Thursday, 17 September 2026

कोलकाता से नक्सलबाड़ी



कोलकाता, पश्चिम बंगाल और नक्सलबाड़ी को करीब से जानने की जिज्ञासा लंबे समय से मन में थी। कोलकाता कभी ब्रिटिश भारत की राजधानी रहा और औपनिवेशिक दौर में व्यापार तथा प्रशासन का प्रमुख केंद्र भी। आज भी यह देश के प्रमुख महानगरों में अपनी अलग पहचान रखता है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की मिट्टी साहित्य, संस्कृति, राजनीति और आंदोलनों की लंबी परंपरा के लिए जानी जाती है। रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस और बटुकेश्वर दत्त जैसे अनेक चर्चित व्यक्तित्वों ने इस धरती की पहचान को समृद्ध किया। इसी बंगाल में 1967 में दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से एक किसान आंदोलन ने देश की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया। चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल से जुड़े इस आंदोलन ने जमीन, किसान और वर्गीय शोषण के सवालों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। आंदोलन से जुड़ा प्रसिद्ध नारा “अमार बाड़ी, तोमार बाड़ी, नक्सलबाड़ी, नक्सलबाड़ी” उस दौर में किसानों के संघर्ष और जमीन पर अधिकार की भावना का प्रतीक बन गया।

किताबों की तलाश में कॉलेज स्ट्रीट

कोलकाता घूमने की हसरत के साथ कुछ काम और प्रगतिशील हिंदी किताबों की तलाश भी थी। इसलिए हम पहुंच गए कॉलेज स्ट्रीट, जिसे किताबों की दुनिया के लिए जाना जाता है। किताबों की दुकानों के बीच घूमते हुए पश्चिम बंगाल की राजनीति पर कई लोगों से बातचीत का मौका मिला। सुबह हम नेशनल बुक एजेंसी पहुंच गए, लेकिन दुकान अभी खुली नहीं थी। पास की एक दुकान पर बैठे दुकानदार से बातचीत शुरू हुई। शुरुआत सामान्य बातचीत से हुई, लेकिन धीरे-धीरे चर्चा पश्चिम बंगाल की राजनीति तक पहुंच गई। दुकानदार ने लंबे समय तक कांग्रेस के शासन, फिर करीब 35 वर्षों तक चले वाम मोर्चे और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने की चर्चा की। उनका मानना था कि वाम मोर्चा सरकार ने गरीबों, किसानों और मजदूरों के लिए काफी काम किया, लेकिन समय के साथ वह नई पीढ़ी को पर्याप्त नेतृत्व नहीं दे सकी। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक अति-आत्मविश्वास ने वाम मोर्चे को नुकसान पहुंचाया। ममता बनर्जी के 15 सालों के शासन के दौरान लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और बदलते राजनीतिक माहौल का जिक्र करते हुए उन्होंने भाजपा के सत्ता में आने की बात कही। जब उनसे पूछा कि इन सभी सरकारों में उन्हें सबसे बेहतर कौन-सी लगी, तो उनका जवाब था—वाम मोर्चा। उनके अनुसार उस दौर में महंगाई अपेक्षाकृत कम महसूस होती थी और गरीब, किसान तथा मजदूर के मुद्दों पर सरकार का ध्यान अधिक था। भाजपा को सत्ता में आए लगभग चार महीने हुए हैं, जनता को बड़ी उम्मीद थी, लेकिन अभी तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और उनके मंत्रियों व विधायकों की तामझाम के साथ वीआईपी सुरक्षा देखने को मिल रही है। नेताओं के आने से पहले सड़कों पर चूना मारना और लोगों को खाली करने का काम किया जाता है, लेकिन वाम सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य सामान्य व्यक्ति की तरह घूमते थे। आज भी पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी नेशनल बुक एजेंसी पुस्तक खरीदने आती है बिना सुरक्षा और सामान्य कपड़ों में। लोग उन्हें जानते भी नहीं कि पूर्व सीएम की बेटी हैं।

कोलकाता की गलियों में इतिहास और वर्तमान

कोलकाता भ्रमण का पहला दिन विक्टोरिया मेमोरियल, प्रिंसेप घाट, हावड़ा ब्रिज और बड़ा बाजार घूमते हुए बीता। रास्ते में कई लोगों से बातचीत हुई। किसी से रास्ता पूछा तो उसने रुककर समझाया, किसी से किसी जगह के बारे में पूछा तो उसने सहजता से जानकारी दी। अनजान शहर में लोगों का यह व्यवहार यात्रा को और आत्मीय बना रहा था। दूसरे दिन सुबह हम रवींद्रनाथ ठाकुर के पुश्तैनी घर जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी पहुंचे। आज यह घर संग्रहालय बन गया है। इसके बाद दोपहर में साइंस सिटी पहुंचे। यहां रोपवे, टाइम मशीन, डायनासोर, 3D अंतरिक्ष, मानव के उद्भव और विकास तथा ब्रह्मांड से जुड़ी प्रदर्शित सामग्री ने विज्ञान को बेहतर और मनोरंजक तरीके से समझाया।लेकिन यात्रा अभी पूरी नहीं हुई थी। अगली सुबह मंजिल थी नक्सलबाड़ी।

नक्सलबाड़ी : एक नाम, जिसने देश की राजनीति बदल दी

दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी पहुंचते ही मन में सबसे पहले वही सवाल उठा आखिर इस छोटे से इलाके के नाम ने भारतीय राजनीति में इतनी बड़ी जगह कैसे बना ली? 1967 का नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह भारतीय वामपंथी राजनीति और किसान आंदोलनों के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। भूमि संबंधों, बटाईदार किसानों और ग्रामीण शोषण के सवालों को लेकर यहां संघर्ष तेज हुआ। आंदोलन के दौरान हिंसक टकराव भी हुए और पुलिस कार्रवाई में किसानों की मौत हुई। बाद के वर्षों में इसी घटना से जुड़ा “नक्सलवादी” शब्द देश की राजनीति में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगा। हम सुबह नक्सलबाड़ी के एक छोटे से होटल में रुके। नाश्ते में पूड़ी-सब्जी और रसगुल्ला लिया। वहां बैठे लोगों से जब नक्सलबाड़ी के बेंगई जोत क्षेत्र में किसान आंदोलन की शुरुआत के बारे में पूछा तो उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुनी बातें साझा कीं। स्थानीय लोगों की स्मृतियों में वह दौर आज भी जिंदा है। उनके अनुसार किसानों ने जमीन और शोषण के सवाल पर जमींदारों के खिलाफ संघर्ष किया था। आज भी नक्सलबाड़ी के आंदोलन और उसमें मारे गए लोगों की स्मृति स्थानीय समाज में मौजूद है। हर वर्ष 25 मई को बेंगई जोत सहित आसपास के क्षेत्रों में शहीद किसानों की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

चाय बागानों की हरियाली और छत्तीसगढ़ से जुड़ी कहानी

नक्सलबाड़ी की यात्रा केवल इतिहास तक सीमित नहीं रही। नाश्ते के बाद हम चाय बागान की ओर निकल पड़े। दूर-दूर तक फैली चाय की हरी झाड़ियां, उनके बीच काम करते श्रमिक और वातावरण में घुली हरियाली मन को बेहद आकर्षित कर रही थी। बागान में कई मोर भी चहल-पहल करते दिखाई दिए। यहीं हमारी मुलाकात छत्तीसगढ़ के जशपुर से जुड़े कुछ लोगों से हुई। कोई सुपरवाइजर के रूप में काम कर रहा था, कोई ड्राइवर था तो कोई मजदूरी कर रहा था। कई लोगों ने बताया कि उनके दादा आर्थिक तंगी के कारण वर्षों पहले यहां काम करने आए थे। रोजगार की तलाश में आई वह पीढ़ी यहीं बस गई और अब उनकी अगली पीढ़ियां भी इसी इलाके से जुड़ गई हैं। चाय बागान में यह जानने का मौका मिला कि चाय की कोमल पत्तियों को किस तरह तोड़ा जाता है और आगे प्रसंस्करण के बाद उन्हें पैकेट में पहुंचाया जाता है। हरी चाय की झाड़ियों के बीच खड़े होकर यह समझना अपने आप में एक अलग अनुभव था कि जिस चाय की चुस्की हम रोज लेते हैं, उसके पीछे कितने लोगों का श्रम जुड़ा है।

नई पीढ़ी के लिए नक्सलबाड़ी की याद

बागान में कुछ युवाओं से भी बातचीत हुई। उन्होंने बताया कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के बारे में उन्होंने अपने पिता और दादा से सुना है। उनके लिए यह उनके क्षेत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक युवा ने कहा कि उनकी समझ में यह आंदोलन मजदूर और किसान के सवालों से जुड़ा था और आज भी नक्सलबाड़ी से जुड़े नेताओं के प्रति स्थानीय लोगों में सम्मान की भावना दिखाई देती है। बेंगई जोत गांव में आज भी देश-दुनिया के कम्युनिस्ट नेता कार्ल मार्क्स, एंजेल्स, लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग, लिन बियाओ, चारु मजूमदार और सरोज दत्त की मूर्तियां लगी हुई हैं।

- गणपत लाल

Thursday, 28 August 2025

क्या मिल गई आजादी?


15 अगस्त को सभी देशवासियों में देश प्रेम जाग जाएगा। साल में ऐसा दो बार होता है। बाकी समय किसी के पास सोचने का भी समय नहीं होता। और पैसे कमाने के लिए सब देश भक्ति भूल जाते हैं।

हम कौन है और हमारी अवकात क्या है?

हम भूल जाते हैं कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं, लेकिन ये जरूर जानते हैं कि पैसा हमारे जीवन में जरूरी है। इसलिए रुपए कमाना ही मुख्य उद्देश समझते हैं। लेकिन पैसे कमाने के लिए कई लोग इतने गिर जाते हैं कि लोगों को ठगना चालू कर देते हैं, लूटना, चोरी करना, घूस लेना, घोटाले करना ऐसे बहुत से अनुचित कार्य करने लग जाते हैं, जिससे समाज और देश को आर्थिक नुकसान के साथ सामाजिक समस्या का सामना करना पड़ता है।

पूंजीवाद और मनुवाद से कब मिलेगी आजादी 

हमारा देश को अंग्रेजी सरकार से आजादी तो मिल गई, लेकिन ये मनुवादी और पूंजीवादी सरकार से कब आजादी मिलेगी? हमारा भारत महान है। आई लव माई इंडिया और छत्तीसगढि़या सबले बढि़या। ऐसे कहने बस से सब ठीक-ठाक नहीं हो जाता। क्या अच्छा है ये भी देखना पड़ता है। हवाहवाई में अच्छा है कहने से सुंदर नहीं होगा। इसके लिए अच्छा होना पड़ता है। हर एक नागरिक को बढि़या बनना पड़ेगा। अब सोचिए क्या दस प्रतिशत भी अच्छा है? 

मेरी नजर में

मेरी नजर में कोई अच्छा नहीं है। अब ये मत कहना आप निराशावादी है, नहीं दोस्तों मैं निराशावादी नहीं हूं। मैं तो आशावादी और सुधारवादी हूं। हमेशा लोगों के लिए अच्छा सोचता हूं। बेहतर समाज, अच्छा देश रहे यही चाहता हूं। इसी सुधार के कारण मैं इस लेख और बहुत से लेख को लिखता हूं। मैं आशा करता हूं कि मेरे लेख से लोग कुछ समझे और अपनी जिंदगी में सुधार लाएं। 

सभी जगह निजीकरण का बोलबाला

सरकारी संस्थान धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। सभी संस्थान पूंजीपतियों के हाथों में चले गए हैं। हर जगह निजी कंपनी खुली है, जिसमें देश हित की बात तो छोड़िए, यहां देश को कैसे लूटना है। यहां की जनता का शोषण कर किस प्रकार से पैसे कमाकर कंपनी को फायदा होगा। कंपनी के फायदे के लिए कुछ भी करने को तैयार है चाहे देश की जनता मरे इससे कोई लेना-देना नहीं है। 

सरकारी संस्थानों की जर्जर स्थिति क्यों?

