Saturday, 11 February 2017

छत्तीसगढ़िया लोक कलाकारों की शहरों में कद्र नहीं: सीमा कौशिक

छत्तीसगढ़ के शहरों में स्थानीय लोक कलाकारों की कोई कद्र नहीं है। यहां कलाकारों को जो भी सम्मान मिलता है,गांवों में मिलता है। ग्रामीण ही लोककला और संस्कृति को बचाकर रखे हैं, नहीं तो लोककला और लोकसंगीत कब के विलुप्त हो जाते।

यह कहना है छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध लोकगायिका सीमा कौशिक का। कुछ बरस पहले उनके छत्तीसगढ़िया गीत “टूरा नई जानय रे नई जानय, बोली-तोली मया के” ने धूम मचाते हुए बेहद लोकप्रियता हासिल की थी. सीमा कौशिक  से प्रदेश की लोककला और कलाकारों के बारे में हुई बातचीत प्रस्तुत है।
उनका कहना है कि शहर के लोग अपने आप को छत्तीसगढ़िया नहीं कहते। न ही छत्तीसगढ़ी गीतों और फिल्मों को देखते, सुनते हैं। वे अपने बच्चों को भी छत्तीसगढ़ी बोलने के लिए मना करते हैं। यहाँ के कलाकारों को जो भी सम्मान मिलता है वह गांवों में मिलता है। गांव के लोग खुद को छत्तीसगढ़िया कहने में गर्व महसूस करते हैं। छत्तीसगढ़ की संस्कृति को गांव के लोगों ने संरक्षित रखा है।  

वे कहती हैं कि हम कलाकार ग्रामीणों से मिले प्रतिसाद के कारण ही छत्तीसगढ़ी गीत लिख और गा पा रहे हैं। गांव में सुनने वाले अच्छे कान और देखने वाली अच्छी आंखें है। शहर में यहां के कलाकारों को उतना सम्मान नहीं मिल पाता, जितना मिलना चाहिए। यहां तो बाहर के कलाकारों के आयोजन में करोड़ों रूपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन स्थानीय कलाकारों को मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहना पड़ता है। यहां तक कि कलाकारों को कार्यक्रम के लिए उचित मेहनताना भी नहीं दिया जाता है। 

 

तालियाँ सुनकर शरमा जाती थी ...

 

पूरे प्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, बिहार, बैंगलूरू, ओडिशा और महाराष्ट्र समेत अन्य राज्यों में कई कार्यक्रम दे चुकीं लोकगायिका सीमा कौशिक बताती हैं कि वे बचपन से ही आकाशवाणी रायपुर की दीवानी हैं। जब रेडियो सुनते-सुनते सो जाती थी, तो मां-पिताजी खूब डांटते थे। रेडियो पर साधना यादव, कुलवंतिन और जयंती यादव के गीतों को सुना करती थी, साथ ही गाती भी थी। जब रेडियो के गीत और मेरी आवाज बंद हो जाती थी, तो आस-पड़ोस के लोग घर से निकलकर खूब तालियां बजाते थे. मैं बहुत छोटी थी, शरमा जाती थी। तब लोग कहते थे कि बहुत सुंदर गाती है। रेडियो की आवाज और तुम्हारी आवाज तो एक जैसी लगती है। दोनों में अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। स्कूल में गीत गाने पर प्रोत्साहन मिला। 13 वर्ष की उम्र से गा रही हूँ। उसके बाद रजनी और कुलवंतिन के साथ मंच पर गाने लगी। इसी दौरान गीतों की रचना भी करने लगी। सबसे पहला लोकमंच ‘आरो गजरा’ बनाया था। यह 35 कलाकारों की टीम थी। ‘बाली उमर’ एलबम बनाया। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर मेरे गीत प्रसारित होने लगे। फिर मैंने 1998 में ‘मोंगरा के फूल’ के नाम से लोकमंच संस्था तैयार की। आज भी इसी बैनर तले कार्यक्रम करती हूं। मुझे सभी जगहों पर दर्शकों का बहुत प्यार और आशीर्वाद  मिला। श्रोताओं से मिला सम्मान ही किसी कलाकार की जिन्दगी होती है, यह जब तक मिलेगा, तब तक गाती रहूंगी।

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