जो भी कर्ता-धर्ता ईश्वर है, इससे बच्चों की आत्मशक्ति खत्म हो जाती है।' यह बात सत प्रतिशत सहीं है। बच्चे अपने आप को तुच्छ और हीन समझने लगता है। इस प्रकार की सोच घरवालों द्वारा बचपन में ही बच्चों के मन में ठूस-ठूस कर भरी जाती है। ताकी जिंदगी भर इस मानसिक बीमारी से जुझते रहे। पालकों को चाहिए कि अपने बच्चाें को वैज्ञानिक और प्रगतिशील सोच की शिक्षा और विचार दें। जिससे वे अपनी शक्ति और मेहनत पर विश्वास करें। बच्चों को खुद पर विश्वास नहीं होने के कारण परीक्षा में पास होने के लिए पढ़ाई छाेड़ सरस्वती पूजा और नारियल फोड़ना शुरू कर देते हैं। विद्यार्थी पढ़ने में कम और पूजा-पाठ में ज्यादा यकीन करने लगते हैं। जिससे वह कई बार फेल भी हो जाते हैं। इस पर भी खुद को दोषी न मानकर भगवान और भाग्य को दोष देता है। इसमें बच्चों की भी गलती नहीं है, गलती तो हमारी है हमने तो इस प्रकार की सोच की बीज बच्चों के मन में उनकी शुरूआती जिंदगी में बोए हैं। वैज्ञानिक और आधुनिक समाज को यह कितना शोभा देता है?

किसानों की चिंता या चुनाव की

सरकार किसी भी पार्टी की हो हमेशा से भोले-भाले किसानों को वोट बैंक ही समझती है। अब भाजपा सरकार को देख लिजिए इतने साल से किसानों की चिंता नहीं सता रही थी, अचानक चुनाव सामने देख किसानों की फिकर होने लगी। अब इसे किसानों की चिंता कहे या चुनाव की। प्रति क्वींटल धान पर 300 रुपए बाेनस देकर ऐसा अहसान जता रहा है जैसे अब किसानों की जिंदगी ही बदल गई। देश और प्रदेश में इतनी बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या पहली बार हुई है। सरकार को खुशी ऊंट के मुंह में जीरा 300 रुपए बोनस देने में हो रही है, लेकिन किसानों की आत्महत्या की घटनाओं को लेकर उतनी दुखी नहीं। रमन सरकार जितने खर्च किसानों को बोनस देने में कर रही है, उससे कहीं ज्यादा खर्च बोनस तिहार उत्साह मनाने के लिए पंडाल, भीड़ जुटाने, विज्ञापन, और अन्य जनसंपर्क की व्यवस्था में कर रही है। सरकार अब चुनाव को देखते हुए किसानों, मजदूरों, गरीबों, युवाओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों और अन्य वर्गों के लोगों को प्रलोभन और जुमले की जाल में फांसने में लग गई है। भाजपा सरकार पिछले दो चुनावों की चुनावी घोषणाएं पूरी तरह से भूल गई है। किसान पूछ रहे हैं कि धान के समर्थन मूल्य 2100 रुपए कब होगा, पिछले सालों के बोनस कब मिलेगा और ऐसी स्थिति कब आएगी जब किसान पूरी तरह से कर्ज से मुक्त हो और कृषि ऋण लेने की जरूरत न पड़े। सरकार द्वारा पूराने वादे भुलाकर जनता को नए सपने दिखाना कितना जायज है ?

त्याेहारों पर पर्यावरण व खुद से खिलवाड़ तो नहीं ?

आज सबसे ज्यादा समस्या देश में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या है। पूरी तरह से आबो-हवा प्रदूषित हो गई है। इसके बावजूद भी हमारे देश में हर त्योहारों पर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ हो रहा है। क्यों हम उत्सव के रंग में इतने रंग जाते हैं, हमें पर्यावरण और खुद को होने वाली हानियों के बारे में जरा भी ख्याल नहीं आता। यहां महिने के हर दिन कोई न कोई त्योहार होता है, जिसमें हम सब मिलकर केमिकल युक्त मूर्ति से नदियां, तालाबों और अन्य जलस्त्रोतों को पाटने में लगे हैं। भले ही हमारे देश में सरकार गंगा नदी और अन्य नदी बचाने का अभियान कितनों जोर-शोर से चलाए, भले ही देश भर में स्वच्छ भारत मिशन के हल्ला मचाएं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई कानून बनाने की जरूरत महसूस नहीं की। जिससे त्योहार में होने वाले जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और अन्य परेशानियों पर रोक लगाया जा सके। मूर्ति स्थापना, ज्योत प्रजवलित
 के लिए घी-तेल के लिए करोड़ों रुपए की बबार्दी की जाती है। वहीं दूसरी ओर कुपोषण से दिन-ब-दिन मरने की संख्या बड़ रही है। अगर इसी से इन कुपोषितों के पेट भरा जाता तो कितना अच्छा होता। इससे अापके देवी-देवता खुश हो जाते। आप सोचिए कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके इस हरकत से ईश्वर रूठ गया हो और लगातार सुखा-अकाल जैसी स्थितयों का सामना करना पड़ रहा है। यहां देश गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, भुखमरी और अन्य समस्याओं से जूझ रहा है। वहीं छोटे से बड़े वर्ग के लोग मूर्ति पूजा के नाम पर फिजूल खर्च कर रहे हैं। मूर्ति पूजा करने के लिए कई गुंडों की टोलियां घर-घर जारकर चंदा लेते हैं। अगर अाप कम देते है या मना करते हैं तो विवाद करेंगे यहीं नहीं कई बार तो चाकूबाजी करेने में भी यह भक्तों की टोलियां नहीं चुकते। मानना पड़ेगा यहां आस्था के नाम पर कुछ भी हो सकता है। भले ही महानगरों में जगह की कमी हो, ट्रेफिक समस्या हो और अन्य समस्याएं हो, लेकिन मूर्ति स्थापना करेंगे ही। त्योहार या पूजा के लिए लाउड स्पीकर और डीजे बजाकर ईश्वर को खुश किया जाता है, कहीं ऐसा ताे नहीं कि हम लाउडस्पीकर से हास्पिटल के मरीजों को, स्कूल-कालेज के पढ़ने वालों को और आस-पास के लोगों को परेशान तो नहीं कर रहे हैं। वहीं दीपावली में फटाखे से पूरे शहर प्रदूषित हो रहे हैं। पहले गांवों को साफ-सुथरा और सादा जीवन के लिए जाने जाते थे, लेकिन यह धुंआ गांवों में भी पहुंच गई है। अब ग्रामीण भी जमकर आतिशबाजी करने लगे हैं। भले ही खाने के लिए रोटी न हो, पहनने के लिए कपड़े, लेकिन यह गरीब तबके के वर्ग फटाके जरूर खरीदेंगे। वहीं फटाके फोड़तें समय बच्चों के हाथ-पांव जल गया तो हो गया गरीबी में आटा गीला। दूसरी ओर शहरों में वायु और ध्वनि प्रदूषण होने के बाद भी लोग मूर्तियों, पूजा-पाठ और पटाखे में करोड़ों रुपए और प्रर्यावरण का नाश कर कर रहे हैं। अगर इस धन, समय और प्रयास को गरीबों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, कपड़े, आवास और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए खर्च करे तो इस देश की तस्वीर क्यों नहीं बदलेगी