हमें क्या चाहिए? रोटी, कपड़ा और मकान। फ्री में कोई नहीं देगा। इसके लिए हमें क्या चाहिए। रोजगार चाहिए और रोजगार के लिए अच्छा हेल्थ और शिक्षा होना चाहिए। तभी तो हम काम कर पाएंगे। लेकिन क्या हमें अच्छा हेल्थ, अच्छी शिक्षा और रोजगार मिल पा रहे हैं? 

शिक्षा व्यवस्था बदहाल

हजारों सरकारी स्कूल को सरकार बंद कर दिए। क्या सरकारी स्कूल से हमें आजादी चाहिए थी? कुछ बचे सरकारी स्कूलों की हालत इतना खराब कर दिया है कि वहां निम्न वर्ग के बच्चे भी नहीं पढ़ना चाहते हैं। अतिनिम्न वर्ग के ही बच्चे मजबूरी में जा रहे हैं। सरकार चाहती ही है कि सरकारी स्कूल बंद हो और निजीकरण से जितना हो सके उतना कमाया जा सके। निजी स्कूल में भी अच्छा सीखने को मिलेगा ये भी आपका भ्रम मात्र है।

अस्पतालों में पंजीयन के लिए भारी जद्दोजहद

सरकारी अस्पतालों की स्थिति से तो रोना आता है। बहुत दुख होता है जब रोगी लंबी लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करता है। बिलासपुर के सिम्स हॉस्पिटल कुछ दिन पहले जाना हुआ। पर्ची के लिए लाइन लगने से पता चला ऑनलाइन आभा ऐप से पंजीयन कराना होता है। उसके बाद उस पंजीयन नंबर को लेकर लाइन में लगना होता है। ऑनलाइन पंजीयन के लिए व्यक्ति के पास स्मार्ट फोन होना चाहिए, उस फोन में डाटा रिचार्ज होना बहुत जरूरी है। इतने में भी काम नहीं बनने वाला इससे महत्त्वपूर्ण जरूरी मोबाइल में नेटवर्क होना चाहिए, जिससे नेट चल सके सभी पंजीयन होगा।

लोगों का समय हो रहा बर्बाद

ऑनलाइन पंजीयन के बाद ऑफलाइन पंजीयन के लिए लंबी लाइन में लगना होगा। पंजीयन के बाद जिस विभाग ओपीडी में जाना है, वहां भी पर्ची पर ठप्पा लगाने के लिए लंबी लाइन का सामना करना होगा। इसके बाद ओपीडी के डॉक्टर को दिखाने के लिए लाइन में लगना होगा। डॉक्टर को दिखाने के बाद मरीज को लगेगा कि अब मैं जीत हासिल कर ली। तो ये गलत है अभी तो और बचा है दोस्त। 

जनता को मिलती है ठोकर

डॉक्टर के लिखे दवाई को लेने के लिए एक टोकन लेना है महिला या पुरुष का। तब जाकर दवाई वाला काउंटर में लाइन लगाना है। (मध्यम वर्ग की समस्या यही होता है की कुछ पैसा बच जाएं, जिससे राशन-पानी की व्यवस्था हो जाए) इसी सोच को लेकर फ्री में दवाई लेने के लिए लाइन में लग जाता है। सोचता है अगर बाहर गया तो हजारों रुपए की दवाई खरीदकर खानी पड़ेगी। ये सोचते-सोचते लाइन में बारी आ जाती है। लेकिन ये क्या पर्ची पर लिखी दवाई में एक ही दवाई मिली। बाकी दवाइयां बाहर से खरीद लेने की आवाज आती है। फिर मरीज पर्ची सहेजते हुए चला जाता है।

नहीं मिल रही दवाई

वहीं उसी कैंपस में रेडक्रास मेडिकल में लंबी लाइन होती है। सोचता है यहां कुछ छूट के साथ दवाई मिल ही जाएगी, लेकिन यहां भी घाव में नमक छिड़का जाता है। लाइन में लगने के बाद भी कोई छूट नहीं मिलती है। 

रेल की स्थिति खराब

रेल लेट चल रही है। रेलवे स्टेशन में लोग रेल का इंतजार में जमीन पर लेटे पड़े हैं। कोई कुछ पूछने वाला नहीं है। रेल की जनरल डिब्बे की हालत निम्न वर्ग के लोग भली भाती जानता है।

सरकार चाहती है नीजिकरण

पोस्ट ऑफिस की लाइन इतनी लंबी रहती है कि पोस्ट ऑफिस और सड़क दोनों मिल जाते हैं। लोग कहते हैं इससे अच्छा तो कोरियर है। हां सरकार यही चाहती है। सरकारी रेल, पोस्ट, स्कूल, अस्पताल को बंद कर दे जिससे निजीकरण हो और कंपनियों को फायदा हो। क्या निजी स्कूल में अच्छी शिक्षा मिल रही? ठीक इसी प्रकार कोरियर में होगा। सरकार सरकारी संस्थानों में सुधार करने की जगह बंद कर रही है। क्या अब भी लगता है आप को पूरी आजादी मिल गई है। 

पैसे कमाने के लिए तकलीफ न दें

बेहतर समाज और देश के लिए हमें हर एक नागरिक का कर्तव्य होता है ऐसा कोई कार्य न करें जिससे समाज और देश को नुकसान हो। औरों को तकलीफ हो। पैसे कमाने के लिए किसी को तकलीफ दे बहुत ही गलत है।

टिकेश कुमार

Saturday, 24 August 2024

मृत्युभोज क्यों


मनुष्य के मरने के कुछ दिनों के बाद अलग से उनके परिवार वालों के द्वारा मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए मृत्यु भोज कराए जाते हैं। जिसमें संगासंबंधित और गांव, समाज के लोग उपस्थित होते हैं। और कर्मकांड के बाद बड़ी दुख के साथ भोजन किया जाता है। कहीं-कहीं इसे तेरहवीं भोज भी कहा जाता है।

क्या मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है?

मृत्यु भोज से या तेरहवीं से मरे हुए व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि आत्मा नाम की कोई चीज होती ही नहीं। हां जिंदा व्यक्ति का मन होता है, कई लोग इसे ही आत्मा कहते हैं, अगर इस आत्मा की बात करे तो मरने के बाद व्यक्ति के मन खत्म हो जाता है। मन में कोई बात रहती है या कोई इच्छा रहती है वे पूरी नहीं हो पाती होगी।

कोई आत्मा भटकती नहीं

अगर मृत्यु भोज नहीं कराया गया तो आत्मा भटकती है, ऐसा कहने वालों जरा सोचिए आत्मा और भूत-प्रेत नाम की कोई चीज नहीं होती। ये सब आपके मन का भ्रम मात्र है। इसके अलावा कुछ नहीं। अगर आत्मा भटकती तो कोई व्यक्ति की हत्या कर देते हैं, जिसकी पुलिस जांच पड़ताल करती है उस समय तो उस आत्मा को बता देना चाहिए कि किसने मारा है।

हां मृत्यु में व्यापार करने वालों का मन जरूरत भटकता है

कुछ लोगों को मरे हुए के लाश से भी कर्मकांड के नाम पर व्यापार दिखता है, ऐसे लोगों का मन जरूर भटकता है। ऐसे लोगों को कर्मकांड के नाम पर मृत व्यक्ति के परिवार वालों को जले में नमक-मिर्च छिड़कने में मजा आता है। ऐसा नहीं करोगे तो आत्मा को शांति नहीं मिलेगी, आत्मा भटकेगी वगैरा-वगैरा कहकर दुखी लोगों को और दुख में डाल देता है।

दुख में उत्सव कैसे

चलो मान लेते है खाना तो है किसी के पेट तो भर रहा है, लेकिन सवाल यह उठता है कि मृतक के परिवार दुख में रहता है, किसी को मेहमान नवाजी करने की सुध नहीं रहती। ऐसी स्थिति में लोगों को स्वादिष्ट भोजन खिलाना संभव नहीं है। बीमारी से मरे हुए मृतक का परिवार आर्थिक रूप से पहले से ही कमजोर हो गया होता है। बहुत से पैसे इलाज में खर्च हो गए होते हैं ऐसी परिस्थिति में पूरा मैनेजमेंट के साथ भोजन कराना संभव नहीं होता है।

मजबूरी में भी मृत्यु भोज कराया जाता है

बहुत से मृत व्यक्ति के परिवार वाले इतना दुखी रहते हैं कि बेमन मृत्यु भोज कराते हैं। वे आसपास और समाज के लोग क्या कहेंगे सोचकर मृत्यु भोज कराते हैं। ऐसा नहीं करेंगे तो लोग उसे कंजूस कहेंगे. साथ ही कहेंगे कि वह कैसा आदमी है, जो अपने पिता के मरन पर भी उसकी आत्मा की शांति के लिए कुछ किया नहीं. वह कितना पैसा बचा लेगा। ऐसे ही तरह-तरह के लोग ताना मारने लगते हैं। इसके चलते भी कई लोग मजबूरी में मृत्यु भोज कराते हैं।

जितना खिलाना है जिंदा खिलाएं, जिससे मन को शांति मिले

मृत्यु के बाद आत्म को शांति के लिए मृत्यु भोज कराना उचित नहीं है। इससे अच्छा है जिंदा में ही उससे अच्छे से व्यवहार करने के साथ अच्छा भोजन, कपड़ा जीते जी देना चाहिए। मरने के बाद सब कुछ खत्म हो जाता है। मृत्यु के बाद अगर आप रो-रोकर अच्छा भोजन, वस्त्र, आवश्यक सामग्री आत्मा के नाम से ब्राम्हण-पुरोहित को देंगे तो कोई फायदा नहीं। इसका फायदा पुरोहित को ही होगा। आत्मा के नाम से भेंट की गई सामग्री पुरोहित के परिवार वाले उपयोग कर के अच्छा जीवन जीएंगे।

दूर से आए मेहमान के लिए भोजन

शोक में शामिल होने के लिए दूर से आए मेहमान के लिए भोजन की व्यवस्था करनी एकदम जरूरी नहीं है, लेकिन स्थिति के अनुसार कर सकते हैं, क्योंकि बहुत दूर से आए मेहमान को खाली पेट भेजना ठीक नहीं है। जो कुछ रूखा-सूखा मिल गया खाने को मेहमान को खा लेना चाहिए, अलग से मृत्यु भोज या तेरहवीं करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

मृत्यु भोज के लिए कुछ लोग आर्थिक सहयोग देते हैं

बेहतर होगा जिंदा व्यक्ति जब बीमारी से गुजर रहा होता है उस समय मरीज और उसके परिवार वालों के साथ खड़े रहें। जितना हो व्यवहारिक, सामाजिक और आर्थिक सहयोग करें। क्या पता ऐसे करने से उस व्यक्ति का जीवन बच जाए। मरने के बाद कौन रो रहा है मरे हुए को क्या पता?

-मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

Wednesday, 21 August 2024

हर भाई को अपनी बहन की करनी चाहिए रक्षा


रक्षाबंधन का त्योहार सावन माह में खेती-किसानी के समय मनाया जाता है। बारिश में भीगते-भागते राखी बांधने या बंधवाने के लिए भाई-बहन एक-दूसरे के पास जाते हैं। लोग कहते हैं कि इससे भाई-बहन में प्रेम दिखता है। बहन की रक्षा भाई कर सके इसलिए राखी बांधी जाती है। चाहे बहन भाई से बड़ी क्यों न हो, बहन कुछ नहीं कर सकती सब रक्षा भाई ही करेगा। क्योंकि यहां पुरुष प्रधान समाज है। पुरुष ही सबसे शक्तिशाली है ऐसा माना जाता है। दुधमुंहा भाई भी शादीशुदा बहन की रक्षा करेगा यह कितनी शोभा देती है?

बाजारवाद को जन्म देता है यह त्योहार

ज्यादातर त्योहार खर्चीले ही होते हैं। इसी प्रकार रक्षाबंधन का त्योहार में भी पूरा बाजार राखी, कपड़े, साड़ी, मिठाई, ज्वेलर्स और हर प्रकार की गिफ्ट सामग्री से पूरा बाजार पट जाता है। इस दिन आने-जाने के समय के साथ पेट्रोल-डीजल की भी बर्बादी होती है। त्योहार के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। मिठाई में कालाबाजारी के कारण सेहत के साथ भी खिलवाड़ होता है। जगह-जगह मिष्ठान के नाम पर जहर बेचा जाता है।

शुभ मुहूर्त में बांधने के चक्कर में हो रही दुर्घटना

ब्राम्हण-पुरोहित के बताएं हुए मुहूर्त में ही राखी बांधने के लिए बहन अपने भाई के यहां जल्दबाजी में जाती है। हड़बड़ी में गाड़ी से दुर्घटना हो जाती है। उस समय न भगवान रक्षा करता है और न ही भाई रक्षा कर पाता है। इसलिए मुहूर्त के फेर में रहना बहुत बड़ा जोखिम कार्य है।

गिफ्ट नहीं मिला तो रिश्ते में दरार

रक्षा के नाम से राखी बांधने के बाद बहन को अगर गिफ्ट नहीं मिला तो उसका मुंह देखने लायक होता है। आसपास के लोगों को बताएगा कि अच्छी साड़ी नहीं मिली या इतनी कम कीमत की चीज दी है। इससे ज्यादा तो पड़ोसी ने अपनी बहन को दिया। भाई को इस बात का पता चला तो बहन और भाई में बोल-चाल बंद भी हो जाता है। एक-दूसरे के घर में आना-जाना भी बंद हो जाता है।

जब मन करे भाइयों के यहां जाना चाहिए

भाई-बहन के प्यार अटूट होता है। जब भी फुरसत मिले बहन को भाई के साथ समय बिताना चाहिए। बहन ससुरला चली गई है तो बहन को अपने भाई से मिलने आना चाहिए, क्योंकि उसका ही घर है। मां-बाप और भाई से जब भी मिलने का मन करे तो महिला अपनी मायके जा सकती है। ठीक इसी प्रकार भाई को भी बहन के यहां जाना चाहिए। इसमें त्योहार या दिखावा नहीं होना चाहिए। खुले मन से भाई-बहन को रिश्ता निभाना चाहिए।

बहन को पूरा सम्मान मिलना चाहिए

बहन रक्षाबंधन में राखी न बांधे फिर भी भाई को चाहिए कि वह बहन की रक्षा और सहयोग करें। हर सुख-दुख में भाई-बहन को एक साथ होना चाहिए। बहन को भी पिता की संपत्ति में पूरा अधिकार है और बराबर का हक मिलना भी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि स्वार्थ के कारण बहन की पूछ-परख हो, जब बहन संपत्ति को भाई के नाम कर देता है तब भाई रक्षाबंधन तो छोड़िए बहन को हमेशा के लिए ही भूल जाता है।

-टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

खेती-बाड़ी को लेकर अंधविश्वास


आधुनिक युग में भी हमारा देश अंधविश्वास के जाल से नहीं निकल पाया है। आज भी लोग चमत्कार, जादू-टोने, तंत्रमंत्र और झाड़फूंक जैसी बातों को मानते हैं। इसके कारण बहुत से घर बर्बाद हुए हैं और एक दूसरे की जान लेने को उतावले हुए हैं, बहुत सी जान गई हैं।

जमीन को भी जादू-टोना, तंत्रमंत्र से बिगाड़ा है ऐसा मानने वाला आज भी है। आज भी लोग अज्ञानतावस जमीन, खेत को झाड़ फूंक करने से पीछे नहीं हटते।

एक दिन की बात है खेती बाड़ी की बात चल रही थी। चर्चा करने वालों में पुरुष के साथ महिलाएं अधिक थीं। अंधविश्वास में पुरुष से आगे महिलाएं सबसे आगे निकल गई हैं और यहां भी ऐसा ही हुआ।

चर्चा चल ही रही थी तभी एक महिला कहती है कि मेरी बाड़ी को किसी ने कुछ (नजर) कर दिया है। मैं फिर एक बार पूछा क्या कर दिया है? वह फिर कहती है कि किसी ने टोना टोटका कर दिया है। आपको कैसे पता चला! मैंने पूछा।

महिला कहती है - बहुत दिनों से जमीन पर कुछ नहीं हो रहा है। पहले टमाटर की खेती करते थे बहुत टमाटर होते थे, लेकिन अब ठीक से नहीं होता है। इसलिए हम बोना बंद कर दिए।

मैंने पूछा- कब की बात है? पूछते हुए मैं सोचने लगा ऐसा कैसे हुआ होगा?
महिला कहती है दो साल पहले की बात है। हर साल टमाटर लगाते थे, बहुत कमाई होती थी। पहले साल तो कुछ कम हुआ, लेकिन दूसरे साल से टमाटर से खेत भरने लगा, अच्छा पैदावार हुआ, लेकिन चौथे साल से ही बहुत कम हो गया। टमाटर के पौधे में फल नहीं के बराबर लगने लगा तब से खेती करना बंद कर दिए। जब खेत ही बिगड़ गया तो खेती करने से क्या फायदा।

मैं समझ गया। सब्जी की खेती करने से पहले कुछ सावधानियां रखनी पड़ती हैं, जैसे खेत को अच्छी तरह से जोताई की जाए और कुछ समय के लिए सुखाया जाए, जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए और खरपतवार के साथ फसल को नुकसान करने वाला रोग नष्ट हो जाए। एक बात प्रमुख रूप से ध्यान देना चाहिए कि एक ही फसल को एक ही स्थान पर बार बार नहीं लगाना चाहिए। हर बार एक फसल लेने के बाद दूसरी बार अलग फसल की खेती करनी चाहिए। जैसे अभी गोभी की खेती की है तो दूसरी बार लौकी, तोरई, करेला या टमाटर। स्थान बदलकर खेती करनी चाहिए।

लगातार उसी उसी की खेती करने से पैदावार धीरे-धीरे गिरता जाता है। ठीक ऐसा ही हुआ। लगातार टमाटर की खेती करने के कारण चार साल तक पैदावार हुआ उसके बाद फल धीरे धीरे कम होता गया। इसी को जादू टोना समझ गया। सही कारण का पता नहीं होने के कारण अंधविश्वास में पड़ गया।

अंधविश्वास में पड़ने का कारण अज्ञानता भी है। यहां एक ही फसल को लगातार नहीं लेना था। महिला को इसका ज्ञान नहीं था इसलिए जादू टोना समझ लिया। अगर ज्ञान होता तो एक ही फसल को एक ही जगह पर बार बार बोवाई नहीं करती जिससे अंधविश्वास में नहीं पड़ती।

समस्या है उसका निदान भी है, लेकिन हम उसका निदान किस तरह खोज रहे हैं, आपके ऊपर निर्भर करता है। बिना जाने समझे भगवान भरोसे निदान खोजेगे तो अंधविश्वास में ही पड़ेंगे। इसलिए कारण को समझे और उसका निदान करने की कोशिश करे।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

सिक्का का दीवार पर चिपकना कोई चमत्कार नहीं


मुझे याद है जब मैं लगभग 11 साल का था। एक रिश्तेदार के साथ उनके घर गया था, उधर से ही हम लोग छत्तीसगढ़ के धमतरी के गंगरेल बांध घूमने गए। डेम से आते समय धमतरी के बिलई माता (छत्तीसगढ़ी में काली माता को बिलाई माता कहता होगा) भी चले गए। लोग यहां नवरात्रि पर्व में बड़ी श्रद्धा से दर्शन करने जाते हैं। हम भी नौरात्रि (दुर्गा पर्व) में गए थे, इसलिए वहां बहुत भीड़ थी, लोग एक-दूसरे को धक्का-मुक्की कर रहे थे।

जैसे-तैसे मंदिर में हम लोग भी प्रवेश किए। बहुत से लोग मंदिर की दीवारों पर सिक्का चिपकाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है ऐसा मानते हैं, इस मंदिर में भी ऐसी मान्यता है। इसलिए यह मंदिर मुझे आज भी याद है। अब पता नहीं कैसा होगा। मंदिर के पीछे अलग दीवार थी, दीवार पर एक चौकोन और गड्ढों पर बहुत से सिक्के चिपके हुए थे और दीवार का रंग भी हल्का काला हो गया था। कुछ लोग बड़ी श्रद्धा से अपनी जेब से सिक्का निकालकर सावधानी से दीवार पर चिपका रहे थे।

नहीं चिपकने पर लोग हो रहे थे परेशान

मेरे साथ गए लोग भी एक-एक करके सिक्का चिपकाने लगे। किसी ने एक रुपया तो किसी ने पांच रुपए का सिक्का चिपकाकर गर्व महसूस कर रहे थे। तो कोई निराश थे, क्योंकि सिक्का उसके हाथ से दीवार पर चिपका नहीं था। जिसके हाथ से सिक्का दीवार पर चिपक गया वे व्यक्ति अपने आप को शुभ, पुण्यात्मा, भाग्यशाली और मनोकामना सिद्धि व्यक्ति मान रहे थे। वहीं जिसके हाथों से सिक्का नहीं चिपका वे खुद को अशुभ, अभागे और मनखोटी समझने लगे। 

सभी सिक्के पुजारी कर लेता है अंदर

लोग कहते हैं कि अगर सिक्का दीवार पर चिपकता है या नहीं चिपकता है, दोनों स्थिति में सिक्का को उठाकर जेब में नहीं डालना है, चाहे कितने बड़े सिक्के हो। अगर बच्चे उस सिक्के को उठाता है तो उसे मना करना होता है। इसे कोई भी नहीं उठा सकता। अब आप सोच रहे होंगे कि इस प्रकार तो बहुत से सिक्के हर रोज उसी स्थान पर इक्कठे हो गए होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। उस सिक्के को कुछ समय के बाद पुजारी अंदर कर लेता है।

क्या यह सच में भाग्य मापने का यंत्र है?

मैं घर पहुंच कर बहुत दिनों से इस मंदिर के बारे में सोचता था, क्या यह सच में भाग्य मापने का यंत्र है? किसी के भाग्य सिक्का से कैसे पता चलेगा? फिर सोचता था आखिर सिक्का दीवार पर क्यों चिपका! घर की दीवारों में भी सिक्का चिपकाकर देखता था, चिपक ही नहीं रहा था। एक दिन अचानक से दरवाजे से लगी दीवार पर एक सिक्का चिपक गया। मैं बहुत खुश हुआ। मुझे लगा मैं ईश्वर को खोज लिया हूं। इस खुशी को पूरा घर में सभी को बांटा। सभी लोग आश्चर्य हो गए।

तेल की वजह से चिपकता है सिक्का

बहुत सोचने के बाद पता चला कोई ईश्वर नहीं, बल्कि तेल का कमाल है। मेरे दादाजी हर रोज सोने से पहले फल्ली तेल को अपने हाथ पैर में चिकचिक से लगाने के बाद सो जाता था और कुछ ही समय के बाद उठकर हाथ से दीवार का सहारा लेकर दरवाजे खोलता था। हाथ के तेल दीवार पर लग जाता था। बहुत दिनों से दीवार पर तेल और धूल लगने से उसमें थोड़ा चिपचिपा आ गया था। इसीलिए सिक्का दीवार पर चिपक जाता था।

मंदिर में भी तेल के कारण से चिपचिपाहट

इसी प्रकार से मंदिर की दीवार पर भी दीया जलाने का तेल समय-समय में लगाया जाता है, जिससे चिपचिपाहट बनी रहे, इसी कारण सिक्का दीवार पर चिपक जाता था। जल्दबाजी या चिपचिपाहट न होने की जगह के कारण कुछ सिक्के नहीं चिपक पाता था। और लोग इसे श्रद्धा मान लेते थे, बहुत बड़ी शक्ति मान लेते थे।

अज्ञानतावश लोग चमत्कार पर करते हैं विश्वास*

आज भी लोग अज्ञानतावश चमत्कार पर विश्वास कर लेते हैं। जब तक उद्दीपक के कारण (वस्तु कैसे कार्य करता है) समझ नहीं आएगा तब तक चमत्कार लगेगा। इसीलिए साथियों आंख बंद करके विश्वास नहीं करें और अंधविश्वास जैसी बीमारी से मुक्ति पाएं।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

हिंदुओं को 4 बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाले बताएं पालेंगे कौन?


इसी प्रदीप मिश्रा को अंधभक्त सुनने जाते हैं। कुछ भी बोल दिया और ये लोग उसे मान लिए। कभी अपने दिमाग का उपयोग कीजिए और सोचिए एक लोटा जल से कोई समस्या का हल नहीं हो सकता। ना ही कोई बच्चा बिना पढ़े बेल पत्र के भरोसे पास हो सकता है। अब प्रदीप मिश्रा ने चार बच्चे पैदा करने की बात कही है। दो बच्चे अपने लिए एक बच्चा सनातन के लिए और एक बच्चा सेना के लिए कहते हुए चार बच्चे पैदा करने की बात कही। ऐसा बयान ज्यादातर सनातन धर्म में आते रहते हैं, लेकिन इसमें कुछ होना जाना नहीं। बस कथा वाचक को क्या है, जो भी मुंह में आए बक देता है।

हमारा देश जनसंख्या के नाम पर विश्व में प्रथम स्थान पर है। जरा सोचिए जनसंख्या अगर ज्यादा है तो हमें क्या नुकसान है। आप यह मत कहना कि मुस्लिम तो दो बीवियां रखता है, बच्चे भी ज्यादा पैदा करता है। मुझे पता है बहुत लोग बिना जाने-समझे ऐसी बातें करते रहते हैं। आप को एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। आप दो भाई और एक बहन हैं, आपके पिता के पास 20 एकड़ जमीन है, जब ये जमीन पिता से आप दोनों भाई और एक बहन के पास जाएगी तो कितनी-कितनी जमीन मिलेगी। वहीं 6 एकड़ के आस-पास। फिर आप चार बच्चे पैदा करेंगे तो चारों को बांटने पर डेढ़ एकड़ ही बचेगी। इस प्रकार की जमीन कम होती जाएगी। रहने के लिए जगह नहीं रहेगी और भीषण गर्मी का सामना करते हुए खाने-पीने के सामान में भी कमी होती जाएगी। मंहगाई बढ़ेगी। इस प्रकार न जाने क्या-क्या मुसीबतों से सामना करना पड़ेगा। चार बच्चे को पैदा करने से लेकर उसे जिंदा रखने के लिए मां-बाप को कितनी कठनाइयों का सामना करना पड़ेगा। आज एक बच्चा को पालना कठिन है तो चार बच्चे को पालना बहुत मुश्किल काम है। बच्चे के खाने-पीने, कपड़े, दवाइयां, पढ़ने के लिए अच्छा स्कूल, अच्छी किताबें ये सब कौन देगा।

हां मुफ्त में कुछ नहीं मिलेगा, सब झूठा वादा है, सत्ता पाने के लिए। असल में मुफ्त तो धर्म के ठेकदारों और सत्ता सुख भोगने वालों को मिलता है। उसकी नकल आम जनता नहीं कर सकती है। महंगाई तो आम जनता को जीने नहीं दे रही। मजदूर और किसान को कड़ी धूप में मेहनत करने के बाद दो वक्त की रोटी मिल पा रही है। धर्म के ठेकेदार चार बच्चे पैदा करने को कहकर इनके मजाक बना रहे हैं। खुद तो एक-दो बच्चे या बच्चे ही पैदा नहीं करते और दूसरों को चार बच्चे पैदा करने की बात कहकर देश के मुफलिसों से मजाक कर रहे हैं। चार बच्चे पैदा करने पर इन बच्चों का पालन-पोषण कौन करेगा। हिन्दूओं में ही बहुत से लोगों का चार से आठ बच्चे हैं। कभी सनातन हिन्दू कहने वालों को उन बच्चों को देखकर इन पाखंडियों के मन में कुछ दया आया होगा। ज्यादा बच्चे रखने का दर्द क्या होता है उन माता-पिता से पूछिए जो अपने परिवार के पेट भरने के लिए दिन और रात जद्दोजहद कर रहे हैं। उनके पास न तो ठीक से तन ढ़कने के लिए कपड़े है और न हीं धूप, ठंड और बारिश से बचने के लिए छप्पर है। इनके दर्द को समझने का प्रयास कभी सनातन ने नहीं किया? 

-मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

भाग्य और भगवान भरोसे ये कैसी जिंदगी


जिंदगी में कठिनाई है, लेकिन इसे भगवान भरोसे छोड़ी नहीं जा सकती। मुसीबत क्यों आई है इसे समझना होगा, फिर संकट से निकलने के लिए हाथ-पैर मारना होगा। तब कही जाकर परेशानी दूर हो पाएगी। भगवान भरोसे चलकर कोई भी व्यक्ति मुसीबत से नहीं निकल पाए है, इसलिए कहते हैं भगवान भरोसे मतलब जिसका कोई भरोसा नहीं। इसके भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार कई लोग किस्मत और भगवान भरोसे बैठ जाते हैं। फिर क्या बाद में इन्हें पछताना पड़ता है और ऐसे लोग असफल होने के बाद भी खुद को दोषी नहीं मानते, बल्कि अपनी किस्मत को कोसते चुप बैठ जाते हैं. कामचाेर लोग कहने लगते हैं कि किस्मत में यही लिखा था और भगवान की यही मर्जी थी। ऐसा कहकर अपनी गलती और आलस्य को छुपा लेते हैं। यह कभी नहीं कहता कि मैं समय रहते उस समस्या से निकलने की कोशिश नहीं की। हाथ में हाथ धरे बैठा रहा।

आप ही बताए अगर आपको मानसिक या शारीरिक रूप से थोड़ा सा भी अच्छा न लगे तब आप क्या करेंगे? क्या आप यह सोचकर कि जो किस्मत में लिखा है वहीं होगा या भगवान की यही मर्जी है बोलकर कुछ नहीं करेंगे? या तुरंत किसी विशेषज्ञ के पास जाकर दिखाएंगे? कितना भी कट्टर धार्मिक किस्मत में विश्वास करने वाला हो मुसीबत के समय मंदिर-मस्जिद में समस्या का हल नहीं खोजेगा, न ही भगवान भरोसे घर में बैठेगा। वह दौड़कर अस्पताल ही जाएगा और कहेगा बुरे वक्त में किस्मत ने साथ दिया तब बचा हूं, भगवान ने बचा लिया, नहीं तो मैं मर ही जाता। इसी को कहते हैं दोगलेपन।

ज्ञान के लिए स्कूल जरूरी, धार्मिक स्थल नहीं

जानकर व्यक्ति अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में इसलिए पढ़ने भेजते है, क्योंकि उसके बच्चे पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक वैगेरा बने। जब उनको भगवान और भाग्य में भरोसा है तो उनको स्कूल-कॉलेज की जरूरत ही क्यों? भाग्यवादी लोग तो कहते हैं कि भगवान के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता तो ऐसे लोगों को पढ़ने लिखने का क्या काम। उन्हें सोचना चाहिए कि किस्मत या भगवान ने चाहा तो हमें खुद-ब-खुद ज्ञान आ जाएगा। जिसको जो बनना होगा किस्मत ने चाहा तो बन जाएगा। किस्मत ने चाहा तो बिना परीक्षा के पास हो जाएंगे. ऐसे सोचने वालों को तो पढ़ने और परीक्षा देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

धार्मिक माहौल विवेक को कर रहा खत्म

इस मूर्खता का प्रभाव ज्यादातर गरीब लोगों में पढ़ रहा है। गरीब व्यक्ति आज शिक्षा से कोसों दूर है, अगर सरकारी स्कूल के भरोसे शिक्षा के लिए दाखिला हो भी जाता है तो उस बच्चे को बराबर क्लास लेने वाले टीचर नहीं मिलते। ऐसे में बच्चे दाल-भात तक सीमित हो जाते हैं। बच्चा अगर घर में पढ़ना भी चाहेगा तो आस-पास के वातावरण उसे पढ़ने नहीं देगा। इस समस्या से हर गरीब के बच्चे जूझते हैं। आस-पास का वातावरण पढ़ने योग्य नहीं मिलता है। दो वक्त की रोटी से अगर फुरसत मिल जाए तो धार्मिक क्रिया-कलाप उसे पढ़ने नहीं देता। सुबह उठते ही धार्मिक गाने के साथ ठन-ठन की आवाज में घंटी बजना चालू हो जाता है तो कहीं नमाज की आवाज सुनाई देती है। गणेश पर्व में ग्यारह दिनों के लिए गणेश पंडाल, दुर्गा पर्व में नौ दिन उपवास के साथ नंगे पैर चलकर पंडाल के आस पास भटकना और कानफाड़ू डीजे के शोर में नाचने का दौर चलता रहता है। सावन आते ही कवाड़ लेकर नंगे पैर बीच सड़क पर जोर-जोर से आवाज करते चलना। गरीब के बच्चे पढ़ना छोड़ दिवाली में जुआ और पटाखे के लिए पैसे इकठ्ठा करने दूसरों के घर की सफाई के लिए चले जाते हैं, घर वालों को भी लगता है कि बच्चा दिवाली के लिए पैसे एकत्र कर रहा है, इससे घर में कुछ तो सहयोग होगा।

प्राथना से नहीं पढ़ाई से होंगे बच्चे पास

इस प्रकार होली आते-आते पढ़ने का पूरा समय निकल जाता है। परीक्षा भी खत्म होने की स्थिति में रहती है। फिर परीक्षा के समय ऐसे छात्र दोस्तों से कहता फिरता है यार मेरी तो कुछ तैयारी ही नहीं हुई, टीचर ने ठीक से क्लास नहीं ली या सेलेबस पूरा नहीं किया। समय नहीं होने के कारण पढ़ नहीं पाया। घर वालों ने बहुत काम करवाया। यहां तक खेत में काम कराने भी ले गया वगैरह-वगैरह। बहुत से बच्चे को ऐसा भी लगता है कि भगवान ने चाहा तो उसे पास करा देंगे, इसलिए भी नहीं पढ़ता। माता-पिता पूजा-पाठ करते देख बच्चे भी भगवान से प्राथना करते हैं कि हे प्रभु पास करा देना नारियल के साथ लड्डू चढ़ाऊंगा।

भगवान भरोसे छात्र हो जाते हैं फेल

जब परीक्षा का रिजल्ट आता है तब फेल होते ही छात्र कहने लगता है कि किस्मत ने साथ नहीं दिया और भगवान ने धोखा दिया। बहुत पूजा-पाठ करने के बाद भी फेल हो गया। यही प्रभु की इच्छा थी। फेल होना मेरी किस्मत में थी इसलिए फेल हो गया आदि। यह नहीं कहता कि मैं मेहनत नहीं किया। किस्मत और भगवान भरोसे बैठा था या बहुत ज्यादा काम होने के कारण पढ़ाई नहीं कर पाया। इसीलिए किस्मत या भगवान भरोसे बैठने की बजाय मेहनत और ईमान पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

-टिकेश कुमार, अध्यक्ष एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

जमीं से आसमां तक विज्ञान का दखल, फिर भी अंधविश्वास का खलल



आज विज्ञान की सहायता से जमीन के अंदर को भी देख सकते हैं। मैं उस समय अचंभित हुआ जब मेरे घर के बोरवेल में केबल और एक तार नीचे गिर जाने के कारण मोटर पंप फंस गया था। हमें लगा कि इस ग्रामीण इलाके में बोरवेल से मोटर को निकाल पाना बहुत कठिन होगा। लेकिन जब मोटर पंप निकालने वाले आए तब सबसे पहले एक छोटी सी चीज को बैग से बाहर निकाला। इसमें लाईट भी जल रही थी और सेम टू सेम टार्च ही जैसा लग रहा था। इसे केबल के साथ बोरवेल के नीचे डालते गया। जिसके हाथ में मोबाईल था वह व्यक्ति केबल पकड़े व्यक्ति से कह रहे थे धीरे-धीरे नीचे जाने दें।

यह सब देख कर मैं उनसे पूछ पड़ा- भईया यह क्या है? नीचे जो केबल के साथ डाले हैं? उसके जवाब में आया- यह कैमरा है, जो नीचे केबल कितने दूर में फंसा है वो सब दिखाएगा। जिससे हमारा काम आसान हो जाएगा और हम उसी हिसाब से टोचन डालकर उसे निकाल लेंगे। यह सब सुनकर मेरे मन को खुशी मिली और मेरे मुंह से निकल पड़ा आप लोग इतने हाइटेक है भईया। चोवा भईया ने कहा हां समय के साथ चलना पड़ता है। फिर नीचे कैमरा डालकर देखने लगा। जिस मोबाइल से कैमरा कनेक्ट था उसमें अब स्पष्ट रूप से दिख रहा था।

सुरक्षित निकला मोटर पंप

कुछ समय के बाद वायर बोरवेल के अंदर दिखने लगा (यह वीडियो अपलोड कर दिया हूं) सच में केबल और मोटर को निकालने में बहुत आसानी हुआ। आखिरकार मेहनत रंग ला ही दिया और पूरा केबल और मोटर पंप सुरक्षित रूप से बाहर निकल गया। उसी मोटर और केबल को फिर से ठीक कर सेट कर दिया गया है। अब पहले जैसा चल रहा है।

तार्किक सोच के अभाव में उपज रहा अंधविश्वास

विज्ञान ने हमें इतना सब दिया है, इसके बावजूद लोग अंधविश्वास में पड़ जाते हैं। लोग अज्ञानता की वजह से सोचते हैं कि जादू-टोने करके बोरवेल से पानी रोक देता है, बोरवेल में मोटर को चलाने नहीं देता है या नीचे गिरा देता है और पूरा जमीन सुखा पड़ जाता है। लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान ने आज प्रगति की धीरे-धीरे जादू टोना का भ्रम दूर होता जा रहा है, फिर भी अभी लोगों के बीच में अंधविश्वास कम नहीं हुआ है। आज भी तार्किक सोच के अभाव में लोग काला जादू में विश्वास कर रहे हैं।

अंधविश्वास में लोग कर रहे विश्वास

जब मैं छोटा था उस समय गांव में ज्यादातर हेंडपंप ही चलता था। गांव में सरकारी बोरवेल खोदने के बाद पानी नहीं आता था तब लोहे का ढक्कन से ढक कर रख दिया जाता था। बच्चे के पत्थर मार-मारकर खेलने से ढक्कन खुल जाता था और बच्चे को बोरवेल के अंदर पत्थर मारने में मजा आता था, क्योंकि पत्थर के नीचे जाते ही उधर से धड़ाम से आवाज आती थी और ऊपर से आवाज करने पर नीचे भी वही आवाज रिपीट होती थी, जिससे लगता था नीचे कोई व्यक्ति या भूत होगा। ये तो बच्चे की बात है। यहां तो बड़े बूढ़े भी इस अंधविश्वास में विश्वास करते थे और अभी भी बहुत से लोग कर रहे हैं। लोग यह भी कहते हैं कि काला जादू से नीचे बोरवेल में पानी नहीं आने देता, तंत्र-मंत्र, जादू टोना से तांत्रिक पानी को पूरी तरह से बांध देता है। बोर सुखा पड़ जाता है और फसल बर्बाद हो जाती है। कई जगह तो यह भी सुनने में मिलता है कि बोर में दो साल तक पानी बढ़िया दिया फिर बंद हो गया, अब पानी ही नहीं आता।

धीरे-धीरे नीचे गिरता जा रहा जलस्त्रोत

आज जगह-जगह बोरवेल होने के कारण जमीन में पानी का लेवल या स्रोत कम होता जा रहा है, इसलिए कुछ साल चलने के बाद बोर में पानी आना बंद हो जाता है, मतलब बोर में पानी के स्रोत कम हो गया है। बोर सुखा है, उसमें तंत्र-मंत्र या जादू टोना से पानी लाने की बात झूठ है। तांत्रिक नींबू को मंत्र कर के बोरवेल में डालने के बाद फुल पानी आने का दावा करके लोगों को ठगता है। तांत्रिक के नींबू को बोरवेल में डालते ही धड़म की आवाज आती है, यह आवाज बोरवेल में पानी होने के कारण आती है। इसी को प्रेत-आत्मा के बाहर निकलने की बात कह कर तांत्रिक बोरवेल मालिक को लूट कर चला जाता है।

बेहतर समाज बनाने के लिए करें प्रयास

लोगों में जागरूकता लाने और अंधविश्वास से मुक्ति के लिए हर तर्कशील व्यक्ति को आगे आने की जरूरत है। हर अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़िवाद को चुनौती देने की जरूरत है, जिससे समाज को बेहतर बनाया जा सकें।

-टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

आडंबर और अंधविश्वास के अंधेरे में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले गुरु घासीदास


'मंदिरवा म का करे ल जइबो, अपन घट के देव ल मनइबो, पथरा के देवता ह हालत हे न डोलत, अपन मन ल काबर भरमइबो' (मंदिर में क्या करने जाएंगे, अपने हृदय के अच्छे विचारों को मानेंगे, पत्थर के देवता हिलता-डुलता नहीं है, अपने मन को क्यों भ्रमित करेंगे) इस बात को घासीदास जी उस समय कहा जब वे जगन्नाथ पुरी के यात्रा में जा रहे थे। उसके बाद आधे रास्ते से सारंगगढ़, रायगढ़ से वापस हो गए। और उन्होंने कहा कि मंदिर में क्या करने जाएंगे। जो अपनी खुद की रक्षा नहीं कर सकता वह क्या मनुष्य की सुनेगा। हम लोग कितने बड़े मूर्ख हैं, पत्थर की पूजा करते हैं जो कुछ बोल नहीं सकता है, न चल सकता है, न खा सकता है, न पी सकता और न उठ-बैठ सकता है। उसके तीर्थ जाकर हमलोग अपने समय और धन को नष्ट कर रहे हैं। 

इस प्रकार के अंधविश्वास, रूढ़िवाद और परंपरावाद के खिलाफ जोरदार विरोध किए। घासीदास जी ने मूर्ति पूजा कभी नहीं करने की बात कही और लोगों को अपने मनोबल को बढ़ाने की अपील की। इसके लिए उन्होंने कहा कि अपने हृदय के अच्छे विचारों को मानेंगे, मन से बढ़कर के कुछ देवता नहीं है। हम लोग पत्थर की पूजा करते हैं। ये हमारी मानसिक बीमारी है, मन को पूजा-पाठ और पाखंड से दूर रखकर कर्म और मेहनत में विश्वास करें।

घासीदास जी समानता की बात भी कही। उसका कहना है कि मनखे-मनखे एक समान (मानव-मानव एक समान)। अरे भाई सभी मनुष्य एक बराबर है, जाति-धर्म के भेद को बनाकर क्यों लड़-मर रहे हो। गुरु घासीदास ये सब इसलिए कहा क्योंकि वे खुद इस पीड़ा को भोग चुके थे। गुरु घासीदास जी का जन्म 18 दिसंबर 1756 में छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले (वर्तमान में बलौदा बाजार-भाटापारा जिले) के गिरौदपुरी गांव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। 

उस समय में गरीब कमजोर के ऊपर बहुत शोषण और अत्याचार होते थे। अपने आप को उच्च जाति कहने वाले पाखंडी लोग कमजोर मनुष्य को शिक्षा और सार्वजनिक जगहों से दूर रखकर अपमानित करने के लिए नीच जाति कहते थे। इस पीड़ा को देखकर घासीदास जी सतनामी पंथ बनाए। दबे-कुचले मनुष्य को इकठ्ठा किए और कहा कि ये सब अपने आप को उच्च जाति समझने वालों और जाति-धर्म के नाम पर धंधा करने वालों की चाल है। जो आडंबर में फंसाकर शोषण और अत्याचार करते हैं, इसीलिए तुम लोग पोथी-पुराण और पत्थर पूजा में मत उलझो और सत्य को जानो और मानो। 

जो दिख रहा है उस पर भरोसा करो, काल्पनिक बात के खुल कर विरोध करो। जो यथार्थ को मानेंगे, वहीं सतनामी कहलाएंगे। इस प्रकार के दलित-शोषित वर्ग को इकट्ठा करके समाज में बहुत बदलाव किए, तब जाकर शोषित-पीड़ित लोगों को सम्मान मिल पाए। पिछड़ा वर्ग के मनुष्य के लिए घासीदास जी मसीहा हैं। जो वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशील विचारों को फैलाकर आडंबर के पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाए। गुरु घासीदास जी अंधविश्वास और रूढ़िवाद के घोर अंधेरे में ज्ञान का प्रकाश कर नया सबेरा लाए।

लेखक- गनपत लाल (छत्तीसगढ़ी से हिंदी अनुवाद- टिकेश कुमार)

Wednesday, 22 November 2023

क्या कोई लगातार चार महीने तक सो सकता है ?


हमारे देश में कई प्रकार की मनगढ़त और उटपुटांग कहानियां बहुत दिनों से चली आ रही हैं। एक पौराणिक कहानी में बताया गया है कि आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष के एकादशी में भगवान विष्णु और सभी देवी-देवता सो जाते हैं। इसे पुरोहित लोग देवसुतनी एकादशी कहते हैं। इसके बाद चार महीने के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष के एकादशी में विष्णु और सभी देवी-देवता भरभराकर उठ जाते हैं। इसे पूजा-पाठ के नाम पर मुफ्त खाने वाले लोग देवउठनी एकादशी कहते हैं।

वैसे तो हमारी पौराणिक कहानियों में ऐसी-ऐसी काल्पनिक बातों की भरमार है, जो असल जिंदगी में कभी नहीं हो सकता। अब आप ही बताइए कि कोई भी व्यक्ति बिना खाए-पीए लगातार चार महीने तक सो सकता है? ऐसे ही रावण के छोटे भाई कुंभकरण को लेकर कहा जाता है कि वह छह महीने तक सोता था, यह भी संभव नहीं है। अभी तक धरती में इस प्रकार का प्राणी की खोज नहीं हुई जो लगातार छह महीने तक सोए और जगने के बाद लगातार छह महीने तक खाना खाते रहे।

लोगों को काल्पनिक बातों और कहानियों में उलझाकर रखने वाले पंडा-पुरोहित बताते हैं कि देवसयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक यानी चार महीने भगवान विष्णु सयन अवस्था में होते हैं और इस समय में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। वहीं दूसरी ओर इसी चार महीने के भीतर व्रत-त्योहार, पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड की भरमार रहती है। जैसे गणेशोत्सव, नवरात्री, दशहरा, दीवाली और कई प्रकार के त्योहार होते हैं। जब देवी-देवता सोए रहते हैं, तभी लोग भारी आवाज में लाउड स्पीकर बजाकर और पटाखे के धमाके के साथ पूजा-पाठ कर क्यों डिस्टर्ड करते हैं? 

सोए हुए देवी-देवता को परेशानी हो या न हो, लेकिन लाउड स्पीकर और पटाखे से स्कूल-कालेज में पढ़ने वाले बच्चे जरूर परेशान होते हैं। तेज आवाज की वजह से अस्पताल में भर्ती मरीज को तकलीफ होती है और कई दम भी तोड़ देते हैं। इसी चार महीने के भीतर नदी और तालाब में देवी-देवताओं की मुर्तियों को लोग डूबो देते हैं। क्या पानी में डूबोने से देवी-देवता की नींद नहीं खुलती हाेगी? काल्पनिक भगवान की नींद उड़े या न उड़े, लेकिन जल स्त्रोत पूरी तरह से प्रदूषित हो रहा है। लोगों के लिए पीने और उपयोग करने के लिए पानी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। वहीं जलीय जीव-जंतु धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं।

- गनपत लाल

Saturday, 23 September 2023

मेहनत करे कोई, जेब भरे कोई


खेत में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी किसान के हाथ में कुछ पैसे नहीं बचता, सब बराबर हो जाता है। कई बार खराब मौसम के कारण फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे किसान के पास खाने के लिए भी नहीं रहता और अलग से कर्ज में डूब जाते हैं।

मौसम सही-सही रहा तो फसल बढ़िया पैदा हो जाती है, लेकिन फिर संकट आ खड़ा होता है। फसल का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता। जिससे फसल को पानी से भी कम मूल्य में बेमन बेचना पड़ता है। फिर वही फसल पूंजीपति स्टोर कर के रख लेता है, जब किसान के पास वह फसल नहीं होता। किसान पूरी फसल को बेच चुके होते हैं तब उस फसल का बाजार में अधिक मूल्य हो जाता है, इससे आम जनता को मंहगाई का सामना करना पड़ता है। शहरी लोगों को लगता है दाल-चावल, गेंहू, सब्जी जो किसान उतपन्न करते हैं उसका मूल्य बढ़ा है तो किसान को फायदा हो रहा है। कुछ लोगों को ऐसा भी लगता है किसान ही ये सब का दाम बढ़ा दिया है, जिससे महंगाई बढ़ गई है। और सब्जी बेचने वालों से मोलभाव करने लगते हैं।

जिसने कभी मेहनत नहीं की और खेती नहीं की उन सभी लोग आज देश में ऐशोआराम कर रहे हैं, मुफ्त में खा रहे हैं। मेहनत करने वालों के खून-पसीने की कमाई खा रहे हैं। जिसमें हमारे राजनेता पहला स्थान पर है। एक विधायक की सैलरी और पेंशन पूरा देश कंगाल हो गया है। मेहनत करने वालों से कहता है कि गरीब जनता को मुक्त में चावल दे रहे हैं। उस नेताओं से पूछना चाहिए कि कौन से खेत में फसल लगाया था? कहां मेहनत किया था या कौन से अपने बाप- दादाओं के घर से लाए। नेताओं के चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों के बाद इतने पैसे आ जाते हैं जिससे उसके कई पीढ़ी बैठकर खा सकती है। इतने पैसे कौन सी मिट्टी में पैदा किया उसका जवाब जनता को मांगना चाहिए। सब सुविधा नेताओं और अधिकारियों के पास है।

मेहनत करने वाली जनता से मूलभूत आवश्यकताओं को भी छीन लिया है। और जनता आज अंधविश्वास की अफीम के नशे में चुर होकर जी रही है। जिस देश और समाज में अंधविश्वास और नशे की तल हो वहां के लोगों को सही गलत कुछ नहीं दिखता और मूर्ख को भी सत्ता का ताज पहना देता है। इसलिए सरकार कभी नहीं चाहती कि जनता होशियार बने और अंधविश्वास व नशे से दूर रहे। सरकार लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं चाहती।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

Thursday, 21 September 2023

गणेशोत्सव का इतिहास और हमारा समाज


देशभर में गणेशोत्सव की धूम है, लेकिन आप अपने विवेक के साथ सोचिए क्या गणेश की कहानी सत्य हो सकती है। मुझे तो यह पूरी तरह काल्पनिक लगती है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मैल से कैसे पैदा हो सकता है। इस कहानी में एक महिला (पार्वती) अपने शरीर की गंदगी से बच्चा बना देता है और वह कुछ समय में इतना बड़ा हाे जाता है कि महिला के पति (शंकर) भी नहीं पहचान पाता है। जब वह बच्चा (गणेश) शंकर को घर के अंदर प्रवेश करने पर रोकता है तो शिव शंकर गुस्से से गणेश का सिर काट कर धड़ से अलग कर देता है। जब गणेश की मां पार्वती देखती है तब शंकर पर क्राधित होकर कहती है- ये क्या अनर्थ किया तुमने अपना ही पुत्र को मार दिया। इसे जिन्दा करना होगा, नहीं तो हम सभी देवी मिलकर पूरी सृष्टि को नष्ट कर देंगे।

तब सभी देवता चिंतित होकर शिव से इस समस्या का समाधान करने को कहते हैं। फिर शंकर देवों को आज्ञा देता है कि दूसरे नवजात शिशु का सिर काट कर लाए। कोई नवजात शिशु नहीं मिलता तो हाथी का बच्चा का सिर काटकर ले आते हैं और उसे गणेश के मृत शरीर में जोड़ देता है और गणेश पुनः जीवित हो जाता है। इस प्रकार की काल्पनिक कहानी पाखंडी लोग गढ़ दी है और भोली-भाली जनता इस कहानी को सत्य मानकर नकली भगवान की पूजा कर रहे हैं।

पूरी तरह से अवैज्ञानिक और काल्पनिक

वैज्ञानिक दृष्टि से देखे तो कोई भी व्यक्ति के शरीर पर किसी भी जानवर का सिर नहीं जोड़ा जा सकता है। यहां तक जानवर के खून को मनुष्य के शरीर में नहीं डाला जा सकता है। मनुष्य के खून को दूसरे व्यक्ति के शरीर में डालने से पहले कौन सा ब्लड ग्रुप है उसकी सावधानी से जांच की जाती है, जब संभव हो तब खून को निकालकर बीमार व्यक्ति के शरीर में डाला जाता है।

हाथी का सिर और मनुष्य का धड़ को जोड़ना असंभव

चलो मान लेते हैं उस समय अज्ञानता के कारण बिना सोचे समझे हाथी का सिर गणेश के शरीर में जोड़ने का प्रयास किया होगा। लेकिन हाथी का सिर मनुष्य का सिर से बहुत बड़ा होता है, अगर तुरंत जन्म लिया हुआ हाथी का सिर भी एक मनुष्य का बच्चा में फिट किया जाए तो आकार में हाथी का सिर बड़ा होने के कारण सर्जरी करना असंभव है।

सभी देवी-देवता मनगढ़त कहानी

इसके अलावा और भी कई सवाल है। जैसे कोई भी व्यक्ति के चार हाथ कैसे हो सकते हैं? बहुत से देवी-देवताओं की तस्वीरों और मूर्तियों में आपने देखा होगा चार हाथ वाला दिख ही जाएगा। जिसमें एक गणेश की मूर्ति भी शामिल है। दुनिया में आज तक किसी मनुष्य को चार हाथ के नहीं देखा या पाया गया। सभी मनुष्य दो हाथ के ही है। इस प्रकार के चार हाथ और चार मुंह के भगवान काल्पनिक नहीं तो और क्या?

अब ये मत कहना कि भगवान के लिए कोई असंभव नहीं। भगवान पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए। ठीक है, मान लेते हैं भगवान बहुत शक्तिशाली है उसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं है, तो आप बताएंगे कि शक्तिशाली, सर्वज्ञानी ईश्वर अपने ही पुत्र को क्यों नहीं नहीं पहचान सके। एक बच्चा गणेश जब शंकर को रोकता है, जिससे शिव क्रोध में आकर बच्चा को मार देता है, इतना क्रोधी है भगवान। उस समय उसकी बुद्धि कहां चली गई थी।

क्रोधित व्यक्ति को कैसे कह सकते हैं भगवान

इतना क्रोधित थे शिव कि गणेश को इतना बेरहमी से मारा जिससे उसका सिर पूरा नष्ट हो गया। जब भगवान है तो गणेश का नष्ट सिर को वापस भी ला सकता था, उसके लिए नामुमकिन नहीं होना चाहिए था। क्या जरूरत थी बेजुबान हाथी का बच्चा का सिर काटकर हत्या करने की? और वह भी तो किसी का बच्चा है। अपना स्वार्थ के लिए दूसरे का बच्चा (चाहे कोई जानवर ही क्यों न हो) उसकी बलि देना गलत है। इसे कैसे भगवान कह सकते हैं?

गणेशोत्सव की शुरूआत कैसे हुई

गणेशोत्सव या गणेश पूजा की शुरूआत महाराष्‍ट्र से हुई है। कहा जाता है कि गणेशोत्‍सव की नींव आजादी की लड़ाई के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने रखी थी। 1894 में स्‍वतंत्रता संग्राम के दौरान तिलक पुणे में गणेश की मूर्ति स्थापित की। 10 दिन तक खूब पूजा-पाठ हुआ। बताया जाता है कि 11वें दिन जब गणेश की मूर्ति की यात्रा निकाली गई तो एक दलित व्यक्ति ने उसे प्रणाम करने के लिए छू दिया। इतने में ब्राम्हणों ने कहा कि गणपति अपवित्र हो गया। सभी पुजारियों ने गंगाधर तिलक को गरियाते हुए कहने लगे कि देखा, गणपति को सार्वजनिक किया, तो धर्म डूब गया। अब कौन ब्राह्मण इस मूर्ति को अपने घर में रखेगा ? तभी तिलक ने कहा, अरे चिल्लाते क्यों हो ? शांत रहो मैं धर्म को डूबने कैसे दूंगा ? धर्म को डुबोने की अपेक्षा हम इस अपवित्र मूर्ति को ही डुबो देते हैं और इस प्रकार गणपति की मूर्ति को डुबो दिया गया। इसी दिन से यह गणेश विसर्जन का रिवाज चल पड़ा। यह पूरी तरह से शूद्रों का अपमान है, लेकिन यहीं शूद्र (SC, ST, OBC) बड़े हर्षोउल्लास के साथ अपना अपमान का त्योहार मनाते हैं।

मेहनत, समय, धन और प्रकृति की बर्बादी

गणेश की मूर्तियों को बनाने में बहुत ही ज्यादा समय, धन और मेहनत लगते हैं। बड़ी-बड़ी मूर्तियों को खरीदकर नदी में बहाने से समाज का कोई कल्यान नहीं होता, बल्की देश और लोगों की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाती है। अगर इसी पैसों से लोग अपने घर और समाज के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत चीजों पर खर्च करते तो उनका बेहतर विकास होता। बड़ी-बड़ी मर्तियों से तालाब, नहर, नदियां और अन्य जल स्त्रोत पूरी तरह से बर्बाद होते जा रहे है। भगवान और धर्म की आड़ पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। गणेशोत्सव के दौरान पूरे 11 से 15 दिनों तक सड़कों पर धर्म की आड़ पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया जाता है। 

जागरूक लोगों को लेनी होगी जिम्मेदारी

भगवान के नाम पर जोर-जोर से कानफोड़ू डीजे बजाया जाता है। यह आवाज सुनकर अगर भगवान होता तो आत्महत्या कर लेता। डीजे पर अश्लील गाने बजाते हुए भक्त गांजा, भांग और शराब के नशे में झूमते नजर आते है। सड़क पर कोई लड़की मिल जाए तो ये छेड़छाड़ करने में उतारू हो जाते हैं। इस प्रकार धर्म के नाम पर सड़क पर नगा नाच जारी है। शासन-प्रशासन पूरी तरह से आंख और कान बंदकर अपाहिज की तरह मौन है। सरकार को वोट बैंक की चिंता है, इसलिए जनता को धर्म की अफीम देकर मस्त है। सभी नेता भोली-भाली जनता को धर्म और भगवान जैसी काल्पनिक बातों पर उलझाकर सत्ता की मलाई खा रहे हैं। अब जागरूक लोगों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी और अपने समाज को विवेकवान बनाना होगा, तभी यह भेड़िया धसान खत्म होगी और हमारी पीढ़ी बेहरत होगी।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (ASO)

Thursday, 14 September 2023

भीड़ के पीछे भेड़िया धसान चल रहे लोग


आज भीड़ का दौर चल रहा है। जिधर भीड़ जा रही है, उधर लोग भाग रहे हैं। लोग समझते हैं कि बहुत लोग (भीड़) उस दिशा में जा रहे हैं तो यही रास्ता सही है या बहुत से लोग मान रहे हैं तो यही सही है। इस प्रकार लोग भीड़ के साथ चलने लगता है। कभी यह नहीं सोचता कि जिस भीड़ के साथ चल रहा हूं क्या वह सच में सही है? आगे खाई में तो डूबा तो नहीं देगा? ऐसा सवाल कभी नहीं आता बस भीड़ चल रही है तो हम भी चले, बहुत से लोग गलत नहीं हो सकता। ऐसा सोचकर भीड़ के साथ चलने लगता है। संत कबीर ने सही कहा है "कैसी गति संसार की ज्यों गाडर की ठाट, एक परा जो गड्‌ढे में, सबै गड्‌ढे में जात।"

व्यक्ति पर भीड़ डातली है दबाव

ऐसा कदापि नहीं है कि भीड़ गलत नहीं हो सकती। भीड़ गलत हो सकती है। इसका प्रमुख कारण सत्ताधारी शोषकों का डर है। क्या पता सही को सही कहे और आपको सत्ता में बैठे लोग दंडित कर दे। इसलिए हर व्यक्ति अपना बचाव चाहता है। मुंह बंद करके भीड़ के साथ ही चला जाता है। इस भीड़ से एक दो व्यक्ति अगर निकलकर सत्य को उजागार करना चाहे तो उसकी मुंह बंदकर दी जाती है, उस व्यक्ति पर भीड़ अपने साथ चलने के लिए दबाव डालती है।

एक उदाहारण

स्कूल की क्लास में बहुत से बच्चे उपस्थित थे। हर गुरुवार की तरह आज भी सरस्वती की पूजा करने के लिए तैयारियां चल रही थी। इसमें एक बच्चा शांतिपूर्ण पढ़ाई कर रहा था। कुछ समय के बाद जब पूजा की सभी तैयारी हो गई तो सभी बच्चे टेबल से उठकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए। लेकिन एक छात्र जो शान्तिपूर्ण पढ़ाई कर रहा था वह पढ़ ही रहा था, टेबल से उठने का नाम नहीं लिया। तब सभी बच्चे उस बच्चे को ऐसा देखते रहे जैसे कोई अपराधी क्लास में आ बैठा हो। सभी को देखकर वह छात्र भी टेबल से उठकर खड़ा हो गया। तब जाकर जोर-शोर से पूजा चालू हुई। ऐसे बहुत से उदाहारण हमारे दिनचर्या में रोज घटित होते हैं, जहां भीड़ व्यक्ति को दबा देती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के नाते भीड़ में दबकर रह जाता है, वहां से निकल नहीं पाता।

भीड़ के पीछे न चले

अपना रास्ता खुद ढूंढें, सत्य क्या है? इसे जानने की कोशिश करें। लोग जा रहे हैं तो क्यों जा रहे हैं, आगे कहां तक जाएगा। उसके साथ हम क्यों चले? अपना विवेक से सोचें। तभी देश और समाज का भला हो सकता है, नहीं तो अंधविश्वास के अंधेरे में डुबकी लगाते रह जाओगे।

- टिकेश कुमार

क्या विज्ञान की तरक्की से अंधविश्वास खत्म हो रहा है?


आज विज्ञान का प्रकाश सभी तरफ तेजी से फैल रहा है, लेकिन क्या इस आधुनिक कहे जाने वाले समाज से अंधविश्वास का अंधेरा खत्म हो रहा है? यह सवाल अंधविश्वास से छुटकारा पाने वाले हर एक व्यक्ति के मन में उठ रहा होगा। मैं बताना चाहूंगा कि अंधविश्वास बहुत ही खतरनाक जानलेवा है, जिसमें हर धार्मिक परिवार किसी न किसी पाखंड, अंधविश्वास में फंसा हुआ है। इस अंधविश्वास की समस्या से समाज हजारों साल से तड़प रहा है। आये दिन अंधविश्वास से लोगों की मौत हो रही है।

घटना का कारण पता नहीं होता तब तक चमत्कार

मनुष्य में किसी घटना को लेकर ज्ञान नहीं रहता तब तक उस घटना में चमत्कार लगता है। जब उस घटना के कारण को समझने लगते हैं तब धीरे-धीरे चमत्कार खत्म हो जाता है। उस चमत्कार से होने वाला अंधविश्वास भी नष्ट हो जाता है। इसलिए हर घटना के कारण को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करना चाहिए। जिससे हम और हमारा समाज चमत्कार को नमस्कार न करें और अंधविश्वास से मुक्त रहें।

विज्ञान और अंधविश्वास की लड़ाई

विज्ञान के आने से अंधविश्वास बहुत कमजोर पड़ जाता है। कुछ ऐसा अंधविश्वास जो धर्म से अछूते है खत्म हो जाता है, लेकिन जहां धार्मिक अंधविश्वास की बात आती है वहां अंधविश्वास को खत्म करना अंधों को आईना दिखाने जैसा है। इतिहास गवाह है- धर्मग्रंथों के हिसाब से पूरी दुनिया में ये अवधारणा प्रचलित थी कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है। निकोलस कोपलनिक्स ने धार्मिक अवधारणा के उलट कहा कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, तब उनका बहुत विरोध हुआ। कोपलनिक्स के निधन के बाद जब गैलीलियो ने उस थ्योरी को सार्वजनिक करते हुए बताया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है तब गैलेलियो को पूरी जिंदगी नजरबंद रखा गया।

विज्ञान को विरोध का सामना

विज्ञान को धार्मिक विरोध का सामना करना पड़ता है, चाहे कितना भी वैज्ञानिक मत रख ले, फिर धीरे-धीरे वही धर्म को मनना पड़ा कि वैज्ञानिक खोज ही सत्य है। ऐसा गैलीलियो के साथ भी हुआ पहले विरोध हुआ फिर तीन सौ सालों बाद धार्मिक चर्च को माफी मांगते हुए गैलीलियो की थ्योरी को सत्य मनाना पड़ा और आज हम सब पढ़ते है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।

लोगों को वैज्ञानिक चेतना की जरूरत

आज वैज्ञानिक चांद पर जा चुके हैं और सूर्य के लिए भी यान भेज चुके हैं, लेकिन अंधविश्वास से समाज नहीं निकल पा रहा है। विज्ञान जितना तरक्की करें, लेकिन अंधविश्वास को खत्म करने के लिए लोगों को वैज्ञानिक चेतना की जरूरत है, तभी देश और समाज अंधविश्वास से निकल सकते हैं। एक अंधविश्वास खत्म होता है तो दूसरा अंधविश्वास का जन्म होता है, ऐसा ही चलता रहता है। कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ के लिए अंधविश्वास को फैलाते हैं, जिससे उसका घर-परिवार चल सकें। इसके लिए हर एक तर्कशील व्यक्ति को पाखंडी तांत्रिक के कथित चमत्कारों को वैज्ञानिक जांच पड़ताल कर के खंडन करने की जरूरत है।

- टिकेश कुमार

Wednesday, 23 August 2023

वैज्ञानिक चांद पर


वैज्ञानिक चांद पर पहुंचे
चाहे पहुंचे मंगल पर
राहु-केतु और शनि का डर
लोगों को नहीं छोड़ेगा
शुभ-अशुभ का भय नहीं छोड़ेगा
अंधविश्वास लोगों को नहीं छोड़ेगा
पाखंड करना लोग नहीं छोड़ेंगे

जाति का भेदभाव नहीं छूटेगा
धर्म के नाम पर लड़ना नहीं छोड़ेंगे
अज्ञानी लोग यही कहेंगे
सूर्य को हनुमान ने निगल लिया था
तो चंद्र में पहुंचना कौन सी बड़ी बात है
धर्म ने पहले से ही खोज कर ली थी

जब धर्म ने सब कुछ खोज ली
तो इतनी खर्च करके
चांद में जाने की क्या जरूरत
एक मंत्र मारो और चांद पर जाओ

विज्ञान कितना भी तरक्की करे
जब तक अंधविश्वास है
आम जनता की तरक्की नहीं होगी
खोजते रह जाएंगे पाखंड में ज्ञान
और पाखंड करते-करते
पृथ्वी भी खत्म न हो जाए
फिर कहां का चांद
और कहां की धरती
सब खत्म हो जाएंगे एक साथ

इसलिए महामानव बुद्ध कह गए
पाखंड छोड़ो, अंधविश्वास मिटाओ
धरती को एक नई दुनिया बनाओ
इंसान-इंसान की खून से न खेले
ऐसा एक संसार बनाओ

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार
अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेशन (एएसओ)

Monday, 21 August 2023

सांप कभी दूध नहीं पीता और न ही कोई नागमणि होती है


आज समाज में सांप के दूध पीने की बात होती है और लोग अफवाह के चलते सांप को दूध पिलाने के लिए शिवलिंग और नागराज सांप की मूर्ति में दूध को चढ़ाने के लिए लंबी लाइन लगाकर एक-एक करके सभी कटोरी-गिलास, लोटे भर दूध को उलचकर आ जाते हैं।

नागराज (King Cobra) जिसे लोग नागदेव या शेषनाग भी कहते हैं

नागराज को लोग देव के रूप में पूजते हैं। नागराज को पूजने के लिए हर साल नांगपंचमी के रूप मनाया जाता है। विशेषज्ञ की माने तो नागराज दुनिया में सबसे लंबा और जहरीला सांप है। यह 18 फिट तक बढ़ता है। भारत में यह सांप दक्षिण राज्यों तथा आसम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा में मिलता है। काले, हरे और भूरे रंग में आता है। इस सांप के शरीर पर उलटे(V) के लकीरों के सफेद पीले रंग के चौड़े पट्टे होते हैं। बढ़ती उम्र के हिसाब से पट्टे धुंधले हो जाते हैं। इसका फन शरीर के अनुपात से बहुत छोटा होता है। यह अपना शरीर जमीन से 3 फीट तक ऊपर उठाता है। 

सांप कभी दूध नहीं पीता है

सांप के दूध पीने की बात सरासर गलत है, क्योंकि सांप जब पृथ्वी पर था तो उस वक्त कोई स्तनधारी प्राणी जो दूध देता हो, नहीं था। इसीलिए उसका मुख्य खाद्य अनेक प्रकार के कीड़े, चूहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से सांप के होंठ नहीं होती और न ही उसकी शरीर की बनावट दूध हजम करने लायक बनी है। वह पूरी तरह से मांसाहारी है, अगर दूध पिला दिया जाए तो सांप मर जाता है।

हजारों लीटर दूध बर्बाद होता है

नांगपंचमी में नागसांप को दूध पिलाने के नाम पर हजारों लीटर दूध नाली में बह जाता है। लोग सुबह से शिवलिंग और नागदेव पर इतना दूध उधेड़ता है, जैसे वह दूध नहीं पानी हो। एक तरफ लोगों के पीनी के लिए दूध नहीं है तो दूसरी तरफ अंधविश्वास के चलते दूध को मंदिर की मूर्तियों में डालकर पूरा दूध गन्दी नाली में बह जाता है। किसी को कुछ नहीं मिलता। क्या इसीलिए गाय दूध दी थी? कि नाली में बहाकर वेस्ट कर दे।

नाग के पास कोई नागमणि नहीं होती है

सांप के पास किसी भी प्रकार की मणि नहीं होती यह सब फिल्म, कहानियां, टीवी चैनल और बड़े बुजुर्गों से सुनी कथाओं से उपजी हैं। कोई भी व्यक्ति आज तक नागमणि नहीं देखा है, सब कही-सुनी बातों पर विश्वास कर लेता है। और उसी अफवाह को समाज में लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिलाते रहता है।

इच्छाधारी नाग नहीं होता है

इच्छाधारी नाग-नागिन अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर लेता है, ऐसा फिल्मों में दिखाया जाता है, वह सब एक मनगढ़ंत कहानी है। कोई इच्छाधारी नाग-नागिन नहीं होता है। यह भी कहा जाता है कि इच्छाधारी नाग या नागिन को मार दिया जाता है तो दूसरा इच्छाधारी नाग सांप को मरे हुए नाग की आंखों में मारे हुए व्यक्ति दिखाई देता है और बदला लेता है। यह भी सरासर अंधविश्वास है। आज तक कोई इच्छाधारी नाग-नागिन  नहीं देखे है, सब अफवाहों और टीवी के काल्पनिक धारावाहिक के कारण लोग उसे सही मानने लगते हैं।

लेखक - मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाइजेश (एएसओ)
संदर्भ - 'सर्पविज्ञान' किताब - गजेन्द्र सुरकार

Thursday, 10 August 2023

वास्तु शास्त्र सबसे बड़ा अंधविश्वास


वास्तु शास्त्र एक अंधविश्वास फैलाने वाले शास्त्र के अलावा कुछ भी नहीं है। अभी अधिकतर वेब खबरों और टेलीविजन में सुबह से शाम तक लगभग तीन से चार ऐसी खबरें रहती हैं जिसमें वास्तु शास्त्र के होते हैं, उसमें वास्तु नियम के बारे में बताया रहता है। किस दिशा में बेडरूम हो, कौन सा दिन शुभ होता है, घड़ी किस दिशा में लगाए और कौन सी घड़ी लगाए, रंग क्या होगा। कौन सा पौधा घर और अपने आस-पास नहीं लगाना चाहिए। घर की द्वार किस दिशा में रहना चाहिए? सीढ़ी किस दिशा में बनानी चाहिए, किचन की दिशा, खिड़की की दिशा, सोने की दिशा कैसी होनी चाहिए। ऐसी बहुत से वास्तु नियम दिए रहते हैं एक नियम पर एक खबर रोज देखने को मिलती है।

वास्तु शास्त्र क्या है?

वास्तु शास्त्र हमेशा विवादों में रहा है। वास्तु शास्त्र बिना सिर पैर के एक अवैज्ञानिक शास्त्र है। लेकिन कुछ स्वार्थी लोग इसे शास्त्र कहकर लोगों को डराने का काम करते हैं। उनका मानना है कि वास्तु शास्त्र घर में रहने वालों के स्वास्थ्य और खुशी को बनाए रखने का शास्त्र है। इसमें भी वास्तुशास्त्री का एक मत नहीं है, अलग-अलग वास्तु शास्त्र की किताब में अलग-अलग बातें लिखी है, इससे यह सिद्ध होता है कि वास्तु शास्त्र पूरी तरह से अवैज्ञानिक है।

हर वास्तु नियम अंधविश्वास से परिपूर्ण

जैसे घर में टूटी हुई घड़ी नहीं रखना चाहिए, टूटा व क्रैक आईना घर में नहीं रखना। मेरे घर में एक बड़ा सा आईना है, जिसमें क्रैक है, उसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं, उसी से अपनी शक्ल हमेशा देखता आ रहा हूं और मेरे घर के सभी लोग उसी आईने से बाल बनाते हैं। आज तक कुछ नहीं हुआ। हां बाकी फ्रेश आईने की तलना में इस पर कुछ धुंधला दिखता है, इसका कारण आईने का पुराना होना और फटे हुए क्रैक पर फॅवीकोल लगा है, इसलिए एकदम चमक नहीं दिखता। पुरानी घड़ी भी घर में सालों से लगा है, उसका भी आईने जैसा हाल है, उसका भी शीशा टूटा हुआ है। शीशा टूटे होने के बाद भी बहुत दिनों तक घड़ी चलती रही.. एक दिन बंद हो गया और उसमें मेरी छोटी सी तस्वीर लगी है, इसलिए मैं उसे वही पर रखना उचित समझा। और एक नई घड़ी लेकर दूसरी दीवार पर लगा दी।

वास्तु में दिनों के लेकर शुभ-अशुभ

वास्तु में दिनों को लेकर बहुत शुभ-अशुभ का खेल खेला जाता है। गुरुवार के दिन पोछा नहीं लगाना चाहिए। अगर ऐसा कोई करता है तो बृहस्पति ग्रह का प्रभाव पड़ता है और मनुष्य में नकारात्मक ऊर्जा उतपन्न होता है। गुरुवार के किसी को पैसा नहीं देना चाहिए, मंगलवार को बाल नहीं कटाना चाहिए। गुरुवार और मंगलवार को वास्तु में शुभ दिन माना जाता है। बहुत से घर और कार्यालय जो बहुत तरक्की कर रहे हैं गुरुवार की सुबह से ही सफाई, पोछा कर अपने कार्य में लग जाते हैं। गुरुवार के बहुत से पैसों के लेनदेन होते हैं, बड़ा-बड़ा व्यापार चलता है। मंगलवार के शुभ होता तो हर परीक्षा मंगलवार को होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता है। शनिवार है सोचकर परीक्षार्थी परीक्षा नहीं देगा तो कैसे पास होगा? कभी ऐसा सुना है मंगलवार को परीक्षा हुई थी, इसलिए अच्छे अंक मिला या बिना पढ़े पास हो गया।

वास्तुशास्त्र में न पड़े

व्यक्ति को अपनी सहूलियत के अनुसार कार्य करना चाहिए, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि खुद और आस-पास के लोगों को दिक्कत न हो। घर बनाते समय बहुत से लोग वास्तु के अनुसार दिशा देखकर बनाते हैं, जिससे बहुत से असुविधा का सामना करना पड़ता है। इसीलिए अपने सुविधा के अनुसार घर, सीढ़ी, बेडरुम, किचन, दरवाजा और अपनी जरूरत की सामग्री को बजट और सुविधा के अनुसार लगाएं। अगर वास्तु दिशा के अनुसार घर बना लिए और उस घर में पर्याप्त मात्रा में हवा-धूप नहीं मिल रही और नाली का पानी निकल नहीं पा रहा तो उस घर में व्यक्ति बीमार पड़ेगा ही। इसी कारण अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए घर, भवन, दुकान का निमार्ण करें। वास्तु शास्त्र में न पड़े।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाजेशन (एएसओ)

Saturday, 5 August 2023

चमत्कार के फेर में लुटा रहे लोग


भारतीय समाज झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और जादू-टोने के जाल में पूरी तरह से फंसा हुआ है। लोग तांत्रिक के जाल में आसानी से फंसकर अपनी मेहनत से कमाए हुए धन को तांत्रिक (बैगा) और धार्मिक लुटेरे को आसानी से लुटा देते हैं। हर व्यक्ति को चमत्कार चाहिए। जिसका फायदा ओझा-तांत्रिक को मिलता है इसीलिए तांत्रिक चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगता है। उस चमत्कार में लोगों को अद्भुत दैवीय शक्ति दिखती है, कुछ लोग तो पाखंडी तांत्रिक को ही भगवान मानने लगते हैं और उसकी जय-जयकार करने लगते हैं। अंधविश्वासी लोग अपने पाखंडी गुरु के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते। चाहे वह बात कितनी भी सत्य की कसौटी पर खरी उतरे, उस बात को आसानी से टाल देता है और उल्टा कहेंगे कि हमारे धर्म के बारे में कुछ न कहिए।

धर्म के नाम पर लूटना आसान

आज धर्म के नाम पर लूटना इतना सरल है जितना कागज को जलाना। जितने भी तांत्रिक है अपने आप को अल्लाह, भगवान और गॉड के दूत या खुद को भगवान समझता है, इसेके नाम से चमत्कार करता है और आम लोगों को लूटता है। लूट रहा है ये बात जानते हुए भी लोग उसका खुलकर विरोध नहीं कर सकते, क्योंकि धर्म का मामला है, आस्था और श्रद्धा को ठेस नहीं पहुंचना चाहिए सोचकर मुहं बंद कर लेते हैं और धार्मिक अंधविश्वास तेजी से आगे बढ़ता है।

जितने भी धर्म के लोग आज दिख रहे हैं सब इंसानियत के खून करने से नहीं हिचकिचाते हैं, जब भी जरूरत पड़े धर्म की रक्षा के लिए मनुष्य का कत्ल करते आ रहे हैं। यहां पर मुझे महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन के कहे शब्द याद आते हैं- "मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को सिखाता भाई का खून पीना।" हिंदुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़कर इलाज नहीं।

क्या मनुष्य से बड़ा धर्म है? धर्म को मनुष्य ने बनाया है या मनुष्य को धर्म ने बनाया? सोचने वाली बात तब होती है जब कट्टरपंथी धर्म रक्षा के नाम पर मनुष्य के कत्ल कर अपने आप को धर्म रक्षक समझता है। धर्म रक्षक नहीं भक्षक है।

चमत्कार में न पड़े

कोई दैवीय शक्ति से चमत्कार नहीं होता है इसके पीछे वैज्ञानिक विधि रहता है या हाथ की सफाई। ऐसे कथित चमत्कारों और पाखंडियों की पोल खोलने का काम हमारा संगठन लगातार कर रहा है। संगठन के कार्यकर्ता लगातार लोगों के बीच जाकर जन-जागरूकता अभियान चला रहे हैं। हमारे साथी कार्यक्रम के दौरान सभी कथित चमत्कार करके दिखाते हैं और यह कैसे होता है उसे भी बताते हैं। जिससे आम जनता पाखंडियों की लूट से बच सकें।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाजेशन (एएसओ)

Wednesday, 2 August 2023

संतान की चाह में अंधविश्वास ने ले ली जान


आज आधुनिक युग में भी लोग अंधविश्वास से जकड़े हुए हैं। इसका ताजा उदाहारण छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के उरला थानांतर्गत ग्राम बरबसपुर से मिला है। ऐसी आए दिन खबरें मिलती है कि फलाना तांत्रिक बाबा ने इलाज के नाम से लूटा या पूजा-पाठ कराने के लिए लाखों रुपए लूट लिए, तो कहीं सर्प कांटने पर इलाज करते-करते रोगी की जान चली जाती है।

संतान की चाह में बैगा (तांत्रिक) के पास गए थे नवदंपति

कोरबा के उरगा थाना अंतर्गत ग्राम बरबसपुर के रामाधार पटेल (28 वर्ष) और सुशीला पटेल (27 वर्ष) शादी के एक साल बाद भी संतान नहीं होने से हताश थे। इसका इलाज भी कराया, लेकिन सफल नहीं हुई तो पति-पत्नी को लगने लगा कि कोई काला जादू-टोना किया है, इसलिए बच्चा नहीं हो रहा है। इसका तोड़ के लिए दोनों तांत्रिक रामलाल यादव के पास चले गए। तांत्रिक झाड़-फूंक करने के बाद पति-पत्नी को पूड़िए में दवा दी जिसे खाने के लिए कहा। पुड़िया खोलकर देखा तो उसमें पान के साथ कुछ जड़ी-बूटी थी, उसे खाते ही दोनों पति-पत्नी की तबीयत बिगड़ने लगी तो अस्पताल ले गया, जिससे पत्नी की मृत्यु हो गई और पति के हालत बिगड़ी हुई है।

जादू-टोने पर आज भी विश्वास

आज भी लोग जादू-टोना, तंत्र-मंत्र में विश्वास कर के अपने रिश्तेदार, भाई-बंधु और आस-पास के लोगों को डायन के नाम से बदनाम करते हैं। जिससे आधुनिक समाज को कलंकित होना पड़ता है। आए दिन जादू-टोना, सैतान और डायन के नाम पर महिलाओं की हत्या की जाती है। सामान्य बीमारी होने पर भी तांत्रिक के पास इलाज कराने जाते हैं, मानसिक बीमारी होने पर तो बहुत बड़ा शैतान या डायन के हाथ समझकर झाड़-फंक और बड़ी से बड़ी पूजा करते हैं। जिससे धन खर्च तो होता ही है, उसके साथ शारिरिक और मानसिक रूप से मरीज को कष्ट झेलना पड़ता है, यहां तक भी मरीज की जान भी चली जाती है।

संतान के लिए दूसरे के बच्चे की बलि

महिला-पुरुष दोनों के संगम से मनुष्य जीवन मिलता है। हर दंपति चाहता है कि उनके गोद में भी बच्चा खेले। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अंधविश्वास में पड़कर झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र कराकर अपनी जान तो गंवाता ही है, साथ ही आस-पास के लोगों को भी तकलीफ देता है। कई बार तो संतान प्राप्ति के लिए तांत्रिक के कहने से दूसरे के बच्चे को बलि देकर उस निर्दोष मासूम की जान ले ली जाती है। संतान नहीं होने की वजह स्त्री या पुरुष में कोई कमी होती है, इसको दूर करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास जाकर इलाज कराना चाहिए।

समाज को अंधविश्वास से मुक्त होना चाहिए

हमारे समाज में बहुत ही अंधविश्वास है। इस अंधविश्वास से निकलने के लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है, उसके साथ अपने आस-पास के लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है। व्यक्ति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना चाहिए, बिना तर्क के हवा हवाई बातों में नहीं आना चाहिए। किसी ने कह दिया और उसे मान लेने से भी अंधविश्वास को पनाह मिलता है। अपनी बुद्धि से सोच-समझकर कार्य करना चाहिए। अगर झाड़-फूंक, पूजा-पाठ और तंत्र-मंत्र से किसी के संतान पैदा होता तो बैगा (तांत्रिक) के लिए अलग से पढ़ाई होती, डिग्रियां मिलती और तांत्रिक भी डॉक्टर के स्थान पाता। लेकिन ऐसा नहीं है। कोई जादू-टोना, टोनही (डायन), शैतान, प्रेतात्मा नहीं होते हैं, आज तक किसी ने नहीं देखा है। देखने का दावा करता है वे सब भ्रम के कारण उसे ऐसा लगता है।

- मनोवैज्ञानिक टिकेश कुमार, अध्यक्ष, एंटी सुपरस्टीशन ऑर्गेनाजेशन (एएसओ)